पर्यावरणीय संकट का संकेत है बाढ़ लाने वाली बारिश
इस साल मानसून के दौरान ज़्यादा बारिश के पीछे मुख्य भूमिका पश्चिमी विक्षोभ की रही, जिसकी मूल वजह जलवायु परिवर्तन ही है।
दीपक भारती
ज़्यादातर लोगों के मोबाइल पर अब मौसम विभाग की ओर से बारिश, आंधी- तूफान के पूर्वानुमान के मैसेज आ जाते हैं। अगस्त और सितंबर के शुरुआती कुछ दिनों में ये मैसेज दिन में कई-कई बार आ रहे थे और उनके पूर्वानुमान भी सही साबित हो रहे थे। मैसेज आने का फ़ायदा यह होता है कि लोग कुछ घंटे बाद आने वाली बारिश के हिसाब से अपनी तैयारी कर लेते हैं। बाहर सूखने के लिए डाले कपड़े अंदर कर लेते हैं, बाहर जाने पर छाता साथ लेकर जाते हैं या ऐसी ही दूसरी चीज़ें लेकिन बड़े स्तर पर समय रहते जितनी तैयारी होनी चाहिए, जिन्हें करनी चाहिए, वह नहीं हो पाती, नहीं की जाती।
कई सालों से हम बारिश का बदलता पैटर्न देख रहे हैं, फुहारों वाली घंटों तक होने वाली बारिश अब नहीं होती। अब बादल आते हैं और कुछ देर में एक ही जगह पर इतना बरस के चल देते हैं कि वहां बाढ़ के हालात बन जाएं और जहां नहीं होती, वहां लोग अगस्त-सितंबर में भी मई-जून जैसी तेज़ धूप झेल रहे होते हैं। बारिश का पैटर्न क्यों बदल रहा है, क्या यह किसी बड़े पर्यावरणीय बदलाव का संकेत है और क्या यह इतनी जल्दी हो रहा है कि हमें समझने का मौका नहीं मिल रहा।
अलविदा, वासुदेवन अक्कितम (भारत), 2024
पहले से मिल रहे थे संकेत
पर्यावरण पर केंद्रित वेबसाइट डाउन टू अर्थ के प्रमुख संवाददाता राजू सजवान के मुताबिक, ‘इस बार देश में अलग-अलग जगहों पर बाढ़ का जो विकराल रूप देखने को मिला, उसके संकेत तो पहले से ही मिल रहे थे। हालांकि हमने उन संकेतों को गंभीरता से नहीं लिया। इस साल मानसून के दौरान ज्यादा बारिश के पीछे मुख्य भूमिका वेस्टर्न डिस्टरबेंस यानी पश्चिमी विक्षोभ की रही, जिसकी मूल वजह जलवायु परिवर्तन ही है। ये विक्षोभ पहले सर्दियों में आते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों से समय से पहले यानी अगस्त-सितंबर में आने लगे हैं। इस बार न सिर्फ़ ये समय से पहले आए, बल्कि इनके सक्रिय होने की आवृत्ति भी बढ़ गई। अगस्त में ये पांच बार सक्रिय हुए। इन विक्षोभों के सामान्य मानसून के साथ आने से, जो बंगाल की खाड़ी से सक्रिय होता है, स्थिति विकराल हो गई। इससे एक साथ दो सिस्टम के टकराने की दुर्लभ घटना हुई। ऐसा ही 2013 में केदारनाथ में हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी तबाही हुई थी।
वह आगे कहते हैं, ‘पश्चिमी विक्षोभ और मानसून के एक साथ आने से बारिश की तीव्रता बढ़ जाती है। एक जगह पर थोड़े ही समय में अप्रत्याशित बारिश होती है, बादल फटने की घटनाएं होती हैं। इसके साथ ही इस बार कम दबाव भी बना, जो मौसम तंत्र का ही एक हिस्सा है। जिसकी वजह से भी भारी बारिश आई। पश्चिमी भारत, खासकर हिमालय के इलाकों पर इसका ज्यादा असर पड़ा। मौसम के पैटर्न के इस बदलाव की वजह से कम समय में ज्यादा बारिश देखने को मिली और बारिश का बढ़ा पानी निकलने की तैयारियां नाकाफी होने के चलते बाढ़ का विकराल रूप देखने को मिला। ’
जलवायु परिवर्तन की प्रमुख भूमिका
वैसे बारिश के अनियमित होने और अनियंत्रित होने के पीछे प्रभावी भूमिका जलवायु परिवर्तन की है। पश्चिमी विक्षोभ के समय से पहले और इसके मानसून से टकराने को लेकर जलवायु परिवर्तन के लिए बने इंटरगवर्नमेंटल पैनल यानी आईपीसीसी ने पहले से चेतावनी जारी कर रखी है। इसके मुताबिक धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है। पिछले सौ सालों में इसका तापमान लगभग एक डिग्री बढ़ गया है। इसमें भी पिछले 40 सालों में धरती का गर्म होना ज़्यादा तेज़ी से बढ़ा है। माना जाता है कि जब धरती का तापमान 1 डिग्री बढ़ता है तो इसकी तुलना में नमी सात फीसदी बढ़ जाती है। नमी बढ़ने से बनी वाष्प, बादल में बदलती है, जिससे बारिश होती है। बारिश का पैटर्न कितना बदल चुका है, इसे इस साल के एक उदाहरण से समझिए – भारतीय मौसम विज्ञान के मुताबिक, अगस्त की शुरुआत तक लद्दाख में सूखे जैसे हालात थे यानी सामान्य बारिश भी यहां नहीं हुई थी। फिर, अगस्त में यहां रिकार्ड 82 मिमी से भी ज्यादा बारिश हुई, जो सामान्य बारिश यानी 30 से 36 मिमी से लगभग तीन गुना ज्यादा थी।
सुरक्षित स्थान, महेश बलिगा (भारत), 2022
राजस्थान और पंजाब की बाढ़
राजस्थान, देश का ऐसा राज्य है, जहां के लोगों को 4-5 साल पहले तक बाढ़ के सिस्टम के बारे में पता ही नहीं था। इस बार हमने राज्य के कई जिलों को भारी बारिश से जमा पानी से जूझते देखा। जाहिर सी बात है कि जलवायु परिवर्तन से उपजे संकट से निपटने के लिए अब इस रेगिस्तानी राज्य को न सिर्फ़ सूखे बल्कि बाढ़ से निपटने के लिए प्रभावी सिस्टम तैयार करना पड़ेगा। वहीं उसका पड़ोसी राज्य पंजाब इस बार बाढ़ से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ है, जहां बाढ़ की आपदा से पचास से ज्यादा लोगों की जान चली गई। यहां 28 अगस्त से 3 सितंबर तक सामान्य से 48 फीसदी से अधिक बारिश हुई, जिसका नतीजा यह हुआ कि राज्य की तीन प्रमुख नदियों सतलुज, ब्यास और रावी नदियों के किनारों के बांध टूट गए। मुख्य नदियों के बाढ़ के मैदानों पर अवैध अतिक्रमण, खेती और बस्तियां बसाना भी नुक़सान का बड़ा कारण बना। पंजाब की नदियों और बांधों की जलधारण क्षमता गाद जमने से घट गई है और समय पर गाद निकासी न करने से स्थिति और बिगड़ गई। पंजाब में इस साल की बाढ़ को पिछले तीन दशकों की सबसे भीषण बाढ़ माना जा रहा है क्योंकि इसने अत्यधिक नुकसान पहुंचाया। बाढ़ के कारण राज्य के 2,000 से अधिक गांवों में करीब 4 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए।
सिस्टम की लापरवाही
भारी बारिश का पानी बहकर निकल जाता अगर नदियों, नालों का बेहतर इंतज़ाम होता। जहां तक बड़े शहरों, महानगरों का सवाल है, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कई बार चेतावनी दे चुका है कि उनका सीवरेज और ड्रेनेज सिस्टम, बाढ़ का पानी बाहर निकालने में सक्षम नहीं है। समय रहते ने उनकी देखरेख की जाती है, न सफ़ाई। उनकी पाइप लाइनें बेहतर हालत में नहीं है और सालों से बदली नहीं गई हैं। हालांकि राजधानी दिल्ली की सरकार ने इस साल की आपदा को देखते हुए ड्रेनेज मास्टर प्लान 2025 तैयार किया है, जिसका मक़सद मानसून के दौरान जलभराव की समस्या से निपटना और बाढ़ के ख़तरे को टालना है। समय की मांग है कि देश के सभी राज्य मानसून आने से पहले ही ऐसी योजना तैयार करें, जिससे नालों की सफ़ाई समय से की जा सके और ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त किया जा सके।
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कुछ घंटों की बारिश, विकास पर भारी
जिन शहरों के नाम सुनकर ही हम उनके शापिंग मॉलों, उनके आसपास विकसित होती स्मार्ट सिटी, एयरपोर्ट, चमकती सड़कों, भीड़ और उनमें रहने वालों लोगों की जीवन- शैली पर गर्व करने लगते हैं, कुछ घंटों की बारिश उन शहरों की इन सारी चीज़ों पर सवालिया निशान खड़े कर देती है। पिछले दो तीन दशकों में देश का लगभग हर बड़ा शहर अपने आकार का दोगुना होकर फैल गया है। इन शहरों के बाहर किसी भी दिशा में आप खेत और हरियाली देखने की उम्मीद लेकर निकलें तो मायूसी हाथ लगेगी क्योंकि दसियों-बीसियों किलोमीटर तक नई बनती कालोनियां, रियल एस्टेट के प्रोजेक्ट, कच्ची- पक्की सड़कें, शहरों का कचरा दिखेगा और कुछ नहीं। कहां से आकर बस गए इतने लोग, किसके लिए हो रहा है ये विकास, किसे चाहिए इतने प्रोजेक्ट और किस क़ीमत पर, यह सवाल कोई नहीं पूछता। जिस गति से गांवों के लोग आकर शहर में बस रहे हैं, उसी गति से शहर गांवों के नजदीक जाकर विकास का परिचय दे रहे हैं। किसी भी शहर में पांच साल बाद लौटकर देखिए, आपको इतना विकास दिखेगा कि हैरत होगी लेकिन विडंबना यह है कि ये सारा विकास पर्यावरण के हितों की अनदेखी कर किया गया है, किया जा रहा है। लाखों की आबादी वाले महानगरों, शहरों में बीसियों साल पुराना सीवरेज और ड्रेनेज सिस्टम है। नालों की समय से सफ़ाई नहीं होती और शहरों से बारिश का पानी निकालने वाली अधिकांश पाइप लाइनें या तो टूट चुकी हैं या सड़ चुकी हैं।
क्या हो आगे का रास्ता
दरअसल जलवायु परिवर्तन यानी क्लाईमेंट चेंज और पर्यावरण से जुड़े तमाम मुद्दों को हम बस संगोष्ठी, सेमिनार की चीज़ समझ लेते हैं। सरकारों और दुनिया के स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर अलग- अलग सोच है। विकसित देशों का मानना है कि विकासशील देशों को कम कार्बन पैदा करना चाहिए भले ही इससे उन्हें विकसित देशों की श्रेणी में आने में ज़्यादा समय लगे और वे पिछड़े बने रहें। दूसरी तरफ़ विकासशील देशों का मानना है कि विकसित देशों ने बीते कुछ दशकों में अमीर बनने के लिए प्रकृति का इतना दोहन किया, इतनी भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन किया कि धरती का तापमान बढ़ता चला गया और इसीलिए आज हम ग्लोबल वार्मिंग से उपजे संकटों का सामना कर रहे हैं। हालत यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति अपने देश को क्लाईमेंट चेंज से निपटने के लिए किए गए तैयार किए गए पेरिस समझौते से अलग कर चुके हैं, क्योंकि उनके लिए यह मुद्दा ही वास्तविक नहीं है और इसके नाम पर अमेरिका से डालर ऐंठे जा रहे थे।
ऐसे में पहले तो निजी स्तर से लेकर दुनिया के स्तर पर यह समझ तैयार करने कर है कि मुद्दा, हमारे अस्तित्व के जितना वास्तविक है और इसके लिए साथ मिलकर काम करना सभी के हित में है। अगर आने वाली पीढ़ियों को हम वास्तव में कोई विरासत देकर जाना चाहते हैं तो वह प्रदूषण रहित साफ़-सुथरा पर्यावरण ही होगा।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)