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	<title>हिंदी बुलेटिन Archives - Tricontinental: Institute for Social Research | Tricontinental: Institute for Social Research</title>
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	<description>international, movement-driven institution focused on stimulating intellectual debate that serves people’s aspirations.</description>
	<lastBuildDate>Sat, 11 Jul 2026 12:35:46 +0000</lastBuildDate>
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		<title>पहले खाद की किल्लत और अब मानसून की बेरुख़ी </title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/pehle-khaad-ki-killat-ab-monsoon-ki-berukhi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Jul 2026 12:35:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कम वर्षा तथा अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पैदा हुए खाद संकट से पैदावार में कमी आ सकती है, जिससे किसानों की मुश्किलें बढ़ेंगी।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_149726" class="wp-caption aligncenter"><img fetchpriority="high" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-149726" class="size-full wp-image-149726 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/C1100-reena-saini-kallat-deep-rivers-run-quiet-2579.jpg" alt="" width="1100" height="733" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/C1100-reena-saini-kallat-deep-rivers-run-quiet-2579.jpg 1100w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/C1100-reena-saini-kallat-deep-rivers-run-quiet-2579-300x200.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/C1100-reena-saini-kallat-deep-rivers-run-quiet-2579-1024x682.jpg 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/C1100-reena-saini-kallat-deep-rivers-run-quiet-2579-768x512.jpg 768w" sizes="(max-width: 1100px) 100vw, 1100px"><p id="caption-attachment-149726" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-size: 15pt;">रीना सैनी कलाट, <em>नदी के रेखाचित्र</em>, 2020</span></small></p></div>
<p style="text-align: justify;">कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी आँकड़ों के <a href="https://upag.gov.in/pdf-reports?rtab=Crop+Weather+Watch+Group+Reports&amp;rtype=reports&amp;rurl=https%3A%2F%2Fstorage.googleapis.com%2Fupag-10-128-23-3%2FMIR-Reports-Crop-Outlook%2FI_17827270970110526_Crop%2C_Rainfall_%26_Reservoir_as_on_29th_June_2026.pdf">अनुसार</a> 25 जून 2026 तक मात्र 183 लाख हेक्टेयर खेतों की बुवाई हो पाई है। पिछले ख़रीफ़ के मौसम में अब तक 236 लाख हेक्टेयर की बुवाई पूरी हो गई थी। बुवाई के रकबे में इस चिंताजनक देरी का मुख्य कारण मानसून का बेहद विलंब से आना तथा औसत से कम स्तर की बारिश है। ज़्यादातर ख़रीफ़ फ़सलों का रकबा पिछले साल की तुलना में कम है। जहाँ धान की बुवाई का रकबा 9 प्रतिशत कम है, वहीं दालों का रकबा करीब 7 प्रतिशत कम रहा। तिलहन में यह गिरावट 19 प्रतिशत है जबकि कपास में 16 प्रतिशत।</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?ModuleId=3&amp;NoteId=154892&amp;id=154892&amp;utm_source=chatgpt.com&amp;reg=48&amp;lang=2">दक्षिणपश्चिमी मानसून</a> का आगमन सामान्यत: 1 जुलाई को हो जाता है। इस साल यह 4 जुलाई को केरल <a href="https://internal.imd.gov.in/press_release/20260604_pr_5049.pdf">पहुँचा</a>। यह भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण वर्षा का मौसम पैदा करता है। यह भारत की कुल सालाना वर्षाजल का क़रीब 75 प्रतिशत लेकर आता है। दक्षिणपश्चिमी मानसून इस साल देरी से भी पहुँचा है और इसकी बारिश का स्तर भी सामान्य स्तर से कम है। कुल वर्षा का <a href="https://internal.imd.gov.in/press_release/20260618_pr_5084.pdf">स्तर</a> 1 से 17 जून के बीच अपने दीर्घकालिक औसत स्तर से 38 प्रतिशत कम रहा। सबसे ज़्यादा प्रभावित मध्य भारत और पूर्वी एवं उत्तरपूर्वी भारत के क्षेत्र हैं। जुलाई माह में भी औसत से कम बारिश का <a href="https://internal.imd.gov.in/press_release/20260630_pr_5107.pdf">अनुमान</a> है।</p>
<p style="text-align: justify;">विलंबित मानसून फ़सलों की उपज को कम करता है। फ़सलों की उपज में गिरावट चिंताजनक है।  भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है। कुल सालाना वैश्विक विश्व निर्यात का तक़रीबन 40 प्रतिशत <a href="https://www.cybex.in/blogs/indian-rice-exports-guide-for-exporters-how-it-is-building-its-dominance?__cf_chl_f_tk=KPepgU_KKYbi2n3zBVQqLlReZWJ7q170u9YiVHMypPw-1783081260-1.0.1.1-Busm3DYeJ2jCE7KFnYTHzZThazx0TBVLbg69MWMU6S0">हिस्सा</a> भारत करता है। इससे भारत की निर्यात से अर्जित राशि में कमी आ सकती है। भारत अपनी घरेलू <a href="https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2200287&amp;reg=3&amp;lang=1">खाद्य तेल</a> की ज़रूरत का आधे से ज़्यादा हिस्सा आयात से पूरा करता है। तिलहन उत्पादन में कमी से खाद्य तेल की आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है। बढ़े आयात और घटे निर्यात की वजह से भारत का कृषीय व्यापार संतुलन बिगड़ेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">2023-24 के हालिया मौजूद भूमि उपयोग आँकड़ों के अनुसार भारत में क़रीब साठ प्रतिशत खेती की ज़मीन पर ही सिंचाई सुविधा मौजूद थी। क़रीब 40 प्रतिशत खेती की ज़मीन सिंचाई के लिए मानसून-निर्भर है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में 90 प्रतिशत खेतों तक सिंचाई के साधन मौजूद हैं। लेकिन अन्य राज्यों में खेती की ज़मीन के एक बड़े हिस्से पर मानसून के भरोसे ख़रीफ़ की खेती होती है। पूर्वोत्तर के अधिकतर राज्यों, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे राज्यों में आधे से भी ज्यादा खेतों का रकबा मानसून निर्भर है। इन राज्यों की ख़रीफ़ की पैदावार पर कमज़ोर मानसून का विषम प्रभाव पड़ने वाला है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के क़रीब 70 प्रतिशत किसान 1 हेक्टेयर से कम जोतों पर <a href="http://../../../../../../Downloads/Changes%20in%20Indian%20Agriculture%20Recent%20Household-level%20Evidences.pdf">खेती करते</a> हैं। ये मुख्यत: अपने परिवार के भोजन की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए फ़सलें उगाते हैं। कम पैदावार उनकी खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी। इनको अपनी खाने की आवश्यकता पूरी करने के लिए बाज़ार से अनाज ख़रीदने को विवश होना पड़ेगा। फ़सलों की कम पैदावार सामान्यत: उनकी स्थानीय क़ीमतों में भी उछाल लाती है। छोटे किसान पर इसकी दोहरी मार पड़ेगी। पैदावार में गिरावट की वजह से किसानों की आय पर भी प्रभाव पड़ेगा, जो ग्रामीण माँग को शिथिल करेगा। यह पहले से ही निम्न स्तर की माँग से संघर्ष कर रहे देश के लिए किंचित भी अच्छी ख़बर नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">मौसम विभाग का अनुमान है कि वर्तमान में एल-नीनो की क्षीण परिस्थितियाँ मौजूद हैं और मानसून के आगामी हिस्से में उनके प्रबल होने की आशंका है। यह भारत के किसानों की मुश्किलों को और गंभीर बना सकता है। विलंबित मानसून और औसत से कम वर्षा की ख़बर तब आ रही है जब किसान पहले से ही ईरान और अमेरिका तथा इज़रायल के बीच जारी युद्ध के परिणामों को झेल रहे थे। तेल के दामों में वृद्धि की वजह से किसानों की लागत बढ़ रही थी। रही-सही कसर रासायनिक खाद के संकट ने पूरी कर दी।</p>
<div id="attachment_149718" class="wp-caption aligncenter"><img decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-149718" class="size-full wp-image-149718 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971.jpg" alt="" width="4200" height="4200" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971.jpg 4200w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-300x300.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-1024x1024.jpg 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-150x150.jpg 150w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-768x768.jpg 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-1536x1536.jpg 1536w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-2048x2048.jpg 2048w" sizes="(max-width: 4200px) 100vw, 4200px"><p id="caption-attachment-149718" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-size: 15pt;"><em>यमुना बाढ़-11</em>, अतुल भल्ला</span></small></p></div>
<p style="text-align: justify;">भारत रासायनिक खादों तथा उनके उत्पादन के लिए आवश्यक अवयवों के लिए मुख्यत: आयात पर निर्भर है। यूरिया के उत्पादन में लगने वाले प्राकृतिक गैस का 78 प्रतिशत हिस्सा <a href="https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/187/AS482_Eh31SM.pdf?source=pqals">आयात</a> किया जाता है। इसी तरह रॉक फ़ॉस्फ़ेट, सल्फ़र, अमोनिया, फ़ॉस्फ़ोरिक एसिड, तथा पोटाश के म्युरिएट का आधा से ज़्यादा हिस्सा भी आयात ही किया जाता है। प्राकृतिक गैस का तक़रीबन <a href="https://www.theguardian.com/world/2026/apr/04/india-fuel-crisis-fertiliser-shortage-farming">दो-तिहाई भाग</a> खाड़ी के देशों से होर्मुज़ की खाड़ी से होकर आता है। रासायनिक खादों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा भी उसी रास्ते आता है। रूस-युक्रेन युद्ध, और उसके बाद ईरान और अमेरिका तथा इज़रायल ने भारत के रासायनिक खाद सेक्टर को डांवाडोल कर रखा है।</p>
<p style="text-align: justify;">होर्मुज़ की खाड़ी की घेराबंदी से भारत के किसान पहले ही खाद की किल्लत और उनकी बढ़ती क़ीमतों को लेकर आशंकित थे। कालाबाज़ारी और ज़माखोरी जैसी समस्याओं से किसान और त्रस्त हो गए हैं। ग़ौरतलब है कि रासायनिक खाद की समस्या पूरी तरह सरकारी नीतियों की देन है। सरकार-दर-सरकार ने, फ़्री-मार्केट के नवउदारवादी सिद्धांत का हवाला देते हुए, रासायनिक खाद के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से आयात पर निर्भरता को बढ़ावा दिया। आज हालत है कि भारत अपनी खेती के लिए आवश्यक खाद के लिए पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार पर निर्भर है, क्योंकि घरेलू उत्पादन क्षमता नाकाफ़ी है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में होने वाली एक छोटी सी हलचल भी भारत के किसानों के लिए रोजी-रोटी का संकट पैदा कर देती है और भारत की खाद्य सुरक्षा को ख़तरे में डाल देती है।</p>
<p style="text-align: justify;">ज़ाहिर है, विलंबित और अपर्याप्त मानसून और पहले से मौजूद बढ़ती लागत और खाद के संकट ने मिलकर कृषि क्षेत्र के सामने भारी मुश्किलें पैदा कर दी हैं। अगर इनसे निपटने के लिए त्वरित क़दम नहीं उठाए गए तो करोड़ों किसानों के लिए कई तरह की चुनौतियाँ खड़ी हो सकती हैं। आशंका यह है कि ग्रामीण मज़दूरी में गिरावट आ सकती है। कुल ग्रामीण माँग में गिरावट से अर्थव्यवस्था के बढ़ने की रफ़्तार पर भी ब्रेक लग सकता है। सरकार को एमएसपी के दामों को समुचित स्तर पर तय करके ज़्यादा से ज़्यादा किसानों को इसके दायरे में लाना चाहिए, ख़ासकर उन राज्यों पर विशेष ध्यान देना चाहिए जहाँ एमएसपी की ख़रीद बेहद कम अथवा नगण्य है।</p>
<p style="text-align: justify;">मनरेगा को ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कमज़ोर पड़ती माँग को सहारा देने का एक कारगर उपाय माना जाता है। मनरेगा के तहत मिलने वाले काम के दिनों और मज़दूरी को बढ़ाकर खेती और मज़दूरी से घटी आय को कुछ हद तक काबू किया जा सकता है। रासायनिक खाद की समस्या के लिए आत्मनिर्भरता ही एक उपाय है। निजी क्षेत्र और बाज़ार की निरंकुशता के भरोसे छोड़े जाने का नतीजा आज देखने को मिल रहा है। सरकार को रासायनिक खाद के उत्पादन में यथासंभव आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए ख़ुद निवेश करके घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने की पहल करनी चाहिए। सरकार जब तक प्रभावी नीतियों की बजाय प्रभावहीन जुगाड़ों का सहारा लेती रहेगी,ये समस्याएँ गहराती जाएँगी।</p>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>उमेश यादव</strong></p></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>ग्रामीण ग़रीबी से शहरी बेबसी तक</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/grameen-gareebi-se-shahri-bebasi-tak/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Jul 2026 18:40:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कम वर्षा तथा अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पैदा हुए खाद संकट से पैदावार में कमी आ सकती है, जिससे किसानों की मुश्किलें बढ़ेंगी।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><span style="font-size: 20pt;"><strong>नोएडा इंडस्ट्रियल एरिया के मज़दूरों की सर्वे रिपोर्ट-2</strong></span></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="https://dev.thetricontinental.org/asia/noida-mazdoor-survey/"><u>नोएडा इंडस्ट्रियल एरिया के मज़दूरों की सर्वे रिपोर्ट</u></a>: भाग 1 ने गारमेंट कारख़ानों में काम कर रहे प्रवासी मज़दूरों के हालात पर प्रकाश डाला। ये मज़दूर—मुख्यत: नौजवान पुरुष—उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से काम की तलाश में यहाँ आते हैं। उनको मालूम है कि यह शहर उनकी श्रम शक्ति को निचोड़कर उन्हें बदले में मुश्किल से ज़िंदा रहने लायक मेहनताना भी नहीं देगा। नतीजतन, वो अमानवीय हालात में यहाँ जैसे-तैसे अपने दिन काटते हैं। उनकी मज़दूरी उनको अपना परिवार साथ में रख पाने और उनका ख़र्च उठा पाने की इजाज़त नहीं देती। किराये के साझा कमरों में रहने वाले इन मज़दूरों के लिए नोएडा कमाई का एक अस्थाई ठिकाना मात्र है।</p>
<p style="text-align: justify;">सवाल यह उठता है कि जिन जगहों से ये मज़दूर आ रहे हैं, वहाँ किस तरह का आर्थिक संकट है, जिससे बचने के लिए उनको यहाँ के अमानवीय हालात में रहकर काम करने को मज़बूर होना पड़ रहा है? इसके जवाब का रास्ता भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आए बदलावों और उनसे जनित खेती की समस्याओं के विश्लेषण से होकर जाता है। यह भूमि के स्वामित्व में मौजूद असमानता, गैर-कृषीय सेक्टरों में उचित रोज़गार सृजन के अभाव जैसे मुद्दों से जुड़ा हुआ है। शहर में अति निम्न वेतन पर काम करने को विवश मज़दूर अपने मूल निवास में व्याप्त एक दीर्घकालिक आर्थिक संकट तथा बेरोज़गारी के भीषण प्रकोप के लक्षण मात्र हैं। इस समस्या की जड़ें ग्रामीण भारत में मौजूद हैं।</p>
<h2 style="margin:3em 0;"><strong>बेरोज़गारी से त्रस्त ग्रामीण भारत </strong></h2>
<p style="text-align: justify;">भारत में पिछले कई दशकों से खेतों के कुल रकबे में कोई वृद्धि नहीं हुई है। खेती का कुल रकबा 1980 के दशक के बाद से ठहराव की स्थिति में है। जोत का औसत आकार भी लगातार घट रहा है। कृषि जनगणना के अनुसार <a href="https://agcensus.da.gov.in/document/ac/airac2000-01-compressed.pdf"><u>1980-81</u></a> में जहाँ एक औसत जोत का रकबा 1.84 हेक्टेयर था, वहीं, <a href="https://agcensus.da.gov.in/document/agcen1516/ac_1516_report_final-220221.pdf"><u>2015-16</u></a> के हालिया कृषि जनगणना के मुताबिक यह 1.08 हेक्टेयर था। सीमित कृषि योग्य भूमि और बढ़ती जनसंख्या की वजह से न सिर्फ़ औसत जोत का आकार घट रहा है, छोटे और सीमांत किसानों की संख्या भी बढ़ रही है। <a href="https://agcensus.da.gov.in/document/ac/airac2000-01-compressed.pdf"><u>1980-81</u></a> में करीब 74 प्रतिशत जोतों का रकबा 2 हेक्टेयर से कम था। जबकि <a href="https://agcensus.da.gov.in/document/agcen1516/ac_1516_report_final-220221.pdf"><u>2015-16</u></a> में करीब 86 प्रतिशत जोतों का रकबा 2 हेक्टेयर से कम था। कृषि भूमि का वितरण भी बेहद असमान है। 2015-16 में 2 हेक्टेयर से कम जोतों की कुल राष्ट्रीय जोतों के क्षेत्रफल में हिस्सेदारी मात्र 47 प्रतिशत थी। विषम असमानता वाली भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में छोटी होती जोत और सीमांत तथा छोटे किसानों की बढ़ती प्रधानता से प्रति हेक्टेयर खेत पर निर्भर लोगों की संख्या बढ़ी है। इसके साथ ही साथ, फ़सलों को उगाने के लिए आवश्यक श्रम में तेज़ गिरावट आई है। नीचे दी गई तालिका 2000-01 और 2021-22 के बीच धान और गेहूँ में प्रयुक्त प्रति हेक्टेयर श्रम में प्रतिशत गिरावट को दर्शाती है। यह तालिका धान तथा गेहूँ दोनों उगाने वाले उत्तर भारत के चुनिंदा राज्यों के आंकड़ों को दिखाती है, लेकिन लगभग हर राज्य में फ़सलों में प्रयुक्त श्रम में गिरावट एक सार्वभौमिक तथ्य है। मुख्यत: धान तथा अन्य फ़सलों की खेती करने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों में भी यही पैटर्न देखने को मिलता है। तमिलनाडु में धान की खेती में श्रम की मात्रा में 65 प्रतिशत, कर्नाटक तथा केरल में 56 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली है।</p>
<p style="text-align: center;"><em><strong>तालिका</strong></em><em>: </em><em>धान तथा गेहूँ की प्रति हेक्टेयर फ़सल में प्रयुक्त श्रम की मात्रा में </em><em>2000-01 </em><em>की तुलना में </em><em>2021-22 </em><em>में आई प्रतिशत गिरावट</em></p>
<p style="text-align: justify;"><img decoding="async" class="aligncenter wp-image-149646 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part2_labour_use_decline_table.png" alt="" width="450" height="279" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part2_labour_use_decline_table.png 743w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part2_labour_use_decline_table-300x186.png 300w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px"></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"><em><strong>आंकड़ों का स्रोत</strong></em>: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के ‘प्लॉट लेवल कॉस्ट ऑफ़ कल्टिवेशन’ के यूनिट लेवल आंकड़ो से लेखक की गणना।</span></p>
<p style="text-align: justify;">बेहतर होती तकनीक तथा खेती करने के उन्नत तरीक़ों के अनुपालन की वजह से यह बदलाव अपने आप में खेती की बढ़ती उत्पादकता का परिचायक होता है। लेकिन, जब इस तथ्य को कृषीय अर्थव्यवस्था के अन्य संरचनात्मक पहलुओं के साथ जोड़कर देखा जाए तब समस्या का जटिल रूप प्रकट होना शुरू होता है। औसत जोत का आकार लगातार घट रहा है; फ़सलों में लगने वाले श्रम की मात्रा भी तेज़ी से घट रही है; जबकि खेती से गुज़र-बसर करने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। खेती में संलग्न लोगों की संख्या जहाँ <a href="https://www.indiabudget.gov.in/budget_archive/es2001-02/chapt2002/chap103.pdf"><u>1983</u></a> में करीब 21 करोड़ थी, वहीं <a href="https://www.outlookbusiness.com/economy-and-policy/economist-santosh-mehrotra-on-the-jobs-crisis-that-could-keep-india-poor"><u>2023-24</u></a> मे यह संख्या 28 करोड़ तक पहुँच गई। चिंता की बात तो यह है कि हाल के वर्षों में खेती में संलग्न लोगों का प्रतिशत बढ़ता गया है। 2024-25 में सकल मूल्य संवर्धन में मात्र 14 प्रतिशत का योगदान देने वाले कृषि सेक्टर में वर्कफ़ोर्स का 46 प्रतिशत हिस्सा काम कर रहा था। आवश्यकता ना होने के बावजूद खेतों में काम करना वास्तव में अर्थपूर्ण काम करना नहीं है। यह गाँवों में गैर-कृषीय रोज़गार की भारी कमी को ढकने का तकनीकी प्रयास मात्र है। कृषि में वर्कफ़ोर्स का एक बड़े हिस्से का संलग्न होना बेरोज़गारी के गंभीर स्तर का एक अप्रत्यक्ष संकेतक है।</p>
<p style="text-align: justify;">छोटी जोतों और कम होती आवश्यक श्रम की मात्रा एक और तबक़े को सीधे तौर पर प्रभावित करती है—भूमिहीन ग्रामीण परिवार। खेत में काम कम होने से इनकी जीविका गंभीर रूप से प्रभावित होती है। भूमिहीनता की वजह से इनको खेत में काम न मिलने की स्थिति में खाने के लाले पड़ जाते हैं। ग्रामीण भारत में तकरीबन <a href="https://cpim.org/agrarian-change-in-india-understanding-the-continuities-and-shifts/"><u>41 </u>प्रतिशत</a> परिवार 2018-19 में भूमिहीन थे। हक़ीक़त यह है कि रोज़गार के बेहतर अवसरों का भारी अभाव है। इन लोगों को मैन्युफ़ैक्चरिंग और सर्विस सेक्टरों में रोज़गार नहीं मिल पा रहा है। इस वजह से रोज़गार की तलाश में पलायन करने का दबाव सबसे ज़्यादा भूमिहीन परिवारों पर ही होता है।</p>
<div id="attachment_149662" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-149662" class="wp-image-149662 size-full img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/d7hftxdivxxvm.cloudfront.net_.webp" alt="" width="800" height="600" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/d7hftxdivxxvm.cloudfront.net_.webp 800w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/d7hftxdivxxvm.cloudfront.net_-300x225.webp 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/d7hftxdivxxvm.cloudfront.net_-768x576.webp 768w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px"><p id="caption-attachment-149662" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-size: 14pt;">बीरेंद्र यादव, <em>Matter of Material X</em>, 2019</span></small></p></div>
<h2 style="margin:3em 0;"><strong>प्रवास के अलावा कोई चारा नहीं </strong></h2>
<p style="text-align: justify;">खेती के पास काम देने की सीमित क्षमता होती है। बढ़ती आबादी के साथ अगर ग़ैर-कृषीय क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में रोज़गार का सृजन अपरिहार्य हो जाता है। लेकिन भारत में मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर नवउदारवादी दौर में न तो सकल मूल्य संवर्धन में अपना हिस्सा बढ़ा पा रहा है और न ही समुचित रोज़गार प्रदान कर पा रहा है। सर्विस सेक्टर सकल मूल्य संवर्धन का सबसे बड़ा भागीदार होने के बावजूद बेहद कम रोज़गार दे पा रहा है। भारत में नवउदारवादी दौर की इन संरचनात्मक कमज़ोरियो की विस्तृत चर्चा हमारे डोसियर <a href="https://dev.thetricontinental.org/hi/bharteey-arthvyavastha-me-uthal-puthal-ka-daur/"><u><em>भारतीय अर्थव्यवस्था में उथल</em></u></a><a href="https://dev.thetricontinental.org/hi/bharteey-arthvyavastha-me-uthal-puthal-ka-daur/"><em><u>–</u></em><em>पुथल का दौर</em></a> को पढ़ें।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रामीण भारत में रोज़गार का यह गंभीर अभाव ही विपदाग्रस्त प्रवास को जन्म देता है। मुख्यत: भूमिहीन परिवार, और छोटे तथा सीमांत किसान परिवारों के लोग स्थानीय अवसरों के अभाव में शहरों की ओर पलायन करते हैं। सर्वे में शामिल मज़दूरों में से 42 प्रतिशत ने मज़बूरी में 18 वर्ष की आयु से पहले ही मज़दूरी करना शुरू कर दिया था। जबकि क़रीब 7 प्रतिशत ने 14 वर्ष की आयु प्राप्त करने से पहले ही। मात्र 12 प्रतिशत मज़दूरों ने 24 साल के बाद काम करना शुरू किया था। किशोरावस्था में काम करना मज़बूरी में काम करने की विवशता का संकेत होता है। न सिर्फ़ यह बच्चों का बचपना छीनता है, बल्कि उच्च शिक्षा जैसे अवसरों से भी उनको दूर करता है, जिसकी वजह से उनको भविष्य में आजीविका तथा ज़िंदगी के अन्य बेहतर अवसरों से वंचित होना पड़ता है। कृषि क्षेत्र के संकट का प्रभाव सब पर एक समान नहीं होता है। ग्रामीण समाज की असमानता और विपदाग्रस्त प्रवास में गहरा संबंध होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे सर्वे में शामिल मज़दूरों में 76 प्रतिशत के पास उनके गाँव में खेती की भूमि नहीं थी। उनके परिवार भूमिहीन थे। इस सर्वे में मुख्य रूप से भूमिहीन, सीमांत तथा लघु जोतों के सदस्य ही विपदाग्रस्त प्रवासी निकले। बड़ी जोतों वाले मज़दूर नगण्य थे। ग्रामीण भारत में रोज़गार का पैटर्न जहाँ खेती-प्रधान होता जा रहा है, वहीं परिवारों की आय का वितरण अधिकाधिक रूप से मज़दूरी प्रधान। एक औसत ग्रामीन परिवार की मासिक आय में मज़दूरी का हिस्सा 2013 में 33 प्रतिशत था, जो 2019 में बढ़कर 41 प्रतिशत हो गया। वहीं मासिक आय में खेती से होने वाली आय का हिस्सा इस दौरान 50 से घटकर 38 प्रतिशत हो गया। सीमांत और लघु जोत वाले किसानों के मामले में ग़ैर-कृषि मज़दूरी का हिस्सा इससे भी ज़्यादा मात्रा में बढ़ा है और खेती से प्राप्त आय का हिस्सा अधिक मात्रा में गिरा है। खेती से होने वाली आय की गिरावट को खेती में बढ़ती संलग्नता के आलोक में देखने पर खेती एक अतिनिम्न उत्पादकता वाला क्षेत्र बनता जा रहा है। जीविकोपार्जन हेतु यह नाकाफ़ी है जिस वजह से ग्रामीण परिवार ग़ैर-कृषीय गतिविधियों में रोज़गार पाने को बेताब हैं। जीविकोपार्जन का यह संकट लोगों को रोज़गार की तलाश में दूर-दराज़ इलाक़ों में भटकने को विविश कर रहा है। यही कारण है कि किशोर तथा युवा दो पैसे कमाने के लिए इस शहरों में आते हैं तथा बेहद कम मज़दूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">14 प्रतिशत मज़दूर अनपढ़ थे, जबकि 46 प्रतिशत ने पाँचवी कक्षा या उससे कम पढ़ाई की हुई थी। 10 प्रतिशत के पास स्नातक की डिग्री थी। भूमिहीनता न सिर्फ़ गाँव में बाशिंदों की आर्थिक नियति तय करती दिखती है, बल्कि शिक्षा के स्तर और प्रवास के स्वरूप की भी निर्धारक जान पड़ती है। भूमिहीनता की वजह से ग़रीबी की आशंका ज्यादा हो जाती है, इससे बच्चों को समय से पहले पढ़ाई त्यागकर काम पर लगना पड़ता है। इस कारण उनको अपनी ग़रीबी दूर करने लायक रोज़गार प्राप्त करने के लिए ज़रूरी शिक्षा नहीं मिलती, और ग़रीबी का यह चक्र निर्बाध चलता रहता है। इस चक्र का यदा-कदा टूटना अपवाद ही होता है। वर्तमान पीढ़ी पिछली पीढ़ी की आर्थिक विपन्नता को शहरों में नए रूपों में जीने को मज़बूर होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">नोएडा जैसे इंडस्ट्रियल क्षेत्रों, तथा शहरों में लगभग हर तरह के निम्न मेहनताना वाले श्रम की आपूर्ति करने वाले गाँव के प्रवासी मज़दूर ग्रामीण भारत में विद्यमान असमान भूमि वितरण, खेती में व्याप्त संकट एवं रोज़गार के अभाव के मारे हैं। उनका विपदाग्रस्त प्रवास ग्रामीण भारत में कायम भीषण आर्थिक संकट का द्योतक है। यह प्रवास भुखमरी से बचने के लिए ग्रामीण ग़रीबी से शहरी बेबसी की ओर एक यात्रा मात्र है।</p>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>उमेश यादव</strong></p><small><strong>उमेश यादव</strong></small></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>साझा ज़मीन की घेराबंदी से बढ़ा सामाजिक संकट</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/sajha-zameen-ki-gherabandi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Jun 2026 11:36:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नोएडा के मज़दूर प्रायः बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के गाँवों के भूमिहीन परिवारों से आते हैं। इनमें से ज़्यादातर ने कम उम्र में ही मज़दूरी शुरू की।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-148289 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/WhatsApp-Image-2026-06-29-at-07.01.11.jpeg" alt="" width="544" height="895" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/WhatsApp-Image-2026-06-29-at-07.01.11.jpeg 544w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/WhatsApp-Image-2026-06-29-at-07.01.11-182x300.jpeg 182w" sizes="auto, (max-width: 544px) 100vw, 544px"></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">करीब एक दशक पहले तक पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के दियारा</span></span>/<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">खादर क्षेत्रों में कुछ दूरी से अवलोकन करने पर भैंसों का असंख्य हुजूम बालू और घास के आसमान पर काले तारों की तरह टिमटिमाते हुए दिखता था। बीच में कहीं</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">कहीं गायों और बैलों का छोटा समूह भी दिख जाता था। भैंसें दिन भर रेत पर चरतीं और नदी की धारा में बैठी अथवा तैरती रहतीं। चरवाहे नदी किनारे स्थित पेड़ों के झुरमुट और बगीचों में बैठकर नज़र रखते। गमछों में बाँधकर लाया गया दोपहर का भोजन इकट्ठे खाया जाता। पूरा दिन बतकही में निकलता। यद</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">कदा भैंसें अगर अवांछित दिशा में जातीं तो कोई एक चरवाहा उठकर उनको हाँककर वापस मोड़ देता। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">अब दियारों की सूरत बियाबान</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">सी लगती है। रेत के मैदान खाली और सपाट दिखते हैं। चरवाही की परंपरा अवसान की ओर है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">और इसके कई कारण हैं। चरागाह ख़त्म हो रहे हैं</span></span>; <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">परती ज़मीनें जोती जा रही हैं। कुएँ तो कब के ग़ायब हो चुके थे। तालाब और पानी के स्रोतों को पाटकर उन पर भी क़ब्ज़ा जमाया जा रहा है। बिना चरागाहों और तालाबों के चरवाही मुश्किल हो गई है। चरवाही का विलीन होना एक आर्थिक गतिविधि का अवसान मात्र नहीं है। यह सामुदायिक श्रम के सबसे पुरातन स्वरूपों में से एक का ख़त्म होना भी है—एक ऐसी सामूहिक जगह का ख़त्म होना जहाँ ग्रामीण पुरुषों की रचनाशीलता आपस में मिलती</span></span>; <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">गल्प</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">मज़ाक और गीत गढ़ती। चैता</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">सोरठा</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">बृजभार जैसी शैलियों के गीत गाए जाते</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">उनकी तर्ज़ पर नए बोल जोड़े जाते। नई पीढ़ी इनको आत्मसात करती। बच्चों की गर्मियों की छुट्टियाँ प्राय</span></span>: <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">नदी में नहाते</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">बगीचों और परती मैदानों में खेलते बीततीं</span></span>; <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">नदी किनारे और बगीचों में ठहरे चरवाहों और बुज़ुर्गों के पास बैठकर वे पुरानी कहानियाँ सुनते</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">गीत सीखते। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">बाग</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">बगीचों और परती ज़मीनों के जाने की वजह से खेलने की जगहें भी चली गई हैं। पहले पूरा गाँव ही खेल का मैदान हुआ करता था। बच्चे झुंड बनाकर गाँव के एक कोने से दौड़ते</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">कलरव करते</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">दूसरे छोर तक चले जाते थे। अब मकानों को चहारदीवारियों से घेरने का चलन चल पड़ा है। ज़मीन की एक</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">एक इंच पर क़ब्ज़े का चलन ऐसा है कि गलियाँ और सड़कें संकरी होती जा रही हैं। गाँव के एक छोर से दूसरे छोर तक जाना तो दूर</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">एक छोटी दूरी तय करने का रास्ता भी घुटन से भरा होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि एक अदम्य भूख इन सामुदायिक जगहों को धीरे</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">धीरे लील रही है—सामुदायिक जगहों को भी और घरों को भी। और यह लील रही है बच्चों का बचपन। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">इस अदम्य भूख का एक नाम है—घेराबंदी </span></span>(<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">साझा जगहों को निजी बना देने की प्रक्रिया</span></span>)<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">। </span></span></p>
<h2 class="heading-20-1-unnumbered" style="margin:3em 0;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">ग्रामीण भारत का बदलता ताना</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">बाना </span></span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">यह घेराबंदी कोई स्थानीय या नई परिघटना नहीं है। गाँव की साझा ज़मीन—उत्तर भारत में जिसे प्राय</span></span>: <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">ग्राम</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">सभा या ग्राम</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">पंचायत की भूमि कहा जाता है—पर क़ब्ज़े का सिलसिला इतना व्यापक हो चुका है कि देश की सर्वोच्च अदालत को इस पर सख़्त टिप्पणी करनी पड़ी। </span></span>2011 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">के <a href="https://indiankanoon.org/doc/1692607/">जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य</a> मामले में उच्चतम न्यायालय ने माना कि सदियों से गाँव की ये साझा भूमि—तालाब</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">चरागाह</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">श्मशान</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">रास्ते—समूचे समुदाय के साझा उपयोग के लिए रही हैं</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">किन्तु आज़ादी के बाद धनबल</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">बाहुबल और राजनीतिक रसूख़ वाले लोगों ने</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">अधिकारियों की मिलीभगत से</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">इन पर व्यवस्थित ढंग से क़ब्ज़ा कर लिया। जिस मामले की सुनवाई हो रही थी</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">वह ख़ुद एक ऐसे तालाब का था जिसे मिट्टी से पाटकर उस पर मकान खड़े कर दिए गए थे—आज यह दृश्य असंख्य गाँवों और दियारों में आम है। अदालत ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे साझा ज़मीनों से अवैध क़ब्ज़े हटाएँ। लेकिन फ़ैसले के एक दशक बाद भी हालात जस के तस हैं</span></span>: <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">क़ब्ज़े बने हुए हैं</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">और जहाँ हटाए भी गए</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">वहाँ अक्सर वे ग़रीब परिवार उजड़े जो पीढ़ियों से बिना किसी काग़ज़ के पंचायती ज़मीन पर बसे थे। घेराबंदी की मार</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">अंतत</span></span>:, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">ग़रीब पर ही दोनों तरफ़ से पड़ती है। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">घेराबंदी की प्रवृत्ति नब्बे के दशक में अपनाई गई नवउदारवादी नीतियों के साथ और तेज़ी से बढ़ी। इन नीतियों का मूल तर्क यही है कि जो भी साझा है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">जो भी लोगों के काम का है—ज़मीन</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">पानी</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">स्कूल</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">अस्पताल—उसे बाज़ारू वस्तु बना दिया जाए</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">ताकि लोग उसे आपस में ख़रीदें</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">बेचें। हमारे असमान समाज में</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">जहाँ उत्पादन के साधनों पर एक छोटे तबके का स्वामित्व रहा है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">इन नीतियों के कारण असमानता बढ़ती गई है। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">ग्रामीण मज़दूर और किसान वर्ग पहले ही एक असमान आर्थिक विकास प्रक्रिया का दंश झेल रहा है। शहरी उद्योगों का विस्तार रुका हुआ है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">ग़ैर</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">कृषि रोज़गार का सृजन नगण्य है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">और गाँव में रोज़गार ढूँढ़ते लोगों की क़तार लंबी होती जा रही है। एक नौकरी के लिए हज़ारों के खड़े होने का नतीजा यह कि निजी उद्योग भरण</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">पोषण भर के लिए भी नाकाफ़ी मज़दूरी देते हैं। संक्षेप में</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">हमारे असमान समाज में नवउदारवाद ने श्रम के सस्तीकरण को बढ़ावा दिया है। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">दूसरी तरफ़</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">शिक्षा और स्वास्थ्य—जिनकी माँग कभी नहीं घटती—सबसे कम जोख़िम और सबसे ऊँचे मुनाफ़े वाले धंधे बन गए हैं। न स्कूलों की फ़ीस पर कोई नकेल है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">न इलाज की। दिल्ली के एम्स और सफ़दरजंग जैसे अस्पतालों के बाहर महीनों तक इलाज की आस में अमानवीय हालात में पड़े रहने वाले बिहार</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">बंगाल और उत्तर प्रदेश के लोग इस व्यवस्था की जर्जर तस्वीर की एक बानगी भर हैं। जिनके पास साधन हैं वे इलाज और पढ़ाई के लिए शहर पलायन कर जाते हैं</span></span>; <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">असंख्य परिवार साधनों के अभाव में अपने सपनों का गला घोंटकर भाग्य के भरोसे छूट जाते हैं। यह केवल सपनों की मौत नहीं</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों के भरोसे की मौन पराजय भी है। शहर ख़ुद निरंकुश खर</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">पतवार की तरह फैल रहे हैं</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">और सरकार ने उनके विस्तार को भी बाज़ार के हवाले कर रखा है—न कोई नियोजन है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">न बुनियादी सामुदायिक ढाँचे का कोई एजेंडा। अमीर इलाक़ों को छोड़ दें तो ये शहर इंसानों को वस्तुओं की तरह उत्पादित करने वाले कारखाने अधिक लगते हैं</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">जहाँ न लोगों के हिलने</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">मिलने की जगह है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">न बच्चों के कलरव की। </span></span></p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-148297 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/WhatsApp-Image-2026-06-29-at-07.12.35.jpeg" alt="" width="926" height="1330" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/WhatsApp-Image-2026-06-29-at-07.12.35.jpeg 926w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/WhatsApp-Image-2026-06-29-at-07.12.35-209x300.jpeg 209w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/WhatsApp-Image-2026-06-29-at-07.12.35-713x1024.jpeg 713w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/WhatsApp-Image-2026-06-29-at-07.12.35-768x1103.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 926px) 100vw, 926px"></p>
<h2 style="margin:3em 0;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">सिमटता बचपन का दायरा </span></span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">विकास की इस नवउदारवादी परिकल्पना से प्रभावित एक तबक़ा ऐसा है जिसकी बात व्यापक ढंग से नहीं हो पाती—बच्चे। अंग्रेज़ी माध्यम के निजी स्कूलों और कोचिंग का उभार ऐसा हुआ है कि जिसके पास साधन हैं वह बच्चों को निजी स्कूल भेज रहा है और अनिवार्यत</span></span>: <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">कोचिंग भी करा रहा है</span></span>; <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">सरकारी स्कूल मुख्यत</span></span>: <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">ग़रीबों के बच्चों के लिए रह गए हैं। मेधावी बच्चों को शहरों में पढ़ने भेजा जा रहा है—अकेले या सपरिवार। बेहतर शिक्षा की प्रबल आकांक्षा और महँगी</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">खस्ताहाल होती शिक्षा</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">व्यवस्था की यह विडंबना आज के भारत की हक़ीक़त है। रही</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">सही कसर प्रतियोगी परीक्षाओं के स्वरूप ने पूरी कर दी है</span></span>: <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">स्कूली परीक्षाओं से लेकर अच्छे कॉलेजों और सरकारी नौकरियों के इम्तिहान पाठ्यक्रम से इतने दूर होते जा रहे हैं कि बिना कोचिंग के उन्हें पास करना असंभव</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">सा है। नतीजतन कोचिंग का धंधा ख़ूब फल</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">फूल रहा है। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">इस धंधे का सबसे ख़तरनाक रूप राजस्थान के कोटा में दिखता है। आईआईटी और मेडिकल की तैयारी के इस ‘कारखाने’ में हर साल देश भर से हज़ारों किशोर जुटते हैं</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">और हर साल कुछ लौटकर नहीं आते। अकेले </span></span>2023 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">में वहाँ दो दर्जन से अधिक विद्यार्थियों ने पढ़ाई के दबाव में अपनी <a href="https://www.ndtv.com/india-news/kota-suicides-2023-year-of-highest-student-suicides-in-kota-many-steps-to-prevent-them-4773989">जान</a> दे दी। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">बचपन दोहरी मार की चपेट में है। स्कूल और कोचिंग के बीच खेलने</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">कूदने का समय कम पड़ता जा रहा है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">और खेलने की जगहें तो पहले ही घेराबंदी की भेंट चढ़ चुकी हैं। अपनी मातृभाषा</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">अपने लोकगीतों और संस्कृति को सीखने</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">सहेजने के अवसर भी उसी रफ़्तार से सिमट रहे हैं। पारंपरिक विधाओं और संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने वाली जगहें और परिस्थितियाँ</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">दोनों ही गहन दबाव में हैं। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">बच्चे आने वाले समाज का स्वरूप तय करते हैं</span></span>; <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">वे कल के नागरिक हैं। जिस परिवेश में वे बड़े हो रहे हैं और जिन सामाजिक प्रक्रियाओं से उन्हें वंचित होना पड़ रहा है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">वही आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को गढ़ेंगी। समाज से काटकर सामाजिक रूप से कटिबद्ध इंसान का निर्माण नहीं किया जा सकता। एक ज़िम्मेदार नागरिक के निर्माण के लिए ज़रूरी है कि उसे सामाजिक प्रक्रियाओं में समुचित भागीदारी का मौका मिले</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">संस्कृति को आत्मसात करने और ख़ुद को उससे जोड़ने का पर्याप्त समय और मार्गदर्शन मिले। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">बचपन की यह घेराबंदी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">एक राजनीतिक चुनाव है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">और इस स्थिति को पलटा जा सकता है। पर अहम सवाल यह है कि हम किस तरह का समाज चाहते हैं—वह जो अपने बच्चों के लिए साझा जगह और साझा समय बचाकर रखे</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">या वह जो ज़मीन के हर इंच और बचपन के हर घंटे को मुनाफ़े की भट्ठी में झोंक दे। मातृभाषा</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">लोकगीत और साझा बचपन जैसे ‘मुनाफ़ा</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">विहीन’ सवाल अगर मौजूदा विकास</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">परिकल्पना को रास नहीं आते</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">तो इस परिकल्पना को ही कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;">(<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">लेख में शामिल स्केच सफ़दर हाशमी द्वारा बच्चों के लिए लिखी गई पुस्तक </span></span>‘<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">दुनिया सबकी</span></span>‘ <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">से लिए गए हैं।</span></span>)</p>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>उमेश यादव</strong></p><small>उमेश यादव</small></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आईपीएलः क्रिकेट के मैदान में पूँजी का खेल</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/ipl-cricket-me-poonji-ka-khel/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 May 2026 10:10:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सार्वजनिक भूमि के ख़त्म होते जाने से आपसी संबंध तो बदले ही हैं, कई तरह की आर्थिक समस्याएं भी पैदा हुई हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>सख़्त धूप का महीना अप्रैल और आँधी-तूफ़ान से जुड़ा मई, दोनों अब आईपीएल को समर्पित हो गए हैं। इस साल तो हद ही हो गई। टी-20 फॉर्मेट का पुरुष वर्ल्ड कप भारत में ही टीम इंडिया की जीत के साथ मार्च के पहले हफ़्ते में संपन्न हुआ और मार्च बीतने से पहले ही लोगबाग़ आईपीएल देखने में जुट गए। ‘ओवरसप्लाई’ जैसी कोई बात अपने यहाँ इस खेल पर लागू नहीं होती। बल्ले से मारी गई गेंद के पीछे खिलाड़ियों को भागते हुए देखने की भूख हमारे देश में कितनी है, इसका अंदाज़ा 2007 से पहले किसी को नहीं था। जिस एक इंसान को सबसे पहले इसका अंदाज़ा हुआ और इसके इर्द-गिर्द जिसने यह धंधा खड़ा किया, वह दो पैसे खींचकर वनुआतू का नागरिक बन गया है। जी हाँ, ललित मोदी, पूर्व उपाध्यक्ष बीसीसीआई, और आईपीएल के पहले चेयरमैन, जो साथ में चीयरलीडरों का सिस्टम लेकर आए थे और जिनके ट्वीट का इंतजार आईपीएल के हर सीजन से पहले कई लोग आज भी करते हैं।</p>
<p><strong>बड़ी पूँजी, स्पोर्ट्स लीग और देसी दिमाग़</strong></p>
<p>लीग का आइडिया बाज़ार में आए बीस साल भी नहीं हुए और इतने ही वक़्त में कितना बड़ा तमाशा खड़ा हो गया है, इसका एक ख़ाका दिमाग़ में बनाने के लिए आईपीएल की तुलना दुनिया की बाकी कमाऊ स्पोर्ट्स लीग्स से की जानी चाहिए। अभी हम चोटी के ऐसे पाँच नाम निकालें तो आईपीएल का मुक़ाम कारोबारी क़द में दूसरे नंबर का निकलता है। दुनिया की सबसे अमीर लीग एनएफएल है- नेशनल फुटबॉल लीग। यह अमेरिकी लीग एक ऐसे खेल का कारोबार करती है जो भारत में खेला ही नहीं जाता। बाकी दुनिया इसको रग्बी कहती है लेकिन ढाँचे में ज़रा से बदलाव के साथ अमेरिकी इसे फुटबॉल ही बोलते हैं, भले दुनिया भर के असल फुटबॉलर इस पर खुन्नस खाते रहें। एनएफएल की सालाना कमाई 21.2 अरब डॉलर है, जबकि आईपीएल साल में 16.4 अरब डॉलर पीट रहा है।</p>
<p>तीसरे और चौथे नंबर की कमाऊ स्पोर्ट्स लीग्स भी अमेरिकी ही हैं। मेजर लीग बेसबॉल (एमएलबी) एक और ठेठ अमेरिकी खेल का धंधा करती है, जिसके दर्शन भारत में नहीं होते। इसकी सालाना कमाई 13.1 अरब डॉलर है। इसके जरा-सा पीछे नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन है जो अभी साल में 13 अरब डॉलर कमा रही है। इस सूची में पाँचवाँ और आख़िरी नाम इंग्लैंड की फुटबॉल लीग ईपीएल (इंग्लिश प्रीमियर लीग) का है। इसका बिजनेस उसी वाली फुटबॉल का है, जो भारत समेत पूरी दुनिया में खेली जाती है। इस सूची को ग़ौर से देखने पर दो बातें उछलकर आती हैं। एक यह कि बाक़ी चार लीग्स विश्व पूँजीवाद का नेतृत्व करने वाले देशों में जन्मी हैं। दूसरी यह कि उनका कारोबार बहुत पहले, कम से कम 80 साल पहले शुरू हो चुका था, जब स्पोर्ट्स टीवी कहीं सीन में ही नहीं था। इनके बरक्स आईपीएल बहुत नया है और विकासशील देश से आने के चलते भी इसकी कामयाबी असाधारण है।</p>
<p>इंग्लिश प्रीमियर लीग की शुरुआत सन 1888 ई. में हुई थी, जब ब्रिटेन के राज में सूरज नहीं डूबता था। उसके 12 साल पहले, सन 1876 में मेजर लीग बेसबॉल अमेरिका में कामकाजी शक्ल ले चुकी थी। नेशनल फुटबॉल लीग वहाँ सन् 1820 में बनी, जबकि नेशनल फुटबॉल लीग ने द्वितीय विश्वयुद्ध ख़त्म होने के तुरंत बाद सन 1946 में अपना धंधा शुरू किया। इनके बरक्स बीस साल से कम उम्र में ही आईपीएल का बिजनेस जितना बढ़ गया है, उसे देखकर इसको खड़ा करने वालों की कुशाग्र बुद्धि से ज़्यादा भारत के आम आदमी की दिमाग़ी हालत का अंदाज़ा मिलता है, जो हर साल दो महीने बिला नागा, हर रोज़ एक ऐसा खेल टीवी पर देखने के लिए अपने तीन से सात घंटे देता है, जिसको न तो उसने कभी ख़ुद खेला है, न ही अपने बच्चों को खुले मन से इसे खेलने का मौक़ा दिया है। उसकी यह दशा टीवी और ओटीटी प्लैटफॉर्म्स पर विज्ञापन के महंगे टाइम स्लॉट बनाती है, जिससे मंदी में भी पैसा बरसता है।</p>
<p><strong>आमदनी के ज़रिये</strong></p>
<p>बीसीसीआई की कुल आमदनी का लगभग साठ फ़ीसदी हिस्सा अभी आईपीएल से ही आता है और उसके पास आय के बहुत सारे ज़रिये हैं। इनमें सबसे बड़ा ज़रिया प्रसारण अधिकार हासिल करने के लिए स्पोर्ट्स टीवी चैनलों द्वारा दी जाने वाली रक़म ही है। इसके अलावा स्टेडियम में लगाए जाने वाले विज्ञापनों से और टिकट बेचने से होने वाली कमाई भी इसके दो प्रकट साधन हैं। फ्रैंचाइजी कंपनियों के पास भी पैसे कमाने के बहुत सारे उपाय हैं। एक तो ऊपर जिन साधनों की बात हमने की है, उनसे होने वाली आमदनी में हिस्से का। दूसरा, एक नया ज़रिया विदेशों में क्लब ख़रीदकर वहाँ भी आईपीएल जैसा ही कुछ धंधा शुरू करने का दिखने लगा है। इससे उनका कारोबार साल में सिर्फ़ दो महीने के बजाय पूरे साल चलता रहता है। दक्षिण अफ्रीका में टी-20 लीग की छह की छह टीमें आईपीएल के फ्रैंचाइजीज ने ख़रीद रखी हैं और यूएई तथा अमेरिकी लीग की ज़्यादातर टीमें भी उन्हीं के पास हैं। वेस्ट इंडीज का कोई खिलाड़ी आपने ख़रीद रखा हो तो वह चारों लीगों में खेलकर आपके लिए पैसे कमाएगा।</p>
<p>ख़ैर, ये तो कमाई के प्रकट, कानूनी और वाज़िब तरीक़े हैं। अपने शुरुआती दस सालों में देश-दुनिया में आईपीएल की चर्चा पर्दे के पीछे चलने वाली गैरकानूनी गतिविधियों के लिए ज़्यादा रही। सबसे पहले, सन् 2010 में इसकी जड़ में मट्ठा डाला उन्हीं ललित मोदी ने, जिन्हें धूमधाम से आईपीएल शुरू कर देने के लिए धंधे का जीनियस कहा जा रहा था। उन्होंने ट्वीट किया कि नई फ्रैंचाइजी कोच्चि टस्कर्स के पीछे शशि थरूर हैं जो अपनी महिला मित्र सुनंदा पुष्कर को पूँजी लगाए बिना ही फ्रैंचाइजी बोर्ड का मेंबर बनाना चाहते हैं। यह विवाद इतना बढ़ा कि कोच्चि टस्कर्स से फ्रैंचाइजी छीन ली गई और बाद में अदालत के हस्तक्षेप से मुआवज़े की एक बड़ी रक़म बीसीसीआई को उसे देनी पड़ी। उसी क्रम में फ्रैंचाइजीज से पैसे उगाहने संबंधी कुछ घपले भी ललित मोदी से जुड़ते गए और गला फँसते देख एक दिन वे चुपके से लंदन खिसक गए। उनके क़िस्से आज भी निकलते हैं। आईपीएल से उनकी छाया हटी नहीं है।</p>
<p><strong>सट्टेबाजी और फिक्सिंग</strong></p>
<p>फिर स्पॉट फिक्सिंग के क़िस्से निकले तो उसमें ललित मोदी की छत्रछाया वाली टीम राजस्थान रॉयल्स के प्रबंधकों में एक राज कुंद्रा और मोदी के प्रतिद्वंद्वी श्रीनिवासन की टीम चेन्नई सुपरकिंग्स के एक प्रमुख व्यक्ति मय्यप्पन, दोनों को साल भर जेल की सज़ा मिली और उन्हें आजीवन आईपीएल से प्रतिबंधित किया गया। कुछ उभरते हुए क्रिकेटर्स का करियर बर्बाद हुआ सो अलग। बड़ी बात यह कि यह फिक्सिंग सट्टेबाज गिरोहों के लिए की जा रही थी, जिनका जाल एक समय देश में गली-गली फैल गया था। जैसे नब्बे के दशक में एक नंबर की लॉटरी बड़े पैमाने पर लोगों का घर बर्बाद करने लगी थी, वैसा ही कुछ क़िस्सा आईपीएल के साथ भी चल पड़ा। ऋषि कपूर और नीतू सिंह की मुख्य भूमिकाओं के साथ बनी वर्ष 2010 की फिल्म ‘दो दूनी चार’ की कहानी में एक पहलू इस तल्ख़ हक़ीक़त का भी था।</p>
<p>बाद में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर. एम. लोढ़ा के नेतृत्व में गठित आयोग ने मैच फिक्सिंग, स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी के मामलों में बड़ी गहराई तक जाते हुए आईपीएल के लिए जो व्यवस्थाएँ दीं और नियम-कानून बनाए, उन्हीं का नतीजा है कि पाताल में जाती हुई इस लीग की साख कुछ सँभल गई। इसके बावजूद पता नहीं किस सरकारी छेद का इस्तेमाल करते हुए बीच में ‘ड्रीम इलेवन’ जैसी गतिविधियाँ शुरू हो गईं। बड़े-बड़े क्रिकेट सितारे उनका विज्ञापन करने लगे, हालाँकि अपनी अंतर्वस्तु में वे अलग मुहावरे के साथ की जाने वाली सट्टेबाजी ही थीं। काफ़ी विरोध के बाद उन पर रोक लगी और 2025 में आईपीएल को 1500 करोड़ का नुक़सान झेलना पड़ा है। इससे सट्टेबाजी नहीं रुकी है। पुलिस जहाँ भी सख़्त होती है, सट्टेबाज गिरोह पकड़े जाते हैं।</p>
<p><strong>विश्व क्रिकेट पर प्रभाव</strong></p>
<p>आमदनी और ख़र्चे वाली बात पर आगे बढ़ें तो आईपीएल के लिए ख़रीदे गए विदेशी खिलाड़ियों को इस साल के लिए 800 करोड़ रुपये के आसपास रक़म जानी है। विदेशी क्रिकेट बोर्डों के नुक़सान की भरपाई वहाँ से आने वाले खिलाड़ियों की देय राशि के 20 प्रतिशत हिस्से से की जाती है। सबसे महँगे खिलाड़ी लगभग हर साल ही ऑस्ट्रेलिया से ख़रीदे जाते हैं और सबसे ज़्यादा रक़म भी उन्हें ही जाती है लेकिन संख्या में सबसे ज़्यादा खिलाड़ी शुरू से ही वेस्ट इंडीज से आते रहे हैं। तीसरे नंबर पर दक्षिण अफ्रीका और फिर इंग्लैंड-न्यूजीलैंड के खिलाड़ी आते हैं। मैदान में चार विदेशी खिलाड़ी रखने की छूट है लेकिन प्रोफेशनलिज्म को ध्यान में रखते हुए हर टीम आठ-दस विदेशी खिलाड़ियों को अपने रोल पर रखना ही चाहती है। शुरू में पड़ोसी मुल्कों, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से खिलाड़ियों की बड़ी खेप आती थी लेकिन कूटनीतिक माहौल बिगड़ा तो फ्रैंचाइजीज ने पहले पाकिस्तानी क्रिकेटरों से पीछा छुड़ाया और अभी बांग्लादेश का भी कोई खिलाड़ी आईपीएल में नहीं खेल रहा है।</p>
<p>जिन स्पोर्ट्स लीग्स का ज़िक्र ऊपर आया है, उनमें ऐसा कोई मामला याद नहीं पड़ता, जब किसी देश से कूटनीतिक टकराव होने पर उसके खिलाड़ियों को लीग में न खेलने दिया गया हो। हालाँकि इतालवी फुटबॉल लीग ‘सीरी ए’ में एक बार ऐसा ज़रूर हुआ था कि इटली की टीम एक वर्ल्ड कप के नॉकआउट मैच में ब्राजील से हार गई तो जिस खिलाड़ी ने खेल के आखिरी क्षणों में गोल मारकर इटली को टूर्नामेंट से बाहर कर दिया था, उसको उस साल सीरी ए के किसी भी फ्रैंचाइजी ने नहीं ख़रीदा। पाकिस्तानी क्रिकेटरों का कई साल से और यहाँ से आगे उसी तर्ज़ पर बांग्लादेशी खिलाड़ियों का भी आईपीएल से बाहर रहना यही बताता है कि भारत में खेल का मुहावरा बाक़ी दुनिया जैसा कभी शायद ही हो पाए। खिलाड़ियों से ज़्यादा यहाँ भावना खेलती है और वह अक्सर आहत होती रहती है।</p>
<p><strong>कमज़ोर क्रिकेट बोर्ड</strong></p>
<p>आईपीएल से सबसे बड़ा नुक़सान दुनिया के कमज़ोर क्रिकेट बोर्डों का हुआ है। मसलन, जिंबाब्वे में क्रिकेट नहीं उठ पा रहा है और वेस्ट इंडीज का क्रिकेट बोर्ड आईपीएल की मेहरबानी से बिल्कुल प्रतीकात्मक स्थिति में आ चुका है। क्रिस गेल जैसा आईपीएल का बादशाह समझा जाने वाला खिलाड़ी अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए किसी काम का नहीं साबित हुआ। वेस्ट इंडीज के खिलाड़ी अपने बोर्ड से पैसे कम मिलने के कारण आम तौर पर उसको कोई भाव ही नहीं देते। और मान-मनौवल के बाद किसी तरह अपने देश की ओर से खेलने को राज़ी भी हो गए तो न उनमें टीम स्पिरिट दिखती है, न ही उनका थका हुआ या चोट खाया हुआ शरीर मैच में जान लड़ाने की स्थिति में होता है।</p>
<p>आयरलैंड, नीदरलैंड और स्कॉटलैंड जैसी यूरोप की संभावनाशील टीमों वाले क्रिकेट बोर्ड इस हालत में नहीं आ पा रहे हैं कि आईसीसी टूर्नामेंट्स में अपने लिए जगह बना लेने के बाद अपने खिलाड़ियों को नियमित काम-धंधे से छुट्टी दिलाकर टूर्नामेंट से पहले उन्हें महीने-दो महीने की न सही, कम से कम पंद्रह दिन की मैच प्रैक्टिस करा सकें। यह सही है कि आईपीएल का कुछ न कुछ फ़ायदा हर क्रिकेट बोर्ड को मिल रहा है- चाहे यह उसके खिलाड़ियों की फीस के हिस्से में मिले या आईसीसी से मिल रही सहायता के रूप में। लेकिन इससे बोर्डों के ख़र्चे चल जा रहे हैं, ढाँचे की मज़बूती के क्रम में सेहत नहीं सुधर रही। खेल का विस्तार करने की जिम्मेदारी आईसीसी की है लेकिन आईपीएल की विशाल पूँजी के सामने जब सौ साल के इतिहास वाले क्रिकेट बोर्ड भी बेचारगी दिखाने को मजबूर हैं, तो फिर दस-बीस साल से क्रिकेट की दुनिया में आने की कोशिश कर रहे इटली या नेपाल की क्या बिसात!</p>
<p><strong>करियर की मृगमरीचिका</strong></p>
<p>साल में दो महीने की इस गहमागहमी के पीछे बहुत धीरे-धीरे ज़मीनी तौर पर एक रासायनिक बदलाव भारतीय समाज में घटित हो रहा है। इसका स्वरूप कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा करोड़ रुपये की एक लॉटरी की जगह पाँच-दस हज़ार की कई हज़ार लॉटरियाँ निकलने से नब्बे के दशक में पैदा हुआ था। जब तक क्रिकेट की रोशनी गिनती के दस-बीस खिलाड़ियों पर सिमटी हुई थी तब तक भारत का मध्यवर्ग उन्हें देवताओं की तरह देखता था और उनकी दुनिया को अपनी दुनिया से अलग मानता था। अभी जब डेढ़ सौ क्रिकेटर एक साथ रोशनी में हैं तो लोग इसे अपने बच्चों के लिए एक करियर ऑप्शन की तरह देखने लगे हैं। धंधे के लोग छोटे स्तरों की प्रीमियर लीग शुरू करके उनकी उत्कंठा का फ़ायदा उठा रहे हैं। लेकिन भारत जैसे देश में बच्चों के करियर के लिए यह बहुत बड़ा जोख़िम है और अभी कहीं-कहीं से निराशा की ख़बरें भी आनी शुरू हो गई हैं।</p>
<p><span style="color: #ba2025;"><strong>– चंद्रभूषण </strong>(कवि-विचारक)</span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>श्रम बेचने का अमानवीय ठौर है नोएडा: नोएडा इंडस्ट्रियल एरिया के मज़दूरों की सर्वे रिपोर्ट</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/noida-mazdoor-survey/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 01 May 2026 01:47:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[यह कारोबारियों के लिए एक आकर्षक धंधे की तरह उभरा है, वहीं मध्यवर्ग इसमें अपने लिए करियर की तलाश करने लगा है। &nbsp;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-weight: 400;">पिछले दिनों जब नोएडा में अपनी माँगों को लेकर बड़ी संख्या में मज़दूर सड़क पर उतरे, तब उनके मुद्दों को मीडिया में जगह मिल पाई। हालाँकि, इस पूरे प्रकरण को एक अस्थाई समस्या के तौर पर पेश किया गया। ग़ौर करने वाली बात यह है कि मीडिया कवरेज सत्ताधारी विचारधारा के समीप रहकर एक बेहद कपटपूर्ण भाषा में मज़दूरों के प्रदर्शन को पेश करता रहा है। मीडिया रिपोर्टिंग में मुख्यत: तीन तरह की भाषाएँ इस्तेमाल की गईं। पहली: हिंसक प्रदर्शन, अशांति, नियम-कानून का उल्लंघन, पुलिस के साथ झड़प तथा हिंसा भड़काना एवं षड्यंत्र रचना। दूसरी: सुनियोजित लामबंदी, भड़कीली सामग्री का उपयोग, बाहरियों/विदेशियों की संलिप्तता, तथा औद्योगिक क्षेत्रों में अशांति फैलाने का प्रयास। तीसरा: मुद्रास्फ़ीति, बढ़ती क़ीमतें, स्थिर मेहनताना तथा पड़ोसी राज्य हरियाणा में मज़दूरी में बढ़ोत्तरी इसके पीछे की वजह बताई गई। इसके इतर, मज़दूरी में इज़ाफ़ा तथा बुनियादी मुद्दों को भी कहीं-कहीं वजह बताया गया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मीडिया की भाषा मज़दूरों के संगठित होने के प्रयास को अपराध बताने तथा मज़दूरों की आवाज़ की वैधता को पंगु करने की रही है। इस तरह का मीडिया कवरेज मज़दूरों द्वारा इकट्ठा होकर अपनी माँगों को रख पाने की काबिलियत को कठघरे में खड़ा करता है, तथा सुनियोजित अशांति, विदेशियों की संलिप्तता से जोड़कर उनको एक बेज़ुबान एवं सामूहिक कदम उठाने के नाकाबिल तबक़े के रूप में पेश करता है, जिसके पास ना तो राजनीतिक समझ है ना ही एक वर्ग के तौर पर कोई अस्मिता। हालाँकि तीसरी तरह की रिपोर्टिंग कुछ हद तक वर्तमान मुद्दों पर आंशिक प्रकाश डालती है, लेकिन मज़दूरों के मुद्दे के मूल तक पहुँचने की कोशिश नहीं करती है। सोशल मीडिया और कॉर्पोरेट स्वामित्व से स्वतंत्र मीडिया ही इसका अपवाद रहा है। उसने ज़मीनी स्तर पर जाकर मज़दूरों के वास्तविक हालात को सामने रखा है। इसके अलावा उसने मज़दूरी में वृद्धि, सामाजिक सुरक्षा एवं काम के बेहतर हालात की माँगों के लिए होने वाले प्रदर्शनों को भी कवर किया है।</span></p>
<div id="attachment_143042" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-143042" class="size-full wp-image-143042 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/dsc-8006-copy-1366x2048.jpg.webp" alt="" width="1366" height="2048" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/dsc-8006-copy-1366x2048.jpg.webp 1366w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/dsc-8006-copy-1366x2048.jpg-200x300.webp 200w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/dsc-8006-copy-1366x2048.jpg-683x1024.webp 683w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/dsc-8006-copy-1366x2048.jpg-768x1151.webp 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/dsc-8006-copy-1366x2048.jpg-1025x1536.webp 1025w" sizes="auto, (max-width: 1366px) 100vw, 1366px"><p id="caption-attachment-143042" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>बीरेंद्र यादव, Re-presented traces (पुनर्निर्मित निशान), 2023</small></p></div>
<p><span style="font-weight: 400;">विडंबना है कि मज़दूरों की विवशता तभी देश के ज़ेहन में जगह बना पाती है जब उनकी लाचारी सड़कों और सार्वजनिक जगहों को प्रभावित करती है। चाहे वो कोरोना महामारी के बाद लगाए गए तुग़लकी लॉकडाउन के बाद भूखे-प्यासे पैदल तथा साइकिल-बाईकों से अपने घरों की ओर बदहवास चलते प्रवासी मज़दूरों का हुज़ूम हो अथवा हाल में गैस सिलेंडर की किल्लत से शहरों को छोड़कर अपने गाँवों की ओर लौटते लोग। इन मौक़ों पर भी बुनियादी सवाल बुर्ज़ुआ विमर्श में जगह नहीं बना पाए। उत्तर भारत के गाँवों और क़स्बों में आख़िर किस तरह की परिस्थितियाँ ऐसी विपन्नता पैदा कर रही हैं जिसकी वजह से लोगों को शहरों में रोज़गार की तलाश में पलायन करना पड़ रहा है? शहरों में मज़दूरी इतनी निम्न कैसे है कि कुछ दिन काम बंद होते ही मज़दूरों को भुखमरी का सामना करना पड़ता है? जिनके ख़ून-पसीने के आधार पर शहरों की नींव रखी गई है, और जो इन्हीं के श्रम से फल-फूल रहे हैं, वो शहर उनके लिए सिर्फ़ एक अस्थाई ठौर बनकर क्यों रह जाते हैं? जिन शहरों को वो बनाते हैं, उन शहरों में नागरिकता के बुनियादी अधिकारों से उनको महरूम कैसे कर दिया जाता है? सवालों की यह फ़ेहरिस्त लंबी है। इन सवालों से टकराए बग़ैर मज़दूरों के प्रदर्शनों को समझा नहीं जा सकता है। इनके जवाबों का दायरा भारत की वर्तमान विकास नीति तथा राजनीतिक परिदृश्य को भी समाहित करता है और भारत के सामने मौजूद आर्थिक-राजनीतिक चुनौतियों को उजागर करता है।</span></p>
<h1><b>सर्वे का संक्षिप्त विवरण</b></h1>
<p><a href="https://dev.thetricontinental.org/hi/"><span style="font-weight: 400;">ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान</span></a><span style="font-weight: 400;"> इन मुद्दों पर शोधकार्य करता रहता है। भारतीय अर्थव्यवस्था की</span><a href="https://dev.thetricontinental.org/hi/bharteey-arthvyavastha-me-uthal-puthal-ka-daur/"> <span style="font-weight: 400;">संरचनात्मक समस्याओं</span></a><span style="font-weight: 400;">, ग्रामीण भारत में</span><a href="https://dev.thetricontinental.org/asia/hi-bulletin-rozagaar-srijan-ke-abhaav-se-joojh-raha-hai-grameen-bhaarat/"> <span style="font-weight: 400;">बेरोज़गारी और बेकारी</span></a><span style="font-weight: 400;"> के कारणों,</span><a href="https://dev.thetricontinental.org/hi/dossier-41-bhartiya-krishi/"> <span style="font-weight: 400;">खेती-किसानी</span></a><span style="font-weight: 400;"> के संकटों, तथा अन्य समसामयिक मुद्दों पर इसके लगातार शोधपरक लेख प्रकाशित होते रहते हैं। इसके साथ-साथ, इन चुनौतियों के ख़िलाफ़</span><a href="https://dev.thetricontinental.org/hi/dossier-55-vishakhapatnam-steel-karkhana/"> <span style="font-weight: 400;">मज़दूरों</span></a><span style="font-weight: 400;"> एवं</span><a href="https://dev.thetricontinental.org/hi/dossier-41-bhartiya-krishi/"> <span style="font-weight: 400;">किसानों</span></a><span style="font-weight: 400;"> के प्रयासों के सूक्ष्म विश्लेषण छपते रहते हैं। इसी सिलसिले में, निर्यातोन्मुखी क्षेत्रों में मज़दूरों के मुद्दों और उनके हालात के विश्लेषण के लिए ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान ने सन् 2018–19 के दौरान, कोरोना महामारी के आने से ठीक पहले, एक वृहत सर्वे किया था। इस सर्वे में नोएडा की गारमेंट इंडस्ट्री को चुना गया था। वर्तमान में यह क्षेत्र मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन का एक प्रमुख केंद्र-बिंदु है। इस क्षेत्र में विविध परिधानों का उत्पादन किया जाता है। यहाँ 500 से ज्यादा मज़दूरों को काम पर रखने वाली बड़ी फ़र्मों से लेकर, उनसे कम मज़दूरों को काम पर रखने वाली मध्यम तथा लघु आकार की फ़र्में चलती हैं।</span></p>
<p><b>सर्वे में शामिल मज़दूरों का मूल निवास</b></p>
<div id="attachment_143058" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-143058" class="size-full wp-image-143058 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2-%E0%A4%AE%E0%A4%9C%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%82%E0%A4%B2-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8.png" alt="" width="622" height="650" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/सर्वे-में-शामिल-मजदूरों-का-मूल-निवास.png 622w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/सर्वे-में-शामिल-मजदूरों-का-मूल-निवास-287x300.png 287w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px"><p id="caption-attachment-143058" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>सर्वे में शामिल मजदूरों का मूल निवास</small></p></div>
<p><span style="font-weight: 400;">इस सर्वे में कुल 226 मज़दूरों को शामिल किया गया था। सिर्फ़ दो महिलाओं के अलावा सर्वे में शामिल सारे लोग पुरुष थे। सिर्फ़ दस मज़दूर स्थानीय इलाकों से थे, शेष प्रवासी मज़दूर थे। गारमेंट निर्यात का यह पूरा औद्योगिक क्षेत्र प्रवासी श्रम पर निर्भर है। सर्वे में शामिल मज़दूरों में 66 प्रतिशत मज़दूर उत्तर प्रदेश के निवासी थे, जबकि 27 प्रतिशत बिहार से थे। बाकी बचे 7 प्रतिशत में उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, झारखंड, तथा मध्य प्रदेश के प्रवासी मज़दूर थे। दिल्ली से पश्चिम के राज्यों, जैसे हरियाणा और पंजाब, के प्रवासी मज़दूरों की संख्या नगण्य थी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ज़्यादातर मज़दूर युवावस्था में थे। करीब 37 प्रतिशत मज़दूर 25 वर्ष या उससे कम उम्र के थे जबकि 41 प्रतिशत मज़दूर 26 से 35 वर्ष के बीच थे। इनमें से 27 प्रतिशत सर्वे के वक्त अविवाहित थे।</span></p>
<h1><b>बुनियादी ज़रूरतों से दूर </b></h1>
<p><span style="font-weight: 400;">सर्वे में शामिल एक औसत मज़दूर पिछले साढ़े नौ सालों से काम कर रहा था। इसके बावजूद, मात्र 4.5 मज़दूरों के पास ही दिल्ली में कहने को अपना घर था। ये घर भी एक मंज़िला थे और बेहद संकुचित जगहों पर बने हुए थे। बाक़ी सारे मज़दूर किराए के कमरों में रह रहे थे। शहरों में केंद्रित औद्योगिक केंद्रों में लंबे समय तक उत्पादन प्रक्रिया में संलग्न होने के बावजूद मज़दूर न तो बचत कर पा रहे हैं और न ही आवास जैसी मूलभूत ज़रूरत को पूरा कर पा रहे हैं। शहरी भूमि और आवास बाज़ार पर पूंजी का नियंत्रण अत्यधिक केंद्रीकृत है। भूमि की ऊँची कीमतें, रियल एस्टेट का वित्तीयकरण, और सस्ती आवासीय योजनाओं का अभाव, ये सभी मिलकर मज़दूरों को किराए के दड़बेनुमा आवास में रहने के लिए मजबूर करते हैं। यहाँ आवास एक सामाजिक अधिकार न होकर एक ऐसी बाज़ारू वस्तु (commodity) बन चुका है जो ये मज़दूर सालों की कमाई के बाद भी हासिल नहीं कर सकते।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दो तिहाई मज़दूरों के पास रहने के लिए एक कमरा भी मयस्सर नहीं था। उन्हें अन्य मज़दूरों के साथ एक ही कमरे में रहना पड़ता था। साझा कमरों में रहने वाले मज़दूरों में क़रीब 30 प्रतिशत 4 या उससे अधिक लोगों के साथ एक ही कमरे में रह रहे थे। एक मामला तो ऐसा भी देखने को मिला जिसमें एक ही कमरे में 15 लोग रहने को मज़बूर थे। कई कमरे ऐसे थे जिनमें एक साथ सारे किराएदार सो नहीं सकते थे। ऐसे में अपने काम के शिफ़्ट के अनुसार लोग कमरों में बारी-बारी सोते थे। रहने के लिए एक निजी कमरा तक न होना श्रम के सस्तीकरण की पराकाष्ठा को दर्शाता है। मुनाफ़े को अधिकतम रखने के लिए पगार इतनी कम दी जाती है कि वो श्रमिकों के पुनरुत्पादन की लागत के लिए भी पर्याप्त नहीं है। भीड़भाड़, साझा आवास, और शिफ्ट के अनुसार सोने की व्यवस्था पूँजीवादी उत्पादन प्रक्रिया में श्रम के शोषण के अमानवीय स्तर को दर्शाता है।</span></p>
<div id="attachment_143050" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-143050" class="size-full wp-image-143050 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/28x-39.5-inches-5-1.jpg.webp" alt="" width="1000" height="707" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/28x-39.5-inches-5-1.jpg.webp 1000w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/28x-39.5-inches-5-1.jpg-300x212.webp 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/28x-39.5-inches-5-1.jpg-768x543.webp 768w" sizes="auto, (max-width: 1000px) 100vw, 1000px"><p id="caption-attachment-143050" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>बीरेंद्र यादव, Life Tools (जीवन के औज़ार) सिरीज़ से, 2021</small></p></div>
<p><span style="font-weight: 400;">सिर्फ़ 8.4 प्रतिशत मज़दूरों के मकान में सार्वजनिक जल आपूर्ति उपलब्ध थी। 11 प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं था, तथा 10 प्रतिशत घरों में पानी की व्यवस्था नहीं थी। जबकि 9 प्रतिशत घरों में बिजली की आपूर्ति नहीं थी। मज़दूरों के रहने के अमानवीय स्तर को बदतर करने में सरकार भी कम ज़िम्मेदार नहीं है। जहाँ एक ओर उच्च-वर्गीय इलाक़ों में अत्याधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं, वहीं श्रमिक वर्ग के लिए न्यूनतम जीवन-स्तर भी सुनिश्चित नहीं किया गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रहने के हालात इतने अमानवीय तब थे, जब एक औसत किराएदार मज़दूर अपने मासिक वेतन का एक-चौथाई हिस्सा कमरे के किराए पर ख़र्च कर रहा था। मज़दूरों का अस्तित्त्व पूँजी के लिए तभी तक मायने रखता है, जब वह उत्पादन प्रक्रिया में उनके श्रम-काल का इस्तेमाल कर पाए। उत्पादन प्रक्रिया में प्रयुक्त होने के बाद ये एक त्याज्य वस्तु बन जाते हैं। त्याज्य वस्तु ये सिर्फ़ पूंजीवादी उत्पादन प्रक्रिया के लिए ही नहीं हैं, अपितु शहरी बुर्ज़ुआ वर्ग तथा बुर्ज़ुआ सरकारों के लिए भी हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">त्याज्य वस्तु बन चुके इन प्रवासी मज़दूरों के लिए नोएडा जैसे औद्योगिक शहर मात्र अपना सस्ता श्रम बेचने की जगहें हैं। अमानवीय परिस्थितियों में रहने वाले इन मज़दूरों के श्रम से इन शहरों की आर्थिक गतिविधियों का संचालन होता है। त्याज्य वस्तु बनने की परिस्थिति सीधे तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त कृषि संकट एवं बेतहाशा बेरोज़गारी से जुड़ी हुई है। इस सर्वे रिपोर्ट के अगले भाग में हम मज़दूरों के त्याज्य वस्तु बनाने वाले कारकों पर इस सर्वे के नतीजों के आलोक में चर्चा करेंगे।</span></p>
<p><strong><span style="color: #ba2025;">-उमेश यादव </span></strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आख़िर किसका प्रचार करती हैं प्रोपेगेंडा फ़िल्में</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/propaganda-films-hindi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Apr 2026 14:00:11 +0000</pubDate>
				<guid isPermaLink="false">https://thetricontinental.org/?post_type=india&#038;p=142981</guid>

					<description><![CDATA[उत्पादन प्रक्रिया का ज़रूरी हिस्सा होने के बावजूद मज़दूर न बचत कर पा रहे हैं, न ही आवास जैसी मूलभूत ज़रूरत पूरी कर पा रहे हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>फ़िल्म ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर [2] द रेवेंज’ की कामयाबी से पहले कहा जाता था कि प्रोपेगेंडा फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाब नहीं होतीं। ‘कश्मीर फ़ाइल्स’ की कामयाबी का ज़िक्र अपवाद स्वरूप हुआ करता था। लेकिन धुरंधर ने इस तथ्य को ग़लत साबित किया है।यह फ़िल्म अगर सिर्फ़ भाजपा या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रचार कर रही होती [ऊपरी तौर पर करती भी है] तो हम कह सकते थे कि हर किसी को अपने प्रचार का हक़ है। लेकिन यह राजनीतिक पार्टी और व्यक्ति से कहीं आगे जाकर फ़ासीवाद-नाज़ीवाद का प्रचार करती है।</p>
<p>‘धुरंधर’ में भारत के इंटेलिजेंस एजेंसी का चीफ़ ‘अजय सान्याल’ यही कहते देखा गया है कि जब कोई ऐसा आदमी आएगा जिसको देश से प्यार होगा तभी वह कुछ अच्छा काम कर पाएगा [संवाद में जो कहा गया उसके शब्द और उसका ढांचा भिन्न हो सकता है पर उसका अर्थ यही था]। इस फ़िल्म में तीन आतंकवादी घटनाओं का चित्रण हैं। पहली घटना – कंधार हवाई जहाज़ अपहरण, जो भाजपा के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय घटित हुई, दूसरी घटना – संसद पर हमला, उस समय भी भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और तीसरी घटना – मुम्बई पर हमला, उस समय कांग्रेस पार्टी के मनमोहन सिंह की सरकार थी। ऊपरी तौर पर आपको यह लग सकता है कि फ़िल्म बनाने वाले ने कितनी निष्पक्षता दिखाई है कि कांग्रेस हो या भाजपा सब की नाकामी बेझिझक और बेहिचक उधेड़ कर रख दी है। पर उन दो सरकारों की नाकामी की आड़ में इंटेलिजेंस एजेंसी के सान्याल साहब की नाकामी को फ़िल्म में छिपा लिया जाता है। फ़िल्म बनाने वाले यह भी संकेत देते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी [भाजपा] और मनमोहन सिंह [कांग्रेस] को देश से प्यार नहीं था और अप्रत्यक्ष रूप से वे पाकिस्तानियों या आतंकवादियों की मदद कर रहे थे, ज़ाहिर है कि जिसे शब्दों में नहीं कहा गया है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-142715 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/Dhurandhar.jpg" alt="" width="1672" height="941" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/Dhurandhar.jpg 1672w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/Dhurandhar-300x169.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/Dhurandhar-1024x576.jpg 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/Dhurandhar-768x432.jpg 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/Dhurandhar-1536x864.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1672px) 100vw, 1672px"></p>
<p>अगर हम यह मान भी लें [जबकि सिनेमा बनाने वाले बड़े सुविधाजनक तरीके से फ़िल्म की कहानी को काल्पनिक बताते हैं और सच्ची घटना होने का भ्रम भी रचते हैं] कि अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकार ने देश के इंटेलिजेंस एजेंसी को आतंकवादी घटनाओं के बाद कुछ करने नहीं दिया तो भी यह सवाल तो बनता ही है कि उन घटनाओं के होने के पहले हमारे देश की इंटेलिजेंस एजेंसी [सिनेमा वाली काल्पनिक एजेंसी] क्या कर रही थी ? अगर उनके पास उन घटनाओं की जानकारी होती तो उन्हें घटित होने के पहले ही नाकाम किया जा सकता था। क्या उस समय की ‘काल्पनिक’ सरकारों ने सूचना नेटवर्क को ख़त्म कर दिया था ? अगर हाँ। तो ‘काल्पनिक इंटेलिजेंस एजेंसी के काल्पनिक सान्याल साहब’ और उनकी एजेंसी किस ‘काल्पनिक’ बात की तनख्वाह ले रही थी? ‘काल्पनिक’ हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने की और यह कहते रहने की कि उन्हें एक ‘काल्पनिक’ देश भक्त का इंतज़ार है?</p>
<p>ऊपर तौर निष्पक्ष दिखने वाली फ़िल्म असल में लोकतंत्र विरोधी है। उसे, भाजपा हो या कांग्रेस, जनता द्वारा निर्वाचित सरकार नहीं चाहिए और संविधान द्वारा बनाई गई प्रशासन व्यवस्था भी नहीं चाहिए। इसलिए ‘एक व्यक्ति’ का इंतज़ार जो सान्याल साहब की मर्ज़ी के अनुरूप [व्यवस्था से परे] कुछ भी कर सकने की हिम्मत रखता हो, फ़िल्म की मुख्य ‘काल्पनिक’ चिंता बन जाती है।</p>
<p>फ़िल्म के ‘काल्पनिक’ पात्र सान्याल साहब यह नहीं समझते कि जब एक व्यक्ति के आने से ही अच्छे दिन आ जाएँगे तो उस समय उनकी क्या ज़रूरत रह जाएगी ? उनका काम भी वही व्यक्ति, जिसका उन्हें है इंतज़ार, कर सकता है क्योंकि वह तो ‘काल्पनिक’ रूप से सर्वगुण संपन्न होगा।</p>
<p>लोकतंत्र में तंत्र को दरकिनार करके एक निर्वाचित नेता का सत्ता के तमाम सूत्रों को अपने हाथ में ले लेना ही तो फ़ासीवाद-नाज़ीवाद है। इस अर्थ में यह फ़िल्म स्पष्ट रूप से फ़ासीवाद-नाज़ीवाद की समर्थक दिखाई देती है। लेकिन यह दूसरी प्रोपेगेंडा फ़िल्मों से इसलिए भी अलग है कि इसे मसाले और फ़ार्मूले के साथ पेश किया गया है जिससे भरपूर मनोरंजन होता है – इमोशन की आंधी – एक्शन का तूफ़ान। नाच गाने से भरपूर राष्ट्रवादी ड्रामा।</p>
<p>आदित्य धर एक कुशल निर्देशक हैं जिन्हें अपनी फ़िल्मों में तथ्यों को रचनात्मक तरीके से मरोड़ने की कला आती है। उनकी कुशलता देख कर अनायास ही अमेरिका के फ़िल्म निर्देशक जी. डब्ल्यू. ग्रिफ़िथ की याद आ जाती है। ग्रिफ़िथ की कुशलता का यह आलम था कि आज उन्हें हम अश्वेत विरोधी या नस्लवादी भी कहते हैं और दूसरी तरफ़ उसकी फ़िल्म निर्माण तकनीक के कायल भी रहते हैं। आज फ़िल्म निर्माण जिस मुकाम पर है उसकी बुनियाद में ग्रिफ़िथ की ईजाद की गई अनेक तकनीक और विचार हैं। ग्रिफ़िथ ने ही फ़िल्म को सबसे पहले फ़िक्शन बनाया था।</p>
<p>ग्रिफ़िथ के पहले जो मूक फ़िल्में बनती थीं उनमें सिर्फ़ वास्तविक दृश्यों का चलता हुआ चित्र होता था और बाद में वैसे ही दृश्यों की रचना करके किसी स्टूडियो में उनकी चलती हुई तस्वीर खींची जाती थी। उनका महत्व केवल एक जादुई अनुभव तक ही सीमित था। उन फ़िल्मों में कोई कथानक और आख्यान [नरैटिव] नहीं हुआ करता था। वे सब एक रील की फ़िल्म होती थीं और कभी–कभी दो रील जोड़ कर भी कोई फ़िल्म बनती थी। सब कुछ ‘सिंगल शॉट’ में ही हुआ करता था लेकिन पहली बार ग्रिफ़िथ ने अलग–अलग शॉट को जोड़ कर एक दृश्य बनाया और इस तरह एडिटिंग की शुरुआत हुई। जैसे मास्टर शॉट और क्लोज़ अप शॉट, वन शॉट और टू शॉट आदि ग्रिफ़िथ की ही देन हैं। इन्हें ही एक दृश्य के लिए आपस में जोड़ा जाता था। ज़ाहिर है कि इसके लिए वास्तविक दृश्यों की तस्वीर असंभव थी, उनकी रचना ही की जा सकती थी, तो इनके लिए स्टूडियो बनाए गए। इस प्रयोग के बाद दर्शक केवल सिनेमा तकनीक के जादुई अनुभव से ही नहीं बल्कि कथा और विचार के अनुभव से भी गुज़रने लगे। अब सिनेमा में ऐसी कहानी की रचना भी संभव हो गई जो वास्तविक रूप से अस्तित्व में ही नहीं थी।</p>
<p>ग्रिफ़िथ ने 1915 में एक ऐसी कहानी की ‘रचना’ की जिसमें नस्लीय श्रेष्ठता और अश्वेत विरोधी विचारधारा वाले ‘कू क्लक्स कलान’ [एक संगठन और अभियान] का महिमामंडन किया गया। फ़िल्म का नायक ‘कू क्लक्स क्लान’ का सेनानी है और उन जैसों द्वारा स्थापित राष्ट्र को ही अमेरिका माना गया है [फ़िल्म में] इसलिए फ़िल्म का नाम ‘द बर्थ ऑफ़ ए नेशन’ रखा गया। यह फ़िल्म इसलिए भी प्रतिक्रियावादी फ़िल्म थी कि इसमें ग़ुलामी प्रथा के ख़त्म होने का भी अप्रत्यक्ष विरोध दिखाई देता है। इसमें काले रंग वाले पात्रों को लालची और बलात्कारी तक बताया गया है। दिलचस्प यह है कि उन काले पात्रों की भूमिका गोरे अभिनेताओं ने निभाई थी, अपने शरीर पर काला रंग पोत कर।</p>
<p>जैसे ही सिनेमा में ‘आख्यान रचना’ करने की क्षमता विकसित हुई वैसे ही प्रोपेगेंडा फ़िल्मों की शुरुआत हो गई। इस अर्थ में ‘धुरंधर’ ग्रिफ़िथ की परंपरा की फ़िल्म साबित होती है। ग्रिफ़िथ की ‘द बर्थ ऑफ़ ए नेशन’ ने ‘धुरंधर’ की तरह 1915 में बॉक्स ऑफ़िस पर धमाल मचा दिया था। वैसी कामयाबी ग्रिफ़िथ को फिर कभी नहीं मिली। फिर आदित्य धर जैसे ग्रिफ़िथ के अनेक अनुयायी पूरी दुनिया में पैदा हो गए जो सत्य की आड़ में अर्ध-सत्य और पूर्णतः झूठ पेश करने लगे।</p>
<p>जब अमेरिका के बौद्धिक वर्ग ने ग्रिफ़िथ की उस फ़िल्म का विरोध किया था तो ग्रिफ़िथ ने उसे असहिष्णुता की संज्ञा दी और ‘द इंटोलेरेंस’ नाम की फ़िल्म भी बना दी जिसे उन गोरे दर्शकों ने देखा जिनकी बग़ल में कोई काला दर्शक नहीं बैठ सकता था [यह उस समय के अमेरिका में सामाजिक व्यवहार था]। ठीक उसी तरह जब भारत में फ़िल्म समीक्षकों ने ‘धुरंधर’ को प्रोपेगेंडा फ़िल्म कहा तो फ़िल्म बनाने वाली टीम की तरफ़ से प्रतिक्रिया आई कि उन्होंने सच्चाई दिखाई है पर यह भी सच है कि उन्होंने फ़िल्म की शुरुआत में बहुत बड़ा सा डिस्क्लेमर भी दिया है कि यह एक काल्पनिक फ़िल्म है। तो प्रोपेगेंडा फ़िल्म बनाने वालों में इतना आत्म बल नहीं होता कि वे यह कह सकें कि उन्होंने सच्चाई दिखाई है। उन्हें दक्षिणपंथियों की तरह शब्दों से खेलना आता है।</p>
<p>दक्षिणपंथी प्रोपेगेंडा फ़िल्मों का जब विश्लेषण किया जाता है तो उधर से आक्रमण की तरह यह बात कही जाती है कि वामपंथी भी तो अपनी प्रोपेगेंडा फ़िल्में बनाते हैं। हाँ, ज़रूर बनाते हैं।</p>
<p>सोवियत रूस में लेनिन ने सिनेमा की संप्रेषण क्षमता को शुरुआती दौर में ही पहचान लिया था। इसलिए 1917 की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद रूस की कम्युनिस्ट सरकार के वित्तीय सहयोग से 1925 में एक फ़िल्म बनी जिसका नाम था – ‘बैटलशिप ऑफ़ पोटेमकिन’। इसके निर्देशक थे – सेर्गेई आईज़ेन्स्तीन। यह फ़िल्म 1905 की ज़ारशाही रूस में नाविकों के विद्रोह पर आधारित थी।</p>
<p>कम्युनिस्ट प्रोपेगेंडा फ़िल्में जनता के विद्रोह की स्मृति को बचाए रखने के लिए, दर्शकों को अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध प्रेरित करने के लिए और समतावादी-जनवादी विचार के प्रचार के लिए बनाई जाती हैं। क्या ‘बैटलशिप ऑफ़ पोटेमकिन’ में यह दिखाया जाना उचित होता कि नाविकों को सड़ा हुआ खाना खा लेना चाहिए था, उनके ऊपर हो रहे अत्याचार को सहते जाना चाहिए था और ज़ार [रूसी राजा] के क़सीदे पढ़ते रहना चाहिए था ? नहीं, फ़िल्म ऐसी अत्याचारी व्यवस्था के ख़िलाफ़ दर्शकों को विद्रोह के लिए प्रेरित करती है।</p>
<div id="attachment_142707" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-142707" class="size-full wp-image-142707 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/Battleship-Potemkin_PHOTOFEST.jpg" alt="" width="1500" height="1000" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/Battleship-Potemkin_PHOTOFEST.jpg 1500w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/Battleship-Potemkin_PHOTOFEST-300x200.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/Battleship-Potemkin_PHOTOFEST-1024x683.jpg 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/04/Battleship-Potemkin_PHOTOFEST-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1500px) 100vw, 1500px"><p id="caption-attachment-142707" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>फ़िल्म ‘बैटलशिप ऑफ़ पोटेमकिन’ से एक दृश्य</small></p></div>
<p>जब भी कम्युनिस्ट प्रोपेगेंडा फ़िल्मों पर हमले किए जाते हैं तो उनका विश्लेषण इस तरह से करना चाहिए कि क्या ‘द बर्थ ऑफ़ अ नेशन’ की तरह दर्शकों को काले रंग वाले अपने ही साथी नागरिकों के प्रति घृणा के लिए प्रेरित किया जाए ? क्या ‘द कश्मीर फ़ाइल’ और ‘केरला स्टोरी’ की तरह दर्शकों के मन में अपने ही मुसलमान साथी नागरिकों के प्रति घृणा पैदा की जाए? क्या भारत में मुसलमानों की बढ़ती मॉब लिंचिंग में इन फ़िल्मों द्वारा फैलाई गई नफ़रत नहीं है? वामपंथी प्रोपेगेंडा फ़िल्में और दक्षिणपंथी प्रोपेगेंडा फ़िल्मों के बीच एक मौलिक अंतर है कि वामपंथी प्रोपेगेंडा फ़िल्में पूंजीवादी व्यवस्था की अन्यायपूर्ण चरित्र की कलई खोल कर रख देती हैं लेकिन दक्षिणपंथी प्रोपेगेंडा फ़िल्में एक नागरिक के मन में दूसरे नागरिक के ख़िलाफ़ नफ़रत भरने और हिंसा के लिए उकसाने की भूमिका का निर्वाह करके आख़िकार पूंजीवादी व्यवस्था या यथास्थितिवाद को मज़बूती प्रदान करती हैं। वे इस बात को बताने की कोशिश करती हैं कि आपके जीवन की विसंगतियों के लिए आप स्वयं ज़िम्मेदार हैं जबकि वामपंथी प्रोपेगेंडा फ़िल्में जीवन की विसंगतियों के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को ज़िम्मेदार मानती हैं और यह भी मानती हैं इस व्यवस्था को जनता की क्रांति द्वारा बदला जा सकता है।</p>
<p>व्यवस्था बदलने वाली फ़िल्मों के निर्माण की वामपंथी धारा को प्रगतिशील धारा कहना उचित होगा। इस धारा में आज़ादी और स्वाधीनता का जज़्बा होता है। 1942 में जब गांधी जी के नेतृत्व में ‘भारत छोड़ो’ जैसा आंदोलन चरम पर था, तब उस समय बनने वाली फ़िल्मों ने भी उसमें अपने तरीक़े से योगदान दिया था। 1943 में एक फ़िल्म आई थी ‘किस्मत’। ज्ञान मुखर्जी उसके निर्देशक थे और लेखक थे आग़ा जानी कश्मीरी। अशोक कुमार उसके नायक थे। उस फ़िल्म की कहानी का संबंध स्वाधीनता आंदोलन से नहीं था फिर भी उसकी आड़ में कवि प्रदीप से एक गीत लिखवाया गया – ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है’। इसका संगीत अनिल बिस्वास ने दिया था। कवि प्रदीप अपने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि चूंकि सेंसर बोर्ड अंग्रेज़ों का था इसलिए यह आशंका थी कि इसे प्रतिबंधित किया जा सकता है। तो उन्होंने उस गीत में एक पंक्ति जोड़ी – ‘तुम न किसी के आगे झुकना जर्मन हो या जापानी/ आज सभी के लिए हमारा यही कौमी नारा है/ दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है।’ इस पंक्ति के आधार पर उस समय के सेंसर बोर्ड को समझाया गया कि चूंकि जर्मन और जापानी अंग्रेज़ों के शत्रु हैं, इसलिए हिंदुस्तानियों को उनके आगे झुकने से मना किया जा रहा है। ‘किस्मत’ रिलीज़ हुई और कलकत्ता में साढ़े तीन साल तक चलती रही। दर्शक पूरी फ़िल्म देख लेने के बावजूद बार–बार ‘दूर हटो ……..’ सुनाने की मांग किया करते थे। यह गीत स्वाधीनता आंदोलन का गीत बन गया। पूरे देश में जिसका व्यापक असर देखा गया। यह भी तो प्रोपेगेंडा है। स्वाधीनता आंदोलन का प्रोपेगेंडा।</p>
<p>तो सवाल यह उठता है, [भले ही प्रोपेगेंडा हर विचारधारा के लोग करते हैं], कि हम किस प्रोपेगेंडा के पक्ष में खड़े हैं। प्रगतिशील और स्वतंत्रता की चेतना का विकास करने वाले प्रोपेगेंडा के पक्ष में या नफ़रत, लोकतंत्र विरोधी और प्रतिक्रियावादी भड़काऊ प्रोपेगेंडा के पक्ष में ? यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका का जो ‘कू क्लक्स क्लान’ उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में पूरी तरह ख़त्म हो चुका था, ग्रिफ़िथ की ‘द बर्थ ऑफ़ ए नेशन’ से बीसवीं सदी में फिर से जाग्रत हो गया और उस समय काले लोगों की मॉब लिंचिंग की अनेक घटनाएं सामने आईं। क्या हम ऐसे प्रोपेगेंडा के पक्ष में हैं जो अपने साथी नागरिकों के विरुद्ध हमें भड़काता है?</p>
<p>सहज ही यह सवाल पूछा जा सकता है कि ‘धुरंधर’ में किसके ख़िलाफ़ भड़काने की कोशिश दिखाई देती है? पाकिस्तान तो हमेशा हमारे साथ बुरा करता है, उसके ख़िलाफ़ फ़िल्म बनाने में क्यों आपत्ति है? कहीं आप इस फ़िल्म को मुस्लिम विरोधी तो नहीं मान रहे हैं? तो इसका पहला जवाब तो यह है कि मुस्लिम विरोध होगा तभी उसे नफ़रती प्रोपेगेंडा कहा जाएगा, ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह अलग बात है कि ‘कश्मीर फ़ाइल्स’ और ‘केरला स्टोरी’ और उनके जैसी ढेरों फ़िल्में पिछले दस बारह सालों में बनीं जो सीधे–सीधे मुस्लिम विरोधी थीं इसलिए भारत में प्रोपेगेंडा फ़िल्मों की छवि मुस्लिम विरोधी फ़िल्म की बन गई है। पर अगर प्रोपेगेंडा फ़िल्मों के सन्दर्भ में यही अंतिम सच होता तो बार – बार यहाँ ग्रिफ़िथ की ‘द बर्थ ऑफ़ ए नेशन’ का ज़िक्र नहीं किया जाता। ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर [2] द रेवेंज’ पाकिस्तान की आड़ में अपने देश के लोकतंत्र की विरोधी फ़िल्में हैं। ये दोनों फ़िल्में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के अलावा हर सरकार को देश विरोधी बताती हुई दिखाई देती हैं जिन्हें जनता ने चुना है। अप्रत्यक्ष रूप से उन तमाम सरकारों के पाकिस्तान परस्त होने का संकेत भी दिया गया है। यह भी बताया-दिखाया गया है कि पाकिस्तान से आने वाले नकली नोट में उत्तर प्रदेश का एक मुस्लिम व्यक्ति शामिल हैं। उस ‘काल्पनिक’ पात्र का नाम आतिफ़ अंसारी रखा गया है जिसकी छवि दिवंगत अतीक अंसारी से मिलती-जुलती है। ऐसा करके फ़िल्म बनाने वाले अतीक अंसारी की पुलिस सुरक्षा में की गई हत्या को वैधता प्रदान करते हैं और साथ ही अदालत के बाहर बदला लेने को इंसाफ़ की तरह परिभाषित करते हैं। इसमें नोटबंदी पर अनेक अर्थशास्त्रियों द्वारा उठाई गई आपत्तियों और उससे जुड़ी जनता की तकलीफ़ों के तथ्यों को साफ़ दरकिनार करते हुए उसे एक सफल प्रोजेक्ट बता दिया गया है।</p>
<p>‘धुरंधर [2] द रेवेंज’ में अजय सान्याल कांधार हाईजैक के एक ‘काल्पनिक’ आंतकवादी को याद दिलाते हैं – क्या कहा था तुमने, हिन्दू बड़ी डरपोक कौम होती है ? उस ‘काल्पनिक’ आतंकवादी ने पहले ‘धुरंधर’ में सचमुच यह संवाद बोले थे लेकिन यह संवाद फ़िल्म के लेखक निर्देशक की रचना है यह फ़िल्म देखते समय दर्शक भूल जाता है और उसका ख़ून खौल उठता है। किसके ख़िलाफ़ ख़ून खौलता है ? भारत में रह रहे ग़रीब पड़ोसी मुसलमान के ख़िलाफ़। क्योंकि बदला लेने के लिए उनके पास भारत के मुसलमान ही सहज रूप से उपलब्ध हैं। इसी के साथ यह फ़िल्म हिन्दू ध्रुवीकरण में भी कामयाब हो जाती है जिसका चुनाव में लाभ मिलता है।</p>
<p>अब दोनों ‘धुरंधर’ के डिस्क्लेमर की शुरुआती पंक्तियों पर ध्यान दीजिये – ‘यह फ़िल्म वास्तविक जीवन की घटनाओं से प्रेरित एक काल्पनिक कृति है। यह फ़िल्म एक वृत्तचित्र यानी डाक्यूमेंट्री नहीं है और इसे ऐतिहासिक तथ्यों अथवा घटनाओं का सटीक चित्रण नहीं माना जाना चाहिए’। जबकि इस फ़िल्म को सच्चाई बता कर प्रचारित किया जा रहा है। दूसरे ‘धुरंधर’ में एक दिलचस्प और हास्यास्पद प्रसंग दिखाया गया है कि भारत से भागा हुआ अंडर वर्ल्ड डॉन और आतंकवादी दाऊद इब्राहिम ही दरअसल पाकिस्तान को चला रहा है। नेता और आईएसआई के लोग उसके कदमों में बैठते हैं और वह सब को दिशा निर्देश दे रहा है। अगर यह सच है तो ‘धुरंधर’ के ‘काल्पनिक’ नायक हमज़ा को पाकिस्तान भेजना ही नहीं चाहिए था क्योंकि जिस देश को दाऊद इब्राहिम चलाएगा उस देश को बर्बाद होने से कौन रोक सकता है ? यहाँ आकर फ़िल्म बनाने वालों की कल्पना भी खोखली पड़ जाती है।</p>
<p>प्रोपेगेंडा फ़िल्मों में ऐतिहासिक तथ्य दो तरह से इस्तेमाल किए जाते हैं। पहला, अगर फ़िल्म निर्देशक चाहता है कि दर्शक तथ्यों को जान कर मानवीय विकास के रास्ते पर चलने को प्रेरित हों और उनके भीतर दूसरों के लिए ‘एम्पैथी’ पैदा हो तो वह वामपंथी – लोकतांत्रिक दृष्टि से तथ्यों का इस्तेमाल करेगा। दूसरे, अगर फ़िल्म निर्देशक चाहता है कि अन्याय करने वाली सत्ता बची रहे तो वह ऐतिहासिक तथ्यों का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करेगा जिनसे साधारण कमज़ोर लोगों का शिकार किया जाएगा। इसे तथ्यों का सशस्त्रीकरण कह सकते हैं।</p>
<p>पूरी दुनिया में कला-साहित्य की यह नैतिकता रही है कि वह कमज़ोर और पीड़ित व्यक्ति के पक्ष में होता है। जबकि नफ़रती प्रोपेगेंडा फ़िल्में वास्तविक जीवन में जो ताक़तवर हैं, जो सत्ता में हैं, उनके पक्ष में होती हैं और पीड़ित–कमज़ोर वर्ग के विरोध में। इसीलिए ऐसी प्रोपेगेंडा फ़िल्मों को लेकर न सिर्फ़ चिंता होनी चाहिए बल्कि इनका विरोध भी होना चाहिए, अहिंसक तरीक़े से।</p>
<p> </p>
<p><strong><span style="color: #ba2025;">-फ़रीद ख़ाँ (कवि और पटकथा लेखक)</span></strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>ईरान पर हमलाः साम्राज्यवाद का घिनौना चेहरा</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/iran-par-hamla-samrajyavad-ka-ghinauna-chehra/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Mar 2026 10:49:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ऐसी फ़िल्में प्रायः समाज के ताक़तवर लोगों और सत्ता के पक्ष में तथा कमज़ोर-पीड़ित वर्ग के विरोध में होती हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p dir="ltr">ईरान पर संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) और इज़राइल के साम्राज्यवादी हमले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यूएस अपने वर्चस्व को बचाए रखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों और मानवता के सभी सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाने में ज़रा भी नहीं हिचकता। अभी कुछ ही समय पहले तक यूएस और ईरान के बीच आपसी तनाव दूर करने को लेकर बातचीत चल रही थी। लेकिन वार्ता को एकतरफ़ा और मनमाने तरीक़े से ध्वस्त करते हुए यूएस-इज़राइल ने ईरान पर हमला कर दिया। लगातार जारी हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता (सुप्रीम लीडर) अयातुल्ला अली खामेनेई सहित सरकारी मीडिया और सेना के कई बड़े अधिकारी मारे गए हैं। ईरान जवाब में इज़राइल सहित पश्चिम एशिया में कई यूएस के सैन्य ठिकानों पर बमबारी कर रहा है।</p>
<p dir="ltr">इज़राइली हमले में दक्षिणी ईरान के मिनाब शहर में लड़कियों का एक <a href="https://news.un.org/hi/story/2026/03/1087752" target="_blank" rel="noopener" data-saferedirecturl="https://www.google.com/url?q=https://news.un.org/hi/story/2026/03/1087752&amp;source=gmail&amp;ust=1773397880276000&amp;usg=AOvVaw2Ksv1eZf3Dvj1imDqgeosD">प्राइमरी स्कूल</a> तबाह कर दिया गया जिसमें 165 मौतें हुईं; इनमें ज़्यादातर स्कूल की छात्राएँ थीं। ईरान ने बहरीन, क़तर, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत आदि में यूएस के सैन्य ठिकानों पर बमबारी की है, साथ ही इज़राइल में भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है। इस लड़ाई ने न सिर्फ़ पश्चिम एशिया बल्कि पूरी दुनिया को बेहद ख़तरनाक अस्थिरता की स्थिति में धकेल दिया है। और इसकी पूरी ज़िम्मेदारी यूएस और इज़राइल पर है। वे ऐसा कोई भी बहाना नहीं दे सकते जिससे उनका यह दुस्साहस सही ठहराया जा सके।</p>
<div id="attachment_137582" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-137582" class="size-full wp-image-137582 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Funeral-Hearts.original-1.jpg" alt="" width="950" height="702" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Funeral-Hearts.original-1.jpg 950w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Funeral-Hearts.original-1-300x222.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Funeral-Hearts.original-1-768x568.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 950px) 100vw, 950px"><p id="caption-attachment-137582" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>हबीब सदीक़ी (ईरान), दिलों का जनाज़ा, 1980</small></p></div>
<p dir="ltr">इस हमले के पीछे यूएस और इज़राइल यह दलील दे रहे हैं कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के बेहद क़रीब था, जबकि ईरान सालों से दोहराता आ रहा है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम के तहत हथियार नहीं बना रहा है बल्कि इसका इस्तेमाल ग़ैर-सामरिक कार्यों यानी ऊर्जा आदि के लिए कर रहा है। हमले के चंद घंटे पहले ही, यूएस और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता में मध्यस्थता कर रहे ओमान के विदेश मंत्री बदर अल बुसैदी ने <a href="https://www.aljazeera.com/news/2026/2/28/peace-within-reach-as-iran-agrees-no-nuclear-material-stockpile-oman-fm" target="_blank" rel="noopener" data-saferedirecturl="https://www.google.com/url?q=https://www.aljazeera.com/news/2026/2/28/peace-within-reach-as-iran-agrees-no-nuclear-material-stockpile-oman-fm&amp;source=gmail&amp;ust=1773397880276000&amp;usg=AOvVaw2RgC9-mJVHP48p0MHTGmVU">कहा</a> था कि ‘जल्दी ही शांति समझौता हो सकता है’ और ईरान ने यह भी मान लिया है कि वह कभी भी ‘परमाणु सामग्री जमा नहीं करेगा’। अगले दौर की वार्ता अप्रैल में होने वाली थी और दुनिया की अमनपसंद आबादी इसी उम्मीद में थी कि उन्हें एक और युद्ध नहीं झेलना पड़ेगा। लेकिन यूएस और इजराइल की सम्राज्यवादी लिप्सा हाल के दिनों में तेज़ी से बढ़ी है। इसलिए यूएस और इज़राइल, का यह हमला दुखद होने के बावजूद चौंकाने वाला नहीं कहा जा सकता।</p>
<p dir="ltr">यूएस पिछले कुछ वर्षों से दुनिया के संप्रभु राष्ट्रों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने और सरकारों को उखाड़ फेंकने का कोई मौका नहीं चूक रहा। इससे पहले, 3 जनवरी 2026 को उसने  वेनेजुएला की संप्रभुता को रौंदते हुए वहां के चुने हुए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण करने का षडयंत्र रचा, जो अंतर्राष्ट्रीय कानून का सीधी-सीधा उल्लंघन था। इसी तरह, क्यूबा पर यूएस ने दशकों से ऐसे कठोर और अमानवीय प्रतिबंध लगा रखे हैं कि पूरी आबादी की मूलभूत ज़रूरतें खतरे में पड़ गई हैं। 29 जनवरी 2026 को डॉनल्ड ट्रम्प ने आदेश जारी कर किसी भी देश को क्यूबा को तेल बेचने से मना कर दिया है। ऐसा कर यूएस सरकार इस छोटे से द्वीप का आर्थिक रूप से गला घोंटने की हर संभव कोशिश कर रही है। वेनेजुएला, क्यूबा या ईरान जैसे किसी भी संप्रभु राष्ट्र की सरकार को बदलने का अमेरिका को कोई अधिकार नहीं है। यह उसकी मनमानी और दंभ का ही प्रमाण है कि वह दुनिया को अपना ‘प्रभावक्षेत्र’ (Sphere of Influence) समझता है।</p>
<p dir="ltr">ईरान पर हमले को सही ठहराने के लिए पश्चिमी मीडिया और नेता अक्सर ईरान में महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा भावनात्मक रूप से उछालते हैं। यदि वास्तव में अमेरिका और इज़राइल को महिलाओं के अधिकारों की इतनी ही चिंता है, तो उन्हें ग़ज़ा और पूरे फ़लस्तीन में इज़राइल के जनसंहार में मारी गईं हज़ारों फ़िलिस्तीनी महिलाओं और बच्चियों की आवाज़ क्यों नहीं सुनाई देती? अक्टूबर 2023 से अब तक इज़राइली हमलों में 75,000 से अधिक फ़िलस्तीनियों की मौत हो चुकी है, जिनमें एक बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की है। स्कूलों, अस्पतालों और शरणार्थी शिविरों को तबाह किया गया। यह पूछना जायज़ है कि क्या उन महिलाओं के अधिकार अमेरिका-इज़राइल के लिए मायने नहीं रखते? या फिर महिलाओं और मानवाधिकारों का यह मुद्दा सिर्फ़ एक दिखावा और अपनी सैन्य-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा का एक औज़ार है?</p>
<p dir="ltr">पश्चिम एशिया पर यूएस हमेशा से ही अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता रहा है और ऐसा करने में  उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। पश्चिम एशिया के सभी देशों में यूएस ऐसी ही सरकार या शासन चाहता है जिससे उसके अपने हित सुरक्षित रहें। इज़राइल इस क्षेत्र में यूएस के साम्राज्यवाद का सच्चा और वफ़ादार सिपाही है। इसीलिए इस क्षेत्र की उन सभी सरकारों और ताक़तों को हटाने या कमज़ोर करने में इसने पूरी भूमिका निभाई है। पश्चिम एशिया में अब ईरान की सत्ता वह आख़िरी ताक़त है जो न सिर्फ़ यूएस के साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ खड़ी है बल्कि इसने इज़राइल के विस्तारवाद को भी सीमित किया हुआ है। अक्टूबर 2023 के बाद से इज़राइल ने फ़िलिस्तीनियों का जनसंहार का जो नवीनतम दौर चला रखा है उसका जवाब देने के लिए भी ईरान ही इस क्षेत्र में सबसे सशक्त राष्ट्र के रूप में खड़ा रहा है।</p>
<p dir="ltr">इंसानी समाज जितने जटिल हैं, उतनी ही इन समाजों की राजनीतिक संरचनाएँ भीं। ईरान की आंतरिक राजनीति भी इस तथ्य से अछूती नहीं है। लेकिन यूएस और इज़राइल का यह हमला किसी भी लिहाज़ से सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि बीसवीं सदी में साम्राज्यवाद को निर्णायक लड़ाई में शिकस्त देकर संप्रभुता का सिद्धांत दुनिया के सभी देशों ने मिलकर स्थापित किया था। और इस सिद्धांत को यूएस ने साल 2026 के पहले दो ही महीनों में तार-तार कर दिया है। इन घटनाओं से साबित होता है कि साम्राज्यवाद अब अपने एक चरम दौर में है जिसे हमारे संस्थान ने <a href="https://dev.thetricontinental.org/studies-on-contemporary-dilemmas-4-hyper-imperialism/" target="_blank" rel="noopener" data-saferedirecturl="https://www.google.com/url?q=https://dev.thetricontinental.org/studies-on-contemporary-dilemmas-4-hyper-imperialism/&amp;source=gmail&amp;ust=1773397880276000&amp;usg=AOvVaw29xN9AOTNiqp9Jrl25eWNN">हाइपरइम्पीरीयलिज़म</a> के रूप में पहचाना और इसका विश्लेषण किया है। इससे लड़ने के लिए दुनिया के देशों को और ख़ासतौर से वैश्विक दक्षिण को उपनिवेशवाद-विरोधी और जंग-विरोधी उन्हीं विचारों और सिद्धांतों को और पुख़्ता तौर से सामने लाना होगा जिन्होंने बीसवीं सदी में साम्राज्यवाद को शिकस्त दी थी। गौरतलब है कि उस लड़ाई के बाद वैश्विक दक्षिण (एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका) के देशों ने मिलकर एक ऐसी दुनिया की स्थापना का  <a href="https://dev.thetricontinental.org/hi/bandung-bhawna/" target="_blank" rel="noopener" data-saferedirecturl="https://www.google.com/url?q=https://dev.thetricontinental.org/hi/bandung-bhawna/&amp;source=gmail&amp;ust=1773397880276000&amp;usg=AOvVaw11-t5a52AbGPFG__nmWpQe">संकल्प</a> लिया था जहाँ कोई देश दूसरे देश पर, कोई समाज दूसरे समाज पर अपना वर्चस्व नहीं स्थापित कर सकता। यूएस ने हिंसा का जो यह नया अध्याय साल 2026 में खोला है उसे बंद करने के लिए इन विचारों की ओर लौटना ज़रूरी है।</p>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>सोनाली</strong></p><small><strong>सोनाली</strong></small></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>संकट के दौर में संस्कृति का आईना : फिल्म &#8216;अस्सी&#8217; क्यों है ज़रूरी?</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/assi-film-sankat-ke-daur-me-sanskriti-ka-aaina/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Mar 2026 02:27:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[यूएस-इजराइल के मंसूबों को ध्वस्त करने के लिए वैश्विक दक्षिण के देशों को बीसवीं सदी के साम्राज्यवाद विरोधी सिद्धांतों के साथ आगे आना होगा।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ba2025;">-सोनाली</span></strong></p>
<div id="attachment_136994" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-136994" class="size-full wp-image-136994 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Assi.jpg" alt="" width="800" height="450" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Assi.jpg 800w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Assi-300x169.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/03/Assi-768x432.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px"><p id="caption-attachment-136994" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>फ़िल्म से एक दृश्य</small></p></div>
<p><span style="font-weight: 400;">जब कोई समाज किसी बहुत बड़े संकट से गुज़र रहा होता है, उस वक्त उसके हर पहलू की छोटी-से-छोटी गतिविधि और हर रुझान बेहद अहम हो जाता है। फिलहाल भारतीय समाज ऐसे ही एक गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। इस संकट की सबसे भयावह अभिव्यक्ति है – लगातार बढ़ती हिंसा। यह हिंसा किसी एक रूप में नहीं, बल्कि कई रूपों में हमारे सामने आती है। कहीं मॉब लिंचिंग की घटनाएं हैं, तो कहीं बुलडोज़र के नाम पर हो रहा अन्याय। जनता के संवैधिनिक अधिकारों का हनन आम बात हो गया है। दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं और नियम-कायदों का खुलकर उल्लंघन हो रहा है। ये सब हिंसा के वो रूप हैं जो आम लोगों के जीवन को गहराई से प्रभावित करते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस हिंसा को रोकना काफी हद तक समाज की वैचारिक प्रगतिशीलता पर टिका है। समाज के विभिन्न घटक इस संकट के बढ़ने और इससे लड़ने, दोनों ही प्रक्रियाओं में अहम भूमिका निभाते हैं। इनमें सांस्कृतिक संसाधन और अभिव्यक्तियाँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। सांस्कृतिक क्षेत्र यानी साहित्य, सिनेमा, संगीत, नाटक और कला, बाकी सभी क्षेत्रों के मुकाबले ज्यादा सूक्ष्मता से काम करते हैं और इनका प्रभाव भी गहरा और स्थायी होता है। यही वजह है कि किसी भी समाज की प्रगतिशीलता का अंदाजा उसके सांस्कृतिक परिदृश्य को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पिछले एक दशक में दक्षिणपंथ के उभार ने भारतीय समाज में हिंसा और हिंसक प्रवृत्तियों को किस हद तक बढ़ावा दिया है, इसकी झलक हमारी फिल्मों में साफ देखी जा सकती है। खासकर मुंबई स्थित हिंदी फिल्म उद्योग में ऐसी कई फिल्में बनी हैं जो या तो इस हिंसा को महिमामंडित करती हैं या फिर सामाजिक सरोकारों से किनारा करती हुई नजर आती हैं। लेकिन हर दौर में कुछ अपवाद भी होते हैं – कुछ ऐसी फिल्में जो अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को समझती हैं और संकट के खिलाफ एक सार्थक आवाज बनकर उभरती हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसी ही एक फिल्म है अनुभव सिन्हा निर्देशित ‘अस्सी’। यह फिल्म अपने मूल विषय – महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध – के साथ-साथ हिंसा की उस व्यापक प्रवृत्ति की भी पड़ताल की कोशिश करती है जो आज हमारे समाज का सबसे बड़ा संकट बन चुकी है। इस फिल्म को खास बनाने वाली कई और भी बातें हैं, जो इसे आम सिनेमा से अलग और सार्थक बनाती हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि फिल्म यौन हिंसा की भयावहता को पूरी गंभीरता के साथ दिखाने के बावजूद पीड़िता के पूरे अस्तित्व को उस एक घटना में सिमटकर नष्ट नहीं होने देती। अक्सर हमारे समाज और सिनेमा में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि यौन अपराध की शिकार महिला की पहचान सिर्फ उस एक घटना से हो जाती है। उसके सपने, उसकी महत्वाकांक्षाएं, उसका व्यक्तित्व सब कुछ उस दर्दनाक अनुभव के आगे गौण हो जाता है। ‘अस्सी’ इस खतरनाक सोच को चुनौती देती है। फिल्म साफ संदेश देती है कि यौन अपराध, चाहे वह कितना भी घृणित और कल्पना से परे क्यों न हो, उसे पीड़िता की पूरी जिंदगी पर हावी नहीं होने दिया जाना चाहिए। पीड़िता भी सिर्फ पीड़िता नहीं होती, बल्कि वह एक इंसान होती है जिसके सपने होते हैं, जो आगे बढ़ सकती है और जिसका अपना एक अलग व्यक्तित्व होता है। फिल्म इस मानवीय दृष्टिकोण को बखूबी पेश करती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दूसरी और शायद सबसे अहम बात यह है कि ‘अस्सी’ कंगारू कोर्ट या भीड़ की अदालत की अवधारणा को पूरी तरह खारिज करती है। आज के दौर में जहां सोशल मीडिया के कोर्ट में फैसले सुनाए जाते हैं और भीड़ कानून अपने हाथ में लेने को उतारू रहती है, यह फिल्म एक अलग और संवैधानिक रास्ता दिखाती है। फिल्म अपराधिक न्याय के उस बुनियादी सिद्धांत के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है कि कोई अपराध हुआ या नहीं और उसके लिए क्या सजा होगी, यह फैसला सिर्फ अदालत ही करेगी और वह भी विधि सम्मत प्रक्रिया के तहत। फिल्म बदले की भावना से परे हटकर न्याय की उस व्यवस्था को बरकरार रखती है जो एक सभ्य और लोकतांत्रिक समाज की पहचान होती है। यह दिखाती है कि सही मायनों में न्याय वही है जो अदालत में सबूतों और गवाहों के आधार पर स्थापित हो, न कि सड़कों पर भीड़ के गुस्से से।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">तीसरा और व्यापक संदेश जो यह फिल्म देती है, वह है आत्मचिंतन का। ‘अस्सी’ हमें इस तथ्य पर गहराई से सोचने को मजबूर करती है कि एक समाज जो तेजी से असहिष्णु और हिंसक होता जा रहा है, उसके लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह रुककर आत्मनिरीक्षण करे। फिल्म सवाल उठाती है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्या सिखा रहे हैं। यह महज किताबी शिक्षा की बात नहीं है, बल्कि उस समग्र संस्कार और परवरिश की बात है जो एक बच्चे को घर और समाज से मिलती है। फिल्म रेखांकित करती है कि अगर हमें हिंसा के इस दौर को रोकना है तो हमें अपने बच्चों को संवेदनशील, सहिष्णु और न्यायप्रिय इंसान बनाना होगा। यह सिर्फ स्कूलों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आज जब हमारे सांस्कृतिक परिदृश्य पर अक्सर वही फिल्में हावी रहती हैं जो हिंसा को महिमामंडित करती हैं या सामाजिक मुद्दों से आंखें मूंद लेती हैं, ‘अस्सी’ जैसी फिल्में उम्मीद की किरण की तरह दिखती हैं। यह फिल्म सिर्फ एक मनोरंजन का जरिया नहीं है, बल्कि उस वैचारिक प्रगतिशीलता की मिसाल है जिसकी आज के भारतीय समाज को सख्त जरूरत है। यह हमें याद दिलाती है कि सिनेमा सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। और इस जिम्मेदारी को निभाते हुए ‘अस्सी’ न सिर्फ महिलाओं के खिलाफ हिंसा के सवाल पर, बल्कि न्याय की हमारी समझ और हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर भी एक सार्थक बहस छेड़ती है। ऐसे में यह फिल्म उन गिनी-चुनी कृतियों में शुमार की जा सकती है जो संकट के इस दौर में समाज का आईना बनकर हमें अपनी असल तस्वीर दिखाती हैं और बदलाव का रास्ता भी सुझाती हैं। सिनेमा के सौंदयशास्त्र के आधार पर ‘अस्सी’ का विश्लेषण इस कला के जानकरों और फ़िल्म समीक्षकों का विषय है, और यह लेख ऐसा करने का दावा नहीं करता। मौजूदा दौर में अस्सी एक अच्छी या बुरी फ़िल्म नहीं, बल्कि एक ज़रूरी फ़िल्म है।</span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>प्रकाशन उद्योग को मिलने लगी हैं नई साँसें</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/prakashan-udyog-ko-mil-rahi-nai-sansein/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 27 Feb 2026 18:13:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बढ़ती असहिष्णुता और हिंसा के बीच ‘अस्सी’ सिर्फ यौन अपराध की कहानी नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है जो खुद से सवाल पूछने से बचता रहा है।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p dir="ltr"><strong><span style="color: #ba2025;">संजय कुंदन</span></strong></p>
<p dir="ltr">पिछले क़रीब एक दशक में पठनीयता और प्रकाशन को लेकर ज़्यादातर विरोधाभासी बातें ही सुनने को मिलती रही हैं। कभी कहा जाता कि पठनीयता बढ़ रही है, कभी कहा जाता कि पठनीयता काफ़ी कम हो गई है, तकनीकी विकास के कारण प्रिंट माध्यम की विदाई तय है। बस अब उसके गिने-चुने दिन ही रह गए हैं। प्रकाशकों का एक वर्ग दावा करता रहा है कि उसकी बिक्री बढ़ी है, वहीं दूसरा तबक़ा कम बिक्री का रोना रोता रहा। लेकिन आमतौर पर किसी प्रकाशक को धंधा बंद कर कहीं किसी और क्षेत्र में जाते नहीं देखा गया। इन तमाम दावों-प्रतिदावों के बीच बीते साल हिंदी के एक लेखक को तीस लाख रॉयल्टी दिए जाने की घटना भी सामने आ गई। जबकि ज़्यादातर लेखक रॉयल्टी न मिलने की शिकायत करते हैं। ऐसे में एक भ्रम की स्थिति बनी रहती है कि आख़िर प्रकाशन जगत की सही तस्वीर क्या है। पुस्तक पढ़ने-बिकने के परिदृश्य को किस रूप में देखा जाए?</p>
<p dir="ltr">दरअसल चीज़ें बदल रही हैं, उतार-चढ़ाव जारी है, लेकिन कोई सही-सही तस्वीर नहीं उभर रही है। इसका एक ठीक-ठीक वस्तुनिष्ठ आकलन अभी भी बाक़ी है। कई अध्ययन और सर्वेक्षण बीच-बीच में आते रहते हैं, जिनसे यह तो लगता है कि हालात उतने ख़राब नहीं है, जितने कुछ समय पहले तक बताए जा रहे थे। बल्कि कुछ स्रोत बता रहे हैं कि स्थितियाँ बेहतर हो रही हैं।</p>
<p dir="ltr">इसमें कोई शक नहीं कि प्रकाशन उद्योग पर गहरा दबाव है। नई तकनीक ने उसके सामने नई चुनौतियाँ पेश की हैं, लेकिन यह भी सच है कि प्रकाशन उद्योग ने प्रौद्योगिकी से हाथ मिलाकर अपने लिए नया रास्ता भी खोजने की कोशिश की है। मसलन अमेज़न जैसा बड़ा प्रकाशक पेपरबैक और हार्डबाउंड किताबों से कहीं ज़्यादा किंडल ईबुक बेच रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में ऑडियोबुक की बिक्री 2013 से दोगुनी से भी अधिक हो गई है। इसलिए, लोग अब भी अच्छी पुस्तकों को पसंद करते हैं, बस अब वे अलग-अलग प्रारूपों में उपलब्ध हैं। पर उन देशों में एक वर्ग यह मानता है कि मुद्रित किताबों का कोई विकल्प नहीं है। बल्कि कुछ अध्ययन यहाँ तक दावा करते हैं कि अभी भी मुद्रित किताबें ही ज़्यादा बिक रही हैं।</p>
<div id="attachment_136379" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-136379" class="size-full wp-image-136379 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/after-fernand-leger-la-lecture-reading-1953-for-sale-web.jpg" alt="" width="1000" height="792" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/after-fernand-leger-la-lecture-reading-1953-for-sale-web.jpg 1000w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/after-fernand-leger-la-lecture-reading-1953-for-sale-web-300x238.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/after-fernand-leger-la-lecture-reading-1953-for-sale-web-768x608.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1000px) 100vw, 1000px"><p id="caption-attachment-136379" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>फेरनांड लेगेर (फ़्रांस), पाठक, 1953</small></p></div>
<p dir="ltr">भारत में कई प्रकाशक भी यही मानते हैं। उनके मुताबिक बीच में ऐसा ज़रूर लगा कि छपी हुई किताबों का समय जा रहा है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बल्कि पिछले कुछ वर्षों में मुद्रित किताबों की माँग बढ़ी ही है। पुस्तक मेलों, साहित्य उत्सवों में किताबों की बढ़ती बिक्री से यह धारणा बनी है। इस बात से भी इसका संकेेत मिल रहा है कि प्रकाशन के क्षेत्र में नए-नए लोग लगातार आ रहे हैं। इसके पीछे भी तकनीक ही है। अब डिजिटल प्रिंटिंग के साथ, मात्रा कोई चिंता का विषय नहीं रह गई है। एक ही पुस्तक की अधिक प्रतियाँ छापने की तुलना में विभिन्न पुस्तकों की कम प्रतियाँ छापना अधिक किफ़ायती है। इससे भंडारण लागत में बचत होती है, और डिजिटल प्रिंटिंग से माँग के अनुसार प्रिंट किया जा सकता है। अब शायद ही कोई लेखक हो जो कंप्यूटर पर काम न करता हो, ऐसे में टाइपिंग और प्रूफ रीडिंग का ख़र्च भी बच रहा है। प्रिंटिंग आदि की लागत बढ़ने के बावजूद कई और चीज़ों में बचत से उसकी भरपाई हो जा रही है।</p>
<p dir="ltr">हालाँकि वे दिन अब चले गए, जब किसी बेस्टसेलर किताब की 100,000 प्रतियाँ बिकती थीं। भारत में अब बेस्टसेलर का मतलब 3,000 से 5,000 प्रतियाँ बिकना होता है। ऑनलाइन तकनीक ने किताबों के प्रचार में मदद की है। अब सोशल मीडिया पर किताबों की जानकारी व्यापक रूप में उपलब्ध रहती है। पाठक को किताबों के बारे में व्यक्तिगत स्तर पर जानकारी मिलती रहती है। ऑनलाइन बिक्री की सुविधा के कारण वह आसानी से घर बैठे किताबें ख़रीद लेता है। इसका बिक्री पर सकारात्मक असर हुआ है। शायद किताबों की सहज उपलब्धता ने एक बार फिर पढ़ने के प्रति रुचि बढ़ाई है।</p>
<p dir="ltr">कुछ साल पहले आई एक विस्तृत बाज़ार रिपोर्ट के अनुसार भारतीय पहले से कहीं अधिक फिक्शन पढ़ रहे हैं और फिक्शन के बाजार में साल दर साल 20% की वृद्धि हुई है। लेकिन  नॉन-फिक्शन की माँग सबसे ज़्यादा है। एक अनुमान है कि भारत में ऑनलाइन शॉपिंग और फिजिकल रिटेल शॉपिंग अब 50:50 के अनुपात में है। इंडिया बुक मार्केट रिपोर्ट-2022 की मानें तो 2024-25 में मुद्रित पुस्तकों का बाजार 98,920 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। दस साल पहले यह आँकड़ा 30,660 करोड़ रुपये था।</p>
<p dir="ltr">मुद्रित किताबों के प्रति रुचि जगाने में पुस्तक मेलों, साहित्य उत्सवों का बड़ा योगदान है। कोलकाता के अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में लाखों की संख्या में लोगों ने शिरकत की है। इसी तरह, दिल्ली का अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला भी हर साल लाखों पाठकों को अपनी ओर खींचता है। नेशनल बुक ट्रस्ट की तरफ से लखनऊ में आयोजित गोमती पुस्तक महोत्सव में पिछले साल किताबों की बिक्री में 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। इन मेलों की अभूतपूर्व सफलता यह कहती है कि पढ़ने की संस्कृति एक नए सिरे से तैयार हो रही है। लिटरेचर फेस्टिवलों की कई कारणों से आलोचना की जाती है। कहा जाता है कि यह साहित्य को ग्लैमर या तमाशे में बदल देता है। जो भी हो लेकिन उसकी वजह से लोगों की एक भारी भीड़ वहाँ जुटती है और उसका एक छोटा हिस्सा भी पुस्तकों की ओर आकर्षित होता है तो इससे पाठकों की संख्या में इज़ाफ़ा ही होता है।</p>
<div id="attachment_136387" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-136387" class="size-full wp-image-136387 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/van-gogh.jpg" alt="" width="734" height="504" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/van-gogh.jpg 734w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/van-gogh-300x206.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 734px) 100vw, 734px"><p id="caption-attachment-136387" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>विन्सेंट वान गो (नीदरलैंड्ज़), फ़्रेंच उपन्यासों का ढेर, 1887</small></p></div>
<p dir="ltr">पूरी दुनिया में पढ़ने की आदत को फिर से जीवित करने और प्रोत्साहित करने के लिए कई अद्भुत पहलकदमियाँ चल रही हैं। भारत के कई शहरों, जैसे मुंबई, पुणे और बेंगलुरू में, ‘बुक्सीज़’ जैसे अनोखे सामुदायिक कार्यक्रम बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं। इन कार्यक्रमों में हर उम्र के लोग सार्वजनिक पार्कों या अन्य शांत स्थानों पर एक साथ बैठकर घंटों चुपचाप अपनी-अपनी किताबें पढ़ते हैं। ज़ाहिर है इससे पढ़ना एक निजी गतिविधि तक सीमित नहीं रह जाता। यह एक सुखद सामाजिक  अनुभव में बदल जाता है।</p>
<p dir="ltr">इन वैश्विक प्रयासों के साथ-साथ, भारत में सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर स्कूलों में पुस्तकालयों को मजबूत किया जा रहा है और बच्चों में छोटी उम्र से ही पढ़ने की आदत डालने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। यह बात अब व्यापक स्तर पर महसूस किया जा रहा है कि मुद्रित किताबों की जगह डिजिटल किताबें नहीं ले सकतीं। दुनिया भर में जो लोग डिजिटल माध्यम पर गए उन्होंने भी महसूस किया कि छपी हुई किताबों का अपना ही एक सुख है, और उसके साथ जो सुविधाएँ हैं, उन्हें डिजिटल माध्यम से हासिल नहीं किया जा सकता। डिजिटल माध्यम भी ज़रूरी हैं, लेकिन मुद्रित किताबों को जीवन से बाहर नहीं किया जा सकता। यानी दोनों चाहिए। इसी बात को अभिनेता स्टीफन फ्राई ने कुछ साल पहले इन शब्दों में व्यक्त किया था ,‘एक तकनीक दूसरी तकनीक की जगह नहीं लेती, बल्कि उसकी पूरक होती है। किताबों को किंडल से उतना ही खतरा है जितना सीढ़ियों को लिफ्ट से।’</p>
<p dir="ltr">हाँ, अख़बारों की बिक्री में लगातार गिरावट आई है क्योंकि अधिक से अधिक लोग समाचारों के लिए ऑनलाइन माध्यम पर जा रहे हैं। पत्रिकाएँ लगभग हर दिन बंद होती जा रही हैं। प्रिंट मीडिया और पत्रिकाओं का विज्ञापन राजस्व लगातार कम हो रहा है। अखबार उद्योग को प्रभावित करने वाली एक प्रमुख समस्या तकनीकी से ज़्यादा ऑनलाइन से जुड़ी है। टैब्लॉइड अखबार इससे विशेष रूप से प्रभावित हुए हैं क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा पाठक मनोरंजन जगत की खबरें पाने के लिए सोशल मीडिया का रुख कर रहे हैं। जब आप इंस्टाग्राम पर मशहूर हस्तियों को फॉलो कर सकते हैं और उनसे सीधे बातचीत भी कर सकते हैं, तो अख़बार ख़रीदकर उनके बारे में पढ़ने की क्या ज़रूरत है? इस बीच, कई लोग दुनिया भर की ख़बरें जानने के लिए 24 घंटे चलने वाले समाचार चैनलों या वेबसाइटों का सहारा लेते हैं। ऐसे में, समाचार पत्र उद्योग को प्रिंट मीडिया में गिरावट और उसके परिणामस्वरूप विज्ञापन राजस्व में आई कमी से निपटने के लिए नए-नए उपाय अपनाने पड़ रहे हैं।</p>
<p dir="ltr">भविष्य को देखते हुए, यह संभावना है कि सबसे सफल प्रकाशक वे होंगे जो बहुस्तरीय  प्रकाशन को अपनाएंगे – वास्तविक और डिजिटल दुनिया के बीच की खाई को पाटेंगे। मुद्रित प्रकाशन पढ़ना एक ऐसा ‘आरामदायक अनुभव’ है जो उपभोक्ता को डिजिटल दुनिया की भागदौड़ से कुछ पल का विराम देता है। और जैसे-जैसे जीवन की जटिलता बढ़ी है, भागदौड़ बढ़ी है, दूरियाँ बढ़ी है, सूचनाओं-तथ्यों और आभासी दुनिया की चकाचौंध बढ़ी है, हमें वास्तविक दुनिया में मौजूद रहने के इन छोटे-छोटे पलों की आवश्यकता पड़ने लगी है। और ऐसे पलों का साथी बनती है-छपी हुई किताबें।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<item>
		<title>बजट 2026–27: स्वास्थ्य के बुनियादी मुद्दों की अनदेखी</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/asia/budget-2026-27-swasthya-ki-andekhi-karta-budget/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Feb 2026 20:42:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पुस्तक मेलों और साहित्य उत्सवों में किताबों की बढ़ती बिक्री से संकेत मिलता है कि लोग फिर प्रिंट माध्यम की ओर लौट रहे हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;">
<div>
<div id="attachment_135871" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-135871" class="wp-image-135871 size-full img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/Header-1.jpg" alt="" width="800" height="450" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/Header-1.jpg 800w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/Header-1-300x169.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/Header-1-768x432.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px"><p id="caption-attachment-135871" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>निलीमा शेख (भारत), <em>सलाम चेची</em>, 2018</small></p></div>
</div>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">पिछले साल के बजट भाषण में वित्त मंत्री ने ‘विकसित भारत’ की अपनी अवधारणा को प्रारंभ में ही स्पष्ट करने का प्रयास किया था। उन्होंने तेलुगु कवि और नाटककार गुरजाडा अप्पा राव को उद्धृत करते हुए कहा कि ‘… देश उसके लोगों से बनता है’। आगे उन्होंने बताया कि सरकार के अनुसार विकसित भारत की संकल्पना में ग़रीबी का खात्मा और सभी के लिए सस्ती</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच भी शामिल है। लेकिन स्वास्थ्य के लिए बजट के प्रावधानों में यह संकल्पना पिछले सालों की तरह इस साल भी नहीं दिखती है। बजट के प्रावधान गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा को आम लोगों की पहुँच से दूर करने वाली नीतियों को ही मज़बूत करते दिखते हैं। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span lang="hi-IN">अभाव और खराब गुणवत्ता भारतीय स्वास्थ्य सेक्टर की पुरानी पहचान है। स्वास्थ्य क्षेत्र में अतिनिम्न सार्वजनिक निवेश भी एक पुरानी परिपाटी है। सकल घरेलू उत्पाद </span>(GDP) <span lang="hi-IN">के अनुपात में भारत का स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च न केवल विकासशील देशों में सबसे निचले स्तरों में से एक है</span>, <span lang="hi-IN">बल्कि पिछले ढाई दशकों में इसमें गिरावट भी आई है। प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य व्यय भी बहुत कम है और ब्राज़ील तथा चीन जैसे देशों की तुलना में लगातार पीछे जाता दिखता है। </span></p>
<p style="text-align: justify;"><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-135850 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_health_exp_prop.png" alt="" width="4000" height="2000" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_health_exp_prop.png 4000w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_health_exp_prop-300x150.png 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_health_exp_prop-1024x512.png 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_health_exp_prop-768x384.png 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_health_exp_prop-1536x768.png 1536w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_health_exp_prop-2048x1024.png 2048w" sizes="auto, (max-width: 4000px) 100vw, 4000px"></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">स्वास्थ्य सेक्टर की उपेक्षा नवउदारवादी सरकारों के दौर में और गंभीर रूप अख़्तियार कर चुकी है। ये सरकारें सार्वजनिक स्वास्थ्य में पर्याप्त निवेश नहीं करती हैं। परिणामत</span></span>: <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">स्वास्थ्य सेक्टर का बुनियादी ढाँचा लचर होता चला गया है और स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी है। सामान्यतः किसी कल्याणकारी राज्य में आर्थिक विकास से लोगों को बेहतर बुनियादी सुविधाएँ मिलती हैं</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">लेकिन भारत में तेज़ आर्थिक वृद्धि के साथ स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति और बिगड़ी है। चीन के साथ तुलना इस स्थिति को और स्पष्ट करती है। वर्ष </span></span>2001 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">में भारत में प्रति </span></span>1000 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">आबादी पर </span></span>2.1 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">अस्पताल के बिस्तर थे</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">जबकि चीन में यह संख्या </span></span>1.7 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">थी। </span></span>2023 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">तक चीन ने इस संख्या को बढ़ाकर </span></span>5.6 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">कर लिया</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">जबकि भारत में यह घटकर </span></span>1.6 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">हो गई। चिकित्सकों की संख्या के मामले में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। जहाँ आर्थिक विकास की मदद से अन्य देश बुनियादी सुविधाओं में निवेश बढ़ाकर जनता को बेहतर सुविधाएँ प्रदान करने का प्रयास कर रहे हैं</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">वहीं भारत में बुनियादी सुविधाओं की गुणवत्ता ऊँचे आर्थिक विकास दर से मेल नहीं खाती है। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">इन समस्याओं से निपटने के लिए केंद्र सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र में अभूतपूर्व स्तर पर निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है। लेकिन केंद्रीय बजट </span></span>2026–27 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">में स्वास्थ्य पर केवल </span></span>1,04,599 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">जो पिछले वर्ष की तुलना में मामूली वृद्धि है। कुल केंद्रीय व्यय में स्वास्थ्य का हिस्सा पिछले कुछ वर्षों से लगातार घट रहा है और अब यह दो प्रतिशत से भी कम है। इस स्तर का बजट आवंटन सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र के गिरते हालात को रोकने के लिए भी अपर्याप्त है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">सुधार की बात तो दूर है। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-135858 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_pmabhim.png" alt="" width="4000" height="2000" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_pmabhim.png 4000w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_pmabhim-300x150.png 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_pmabhim-1024x512.png 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_pmabhim-768x384.png 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_pmabhim-1536x768.png 1536w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/hi_pmabhim-2048x1024.png 2048w" sizes="auto, (max-width: 4000px) 100vw, 4000px"></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">कोविड</span></span>-19 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">महामारी के बाद सार्वजनिक स्वास्थ्य ढाँचे को मज़बूत करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री ने आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन </span></span>(PM-ABHIM) <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">की घोषणा की गई थी। इस योजना के अंतर्गत </span></span>2021–26 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">के दौरान </span></span>64,180 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">करोड़ रुपये खर्च किए जाने थे। लेकिन अब तक इसका लगभग </span></span>20 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">प्रतिशत ही खर्च हो पाया है। उपरोक्त ग्राफ़ </span></span>PM-ABHIM <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">पर बजट में प्रदत्त सालाना व्यय प्रदर्शित करता है। प्रारंभिक आवंटित राशि का एक छोटा सा ही हिस्सा खर्च होने के साथ</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">साथ हर साल बजट में प्रस्तावित व्यय और वास्तविक व्यय में भी भारी फ़ासला मौजूद है। अगर </span></span>2025–26 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">और </span></span>2026–27 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">में भी यह फ़ासला कायम रहा तो असल में व्यय हुई राशि प्रारंभिक ऐलान के बीस प्रतिशत से भी कम रहेगी। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में पर्याप्त निवेश न होने के कारण निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। इससे निजी क्षेत्र को अत्यधिक लाभ कमाने का अवसर मिलता है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">जबकि लचर सार्वजनिक क्षेत्र इस पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पाता। निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का विस्तार बढ़ती असमानता और धन के केंद्रीकरण की व्यापक प्रवृत्ति का ही एक हिस्सा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में मौजूदा संकट ने संपन्न वर्ग के लिए भारी मुनाफ़ा कमाने के अवसर पैदा किए हैं। सरकार</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">जो इस संकट के लिए काफी हद तक ज़िम्मेदार है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">इसे दूर करने के बजाय ऐसी नीतियाँ अपना रही है जो निजी क्षेत्र को और लाभ पहुँचाती हैं। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना </span></span>(PMJAY) <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">भी असल में इसी दिशा में काम करती है। सरकार सबको गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए स्वास्थ्य तंत्र तैयार करने की अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा रही</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">और जो बेहद कम खर्च कर भी रही है</span></span>, <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">उसका एक ठीक</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">ठाक हिस्सा निजी अस्पतालों की जेब में डाल रही है। </span></span></p>
<p style="text-align: justify;">‘<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">विकसित भारत’ जैसे अर्थहीन नारों के शोर</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">शराबे के बावजूद सच्चाई यह है कि भारत आज भी अपने नागरिकों की ज़रूरतों के अनुरूप मज़बूत स्वास्थ्य ढाँचा खड़ा करने में असफल रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति विकास और प्रगति के दावों से मेल नहीं खाती और यह एक ऐसी विकास नीति के नतीजों को उजागर करती है जो मूल रूप से असमान है और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विपरीत है। बजट </span></span>2026–27 <span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">भी पिछले बजटों की तरह स्वास्थ्य क्षेत्र की संरचनात्मक समस्याओं को पहचानने में असफल रहा है और जन</span></span>–<span style="font-family: Tahoma;"><span lang="hi-IN">विरोधी स्वास्थ्य एजेंडे की पैरोकारी करता है। </span></span></p>
<div id="attachment_135874" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-135874" class="size-full wp-image-135874 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/anantartgallery-aditya-puthur-thank-goodness-2025.jpg" alt="" width="1200" height="1000" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/anantartgallery-aditya-puthur-thank-goodness-2025.jpg 1200w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/anantartgallery-aditya-puthur-thank-goodness-2025-300x250.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/anantartgallery-aditya-puthur-thank-goodness-2025-1024x853.jpg 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/02/anantartgallery-aditya-puthur-thank-goodness-2025-768x640.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px"><p id="caption-attachment-135874" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>आदित्य पुथुर (भारत), <em>थैंक गुडनेस</em>, 2025</small></p></div>
</div>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>उमेश यादव</strong></p><small>उमेश यादव</small></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
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