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AI हमारी नौकरियाँ तो खाएगा ही, पानी भी पी जाएगा

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बड़े-बड़े डेटा केंद्रों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पीने के पानी का इस्तेमाल होता है।

संजय कुंदन

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बारे में अब तक हम यही सुनते आए थे कि यह हमारी नौकरियाँ खा जाएगा, पर अब पता चल रहा है कि यह हमारा पानी भी पीने लगा है और अगर इस बारे में ठोस उपाय नहीं किए गए, तो यह भारी जल संकट पैदा कर सकता है। AI में पानी को लेकर संकट की बात पिछले करीब दो सालों में आई है, जब से AI चैटबॉट का इस्तेमाल शुरू हुआ है। चैटबॉट को चलाने के लिए चाहिए होता है जीपीयू यानी एक कंप्यूटर चिप। इसका उपयोग कंप्यूटर से लेकर लैपटॉप, स्मार्टफोन और अन्य डिवाइसेज में पिक्चर, वीडियो, 2डी और 3डी एनिमेशन को डिस्प्ले करने के लिए किया जाता है। आम भाषा में इसे ग्राफिक्स कार्ड और वीडियो कार्ड भी कहते हैं, जिसकी मदद से इमेज और वीडियो, स्क्रीन पर जल्दी लोड होते हैं। बड़े-बड़े डेटा केंद्रों में जीपीयू के काम करने से ऊर्जा पैदा होती है, जिससे वहां का तापमान बढ़ जाता है। इसको ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल होता है। पानी के पाइप के जरिए बढ़े हुए तापमान को नियंत्रित किया जाता है।

गौरतलब है कि ऐसी जगहों पर परंपरागत एयरकंडीशनर काम नहीं आते। खाड़ी के देशों में इनका इस्तेमाल बहुत आम है। फोर्ब्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टेक कंपनियों ने इन डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल हाल में बहुत बढ़ा दिया है। असल में इसके लिए ताज़ा पानी चाहिए होता है क्योंकि समुद्र के पानी में नमक होता है। वह इस काम के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। साफ़ पानी से बैक्टीरिया और जंग लगने का ख़तरा कम होता है। यानी पहले से ही साफ़ पानी के लिए तरस रही दुनिया का संकट और बढ़ सकता है क्योंकि अब बहुत सारा साफ़ पानी AI पी जाएगा।

AI कितना पानी ख़र्च कर रहा है, इसको लेकर अलग-अलग अनुमान व्यक्त किए गए हैं। ओपनएआई के चीफ़ एग़्जीक्यूटिव ऑफ़िसर (सीईओ) सैम ऑल्टमैन का कहना है कि चैटजीपीटी से किए गए एक सवाल का जवाब पाने में लगभग एक चम्मच के पंद्रहवें हिस्से जितना पानी लगता है। लेकिन कोलोराडो रिवरसाइड विश्वविद्यालय और टेक्सास अर्लिंगटन विश्वविद्यालय की एक स्टडी ‘मेकिंग एआई लेस थर्स्टी’ में पाया गया कि कंपनी के जीपीटी‑3 मॉडल से 10 से 50 सवालों के जवाब देने में लगभग आधा लीटर पानी लगता है यानी हर जवाब के लिए क़रीब 2 से 10 चम्मच पानी की खपत होती है। पानी के इस्तेमाल का अनुमान कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे किस तरह का सवाल है, जवाब कितना लंबा है, जवाब कहां प्रोसेस हो रहा है और कैलकुलेशन में किन चीज़ों को शामिल किया गया है। इस अध्ययन में जो 500 मिलीलीटर का अनुमान लगाया गया है, उसमें उस पानी को भी गिना गया है जो बिजली बनाने में लगता है, जैसे कोयला, गैस या परमाणु ऊर्जा केंद्रों में टर्बाइन चलाने के लिए भाप तैयार करने में। इस अध्ययन का मानना है कि वैश्विक AI मांग के कारण 2027 तक AI का वार्षिक जल उपयोग 4.2 से 6.6 बिलियन क्यूबिक मीटर (4.2–6.6 ट्रिलियन लीटर) तक पहुँच जाएगा, जो डेनमार्क से अधिक और यूके का लगभग आधा है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) का अनुमान है कि जैसे-जैसे AI की मांग बढ़ेगी, 2030 तक डेटा सेंटर्स द्वारा पानी का इस्तेमाल लगभग दोगुना हो जाएगा। इसमें वह पानी भी शामिल है जो बिजली बनाने और कंप्यूटर चिप बनाने की प्रक्रिया में लगता है।

ज्यों-ज्यों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ा है, इनके डेटा केंद्रों का विरोध भी बढ़ने लगा है। चिली के सैंटियागो में गूगल के एक डेटा सेंटर के प्रस्ताव का स्थानीय समुदाय ने विरोध किया था। कोर्ट ने क्लाइमेट चेंज के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए साइट डिज़ाइन में बदलाव कराने की सलाह दी। उरूग्वे में इसी तरह विरोध हुआ। ब्रिटेन में पर्यावरण एजेंसियों ने कहा है कि डेटा सेंटरों के पानी उपयोग के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इससे भविष्य में जल योजनाएँ बनाने में बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। स्पेन में ‘योर क्लाउड इज़ ड्राइंग अप माय रिवर (तुम्हारा क्लाउड मेरी नदी सुखा रहा है)’ नाम का एक पर्यावरण समूह बना है, जो डेटा सेंटर्स के बढ़ते विस्तार का विरोध कर रहा है। पर्यावरण समूह, शोधकर्ता और निवेशक अब AI कंपनियों से जल के उपयोग को लेकर पारदर्शिता बरतने और जल कुशल तकनीक अपनाने की मांग कर रहे हैं।

इन सब से कंपनियों पर दबाव काफ़ी बढ़ा है कि वे इस बारे में कोई ठोस क़दम उठाएं। कुछ कंपनियां अब समुद्र के पानी या फैक्ट्री का गंदा पानी (जो पीने लायक़ नहीं होता) इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही हैं। गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट, एडब्ल्यूएस और मेटा ने दावा किया है कि वे हर जगह स्थानीय हालात को देखते हुए कूलिंग टेक्नोलॉजी का चुनाव करती हैं। इन सभी कंपनियों ने 2030 तक ‘वॉटर पॉज़िटिव’ बनने का लक्ष्य रखा है। इसका मतलब है कि औसतन वे जितना पानी इस्तेमाल करेंगी, उससे ज़्यादा पानी वापस लौटाने की कोशिश करेंगी। इस मक़सद के लिए ये कंपनियां उन इलाक़ों में पानी बचाने और दोबारा पानी भरने वाली परियोजनाएँ चलाती हैं जहां उनके डेटा सेंटर्स हैं। वे जंगल या वेटलैंड को फिर से तैयार करने, पाइपलाइन में लीकेज ढूंढने या सिंचाई के बेहतर तरीक़े अपनाने पर भी ज़ोर देती हैं।

विशेषज्ञों ने AI के कारण पैदा हो रहे जल संकट को दूर करने के लिए कई रास्ते सुझाए हैं। एक उपाय है- ऊर्जा-कुशल डेटा सेंटर्स का विकास जिसके तहत लिक्विड कूलिंग या इमर्सन कूलिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करके पानी की खपत को कम किया जा सकता है। उनका सुझाव है कि डेटा सेंटर्स को ऐसे क्षेत्रों में स्थानांतरित करना चाहिए जहाँ प्राकृतिक ठंडक मिलती है (जैसे नॉर्डिक देश), जिससे ठंडा करने के लिए पानी की आवश्यकता कम हो जाती है। पीने योग्य पानी की बजाय ग्रे वाटर या रिसाइकल्ड इंडस्ट्रियल वॉटर का उपयोग AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए किया जाए। इसके अलावा छोटे, अधिक कुशल AI मॉडल विकसित करना जो कम संसाधन (पानी और बिजली) का उपयोग करें। जैसे जीपीटी-4 जितने बड़े मॉडल की बजाय विशिष्ट कार्यों के लिए छोटे, सीमित मॉडल इस्तेमाल करना। कई विशेषज्ञ स्मार्ट वॉटर मैनेजमेंट सिस्टम (AI आधारित) के उपयोग की राय देते हैं यानी जल संरक्षण में खुद AI का उपयोग करना। इसमें लीकेज डिटेक्शन, स्मार्ट सिंचाई प्रणाली, पानी के उपयोग की मॉनिटरिंग और अनुकूलन, भविष्य के जल संकट की भविष्यवाणी का सिस्टम विकसित करना शामिल है। एक राय यह भी दी जाती है कि जहां संभव हो, वहाँ सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय स्रोतों से डेटा सेंटर्स को बिजली दी जाए, जिससे परोक्ष रूप से जल की खपत घटे क्योंकि पारंपरिक बिजली उत्पादन में भी बहुत पानी लगता है।

AI हमारे दौर की एक सचाई है, जिससे मुँह मोड़ना मुश्किल है। आने वाले समय में इसका उपयोग बढ़ना तय है। ऐसे में हमें इसके नकारात्मक प्रभावों को लेकर अभी से सचेत हो जाना होगा। इस बारे में जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है। सामाजिक संगठनों को आगे आना होगा ताकि कंपनियों पर यह दबाव बने कि वे पानी के उपयोग को लेकर सचेत हों और ज़रूरी प्रबंध करें। सरकारों पर भी यह दबाव बने कि वह जल के उपयोग के लिए सख़्त मापदंड निर्धारित करे और पर्यावरणीय नियमों का लागू होना सुनिश्चित करे।

<इस लेख में शामिल तस्वीरें ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान द्वारा 2018 में जारी किए गए दूसरे डोसियर से ली गई हैं। पिछले पाँच सालों के दौरान हमने हर महीने वैश्विक दक्षिण के नज़रिए से एक डोसियर जारी किया है। हमने हाल ही में बांडुंग भावना पर एक डोसियर लिखा है।>