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	<title>Hindi Archives - Tricontinental: Institute for Social Research | Tricontinental: Institute for Social Research</title>
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	<description>international, movement-driven institution focused on stimulating intellectual debate that serves people’s aspirations.</description>
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		<title>संकट के दौर में संस्कृति का आईना : फिल्म &#8216;अस्सी&#8217; क्यों है ज़रूरी?</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/assi-film-sankat-ke-daur-me-sanskriti-ka-aaina/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Mar 2026 02:27:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बढ़ती असहिष्णुता और हिंसा के बीच ‘अस्सी’ सिर्फ यौन अपराध की कहानी नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है जो खुद से सवाल पूछने से बचता रहा है।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ba2025;">-सोनाली</span></strong></p>
<div id="attachment_136994" class="wp-caption aligncenter"><img fetchpriority="high" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-136994" class="size-full wp-image-136994 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Assi.jpg" alt="" width="800" height="450" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Assi.jpg 800w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Assi-300x169.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Assi-768x432.jpg 768w" sizes="(max-width: 800px) 100vw, 800px"><p id="caption-attachment-136994" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>फ़िल्म से एक दृश्य</small></p></div>
<p><span style="font-weight: 400;">जब कोई समाज किसी बहुत बड़े संकट से गुज़र रहा होता है, उस वक्त उसके हर पहलू की छोटी-से-छोटी गतिविधि और हर रुझान बेहद अहम हो जाता है। फिलहाल भारतीय समाज ऐसे ही एक गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। इस संकट की सबसे भयावह अभिव्यक्ति है – लगातार बढ़ती हिंसा। यह हिंसा किसी एक रूप में नहीं, बल्कि कई रूपों में हमारे सामने आती है। कहीं मॉब लिंचिंग की घटनाएं हैं, तो कहीं बुलडोज़र के नाम पर हो रहा अन्याय। जनता के संवैधिनिक अधिकारों का हनन आम बात हो गया है। दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं और नियम-कायदों का खुलकर उल्लंघन हो रहा है। ये सब हिंसा के वो रूप हैं जो आम लोगों के जीवन को गहराई से प्रभावित करते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस हिंसा को रोकना काफी हद तक समाज की वैचारिक प्रगतिशीलता पर टिका है। समाज के विभिन्न घटक इस संकट के बढ़ने और इससे लड़ने, दोनों ही प्रक्रियाओं में अहम भूमिका निभाते हैं। इनमें सांस्कृतिक संसाधन और अभिव्यक्तियाँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। सांस्कृतिक क्षेत्र यानी साहित्य, सिनेमा, संगीत, नाटक और कला, बाकी सभी क्षेत्रों के मुकाबले ज्यादा सूक्ष्मता से काम करते हैं और इनका प्रभाव भी गहरा और स्थायी होता है। यही वजह है कि किसी भी समाज की प्रगतिशीलता का अंदाजा उसके सांस्कृतिक परिदृश्य को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पिछले एक दशक में दक्षिणपंथ के उभार ने भारतीय समाज में हिंसा और हिंसक प्रवृत्तियों को किस हद तक बढ़ावा दिया है, इसकी झलक हमारी फिल्मों में साफ देखी जा सकती है। खासकर मुंबई स्थित हिंदी फिल्म उद्योग में ऐसी कई फिल्में बनी हैं जो या तो इस हिंसा को महिमामंडित करती हैं या फिर सामाजिक सरोकारों से किनारा करती हुई नजर आती हैं। लेकिन हर दौर में कुछ अपवाद भी होते हैं – कुछ ऐसी फिल्में जो अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को समझती हैं और संकट के खिलाफ एक सार्थक आवाज बनकर उभरती हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसी ही एक फिल्म है अनुभव सिन्हा निर्देशित ‘अस्सी’। यह फिल्म अपने मूल विषय – महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध – के साथ-साथ हिंसा की उस व्यापक प्रवृत्ति की भी पड़ताल की कोशिश करती है जो आज हमारे समाज का सबसे बड़ा संकट बन चुकी है। इस फिल्म को खास बनाने वाली कई और भी बातें हैं, जो इसे आम सिनेमा से अलग और सार्थक बनाती हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि फिल्म यौन हिंसा की भयावहता को पूरी गंभीरता के साथ दिखाने के बावजूद पीड़िता के पूरे अस्तित्व को उस एक घटना में सिमटकर नष्ट नहीं होने देती। अक्सर हमारे समाज और सिनेमा में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि यौन अपराध की शिकार महिला की पहचान सिर्फ उस एक घटना से हो जाती है। उसके सपने, उसकी महत्वाकांक्षाएं, उसका व्यक्तित्व सब कुछ उस दर्दनाक अनुभव के आगे गौण हो जाता है। ‘अस्सी’ इस खतरनाक सोच को चुनौती देती है। फिल्म साफ संदेश देती है कि यौन अपराध, चाहे वह कितना भी घृणित और कल्पना से परे क्यों न हो, उसे पीड़िता की पूरी जिंदगी पर हावी नहीं होने दिया जाना चाहिए। पीड़िता भी सिर्फ पीड़िता नहीं होती, बल्कि वह एक इंसान होती है जिसके सपने होते हैं, जो आगे बढ़ सकती है और जिसका अपना एक अलग व्यक्तित्व होता है। फिल्म इस मानवीय दृष्टिकोण को बखूबी पेश करती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दूसरी और शायद सबसे अहम बात यह है कि ‘अस्सी’ कंगारू कोर्ट या भीड़ की अदालत की अवधारणा को पूरी तरह खारिज करती है। आज के दौर में जहां सोशल मीडिया के कोर्ट में फैसले सुनाए जाते हैं और भीड़ कानून अपने हाथ में लेने को उतारू रहती है, यह फिल्म एक अलग और संवैधानिक रास्ता दिखाती है। फिल्म अपराधिक न्याय के उस बुनियादी सिद्धांत के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है कि कोई अपराध हुआ या नहीं और उसके लिए क्या सजा होगी, यह फैसला सिर्फ अदालत ही करेगी और वह भी विधि सम्मत प्रक्रिया के तहत। फिल्म बदले की भावना से परे हटकर न्याय की उस व्यवस्था को बरकरार रखती है जो एक सभ्य और लोकतांत्रिक समाज की पहचान होती है। यह दिखाती है कि सही मायनों में न्याय वही है जो अदालत में सबूतों और गवाहों के आधार पर स्थापित हो, न कि सड़कों पर भीड़ के गुस्से से।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">तीसरा और व्यापक संदेश जो यह फिल्म देती है, वह है आत्मचिंतन का। ‘अस्सी’ हमें इस तथ्य पर गहराई से सोचने को मजबूर करती है कि एक समाज जो तेजी से असहिष्णु और हिंसक होता जा रहा है, उसके लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह रुककर आत्मनिरीक्षण करे। फिल्म सवाल उठाती है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्या सिखा रहे हैं। यह महज किताबी शिक्षा की बात नहीं है, बल्कि उस समग्र संस्कार और परवरिश की बात है जो एक बच्चे को घर और समाज से मिलती है। फिल्म रेखांकित करती है कि अगर हमें हिंसा के इस दौर को रोकना है तो हमें अपने बच्चों को संवेदनशील, सहिष्णु और न्यायप्रिय इंसान बनाना होगा। यह सिर्फ स्कूलों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आज जब हमारे सांस्कृतिक परिदृश्य पर अक्सर वही फिल्में हावी रहती हैं जो हिंसा को महिमामंडित करती हैं या सामाजिक मुद्दों से आंखें मूंद लेती हैं, ‘अस्सी’ जैसी फिल्में उम्मीद की किरण की तरह दिखती हैं। यह फिल्म सिर्फ एक मनोरंजन का जरिया नहीं है, बल्कि उस वैचारिक प्रगतिशीलता की मिसाल है जिसकी आज के भारतीय समाज को सख्त जरूरत है। यह हमें याद दिलाती है कि सिनेमा सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। और इस जिम्मेदारी को निभाते हुए ‘अस्सी’ न सिर्फ महिलाओं के खिलाफ हिंसा के सवाल पर, बल्कि न्याय की हमारी समझ और हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर भी एक सार्थक बहस छेड़ती है। ऐसे में यह फिल्म उन गिनी-चुनी कृतियों में शुमार की जा सकती है जो संकट के इस दौर में समाज का आईना बनकर हमें अपनी असल तस्वीर दिखाती हैं और बदलाव का रास्ता भी सुझाती हैं। सिनेमा के सौंदयशास्त्र के आधार पर ‘अस्सी’ का विश्लेषण इस कला के जानकरों और फ़िल्म समीक्षकों का विषय है, और यह लेख ऐसा करने का दावा नहीं करता। मौजूदा दौर में अस्सी एक अच्छी या बुरी फ़िल्म नहीं, बल्कि एक ज़रूरी फ़िल्म है।</span></p>
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		<title>प्रकाशन उद्योग को मिलने लगी हैं नई साँसें</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/prakashan-udyog-ko-mil-rahi-nai-sansein/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 27 Feb 2026 18:13:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बढ़ती असहिष्णुता और हिंसा के बीच ‘अस्सी’ सिर्फ यौन अपराध की कहानी नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है जो खुद से सवाल पूछने से बचता रहा है।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p dir="ltr"><strong><span style="color: #ba2025;">संजय कुंदन</span></strong></p>
<p dir="ltr">पिछले क़रीब एक दशक में पठनीयता और प्रकाशन को लेकर ज़्यादातर विरोधाभासी बातें ही सुनने को मिलती रही हैं। कभी कहा जाता कि पठनीयता बढ़ रही है, कभी कहा जाता कि पठनीयता काफ़ी कम हो गई है, तकनीकी विकास के कारण प्रिंट माध्यम की विदाई तय है। बस अब उसके गिने-चुने दिन ही रह गए हैं। प्रकाशकों का एक वर्ग दावा करता रहा है कि उसकी बिक्री बढ़ी है, वहीं दूसरा तबक़ा कम बिक्री का रोना रोता रहा। लेकिन आमतौर पर किसी प्रकाशक को धंधा बंद कर कहीं किसी और क्षेत्र में जाते नहीं देखा गया। इन तमाम दावों-प्रतिदावों के बीच बीते साल हिंदी के एक लेखक को तीस लाख रॉयल्टी दिए जाने की घटना भी सामने आ गई। जबकि ज़्यादातर लेखक रॉयल्टी न मिलने की शिकायत करते हैं। ऐसे में एक भ्रम की स्थिति बनी रहती है कि आख़िर प्रकाशन जगत की सही तस्वीर क्या है। पुस्तक पढ़ने-बिकने के परिदृश्य को किस रूप में देखा जाए?</p>
<p dir="ltr">दरअसल चीज़ें बदल रही हैं, उतार-चढ़ाव जारी है, लेकिन कोई सही-सही तस्वीर नहीं उभर रही है। इसका एक ठीक-ठीक वस्तुनिष्ठ आकलन अभी भी बाक़ी है। कई अध्ययन और सर्वेक्षण बीच-बीच में आते रहते हैं, जिनसे यह तो लगता है कि हालात उतने ख़राब नहीं है, जितने कुछ समय पहले तक बताए जा रहे थे। बल्कि कुछ स्रोत बता रहे हैं कि स्थितियाँ बेहतर हो रही हैं।</p>
<p dir="ltr">इसमें कोई शक नहीं कि प्रकाशन उद्योग पर गहरा दबाव है। नई तकनीक ने उसके सामने नई चुनौतियाँ पेश की हैं, लेकिन यह भी सच है कि प्रकाशन उद्योग ने प्रौद्योगिकी से हाथ मिलाकर अपने लिए नया रास्ता भी खोजने की कोशिश की है। मसलन अमेज़न जैसा बड़ा प्रकाशक पेपरबैक और हार्डबाउंड किताबों से कहीं ज़्यादा किंडल ईबुक बेच रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में ऑडियोबुक की बिक्री 2013 से दोगुनी से भी अधिक हो गई है। इसलिए, लोग अब भी अच्छी पुस्तकों को पसंद करते हैं, बस अब वे अलग-अलग प्रारूपों में उपलब्ध हैं। पर उन देशों में एक वर्ग यह मानता है कि मुद्रित किताबों का कोई विकल्प नहीं है। बल्कि कुछ अध्ययन यहाँ तक दावा करते हैं कि अभी भी मुद्रित किताबें ही ज़्यादा बिक रही हैं।</p>
<div id="attachment_136379" class="wp-caption aligncenter"><img decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-136379" class="size-full wp-image-136379 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/after-fernand-leger-la-lecture-reading-1953-for-sale-web.jpg" alt="" width="1000" height="792" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/after-fernand-leger-la-lecture-reading-1953-for-sale-web.jpg 1000w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/after-fernand-leger-la-lecture-reading-1953-for-sale-web-300x238.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/after-fernand-leger-la-lecture-reading-1953-for-sale-web-768x608.jpg 768w" sizes="(max-width: 1000px) 100vw, 1000px"><p id="caption-attachment-136379" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>फेरनांड लेगेर (फ़्रांस), पाठक, 1953</small></p></div>
<p dir="ltr">भारत में कई प्रकाशक भी यही मानते हैं। उनके मुताबिक बीच में ऐसा ज़रूर लगा कि छपी हुई किताबों का समय जा रहा है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बल्कि पिछले कुछ वर्षों में मुद्रित किताबों की माँग बढ़ी ही है। पुस्तक मेलों, साहित्य उत्सवों में किताबों की बढ़ती बिक्री से यह धारणा बनी है। इस बात से भी इसका संकेेत मिल रहा है कि प्रकाशन के क्षेत्र में नए-नए लोग लगातार आ रहे हैं। इसके पीछे भी तकनीक ही है। अब डिजिटल प्रिंटिंग के साथ, मात्रा कोई चिंता का विषय नहीं रह गई है। एक ही पुस्तक की अधिक प्रतियाँ छापने की तुलना में विभिन्न पुस्तकों की कम प्रतियाँ छापना अधिक किफ़ायती है। इससे भंडारण लागत में बचत होती है, और डिजिटल प्रिंटिंग से माँग के अनुसार प्रिंट किया जा सकता है। अब शायद ही कोई लेखक हो जो कंप्यूटर पर काम न करता हो, ऐसे में टाइपिंग और प्रूफ रीडिंग का ख़र्च भी बच रहा है। प्रिंटिंग आदि की लागत बढ़ने के बावजूद कई और चीज़ों में बचत से उसकी भरपाई हो जा रही है।</p>
<p dir="ltr">हालाँकि वे दिन अब चले गए, जब किसी बेस्टसेलर किताब की 100,000 प्रतियाँ बिकती थीं। भारत में अब बेस्टसेलर का मतलब 3,000 से 5,000 प्रतियाँ बिकना होता है। ऑनलाइन तकनीक ने किताबों के प्रचार में मदद की है। अब सोशल मीडिया पर किताबों की जानकारी व्यापक रूप में उपलब्ध रहती है। पाठक को किताबों के बारे में व्यक्तिगत स्तर पर जानकारी मिलती रहती है। ऑनलाइन बिक्री की सुविधा के कारण वह आसानी से घर बैठे किताबें ख़रीद लेता है। इसका बिक्री पर सकारात्मक असर हुआ है। शायद किताबों की सहज उपलब्धता ने एक बार फिर पढ़ने के प्रति रुचि बढ़ाई है।</p>
<p dir="ltr">कुछ साल पहले आई एक विस्तृत बाज़ार रिपोर्ट के अनुसार भारतीय पहले से कहीं अधिक फिक्शन पढ़ रहे हैं और फिक्शन के बाजार में साल दर साल 20% की वृद्धि हुई है। लेकिन  नॉन-फिक्शन की माँग सबसे ज़्यादा है। एक अनुमान है कि भारत में ऑनलाइन शॉपिंग और फिजिकल रिटेल शॉपिंग अब 50:50 के अनुपात में है। इंडिया बुक मार्केट रिपोर्ट-2022 की मानें तो 2024-25 में मुद्रित पुस्तकों का बाजार 98,920 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। दस साल पहले यह आँकड़ा 30,660 करोड़ रुपये था।</p>
<p dir="ltr">मुद्रित किताबों के प्रति रुचि जगाने में पुस्तक मेलों, साहित्य उत्सवों का बड़ा योगदान है। कोलकाता के अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में लाखों की संख्या में लोगों ने शिरकत की है। इसी तरह, दिल्ली का अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला भी हर साल लाखों पाठकों को अपनी ओर खींचता है। नेशनल बुक ट्रस्ट की तरफ से लखनऊ में आयोजित गोमती पुस्तक महोत्सव में पिछले साल किताबों की बिक्री में 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। इन मेलों की अभूतपूर्व सफलता यह कहती है कि पढ़ने की संस्कृति एक नए सिरे से तैयार हो रही है। लिटरेचर फेस्टिवलों की कई कारणों से आलोचना की जाती है। कहा जाता है कि यह साहित्य को ग्लैमर या तमाशे में बदल देता है। जो भी हो लेकिन उसकी वजह से लोगों की एक भारी भीड़ वहाँ जुटती है और उसका एक छोटा हिस्सा भी पुस्तकों की ओर आकर्षित होता है तो इससे पाठकों की संख्या में इज़ाफ़ा ही होता है।</p>
<div id="attachment_136387" class="wp-caption aligncenter"><img decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-136387" class="size-full wp-image-136387 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/van-gogh.jpg" alt="" width="734" height="504" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/van-gogh.jpg 734w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/van-gogh-300x206.jpg 300w" sizes="(max-width: 734px) 100vw, 734px"><p id="caption-attachment-136387" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>विन्सेंट वान गो (नीदरलैंड्ज़), फ़्रेंच उपन्यासों का ढेर, 1887</small></p></div>
<p dir="ltr">पूरी दुनिया में पढ़ने की आदत को फिर से जीवित करने और प्रोत्साहित करने के लिए कई अद्भुत पहलकदमियाँ चल रही हैं। भारत के कई शहरों, जैसे मुंबई, पुणे और बेंगलुरू में, ‘बुक्सीज़’ जैसे अनोखे सामुदायिक कार्यक्रम बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं। इन कार्यक्रमों में हर उम्र के लोग सार्वजनिक पार्कों या अन्य शांत स्थानों पर एक साथ बैठकर घंटों चुपचाप अपनी-अपनी किताबें पढ़ते हैं। ज़ाहिर है इससे पढ़ना एक निजी गतिविधि तक सीमित नहीं रह जाता। यह एक सुखद सामाजिक  अनुभव में बदल जाता है।</p>
<p dir="ltr">इन वैश्विक प्रयासों के साथ-साथ, भारत में सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर स्कूलों में पुस्तकालयों को मजबूत किया जा रहा है और बच्चों में छोटी उम्र से ही पढ़ने की आदत डालने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। यह बात अब व्यापक स्तर पर महसूस किया जा रहा है कि मुद्रित किताबों की जगह डिजिटल किताबें नहीं ले सकतीं। दुनिया भर में जो लोग डिजिटल माध्यम पर गए उन्होंने भी महसूस किया कि छपी हुई किताबों का अपना ही एक सुख है, और उसके साथ जो सुविधाएँ हैं, उन्हें डिजिटल माध्यम से हासिल नहीं किया जा सकता। डिजिटल माध्यम भी ज़रूरी हैं, लेकिन मुद्रित किताबों को जीवन से बाहर नहीं किया जा सकता। यानी दोनों चाहिए। इसी बात को अभिनेता स्टीफन फ्राई ने कुछ साल पहले इन शब्दों में व्यक्त किया था ,‘एक तकनीक दूसरी तकनीक की जगह नहीं लेती, बल्कि उसकी पूरक होती है। किताबों को किंडल से उतना ही खतरा है जितना सीढ़ियों को लिफ्ट से।’</p>
<p dir="ltr">हाँ, अख़बारों की बिक्री में लगातार गिरावट आई है क्योंकि अधिक से अधिक लोग समाचारों के लिए ऑनलाइन माध्यम पर जा रहे हैं। पत्रिकाएँ लगभग हर दिन बंद होती जा रही हैं। प्रिंट मीडिया और पत्रिकाओं का विज्ञापन राजस्व लगातार कम हो रहा है। अखबार उद्योग को प्रभावित करने वाली एक प्रमुख समस्या तकनीकी से ज़्यादा ऑनलाइन से जुड़ी है। टैब्लॉइड अखबार इससे विशेष रूप से प्रभावित हुए हैं क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा पाठक मनोरंजन जगत की खबरें पाने के लिए सोशल मीडिया का रुख कर रहे हैं। जब आप इंस्टाग्राम पर मशहूर हस्तियों को फॉलो कर सकते हैं और उनसे सीधे बातचीत भी कर सकते हैं, तो अख़बार ख़रीदकर उनके बारे में पढ़ने की क्या ज़रूरत है? इस बीच, कई लोग दुनिया भर की ख़बरें जानने के लिए 24 घंटे चलने वाले समाचार चैनलों या वेबसाइटों का सहारा लेते हैं। ऐसे में, समाचार पत्र उद्योग को प्रिंट मीडिया में गिरावट और उसके परिणामस्वरूप विज्ञापन राजस्व में आई कमी से निपटने के लिए नए-नए उपाय अपनाने पड़ रहे हैं।</p>
<p dir="ltr">भविष्य को देखते हुए, यह संभावना है कि सबसे सफल प्रकाशक वे होंगे जो बहुस्तरीय  प्रकाशन को अपनाएंगे – वास्तविक और डिजिटल दुनिया के बीच की खाई को पाटेंगे। मुद्रित प्रकाशन पढ़ना एक ऐसा ‘आरामदायक अनुभव’ है जो उपभोक्ता को डिजिटल दुनिया की भागदौड़ से कुछ पल का विराम देता है। और जैसे-जैसे जीवन की जटिलता बढ़ी है, भागदौड़ बढ़ी है, दूरियाँ बढ़ी है, सूचनाओं-तथ्यों और आभासी दुनिया की चकाचौंध बढ़ी है, हमें वास्तविक दुनिया में मौजूद रहने के इन छोटे-छोटे पलों की आवश्यकता पड़ने लगी है। और ऐसे पलों का साथी बनती है-छपी हुई किताबें।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>हम भारत के लोग…और न्याय की चरमराती तिपाई</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/hum-bharat-ke-log/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 25 Jan 2026 14:26:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पुस्तक मेलों और साहित्य उत्सवों में किताबों की बढ़ती बिक्री से संकेत मिलता है कि लोग फिर प्रिंट माध्यम की ओर लौट रहे हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ba2025;"><strong>सोनाली</strong></span></p>
<p>आज़ाद भारत की नींव का सबसे अहम पत्थर है भारतीय संविधान। इस एक दस्तावेज़ ने कोशिश की है कि सालों, बल्कि सदियों से चले आ रहे तमाम तरह के अन्यायों को मिटाने की एक राह मिले। संविधान की प्रस्तावना, जिसे उसकी आत्मा कहा जाता है, में दिए गए तमाम आदर्शों में से एक है न्याय। यह भारत को एक ऐसा देश बनाने का सपना देखता है जहाँ लोगों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके। लेकिन क्या यह सपना पूरा हुआ? या इसे गंभीरता से लिया जा रहा है? इस साल 26 जनवरी को जब हम संविधान लागू होने के छिहत्तर साल पूरे होने का जश्न मनाने वाले हैं, तो एक बार न्याय के इस आदर्श की देश में मौजूदा स्थिति का जायज़ा भी लिया जाना चाहिए।</p>
<p>भारतीय संविधान जिस न्याय की संकल्पना पेश करता है वह केवल अदालतों और क़ानूनों पर टिका नहीं है बल्कि न्याय की एक व्यापक समझ पर आधारित है। सामाजिक न्याय – यानी भारतीय समाज में पुराने समय से चले आ रहे जातीय, लैंगिक, वर्गीय भेदभाव को ख़त्म किया जाए, आर्थिक न्याय – मेहनत की लूट जो सामंती और पूँजीवादी व्यवस्था की नींव है, ऐसी व्यवस्थाओं को ख़त्म कर आर्थिक असमानताओं की खाई को पाटना, और राजनीतिक न्याय – राष्ट्र निर्माण में, नीति निर्माण में बिना भेदभाव देश के प्रत्येक नागरिक की भागीदारी को सुनिश्चित किया जाना, असहमति प्रकट करने की आज़ादी भी इस राजनीतिक न्याय की प्रक्रिया का एक अहम पहलू है। संविधान में दिए गए कई प्रावधानों के पीछे न्याय का यही विचार है, जैसे जातिगत आरक्षण, सार्वभौमिक मताधिकार, मौलिक अधिकार व स्वतंत्रताएँ, राज्य और धर्म का अलगाव, राज्य के नीति निदेशक तत्व जिसमें भौतिक संसाधनों का वितरण और नियंत्रण सामूहिक हित के आधार पर किए जाने की बात की गई है आदि। तो क्या आज भारत में न्याय का यह विचार, यह आदर्श अपनी पूरी जीवंतता के साथ लागू है?</p>
<p>भारत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के ख़िलाफ़ अपराध में लगातार वृद्धि हो रही है। यह राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों से साफ़ है। इसके साथ ही अल्पसंख्यकों, ख़ासतौर से मुसलमानों, पर हमलों के मामले भाजपा सरकार के केंद्र में आने के बाद से आम बात हो गये हैं। देश में हिंदुत्व के आधार पर जो एक धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है वह सामाजिक न्याय के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है। राज्य और धर्म के बीच की रेखा लगातार धूमिल की जा रही है। इसके साथ ही भाजपा सरकार जिस तरह हर क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा दे रही है उससे शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों से सबसे ज़्यादा हाशिए के समुदाय ही वंचित होंगे। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को निजी हाथों में दिया जा रहा है, दूरसंचार, बिजली वितरण, यहाँ तक कि रक्षा क्षेत्र में भी निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे सरकारी नौकरियों में कमी आएगी और नौकरियों में आरक्षण की स्थिति कमज़ोर होगी। देश भर से सरकारी स्कूलों के बंद किए जाने की ख़बरें आ रही हैं, इन स्कूलों के बंद होने से सबसे ज़्यादा दलित, आदिवासी और उनमें भी लड़कियाँ पढ़ने के अधिकार को खो रही हैं।</p>
<p>आर्थिक न्याय पर दो बड़े प्रहार 2025 के अंत में केंद्र की मोदी सरकार ने किए – एक, कई श्रम क़ानूनों की जगह चार लेबर कोड्स लागू किए गए, दूसरा, दुनिया में अपनी तरह का अनूठा ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून यानी महात्मा गाँधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) में बुनियादी बदलाव कर इसे लगभग निरस्त कर दिया गया। चार लेबर कोड्स दशकों के कड़े संघर्ष से हासिल किए मज़दूरों के अधिकारों को लगभग ख़त्म कर, कॉर्पोरेट और उद्योगपतियों के हितों की रक्षा करते हैं। इनके तहत अब मालिकों को ‘हायर और फ़ायर’ का अधिकार यानी बिना नोटिस या कारण बताए कर्मचारियों को नौकरी से निकाल देने का हक़ मिल गया है। साथ ही उन्हें यह भी अधिकार मिल गया है कि 100 मज़दूरों या कर्मचारियों तक की कंपनियाँ या कारख़ाने अब बिना सरकारी अनुमति के बंद किए जा सकते हैं, पहले यह सीमा 300 तक की थी। इन कोड्स के तहत यूनियन बनाने, हड़ताल पर जाने, आदि जैसे मज़दूरों के अपने अधिकारों की लड़ाई के अहम और कारगर हथियार उनसे छीन लिए गए हैं। मज़दूर संगठनों के मुताबिक़ केंद्र सरकार ने देश के श्रमिक वर्ग को पूँजीपतियों की ग़ुलामी करने के लिए मजबूर कर दिया है।</p>
<p>दूसरी ओर, मनरेगा, जिसका नाम बदलकर विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) [वी बी – जी राम जी] कर दिया गया है, की आत्मा को ही भाजपा-नीत एनडीए सरकार ने ख़त्म कर दिया है। इस परियोजना में बुनियादी परिवर्तन कर इसे पंगु बना दिया गया है। यह योजना अब तक स्थानीय माँग के आधार पर चलती थी, यानी स्थानीय स्तर पर जिस तरह के विकास कार्य की ज़रूरत थी वे इसके तहत किए जाते थे, और ग्रामीण जनता को साल के सौ दिन के रोज़गार की गारंटी दी जाती थी। अब इसके अंतर्गत क्या काम होंगे वह केंद्र निर्धारित करेगा जिसका केवल क्रियान्वयन स्थानीय शासन यानी पंचायत पर छोड़ दिया गया है। मनरेगा के तहत पंचायत को जो अधिकार मिले हुए थे वे भारतीय लोकतंत्र का विस्तार स्थानीय स्तर तक करने का काम भी करते थे। नए बदलावों के तहत योजना के ख़र्च का 40% भार अब राज्यों पर थोप दिया गया है। इससे ज़ाहिर है कि राजस्व के लिए लगभग पूरी तरह केंद्र पर निर्भर हो चुके राज्य अब ग्रामीण श्रमिक वर्ग के लिए जीवनदायिनी इस योजना पर उतना ही ध्यान देंगे जितना उनकी तंग होती जा रही जेब इजाज़त देगी। साथ ही, कटाई के समय साल में 60 दिन अब इस परियोजना के तहत श्रमिक काम नहीं माँग सकते, यानी उन्हें बड़े भू-स्वामियों या किसानों के यहाँ उनकी शर्तों पर काम करने को मजबूर होना पड़ेगा। यह कदम साफ़ तौर से सामंती दासता और शोषण को बढ़ावा देने का काम करेगा।</p>
<p>साल 2025 में देश ने सार्वभौमिक मताधिकार पर जितना बड़ा हमला देखा, वह आज़ादी के बाद अब तक नहीं देखा गया है। बिहार चुनावों से ऐन पहले मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेन्सिव रिविज़न- एसआईआर) की प्रक्रिया चुनाव आयोग ने शुरू की। आनन-फ़ानन में की गई इस प्रक्रिया ने लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से निकाल दिए। यानी लाखों लोग अपने मतदान के संवैधानिक अधिकार से वंचित कर दिए गए। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय में इसके ख़िलाफ़ अपील की, जो इस मामले में सुनवाई कर रहा है। सुनवाई के दौरान ऐसे मामले सामने लाए गए, जहाँ ज़िंदा लोगों को मृत घोषित करके उन्हें मतदाता सूची से निकाल दिया, ऐसे और भी कई उदाहरण सामने आए। इतने विवादों के बावजूद केंद्र सरकार के हाथों की कठपुतली के रूप में काम कर रहे चुनाव आयोग के हौसले पस्त नहीं हुए। एसआईआर की प्रक्रिया फ़िलहाल कई ऐसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही है जहाँ इस साल या अगले साल चुनाव होने हैं। चुनावों में मतदान करना एक नागरिक का सबसे मौलिक अधिकार और कर्तव्य है। लेकिन आज हम लोकतंत्र के इस सबसे केंद्रीय पहलू पर हो रहे इतने बड़े हमले को देख रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक न्याय जिसका आधार ही सभी नागरिकों को देश के दिशानिर्धारण की प्रक्रिया में शामिल करने पर टिका है, कैसे स्थापित किया जा सकता है?</p>
<p>लोकतंत्र, गणराज्य, न्याय केवल शब्द नहीं, ये अपने आप में जीवित व्यवस्थाएँ हैं, लेकिन ये ख़ुद ज़िंदा नहीं रह सकते। इन्हें लगातार ज़िंदा रखने के प्रयत्न होने ज़रूरी हैं। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने से यह देश एक गणराज्य नहीं बन गया था, बल्कि उस दिन से इसे गणराज्य बनाने का संकल्प औपचारिक रूप से लिया गया था। संविधान को अगर एक सुनहरा दस्तावेज़ समझकर, सालाना इसे पूज्य भाव से देखकर दोबारा काँच के बक्से में बंद कर दिया जाए तो यह केवल एक क़िताब है जिसकी सूखी स्याही हमारे मरे हुए लोकतंत्र की दास्तान भर बन जाएगी। भारत सही मायने में एक लोकतंत्र और गणराज्य तब कहलाएगा जब हम हर दौर में संविधान के आदर्शों को बचाए रखेंगे, उन्हें विस्तार देंगे। और यही इस देश की जनता कर भी रही है। मज़दूरों से लेकर किसानों तक, दलितों से महिलाओं तक, अल्पसंख्यक आदि सभी अपने अधिकारों पर हो रहे हमलों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं और यह लड़ाई लड़ने का अधिकार उन्हें भारतीय संविधान ही देता है।</p>
<p>(कवर चित्र: विक्रांत भीसे)</p>
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		<title>पॉपुलर कल्चर का पावरहाउस बन गया है दक्षिण कोरिया</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/popular-culture-ka-powerhouse-south-korea/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Dec 2024 12:02:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[लोकतंत्र, गणराज्य, न्याय केवल शब्द नहीं, अपने आप में जीवित व्यवस्थाएँ हैं। इन्हें लगातार ज़िंदा रखने के प्रयत्न होने ज़रूरी हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ba2025;"><strong>चंद्रभूषण</strong></span></p>
<p>पूर्वी एशिया का छोटा सा मुल्क दक्षिण कोरिया अभी राजनीतिक कारणों से चर्चा में है। उसके राष्ट्रपति यून सुक योल की पत्नी पर भ्रष्टाचार का और ख़ुद राष्ट्रपति पर उन्हें साफ़ बचा ले जाने का आरोप लगा तो इस राजनेता ने देश में बेखटके मार्शल लॉ लगा दिया। यह कहते हुए कि विपक्ष उत्तर कोरिया से मिलकर देश में अराजकता फैलाना चाहता है। सेना और पुलिस को आदेश जारी किए कि सांसदों को संसद में घुसने ही न दे और जो घुस गए हों उन्हें घसीटकर बाहर करे। गनीमत रही कि यह आदेश सख़्ती से लागू नहीं कराया जा सका। सांसदों ने किसी तरह इतनी संख्या जुटा ली कि कोरम पूरा हो गया और संसद ने मार्शल लॉ को ख़ारिज करते हुए राष्ट्रपति पर कुछ पाबंदियां आयद कर दीं। उनपर महाभियोग लगाने का प्रयास अभी सफल नहीं हुआ है लेकिन आगे ऐसा हो भी सकता है।</p>
<p>पिछले तीन दशकों से दुनिया में दक्षिण कोरिया की छवि एक स्थिर राजनीतिक व्यवस्था जैसी बनी हुई है। बतौर लोकतंत्र उसकी स्थिति संतोषजनक है और मीडिया समेत देश की बाकी संस्थाएं इस हद तक सक्रिय हैं कि पिछले छह राष्ट्रपतियों में चार को जेल की हवा खानी पड़ी है। सबसे बड़ी बात यह कि तानाशाहियों का लंबा दौर झेलने और आज भी भ्रष्टाचार और असमानता जैसी बीमारियों से बुरी तरह ग्रस्त होने के बावजूद यह हर मायने में एक खुला समाज है। इसका फ़ायदा उसे अपनी विश्वव्यापी सृजनात्मक छवि के रूप में मिल रहा है। लोकप्रिय युवा दायरे से लेकर गंभीर देखने-सुनने-पढ़ने वालों तक को दक्षिण कोरिया से लगातार कुछ न कुछ ऐसा हासिल हो रहा है, जिसके लिए उसे सराहा जाता है और देखते-देखते उभर आई उसकी विपुल रचनात्मकता पर आश्चर्य किया जाता है।</p>
<p>लड़के-लड़कियों से बातचीत में मैं के-पॉप (कोरियन पॉपुलर म्यूजिक) का ज़िक्र अक्सर सुनता हूं। जब-तब कुछ वीडियो भी देखे हैं जो दुबले-पतले, चपल परफॉर्मर्स की एनर्जी से अपनी तरफ़ ध्यान खींचते हैं। बीटीएस ग्रुप का गाना ‘डायनेमाइट’ और ऐसे ही बहुतेरे गाने अरबों की व्यूअरशिप ले चुके हैं। यह गाना अंग्रेजी में है और बाकी चर्चित के-पॉप गानों में भी अंग्रेजी और कोरियन अक्सर मिली-जुली होती है। अमेरिका, यूरोप और भारत के लोकप्रिय संगीत में शब्दों और बिंबों पर जिस सुनियोजित काम से वैराइटी पैदा होती है, के-पॉप में वह कम दिखता है। कई बार ऐसा लगता है जैसे म्यूजिक वीडियो नहीं, कोई विज्ञापन देख रहे हों। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि ग्लोबलाइज्ड दुनिया में अपने युवा टार्गेट ऑडिएंस से बाहर जाना दक्षिण कोरियाई बैंड्स के एजेंडे पर ही नहीं है।</p>
<p>वैसे, अरबों की व्यूअरशिप की शुरुआत 2012 में रैपर साई के चर्चित वीडियो ‘गंग्नम स्टाइल’ से हुई थी, जो कंटेंट से ज्यादा अपनी मुद्राओं के लिए देखा गया। इसके शीर्षक का अर्थ समझने की कोशिश की तो पता चला कि यह सियोल में हान नदी के दक्षिणी तट (गंग्नम) पर बसे नए अमीरों की लग्जूरियस लाइफस्टाइल के बारे में है। इस गीत की लोकप्रियता का आलम यह रहा कि भारत के फिल्मी मंचों और क्रिकेट स्टेडियमों तक इसकी आजमाइश देखी गई। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान-की-मून ने कैमरे के सामने इसके स्टेप्स दोहराए और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसका ज़िक्र ‘कोरियन वेव’ के नमूने की तरह किया।</p>
<p>आगे बढ़ने से पहले यह ‘कोरियन वेव’ का हल्ला ख़ुद में कुछ अलग तवज्जो की मांग करता है। सबसे पहले चीनी पत्रकारों ने अपने यहां के-पॉप की शक्ल में एक कोरियाई लहर चल पड़ने की चर्चा शुरू की थी, फिर यह जुमला दक्षिण-पूर्व एशिया से होता हुई साई के वीडियो के बाद दुनिया भर में चलने लगा। लेकिन इसके पहले सन 2008 में ही दक्षिण कोरिया का कुल सांस्कृतिक निर्यात डॉलर टर्म्स में उसके कुल सांस्कृतिक आयात से ज्यादा हो चुका था। यानी उपभोक्ताओं के स्तर पर एक बड़ी सॉफ्ट-पॉवर के रूप में दक्षिण कोरिया की पहचान पहले ही बन चुकी थी।</p>
<p>यही समय था, जब यह महसूस किया गया कि अंग्रेजी टीवी सीरियल्स के अलावा दो और भाषाओं के टीवी सीरियल्स का दर्शक वर्ग उनके राष्ट्रीय दायरे से बाहर भी है। ये भाषाएं थीं टर्किश और कोरियन। उर्दू भाषा (पाकिस्तान प्रोड्यूस्ड) इस सूची में बाद में जुड़ी, हालांकि उसके कॉमेडी वीडियो बहुत पहले से दुनिया भर में देखे जाते थे। हिंदी ने रामायण-महाभारत और कुछ लोकप्रिय सीरियलों के जरिये 1990 के थोड़ा इधर और उधर इस दायरे में जो शुरुआती बढ़त हासिल की थी, उसे वह निजी टीवी चैनलों के दौर में बचा नहीं पाई। खाड़ी मुल्कों में कुछ समय तक भारत के कुछ हॉरर शो चर्चा में रहे, फिर वह बाज़ार भी जाता रहा। लेकिन दक्षिण कोरियाई टीवी प्रोड्यूसरों ने अपने टीवी शोज लेकर एक बार क़दम बाहर निकाले तो अभी ओटीटी के दौर में भी उनका काम हर जगह छाया हुआ है।</p>
<p>कोरोना के दौर से लेकर अब तक कई सारे कोरियाई टीवी सीरियल्स विश्वव्यापी चर्चा में हैं, लेकिन सबसे ज्यादा बातें इनमें ‘स्क्विड गेम’ और ‘इट्स नॉट ओके टु बी ओके’ को लेकर सुनने में आती हैं। मेरे एक मित्र की टीनेजर बेटी ने युवा पीढ़ी में बहुत लोकप्रिय और कहीं ज्यादा रोमांटिक टीवी सीरियल्स की एक फेहरिस्त मेरे लिए बनाई थी, लेकिन उन्हें देखने का समय मैं नहीं निकाल पाया। ऊपर जिन दो सीरियल्स का नाम लिया है, उनका मिज़ाज ज्यादा थ्रिलर क़िस्म का है, हालांकि कोरियाई मिज़ाज के अनुरूप इनमें भी परिवार मौजूद है और समाज की बहुतेरी परतें दिखाई देती हैं। अमेरिका चले जाना और वहां करियर बनाना पाकिस्तानी और कोरियाई, दोनों ही प्रॉडक्शंस में कुछ इस तरह दिखता है, जैसे यह कोई पड़ोसी मुल्क हो और वहां जड़ें जमाने के लिए सिर्फ सूटकेस पैक करना काफ़ी हो।</p>
<p>‘स्क्विड गेम’ देखते हुए एक ऐसे समाज का नक्शा सामने उभरता है, जहां बहुतेरे लोगों के पास खोने को कुछ भी नहीं है। हालांकि मार्क्सीय मुहावरे के क़रीब लगने के बावजूद ये लोग सर्वहारा मज़दूर नहीं, मिडल क्लास लोग ही हैं। बस, किसी की नौकरी चली गई है, किसी की दुकान उजड़ गई है, किसी का सारा इंतज़ाम दुरुस्त है तो परिवार में किसी के पास उसके लिए फ़ुरसत ही नहीं है। एक डेस्परेट क़िस्म का समाज, जिसमें लोग एक बचकाने खेल में आख़िरी दांव लगाने के लिए शामिल होते हैं और जान गंवाते चले जाते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि इस खेल में हार-जीत के फेरे में पड़े रहने के बजाय किसी तरह जड़ से खेल ही बंद करवा दिया जाए, लेकिन यह आसान नहीं है। ‘इट्स नॉट ओके टु बी ओके’ एक मनोरोगी चरित्र और एक सामान्य चरित्र की रोमांटिक प्रेमकथा है। इस तरह की कहानियां दुनिया में पहले भी लिखी-पढ़ी गई हैं, लेकिन मनोरोगी का ‘प्रो-एक्टिव’ होना इसे बहुत ख़ास बनाता है।</p>
<div id="attachment_116364" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-116364" class="size-full wp-image-116364 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/12/Parasite.jpg" alt="" width="1600" height="1066" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/12/Parasite.jpg 1600w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/12/Parasite-300x200.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/12/Parasite-1024x682.jpg 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/12/Parasite-768x512.jpg 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/12/Parasite-1536x1023.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px"><p id="caption-attachment-116364" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>फिल्म ‘पैरासाइट’ का एक दृश्य</small></p></div>
<p>सन 2020 में ‘पैरासाइट’ को कई सारे ऑस्कर मिल जाने के बाद कोरियाई फिल्मों पर पॉपुलर दायरे में बातें होने लगी हैं, लेकिन गंभीर फिल्मों के मामले में इस देश के कलाकारों को काफ़ी पहले से बहुत ऊंचा दर्जा हासिल रहा है। सन 2000 में आई वोंग कार-वाई की फिल्म ‘इन द मूड फॉर लव’ एक उदास प्रेमकथा है और इसकी गिनती दुनिया की क्लासिक रूमानी फिल्मों में होती है। एक ऐसा पुरुष, जिसकी पत्नी किसी और से प्रेम करते हुए उसके साथ रहने चली गई है, और एक ऐसी स्त्री, जो उस दूसरे पुरुष की पत्नी है, दोनों संकोची जन एक-दूसरे के प्रति गहरी सहानुभूति से भरे हुए हैं। लेकिन स्थितियां उपयुक्त होने के बावजूद अपने लगाव को वे प्रेम की दिशा में नहीं ले जाना चाहते, क्योंकि अगर ख़ुद भी यही कर बैठे तो इन्हें धोखा देने वाले उस जोड़े में और इनमें फ़र्क़ क्या रहेगा!</p>
<p>ऐसी कोई संक्षिप्त बात ‘पैरासाइट’ के प्लॉट को लेकर नहीं की जा सकती। कारण यह कि इसे बनाने वाले बोंग जून-हो की ख्याति क्लासिक मिज़ाज की संघनित फिल्में नहीं, एक ढीली-ढाली कहानी उठाकर उसके ज़रिये समाज की नस-नस खोलने वाले दृश्यों का एक महाकाव्यात्मक कोलाज रचने वाले निर्देशक की रही है। उनकी दो और फिल्में मैंने देखी हैं, जिनसे उनके सामाजिक व्याकरण और ग्लोबल मिज़ाज का पता चलता है। 2006 में आई ‘द होस्ट’ और 2013 में आई ‘स्नोपियर्सर’। दोनों का स्वरूप एक मायने में साइंस फिक्शन जैसा है, हालांकि इस विधा में बनाई गई हॉलिवुड फिल्मों से ये कहीं ज़्यादा गहरी हैं और समाज के दुख-सुख से इनका सीधा रिश्ता है।</p>
<p>‘द होस्ट’ में सियोल से गुजरने वाली हान नदी में एक अमेरिकी कमांडर बहुत सारा फार्मेल्डिहाइड डलवा देता है, जिससे वहां रहने वाला मछली जाति का कोई जीव एक दैत्याकार ख़तरनाक प्राणी में बदल जाता है। पूरी कहानी में हज़ारों लोग इस दैत्य के हाथों और इससे निपटने की सरकारी कार्रवाई के दौरान मारे जाते हैं लेकिन कहानी घूमती है शहर के बाहरी हिस्से में एक छोटी सी दुकान चलाने वाले औसत से हल्की बुद्धि वाले एक इंसान के परिवार के इर्दगिर्द, जो बिना अपनी किसी गलती के इस बवंडर में फंसकर राक्षस और सरकार, दोनों की मार खा रहा है।</p>
<p>‘स्नोपियर्सर’ एक इंटरनेशनल कास्ट वाली फिल्म है और इसकी मूल चिंता का एक छोर पर्यावरण से जुड़ा है। किस्सा यह कि एक वैश्विक योजना के तहत ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए वातावरण के ऊपरी छोर पर एक रसायन छिड़का जाता है, जिसका कुल नतीजा यह होता है कि पूरी दुनिया का तापमान अचानक नीचे सरक जाता है। पूरी धरती तीखे हिमयुग से गुज़रने लगती है। हालात इतने बिगड़ जाते हैं कि सारी वनस्पतियां नष्ट हो जाती हैं, सभी जानवर मारे जाते हैं और एक बड़ा पूंजीपति इंसानों की नस्ल बचाने के लिए पचीस-तीस हज़ार लोगों को एटमी इंजन वाली एक बहुत बड़ी रेलगाड़ी में भरकर धरती के आर-पार बिछी पटरियों पर हमेशा-हमेशा के लिए दौड़ा देता है।</p>
<p>ये सिर्फ़ इन दोनों फिल्मों की कहानी के ढांचे हैं। असल चीज़ इनमें आए दृश्यों में दिखने वाला सामाजिक वर्गों का टकराव, उसका छल-छद्म और उसकी निर्ममता है। ‘पैरासाइट’ में कहानी बिल्कुल चमत्कारिक नहीं है। एकदम ठोस ज़मीनी यथार्थ पर खड़ी इस फिल्म से यह पता चलता है कि जिस दुनिया में हम जी रहे हैं, वह बिना किसी चमत्कार के ही चमत्कारिक हुई जा रही है। सियोल में ही टिकी इस कहानी में हमारा सामना इस हक़ीक़त से होता है कि शहर की एक बड़ी आबादी तहखानों में रहती है और अगर कभी बारिश ज़्यादा हुई और लंबी खिंच गई तो लोगों का हाल ऐसे चूहों जैसा हो जाता है, जिनके बिल में पानी भर दिया गया हो। अपने यहां कोई बीस साल पहले हमने मुंबई का हाल भी ठीक ऐसा ही होते देखा है, लेकिन इसकी तकलीफ़ बयान करती कोई फिल्म नहीं देखी।</p>
<p>बहरहाल, पैरासाइट फिल्म में कहानी एक बेसमेंट से निकलकर एक अमीर परिवार के घर में बने एक ऐसे बेसमेंट में पहुंच जाती है, जिसके होने के बारे में इस परिवार को कुछ भी पता नहीं है। मज़ेदार सीक्वेंस बनते हैं और लगता है कि फिल्म कॉमेडी की राह पर बढ़ रही है। लेकिन अचानक कहानी में ट्विस्ट आता है और यह ख़ूनख़राबे वाली ऐसी भयानक ट्रैजेडी की शक्ल अख़्तियार कर लेती है कि इस माध्यम में भी ‘एस्केप’ के लिए कोई जगह नहीं रह जाती।</p>
<p>रही बात साहित्य की तो दक्षिण कोरिया में को-उन जैसे आधुनिक महाकवि के काम से दुनिया का पुराना परिचय रहा है, लेकिन कोरियाई किस्सागोई को अंतरराष्ट्रीय पहचान इस साल लेखिका हान कांग को दिए गए नोबेल पुरस्कार से ही प्राप्त हुई। अतिशय संवेदनशील भाषा के लिए चर्चित हान कांग अपने काव्यात्मक गद्य की पैदाइश के लिए जिस घटना को ज़िम्मेदार बताती हैं, वह किसी आंदोलन में सीधी भागीदारी की नहीं है। वैसे भी, 1979 में ग्वांग्जू शहर में हुए छात्र उभार के समय वे वहां थीं ज़रूर, लेकिन उनकी उम्र तब सिर्फ़ आठ साल थी। यह एक संयोग ही था कि दमन की कुछ तस्वीरें उनके हाथ लग गईं, जो इतनी भयानक थीं कि कोई जानवर भी इंसान के साथ वैसा सलूक न करे। इनमें एक तस्वीर एक कॉलेज-गोइंग लड़की के मरे हुए चेहरे में भुंकी पड़ी संगीन की थी!</p>
<p>हान कांग कहती हैं, ये तस्वीरें अगर वे सयानी उम्र में देखतीं तो शायद इस नतीजे पर पहुंचतीं कि पुलिस-फ़ौज इतनी ही क्रूर संस्थाएं हैं। लेकिन सशस्त्र बलों के हमले में मारे गए युवा आंदोलनकारियों के कटे-फटे चेहरे जितने बचपने में उन्हें दिख गए, उससे उनके दिमाग में यह धारणा बनी कि इंसान अपने से कमज़ोर लोगों के प्रति इस हद तक बेरहम हो सकता है! क़िस्से के रूप में यह हादसा उनके दो बाद के उपन्यासों ‘ह्यूमन ऐक्ट्स’ और ‘वी डू नॉट पार्ट’ में आता है, लेकिन उनका लेखकीय मन ये तस्वीरें हाथ लगने के साथ ही बनना शुरू हुआ।</p>
<p>इन आंदोलनों का सिर-पैर समझना हो तो एक नज़र हमें दक्षिण कोरिया की बुनावट पर डालनी होगी। बीसवीं सदी की शुरुआत में जापान ने कोरियाई प्रायद्वीप को अपना संरक्षित द्वीप घोषित किया और 1910 में उस पर क़ब्ज़ा कर लिया। उसका यह क़ब्ज़ा द्वितीय विश्वयुद्ध में उसकी पराजय तक जारी रहा, फिर कोरिया से जापानी फ़ौजों के हटने के साथ ही वहां गृहयुद्ध के बीज पड़ गए। एक युद्धरत पक्ष को रूसी, दूसरे को अमेरिकी खेमे का समर्थन प्राप्त हुआ और 1953 में दोनों खेमों के बीच हुई संधि के तहत उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया का गठन हुआ। इनमें उत्तर कोरिया का हाल दुनिया के सामने है। कम्युनिस्ट किसान नेता किम इल सुंग की तीसरी पीढ़ी वहां राज कर रही है। दक्षिण कोरिया में 1990 तक तीन अमेरिका संरक्षित तानाशाहों का शासन चला- सिंगमान री, पार्क चुंग ही और चुन डू ह्वान। इनमें तीसरे वाले के उभार के दौरान ग्वांग्जू शहर में हुई क़त्लोग़ारत ने लेखिका हान कांग का मानस रचा।</p>
<p>लगभग 35 वर्षों से दक्षिण कोरिया में लोकतंत्र है, लेकिन समाज में संसाधनों और जीवन स्तर की असमानता इतनी ज़्यादा है कि दुनिया में कहीं और उसकी कल्पना करना भी आसान नहीं है। एक छोटा सा तथ्य यहां रखा जा सकता है कि अकेले सैमसुंग कंपनी का सालाना उत्पादन दक्षिण कोरिया के कुल जीडीपी के 20 प्रतिशत के बराबर है। ऐसी बड़ी कंपनी को कोरियाई जुबान में चाइबोल कहते हैं और इस स्तर के कुछ और चाइबोल, जैसे एलजी, डाएवू, डाइकिन, ह्युंडाई, क्युंगसुंग वग़ैरह भी वहां मौजूद हैं। ये कंपनियां कोरियाई लोकतंत्र को जेब में लेकर घूमने की हैसियत रखती हैं। इनकी चलाई घूसखोरी और भ्रष्टाचार का ही नतीजा है कि पिछले छह दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपतियों में से चार को जेल काटनी पड़ी है और पांचवां भी धीरे-धीरे लेकिन निश्चित ढंग से उसी राह पर आगे बढ़ रहा है।</p>
<p>इस तरह की सामाजिक भूलभुलैया दक्षिण कोरिया में काफ़ी गहरे संस्कृतिकर्म का मसाला मुहैया करा रही है। लेकिन अच्छी कला के लिए अच्छी कथावस्तु ही काफ़ी नहीं होती। दक्षिण कोरिया एक अतिकुशल समाज है। कुछ समय पहले आए एक आंकड़े के अनुसार वहां की 97 प्रतिशत आबादी (बच्चे-बच्ची, बूढ़े-बूढ़ी समेत) सामान्य शिक्षित ही नहीं, किसी न किसी पहलू से तकनीकी प्रशिक्षण-प्राप्त है। इस हुनरमंद समाज को कलावंत बनाने के लिए अच्छा संस्कृतिबोध चाहिए, जो काफ़ी कुछ इस देश के बौद्ध इतिहास से आता है। इसके आगे बड़े पैमाने की कला बड़ी पूंजी की मांग करती है, जो मुनाफ़े की उम्मीद दिखने पर मिल ही जाती है। इसके बावजूद दुनिया पर दक्षिण कोरिया का कलात्मक फुटप्रिंट अभी जितना बड़ा है, इस देश का आकार देखते हुए वह स्तंभित करता है।</p>
<p><span style="color: #ba2025;">(लेखक चर्चित कवि और विचारक हैं)</span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<item>
		<title>पूंजीवाद के स्वर्ग में बेघर हो रहे मेहनतकश</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/hn-bulletin-poonjivaad-ke-swarg-me/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Jul 2024 10:50:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दक्षिण कोरिया के साहित्य, संगीत व सिनेमा ने दुनिया को चकित किया।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Adobe Devanagari; color: #ba2025;"><span lang="hi-IN"><span style="font-size: large;"><b><span style="font-size: 14pt;">स्वदेश कुमार सिन्हा</span> </b></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="justify"><span style="font-size: 14pt;"><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">इस वर्ष अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में अनुदारवादी रिपब्लिकन पार्टी के अनुदार नेता तथा भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के एक बार पुनः सत्ता में आने की संभावना व्यक्त की जा है</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">इसका अर्थ है कि शेष दुनिया की‌ तरह अमेरिका में भी फासीवाद का संकट बढ़ रहा है। ट्रम्प शुरू से अमेरिका में बढ़ रहे आर्थिक संकट का कारण प्रवासियों विशेष रूप से मैक्सिको और भारत से आए कामगारों को मानते रहे हैं। </span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="justify"><span style="font-size: 14pt;"><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">2022‌ </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">में उसकी जीडीपी </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">25 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">ट्रिलियन से भी ज़्यादा डॉलर की रही थी</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">इसका दूसरा मतलब यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिका की हिस्सेदारी </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">24 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">फीसदी है। </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">2022 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">की फोर्ब्स लिस्ट में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">2000 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">कंपनियों में से </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">560 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">अमेरिकी कंपनियां थीं। फोर्ब्स की इस लिस्ट की टॉप</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">-20 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">कंपनियों में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">11 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">अमेरिकी थीं।‌ कंपनियों के अलावा दुनिया के सबसे ज़्यादा अरबपति भी अमेरिकी ही हैं। फोर्ब्स की लिस्ट में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">2022 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">735‌ </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">अरबपति अमेरिकी थे</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">जिनके पास </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">4.7 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति थी। इस समय दुनिया के दस सबसे रईस लोगों में सात अमेरिकी ही हैं। टेस्ला और स्पेस एक्स के फाउंडर एलन मस्क दुनिया के दूसरे सबसे रईस हैं</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">जिनके पास </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">188 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">अरब डॉलर से ज़्यादा की संपत्ति है। </span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="justify"><span style="font-size: 14pt;"><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">इतनी समृद्धि के बावज़ूद पूंजीवाद के ‘स्वर्ग’ कहे जाने वाले अमेरिका में सब ठीक</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">–</span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">ठाक नहीं है। साम्राज्यवादी पूंजी के बड़े चौधरी अमेरिका में जहां एक तरफ़ पूंजी का अंबार है</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">तो दूसरी तरफ़ बेरोज़गारी और भुखमरी की समस्या भी बढ़ती जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">5 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">से </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">6 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">लाख तक लोग बेघर हैं। बेघर होने की तलवार तो लाखों लोगों के सिर पर लटकती रहती है। सन् </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">2000 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">से लेकर </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">2010 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">तक के दशक में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">36 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">लाख लोगों को घर खाली करने का नोटिस मिला था। कोरोना लॉकडाउन अमेरिका में बाक़ी दुनिया की तरह ग़रीबों के लिए भारी मुसीबतें लेकर आया था। इस दौर में पहले के मुक़ाबले घरों के किराए </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">25 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">फ़ीसदी बढ़ गए थे। जनगणना ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार अगले दो महीनों में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">38 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">लाख लोगों को घर छोड़ने के आदेश मिल सकते हैं। जो </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">38 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">लाख लोग घर छोड़ने की प्रक्रिया में शामिल होंगे</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">उनमें थोड़े से कुछ समय के लिए अपने रिश्तेदारों और जानकारों के घर जा सकते हैं</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">पर एक बड़ा तबक़ा बेघर हो जाएगा। </span></span></span></p>
<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;">
<div id="attachment_108468" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-108468" class="size-full wp-image-108468 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/07/pic_1-1.png" alt="" width="960" height="717" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/07/pic_1-1.png 960w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/07/pic_1-1-300x224.png 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/07/pic_1-1-768x574.png 768w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px"><p id="caption-attachment-108468" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-family: Adobe Devanagari; color: #ba2025;"><span lang="hi-IN"><span style="font-size: large;"><em>अमेरिका ईट्स (इट्स यंग/ इट्स ओल्ड)</em>, ऐडम टर्ल</span></span></span></small></p></div>
</div>
<p style="text-align: justify;" align="justify"><span style="font-size: 14pt;"><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">पूंजीवादी सभ्यता के सबसे बड़े रोल मॉडल अमेरिका में लोगों को किस तरह बेघर किया जाता है</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">उसका एक उदाहरण पेश हैः </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">15 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">दिसंबर </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">2021 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">के ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ में एलीसासलोव का घर खाली करवाने के लिए ज़ि‍म्मेदार एक पुलिस कर्मचारी लेनी के बारे में लिखा गया है कि वह रोज़ाना कंधे पर बंदूक रखकर किराया ना भर सकने वाले घरों में जाता था। पुलिस अधिकारी ने बताया कि उसने अकेले ही दो दशकों में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">20,000 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">से ज़्यादा घर खाली करवाए। उसे आदेश दिया गया था कि एक फ़्लैट </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">10 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">मिनट में ख़ाली करवाए। उसने बताया कि वह बिना किसी आगामी सूचना के घर का दरवाजा खटखटाता था और </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">10 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">मिनट में घर खाली करने का आदेश सुना देता था। छोटे बच्चों वाले परिवार के लिए भी कोई छूट नहीं थी। </span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="justify"><span style="font-size: 14pt;"><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">घर खाली करवाने वाला वह अकेला अधिकारी नहीं था। अमेरिका में घर खाली करवाने का औसत लगभग </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">10,000 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">रोज़ाना है। यानी </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">1 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">घंटे में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">420 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">और </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">1 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">मिनट में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">7</span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">। अस्थाई बेघर लोग भी अमेरिका में काफ़ी बड़ी संख्या में मिल जाते हैं। जब तक किसी घर का प्रबंध नहीं होता</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">लोग किसी शेल्टर या कार में रहने के लिए मजबूर होते हैं। घर खाली करने से पहले भी बकाया देनदारी की समस्या भी काफ़ी गंभीर होती है। उलटा किराए में देरी करने पर जुर्माना भी वसूल किया जाता है। एक बार जिससे घर खाली करवाया जाता है</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">,</span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">उसे आगे नया घर लेते समय बहुत मुश्किल आती है। क्योंकि उसके रिकॉर्ड में लिखा जाता है कि</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">,<b>‘</b></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">उससे घर खाली करवाया गया है’। इससे नया मकान मिलना मुश्किल हो जाता है। </span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="justify"><span style="font-size: 14pt;"><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">मकान मालिक के मुक़ाबले किराएदार की क़ानून तक पहुंच भी कम होती है। आमतौर पर ग़रीब किराएदार नोटिस मिलने पर एकदम पैसों का प्रबंध कर सकने की हालत में नहीं होते हैं। घरों की समस्या में वर्गीय और नस्लीय कारक भी काम करते हैं। वर्गीय कारक तो सीधे</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">–</span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">सीधे अर्थव्यवस्था से संबंधित हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार कम आमदनी वाले लोग और नस्लीय अल्पसंख्यक के एक तिहाई लोग किराए के घरों में रहते हैं। </span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="justify"><span style="font-size: 14pt;"><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">वैसे अमेरिका में मकानों की कोई कमी नहीं है। कुल घरों के </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">10 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">फीसदी मकान खाली पड़े रहते हैं। पर ग़रीबों की पहुंच वाले घरों की बहुत कमी है। कैलिफ़ोर्निया में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">100 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">किराएदारों पर सिर्फ़ </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">23 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">घर ऐसे हैं</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">जिनका किराया भर पाना उनकी पहुंच में होता है। इस समय राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की पहुंच वाले </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">70 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">लाख मकानों की कमी है। वर्तमान समय में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">10000 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">अमेरिकी लोगों के पीछे </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">17 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">लोग बेघर हैं। अमेरिका के बेघरों की कुल आबादी के </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">40 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">प्रतिशत अफ़्रीकी मूल के अमेरिकी हैं। अमेरिकी बेघरों में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">20 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">प्रतिशत बच्चे हैं। बेघर लोगों के मान</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">–</span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">सम्मान को तो ठेस पहुंचती ही है</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">बल्कि नए रोज़गार ढूंढने में भी समस्या आती है। औरतों और बच्चों को ज़्यादा कष्ट झेलने पड़ते हैं। बेघर लोगों की समस्याओं पर बनी फ़िल्म का ज़िक्र करते हुए एलीसासलोव एक घटना का विवरण लिखते हैं</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN"><span style="font-size: large;"><span style="font-size: 14pt;">जिसमें अचानक घर खाली करते समय एक साल का बच्चा अपनी माँ की टाँगों से लिपट जाता है। इस भावुक दृश्य को देखकर दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस अन्यायपूर्ण हालत की तरफ़ सरकार का रवैया बहुत बेरुख़ी वाला है। कम आमदनी वाले लोगों के लिए घर की योजना का अमेरिकी पूंजीपति डटकर विरोध करते हैं। उनका तर्क है कि इससे उनकी जायदाद की क़ीमत और उसका स्तर गिरता है। इसी दबाव के कारण अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन घरों की समस्या संबंधी अपने चुनावी वायदों से पीछे हट गए हैं।</span> </span></span></span></p>
<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;">
<div id="attachment_108478" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-108478" class="wp-image-108478 size-full img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/07/pic_2-1.png" alt="" width="366" height="454" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/07/pic_2-1.png 366w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2024/07/pic_2-1-242x300.png 242w" sizes="auto, (max-width: 366px) 100vw, 366px"><p id="caption-attachment-108478" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-family: Adobe Devanagari; color: #ba2025;"><span lang="hi-IN"><span style="font-size: large;"><em>स्लीप बिटवीन</em>, कैरन हेडॉक</span></span></span></small></p></div>
</div>
<p style="text-align: justify;" align="justify"><span style="font-size: 14pt;"><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">आख़िर अमेरिकी मज़दूरों की पहुंच में रहने लायक घर क्यों नहीं हैं</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">? </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">अमेरिका में न्यूनतम वेतन का स्तर इतना नहीं है कि कम वेतन वाले मज़दूर मकान का किराया दे सकें। एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में न्यूनतम वेतन </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">7.25 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">डॉलर प्रति घंटा है। कई राज्यों में न्यूनतम वेतन इससे थोड़ा ज़्यादा है। कई राज्य अगले वर्षों में न्यूनतम वेतन </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">15 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">डॉलर प्रति घंटा करने पर विचार कर रहे हैं। पर </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">2021 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">की एक रिपोर्ट के अनुसार एक किराएदार को घर हासिल करने के लिए दिन का पूरा समय </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">20.40 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">डॉलर प्रति घंटा कमाने की ज़रूरत है</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">वह भी सिर्फ़ एक बेडरूम वाले रहने लायक घर के लिए। वैसे दो बेडरूम वाला घर लेने के लिए </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">24.90 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">डॉलर प्रति घंटा की कमाई ज़रूरी है। कम आमदनी वाले परिवारों के राष्ट्रीय गठबंधन की ‘पहुंच से बाहर’ रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">93 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">प्रतिशत ज़िलों के कम वेतन वाले मज़दूर एक बेडरूम वाला घर लेने में सक्षम नहीं हैं। पूरा समय काम करने वाले मज़दूर की आमदनी का </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">30 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">फीसदी घरों के किराए में चला जाता है। </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">2021 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">की एक रिपोर्ट के अनुसार औसतन मज़दूर इस समय </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">18.70 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">डॉलर भी प्रति घंटा कमाते हैं</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">,</span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">जो न्यूनतम ज़रूरत से भी </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">6 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">डॉलर प्रति घंटा कम है। एक मज़दूर को घर हासिल करने के लिए हफ़्ते में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">97 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">घंटे काम करने की ज़रूरत है। अमेरिका में यह समय मज़दूरों के पूरा समय काम करने से दोगुना बनता है। रिपोर्ट से साफ़ है कि मज़दूरों का कम वेतन घरों की समस्या का मुख्य कारण है। </span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="justify"><span style="font-size: 14pt;"><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">वास्तव में </span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">2020 </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था गंभीर आर्थिक संकट और मंदी का शिकार हो गई। अमेरिका की तबाही के पीछे विश्व में उसके वर्चस्व का सवाल भी प्रमुख है। आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से अमेरिका को जहां एक ओर यूरोपीय यूनियन चुनौती दे रहा है</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">वहीं दूसरी ओर चीन दुनिया के पहले नंबर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है तथा वह सैन्य दृष्टि से भी अमेरिका को चुनौती दे रहा है। रूस</span></span><span style="font-family: Adobe Devanagari;">, </span><span style="font-family: Adobe Devanagari;"><span lang="hi-IN">चीन और ईरान का गठजोड़ भी आज अमेरिका पर भारी पड़ रहा है। अमेरिका का यह संकट बढ़ते हुए विश्व पूंजीवाद के संकट का ही एक रूप है। वास्तव में इन आर्थिक संकटों का सबसे ज़्यादा ख़मियाजा सबसे पहले समाज के बेघर और ग़रीब तबके को भुगतना पड़ता है। आज हम अमेरिका में यही देख रहे हैं।</span></span></span></p>
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		<title>भारत में किसान विद्रोह</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/hi/dossier-41-bhartiya-krishi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 Jun 2021 08:47:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन यह समृद्धि सबके लिए नहीं है। एक तरफ़ पूंजी का अंबार है, तो दूसरी तरफ़ बेरोज़गारी और भुखमरी की समस्या भी बढ़ती जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में 5 से 6 लाख तक लोग बेघर हैं। जबकि बेघर होने की तलवार तो लाखों लोगों के सिर पर लटकती रहती है।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>कनक मुखर्जी (1921-2005)</title>
		<link>https://www.thetricontinental.org/hi/kanak_mukherjee/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Tech Tricontinental]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Mar 2021 13:32:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[]]></description>
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		<title>अर्नेस्तो चे ग्वेरा</title>
		<link>https://mayday.leftword.com/catalog/product/view/id/21886</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Oct 2020 11:10:45 +0000</pubDate>
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