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बांग्लादेशी राजनीति की उलझनें

विजय प्रशाद

सोमवार 5 अगस्त को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना जल्दबाज़ी में बांग्लादेश वायु सेना के C-130J पर सवार होकर दिल्ली से कुछ दूर स्थित हिंडन वायु सेना के हवाई अड्डे के लिए निकल पड़ीं। उनके विमान में फिर से ईंधन भरा गया और खबरों के मुताबिक वे वहाँ से या तो यूनाइटेड किंगडम (जहाँ उनकी भतीजी ट्यूलिप सिद्दिक नव निर्वाचित लेबर सरकार में मंत्री हैं), फ़िनलैंड (जहाँ उनके भतीजे रदवान मुजीब सिद्दिक हैं जिनकी शादी एक फ़िनलैंड नागरिक से हुई है) या यूनाइटेड स्टेट्स (उनके बेटे सजीब वाजिद जॉय के पास बांग्लादेश और यूएस की दोहरी नागरिकता है) जाने वाली थीं। सेना प्रमुख वकार उज़-ज़मान जिन्होंने छह हफ्ते पहले ही यह पद संभाला है और जो शेख हसीना के ससुराल की तरफ से रिश्तेदार भी हैं, उन्होंने हसीना को उस दिन बताया था कि वे इस परिस्थिति को अपने नियंत्रण में ले रहे हैं और आगे चुनाव करवाने के लिए एक अंतरिम सरकार का गठन करेंगे।

शेख हसीना बांग्लादेश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद पर रहीं हैं। वे 1996 से 2001 तक प्रधानमंत्री थीं और फिर 2009 से 2024 तक – कुल मिलाकर 20 साल। यह उनके पिता शेख मुजीब से बिल्कुल उलट रहा क्योंकि उनके सत्ता पर आने के चार साल बाद 1975 में उनकी हत्या कर दी गई थी, ऐसे ही 1981 में जनरल ज़ियाउर रहमान को भी सत्ता पर काबीज़ होने के छह साल बाद मार दिया गया था। श्रीलंका में महिंदा राजापक्षा के शासन के अंत में जो दृश्य सबने देखे लगभग वैसे ही बांग्लादेश में भी दिखे जहाँ हज़ारों की भीड़ ने खुशी में झूमते हुए प्रधानमंत्री निवास यानी गणभवन के दरवाज़े तोड़ दिए और इसी खुशी में उनके जो हाथ लगा लेकर चले दिए।

बंगाल फाउंडेशन के मुख्य संग्रहाध्यक्ष या क्यूरेटर और फोटोग्राफर तंज़ीम वहाब ने मुझे बताया, “जब [जनता] महलों में घुस आती है और पालतू हँसों, वरज़िश की मशीनों और आलीशान लाल सोफ़े उठाकर ले जाती है, तो आप एक लालची शासन के खिलाफ सबाल्टर्न वर्ग के दबे हुए गुस्से की हद को महसूस कर सकते हैं”। बांग्लादेश में हर तरफ जश्न मनाया गया, सरकार की तरफ माने जाने वाले निजी टीवी चैनलों के दफ्तरों के बाहर पटाखे फोड़े गए और मंत्रियों के आलीशान घर आगजनी का निशाना बने। शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के कई स्थानीय नेताओं की हत्या कर दी गई है (पार्टी के एक स्थानीय अध्यक्ष मोहसिन रज़ा को खुलना में पीट-पीटकर मार दिया गया)।

बांग्लादेश की स्थिति नाज़ुक है लेकिन यहाँ वही जाना-पहचाना फॉर्मूला लागू होता दिख रहा है कि “अंतरिम सरकार” का गठन हो जो नई सिरे से चुनाव करवाएगी। बांग्लादेश में राजनीतिक हिंसा नई बात नहीं है। हिंसा 1971 में इस देश के बनने के समय से ही मौजूद रही है। शेख हसीना ने किसी भी आलोचना या विरोध पर इतनी सख्त प्रतिक्रिया शायद अपने उन अनुभवों की वजह से दी जो उन्होंने अपनी युवा अवस्था में देखे थे। उनके पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की उनके अधिकतर परिवार वालों सहित 15 अगस्त 1975 को हत्या कर दी गई थी। शेख हसीना और उनकी बहन इसलिए बच गए क्योंकि वे उस वक़्त जर्मनी में थीं – दोनों बहनें अब एक साथ एक ही हेलिकॉप्टर में बांग्लादेश से भागीं। हसीना पर कई बार जानलेवा हमले हुए हैं इनमें 2004 का ग्रिनेड हमला भी शामिल है जिसकी वजह से उन्हें सुनने में परेशानी होने लगी। खुद पर फिर इसी तरह के हमलों के डर से ही शेख हसीना अपने किसी भी तरह के विरोध से चिंतित रहती इसलिए देश छोड़कर जाने से 45 मिनट पहले तक वे चाह रही थी कि सेना इकट्ठा हुई भीड़ पर फिर से बल प्रयोग करे।

लेकिन सेना ने हालात भाँप लिए। शेख हसीना के जाने का वक़्त आ चुका था। 

शेख हसीना के हटने से किसका फ़ायदा होगा इसके लिए मुकाबला शुरू हो चुका है। एक तरफ हैं छात्र जिनका नेतृत्व 158 लोगों और छह प्रवक्ताओं वाली बांग्लादेश स्टूडेंट अप्राइज़िंग सेंट्रल कमेटी कर रही है। इसके मुख्य प्रवक्ता नाहिद इस्लाम ने छात्रों का मत बिल्कुल साफ कर दिया: “हमने जिस सरकार की सिफारिश की है उसके अलावा कोई दूसरी सरकार हमें मंज़ूर नहीं है। हमारे आंदोलन के शहीदों से हम गद्दारी नहीं करेंगे। हम सुरक्षित जीवन, सामाजिक न्याय और एक नए राजनीतिक परिदृश्य के अपने वायदे के ज़रिए एक नए लोकतांत्रिक बांग्लादेश का निर्माण करेंगे”। दूसरी तरफ हैं सेना और विपक्षी राजनीतिक ताकतें (इनमें मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नैशनल पार्टी, इस्लामी दल बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी और छोटा सा वाम दल गणोसंहति आंदोलन शामिल हैं)। हालांकि सेना ने पहले इन राजनीतिक दलों से मुलाकात की लेकिन छात्र आंदोलन को शामिल न करने की वजह से जन आक्रोश हुआ उसके बाद सेना ने स्टूडेंट सेंट्रल कमेटी से मुलाकात कर उनकी मुख्य माँगे सुनीं।

बांग्लादेश में एक प्रवृत्ति का बहुत चलन है पोलटी खावा  या ‘फुटबॉल खेल के बीच में जर्सी या कमीज़ बदल लेना’, इस पटलने के दौरान सेना हमेशा रेफ्री का काम करती है। यह नारा इस वक़्त जनता के बीच बहुत गूँज रहा है ताकि ध्यान रहे कि सेना महज़ लिहाफ़ बदलकर किसी को सत्ता पर काबिज़ करने की कोशिश न कर पाए क्योंकि छात्रों की माँग खेल के नियमों को ही बदल देने की है। सेना इस बात से वाकिफ़ है इसलिए उसने बांग्लादेश के एकलौते नोबेल पुरस्कार विजेता और अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में नई सरकार के गठन की छात्रों की माँग को स्वीकार कर लिया है। माइक्रोक्रेडिट आंदोलन के संस्थापक और “सामाजिक व्यापार” को बढ़ावा देने वाले यूनुस को मुख्यत: नवउदारवादी एनजीओ दुनिया के फिनामनान के तौर पर देखा जाता था। लेकिन पिछले दशक में हसीना सरकार के उनसे जो राजनीतिक प्रतिशोध लिया और साथ ही छात्र आंदोलन के हक में आवाज़ उठाने के उनके निर्णय ने उन्हें प्रदर्शनकारियों के लिए एक असंभावित “अभिभावक” बना दिया है। छात्र उन्हें एक नेता के रूप में देख रहे हैं हालांकि यूनुस की मितव्ययिता (ऑस्टेरिटी) की नवउदारवादी राजनीति छात्रों की प्रमुख माँग यानी रोज़गार के खिलाफ जा सकती है।

छात्र

स्वतंत्रता पूर्व भी और इस इलाके के ग्रामीण स्वरूप के बावजूद बांग्लादेश की राजनीति का केंद्र शहरी ही रहा और इसका ज़्यादा ध्यान ढाका पर रहा। दूसरी ताकतों के राजनीति में आने के  बावजूद बांग्लादेश में छात्र एक प्रमुख राजनीतिक खिलाड़ी बने रहे। उत्तर उपनिवेशवादी पाकिस्तान में हुए सबसे शुरूआती विरोध प्रदर्शनों में था भाषा आंदोलन जो ढाका विश्वविद्यालय में पनपा था, जहाँ 1952 में छात्र नेताओं को एक प्रदर्शन के दौरान मार दिया गया था (उनकी याद में ढाका में शहीद मीनार बनाई गई)। 1971 में पाकिस्तान से आज़ादी के संघर्ष में छात्रों ने बहुत अहम भूमिका निभाई इसीलिए पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन सर्चलाइट के तहत विश्वविद्यालयों को निशाना बनाया जिसके चलते छात्र नेताओं को मारा गया। 1971 के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक दल ज़्यादातर अपने छात्र संगठनों के ज़रिए उभरे – आवामी लीग का बांग्लादेश छात्र लीग, बांग्लादेश नैशनल पार्टी का बांग्लादेश जातियतावादी छात्र दल और जमात-ए-इस्लामी का बांग्लादेश इस्लामी छात्र शिबिर।

पिछले दशक से बांग्लादेश के छात्र गुस्से में थे क्योंकि अर्थव्यवस्था के विकास के बावजूद रोज़गार कम हो रहे थे और उन्हें सरकार उदासीन लग रही थी। सरकारी उदासीनता उन्हें शेख हसीना के एक मंत्री शाहजहाँ खान की टिप्पणी में दिखी जब उन्होंने जुलाई 2019 में ढाका के एयरपोर्ट रोड पर बस से दो छात्रों की मौत की घटना को हँसकर मानने से इंकार कर दिया। इस घटना के बाद हर उम्र के छात्र सड़क सुरक्षा को लेकर हुए बड़े-बड़े प्रदर्शनों में शामिल हुए, इनका जवाब सरकार ने गिरफ्तारियों से दिया (इसी दौर में फोटोजर्नलिस्ट शाहीदुल आलम को 107 दिनों तक जेल में कैद रखा गया था)।

सड़क सुरक्षा के लिए प्रदर्शन बहुत साफ दिखाई दिए लेकिन इनके पीछे एक और प्रमुख मुद्दा था। पाँच साल पहले 2013 में बांग्लादेश लोक सेवा में कुछ छात्रों को नहीं बैठने दिया गया था और वे सरकारी नौकरियों में एक खास आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। फरवरी 2018 में बांग्लादेश साधारण छात्र अधिकार संरक्षण परिषद के छात्रों की बदौलत यह मुद्दा फिर सामने आया। जब सड़क सुरक्षा को लेकर प्रदर्शन हुए तो छात्रों ने आरक्षण का मुद्दा भी उठाया (इसके साथ ही महँगाई का मुद्दा भी)। कानूनन सरकारी नौकरियों में सरकार पिछड़े जिलों (10 प्रतिशत), महिलाओं (10 प्रतिशत), अल्पसंख्यकों (5 प्रतिशत) और विक्लांगों (1 प्रतिशत) के लिए सीटें आरक्षित रखती है और इसके साथ ही स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों (30 प्रतिशत) के लिए भी।

इस आखिरी आरक्षण यानी स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को मिलने वाले आरक्षण को ही 2013 में चुनौती दी गई और यही इस साल छात्रों के लिए एक भावनात्मक मुद्दा बनकर लौटा है – खासतौर से एक प्रेस कान्फ्रन्स में प्रधानमंत्री के भड़काऊ बयान के बाद कि जो स्वतंत्रता सेनानियों के आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं वे “राजाकारेर नतनी” (युद्ध के गद्दारों के वंशज) हैं। ब्रिटिश पत्रकार डेविड बर्जमन जो बांग्लादेश की एक प्रमुख कार्यकर्ता वकील सारा हुसैन के पति हैं और जिन्हें हसीना सरकार ने निर्वासन पर मजबूर कर दिया, उन्होंने इस टिप्पणी को एक “भयानक त्रुटि” करार दिया जिसने सरकार गिरा दी।

सैन्य इस्लाम

फरवरी 2013 में जमात-ए-इस्लामी के अब्दुल क़ादर मोल्लाह को बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई (माना जाता है उसने 344 नागरिकों की हत्या की थी)। कोर्ट से निकलते समय उसने ‘वी’ यानी विजय का चिह्न बनाया, उसके घमंड से बांग्लादेश के सामाज के बड़े हिस्से में रोष फैला। ढाका के शाहबाग में कई लोग इकट्ठा हुए और उन्होंने गणजागरण मंच की स्थापना की। इस विरोध प्रदर्शन ने सर्वोच्च न्यायालय को अपने आदेश को फिर से जाँचने पर मजबूर किया और मोल्लाह को 12 दिसंबर को फाँसी दे दी गई। शाहबाग आंदोलन ने राजनीति में धर्म की भूमिका को लेकर बांग्लादेश में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को सतह पर ला दिया।

शेख मुजीब उर रहमान ने शुरू में दावा किया कि बांग्लादेश एक समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष देश बनेगा। सेना द्वारा उनकी हत्या के बाद जनरल ज़ियाउर रहमान ने देश की बागडोर संभाली और 1975 से 1981 तक शासन किया। इस दौर में ज़िया धर्म को सामाजिक जीवन में फिर ले आया और जमात-ए-इस्लामी से प्रतिबंध हटाकर उसका स्वागत किया (यह प्रतिबंध 1971 के नरसंहार में इसकी भागीदारी की वजह से लगा था), और 1978 में राष्ट्रवादी विचारों और भारत के प्रति तीखा रवैया रखते हुए बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की स्थापना की। जनरल हुसैन मोहम्मद इरशाद ने 1982 में तख्तापलट करके खुद देश का नियंत्रण अपने हाथ में लिए और 1990 तक शासन किया, इन्होंने एक कदम आगे जाते हुए इस्लाम को राज्य धर्म घोषित कर दिया। यह मुजीब और उनकी बेटी शेख हसीना, जिन्होंने 1981 में अपने पिता की पार्टी आवामी लीग की कमान थामी, उनकी राजनीति से अलग था।

शेख हसीना की सेन्ट्रिस्ट-धर्मनिरपेक्ष आवामी लीग और बीएनपी के बीच एक लंबी लड़ाई के लिए ज़मीन तैयार थी, 1981 में जनरल ज़िया की हत्या के बाद उनकी पत्नी खालिदा ज़िया ने बीएनपी की बागडोर संभाली। सेना का चरित्र शुरूआत में धर्मनिरपेक्ष रुझान वाला था लेकिन धीरे-धीरे इसमें इस्लामिक रंग बढ़ने लगा। बांग्लादेश में राजनीतिक इस्लाम आम जनता में धार्मिकता के बढ़ने के साथ-साथ विकसित हुआ है, इसका कुछ श्रेय खाड़ी देशों और दक्षिण पूर्व एशिया में जा रहे प्रवासी मज़दूरों के इस्लामीकरण को भी दिया जा सकता है। आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के कई परिणामों में एक यह भी है कि इस्लाम में आस्था का पालन बहुत ज़्यादा दिखाई देने लगा है। किसी को भी इस खतरे को न बढ़ा कर देखना चाहिए न कम आँकना चाहिए।

2013 के बाद से राजनीतिक इस्लामिकों की लोकप्रियता बढ़ी है और इनके तथा सेना के आपसी संबंध पर भी काफी स्पष्टता की ज़रूरत है। युद्ध अपराध ट्राइब्यूनल ने यह दर्ज किया है कि कैसे आज़ादी के संघर्ष के दौरान जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान की ओर था, तब से इसके ओहदे को भी झटका लगा है, ऐसा लगने लगा है कि राजनीतिक इस्लाम के इस स्वरूप की वैधता की एक सीमा है। लेकिन इसका एक पेचीदा पहलू यह भी है कि हसीना सरकार ने “राजनीतिक इस्लाम” के इस डर का लगातार इस्तेमाल कर 2018 और 2024 के चुनावों में यूएस और भारत की खामोश सहमति हासिल की। अगर अंतरिम सरकार समय पर निष्पक्ष चुनाव करवाती है तो बांग्लादेशी जनता यह जान पाएगी कि क्या राजनीतिक इस्लाम वह व्यवस्था है जिसे वे चुनना चाहती है।

नया शीत युद्ध

छात्रों ने जिन महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया जिनकी वजह से शेख हसीना को पद से हटना पड़ा, उन मुद्दों के अलावा भी इस दौर के कुछ खतरनाक रूझान हैं जिनके बारे में ज़्यादा चर्चा नहीं होती। आबादी के हिसाब से बांग्लादेश दुनिया का आठवाँ सबसे बड़ा देश है और दक्षिण एशिया में इसका सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी दूसरे नंबर पर है। यह दुनिया और इस क्षेत्र में जो भूमिका निभाता है उसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता।

पिछले दशक में यूनाइटेड स्टेट्स ने जैसे चीन पर एक नया शीत युद्ध थोपा वैसे-वैसे दक्षिण एशिया ने कई चुनौतियों का सामना किया है। शुरू में भारत यूनाइटेड स्टेट्स के साथ यूएस इंडो-पेसिफिक रणनीति के इर्द-गिर्द की संरचनाओं में भागीदारी करता था। लेकिन फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद भारत ने खुद को यूएस के इस कार्यक्रम से दूर रखना और अपने देश के एजेंडे को सामने रखना शुरू किया। इसका मतलब था कि भारत ने रूस की भर्त्सना नहीं की और रूस से तेल खरीदना जारी रखा। इसी के साथ चीन ने बेल्ट एण्ड रोड इनिश्यटिव (बीआरआई) के ज़रिए भारत के पड़ोसी देशों – बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका में इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण किया।

यह शायद इत्तेफाक नहीं कि इस क्षेत्र की जिन चार सरकारों ने बीआरआई के साथ काम करना शुरू किया था उनमें से तीन गिर चुकी हैं और उनकी जगह जो नई सरकारें आई हैं वे यूनाइटेड स्टेट्स से करीबी बढ़ाने के लिए आतुर हैं। इसमें शामिल हैं शहबाज़ शरीफ़ जो पाकिस्तान में इमरान खान (जो अब जेल में हैं) को हराकर अप्रैल 2022 में सत्ता में आए, रानिल विक्रमसिंघे जो एक बड़े जन आंदोलन को किनारे करते हुए जुलाई 2022 में बहुत कम समय के लिए श्रीलंका में सत्ता पर काबीज़ हुए, लेकिन जनता की बिल्कुल भी यह मंशा नहीं थी कि ऐसे दल को सत्ता दे दी जाए जिसका संसद में केवल एक सदस्य हो (खुद विक्रमसिंघे) और नेपाल में केपी शर्मा ओली जिन्होंने जुलाई 2024 में एक संसदीय उथल-पुथल के बाद माओवादियों के अपदस्थ होने के बाद शासन संभाला है।

शेख हसीना का सत्ता से हटाया जाना इस क्षेत्र के समीकरणों में क्या भूमिका निभाएगा यह तो अंतरिम सरकार के अधीन चुनाव होने के बाद ही पता चलेगा। लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि ढाका में होने वाले फैसलों के क्षेत्रीय और वैश्विक परिणाम होंगे।

छात्र अपनी वैधता के लिए बड़े जन प्रदर्शनों की ताकत पर निर्भर करते हैं। उनके पास बांग्लादेश के लिए कोई एजेंडा नहीं है इसलिए पुराने नवउदारवादी टेक्नक्रैटों ने अभी से अंतरिम सरकार के इर्द-गिर्द शार्क की तरह गोते लगाना शुरू कर दिया है। इनमें बीएनपी और इस्लामिस्टों को समर्थन देने वाले शामिल हैं। ये क्या भूमिका निभाएंगे अभी देखा जाना बाकी है।

अगर छात्र कमेटी मज़दूर संगठनों, खासतौर से कपड़ा मज़दूर यूनियनों, के साथ मिलकर एक नया मोर्चा बनाती है तब एक नए लोकतांत्रिक और जन-केंद्रित बांग्लादेश के निर्माण की संभावना खुल जाती है। अगर वे इस ऐतिहासिक मोर्चे का निर्माण न कर पाए तो उन्हें शायद दरकिनार कर दिया जाएगा जैसे मिस्र के मज़दूरों और छात्रों को कर दिया गया था। और इन्हें शायद सेना और कुलीनवर्ग के साझे प्रयासों के सामने घुटने टेकने पड़ेंगे जो सिर्फ भेस बदलकर लौटे हैं।