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	<title>Uncategorized @hi | Tricontinental: Institute for Social Research</title>
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	<description>international, movement-driven institution focused on stimulating intellectual debate that serves people’s aspirations.</description>
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		<title>सोवेटो पचास बरस बाद: जो दस्तावेज़ों में न मिले वह संघर्ष भुला दिया जाता है</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/hi/soweto-south-africa-rangbhed/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Jun 2026 03:00:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized @hi]]></category>
		<category><![CDATA[soweto]]></category>
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					<description><![CDATA[दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद-विरोधी फोटोग्राफरों ने सबूत सहेजे, सामूहिक स्मृति बनाई, और कैमरे को राजनीतिक शिक्षा व अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता का हथियार बनाया।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;"><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-148168 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/AB28_Header.jpg" alt="" width="950" height="550" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/AB28_Header.jpg 950w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/AB28_Header-300x174.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/AB28_Header-768x445.jpg 768w" sizes="(max-width: 950px) 100vw, 950px"></div>
<div>
<div class="rm-b-e-md">

<p><span style="font-weight: 400;">यह कला बुलेटिन अब्दुल्ला इब्राहिम (1934-2026) को समर्पित है। वे दक्षिण अफ़्रीका के मशहूर जैज़ संगीतकार और नस्लभेद विरोधी कार्यकर्ता थे जिनका इसी महीने देहांत हो गया। जीते जी उन्होंने सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के साधनों, ख़ासतौर से पीआनो, को राजनीतिक प्रतिरोध के सशक्त हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। यही प्रतिरोध उनके गीत ‘</span><a href="https://www.youtube.com/watch?v=HhACPRwzIOo"><span style="font-weight: 400;">सोवेटो</span></a><span style="font-weight: 400;">’ में भी साफ़ झलकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दक्षिण अफ़्रीका के शहर सोवेटो के ऑर्लैंडो वेस्ट इलाक़े में दो सड़कों, मोइमा और विलाकाज़ी, के कोने पर खड़े होकर देखें। बारह बरस के </span><a href="https://sahistory.org.za/people/hector-pieterson"><span style="font-weight: 400;">हेक्टर पीटरसन</span></a><span style="font-weight: 400;"> को 16 जून 1976, यानी आधी सदी पहले इसी महीने में, सुबह के साढ़े नौ बजे गोली मार दी गई थी। इसी जगह के क़रीब फ़ोटोग्राफ़र </span><a href="https://sahistory.org.za/people/masana-sam-nzima"><span style="font-weight: 400;">मसाना सैम्यूअल ‘सैम’ नज़ीमा</span></a><span style="font-weight: 400;"> ने अपने पेनटैक्स एस एल कैमरे और एक 50 मिमि लेंस से छह तस्वीरें ली थीं; इनमें से तीसरी तस्वीर दुनियाभर में देखी गई: अठारह साल के मबुइसा मखुबो हेक्टर के शरीर को उठाए भाग रहे थे, उनकी बहन एंटोनेट सिथोले उनके साथ भाग रही थी। उनके नीचे बिछी डामर की सड़क पर एक गहरी परछाईं पड़ रही थी। ये परछाईं कुछ बातों की गवाही दे थी – तस्वीर सुबह के वक़्त ली गई थी, सोवेटो रोड का वह ख़ास हिस्सा जहाँ यह घटना घटी और वह घड़ी जब रंगभेदी राज्यतंत्र ने एक स्कूली छात्र को गोली मारी।</span></p>
</div>
</div>
<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;">
<div id="attachment_148060" class="wp-caption alignnone"><img decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-148060" class="wp-image-148060 size-large img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/01_Sam-Nzima-Hector-Pieterson-June-16-1976-830x1024.jpeg" alt="" width="830" height="1024" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/01_Sam-Nzima-Hector-Pieterson-June-16-1976-830x1024.jpeg 830w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/01_Sam-Nzima-Hector-Pieterson-June-16-1976-243x300.jpeg 243w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/01_Sam-Nzima-Hector-Pieterson-June-16-1976-768x948.jpeg 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/01_Sam-Nzima-Hector-Pieterson-June-16-1976-1245x1536.jpeg 1245w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/01_Sam-Nzima-Hector-Pieterson-June-16-1976-1660x2048.jpeg 1660w" sizes="(max-width: 830px) 100vw, 830px"><p id="caption-attachment-148060" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-weight: 400;">16 जून 1976 को हेक्टर पीटरसन को मबुइसा मखुबो द्वारा उठाकर ले जाते हुए। साभार: सैम नज़ीमा</span></small></p></div>
</div>
<p><span style="font-weight: 400;">यह तस्वीर एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक बन गई। 80 के दशक में अंतर्राष्ट्रीय रंगभेद-विरोधी आंदोलनों ने इसे अनगिनत बार पोस्टरों और टीशर्टों पर छापा, जिनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के लोगों के साथ एकजुटता संगठन (OSPAAAL) और लंदन में रंगभेद-विरोधी आंदोलन (AAM) से लेकर बोत्सवाना के </span><a href="https://dev.thetricontinental.org/dossier-71-medu-art-ensemble/"><span style="font-weight: 400;">गैबोरोन में मेडू कला समूह</span></a><span style="font-weight: 400;"> (Medu Art Ensemble) आदि शामिल थे। इन सभी समूहों ने मिलकर रंगभेदी शासन की क्रूरता को दुनिया के सामने रखा और उसे हराने के लिए एक वैश्विक आंदोलन खड़ा करने में सहायता की। लेकिन यह बुलेटिन इस एक तस्वीर के बारे में नहीं है बल्कि फ़ोटोग्राफ़रों की उस पूरी पीढ़ी के बारे में है जिन्होंने नस्लभेद को अपनी तस्वीरों में क़ैद किया, उसमें निहित अंधकार को उजागर किया और उस मुक्ति संघर्ष को इतिहास के पन्नों के लिए दर्ज किया जो इस बर्बर शासन के ख़िलाफ़ लड़ा गया।</span></p>
<h3 style="margin:2em 0;"><span style="font-weight: 400;">सोवेटो विद्रोह को तस्वीरों में उतारना</span></h3>
<p><span style="font-weight: 400;">16 जून 1976 को 3,000 से 10,000 के बीच स्कूली छात्रों ने ग्यारह क़तारों में ऑर्लैंडो स्टेडियम की ओर मार्च निकाला। उनकी तात्कालिक शिकायत थी कि अफ़्रीकन स्कूलों में बिना सलाह-मशवरा किए शिक्षा का माध्यम अफ्रीकान्स बना दिया गया था। इसके अलावा उनकी व्यापक शिकायत <a href="https://sahistory.org.za/archive/bantu-education-act-act-no-47-1953">बंटू शिक्षा</a> के विरुद्ध थी – या, जैसा कि इसे दो दशक लगाकर तैयार करने वाले प्रधानमंत्री हेंड्रिक फर्वूर्ड कहते थे, एक ‘अलग और निम्न’ व्यवस्था, जिसे ब्लैक बच्चों को यह समझाने के लिए डिज़ाइन किया गया था कि उनके श्रम के अलावा उनके लिए कोई स्थान नहीं है। सोवेटो स्टूडेंट्स रिप्रेज़ेंटटिव काउन्सिल ने नेलेडी हाई स्कूल से 13 जून को मार्च निकालने का फ़ैसला किया। इस काउन्सिल का नेतृत्व कर रहे थे उन्नीस वर्षीय टेबोहो ‘त्सीत्सी’ माशिनिनी, उन्नीस वर्षीय मर्फ़ी मोरोबे और सोलह वर्षीय सेथ मज़ीबुको।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सुबह साढ़े नौ बजे पहली बार गोलियाँ चलाई गईं। पंद्रह साल लेस्ली ‘हेस्टिंग्स’ एनडलोवु मारे जाने वाले पहले छात्र थे; हेक्टर पीटरसन दूसरे। दिन ढलते-ढलते, सोवेटो में कम-से-कम तेईस छात्र मारे गए थे, इनमें से ज़्यादातर बच्चे थे। साल ख़त्म होते-होते, पूरे देश में 700 से ज़्यादा छात्रों की हत्या कर दी गई थी।</span></p>
<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;">
<div id="attachment_148068" class="wp-caption alignnone"><img decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-148068" class="wp-image-148068 size-large img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/02_Ernest-Cole-Students-kneel-on-floor-to-write.-Government-is-casual-about-furnishing-schools-for-blacks.-South-Africa-1960s-1024x696.png" alt="" width="1024" height="696" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/02_Ernest-Cole-Students-kneel-on-floor-to-write.-Government-is-casual-about-furnishing-schools-for-blacks.-South-Africa-1960s-1024x696.png 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/02_Ernest-Cole-Students-kneel-on-floor-to-write.-Government-is-casual-about-furnishing-schools-for-blacks.-South-Africa-1960s-300x204.png 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/02_Ernest-Cole-Students-kneel-on-floor-to-write.-Government-is-casual-about-furnishing-schools-for-blacks.-South-Africa-1960s-768x522.png 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/02_Ernest-Cole-Students-kneel-on-floor-to-write.-Government-is-casual-about-furnishing-schools-for-blacks.-South-Africa-1960s-1536x1045.png 1536w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/02_Ernest-Cole-Students-kneel-on-floor-to-write.-Government-is-casual-about-furnishing-schools-for-blacks.-South-Africa-1960s-2048x1393.png 2048w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px"><p id="caption-attachment-148068" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-weight: 400;">घुटनों के बल बैठकर लिखते छात्र, 60 का दशक, साभार: अर्नेस्ट कोल</span></small></p></div>
</div>
<p><span style="font-weight: 400;">इन छात्रों को फ़ोटोग्राफ़रों का साथ रहा। सैम नज़ीमा </span><i><span style="font-weight: 400;">द वर्ल्ड </span></i><span style="font-weight: 400;"> के लिए काम करते थे, यह उस समय देश का प्रमुख ब्लैक अख़बार था; पीटर माग़ुबाने </span><i><span style="font-weight: 400;">रैंड डेली मेल </span></i><span style="font-weight: 400;">के लिए तस्वीरें खींचते थे; और ऐल्फ़ कुमालो </span><i><span style="font-weight: 400;">संडे टाइम्ज़ </span></i><span style="font-weight: 400;">के लिए काम करते थे। इन्होंने तस्वीरें खींची। मार खाई। कुछ गिरफ़्तार भी हुए। लेकिन तमाम जोखिमों के बावजूद इन फ़ोटोग्राफ़रों ने हर संभव तरीक़े से नेगेटिव पहुँचाने का काम किया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कुमालो सोवेटो में रहते थे और उन्होंने लगभग आधी सदी तक इस शहर को तस्वीरों में दर्ज किया। जिस रंगभेदी शासन को वे अपनी तस्वीरों के ज़रिए उजागर कर रहे थे उसने उन्हें प्रताड़ित किया। वे <a href="https://www.npr.org/sections/pictureshow/2012/10/25/163557205/remembering-alf-kumalo-chronicler-of-life-under-apartheid">याद</a> करते हैं ‘मुझे गिरफ़्तार किया गया, मारा गया। उन्होंने मेरा सिर फोड़ दिया’।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ये तस्वीरें सिर्फ़ सोवेटो में उस दिन हुई बर्बरता की गवाह भर नहीं हैं। क्रिस हानी बारागवानाथ अस्पताल में डॉक्टर मैल्कम क्लाइन ने <a href="https://brandsouthafrica.com/109018/hastings-ndlovu-150605/">पाया</a> कि कुछ घायलों के ‘घाव अजीब’ थे: उनके शरीर के ऊपरी हिस्सों में गोली घुसने के छोटे छेद और निचले हिस्से से निकलने के बड़े छेद’ मिले। डॉक्टरों को बाद में समझ आया कि पुलिस हेलिकॉप्टरों से गोलियाँ चला रही थी। पुलिस ने गोलियों से घायल दाखिल हर मरीज़ के नाम की लिस्ट माँगी ताकि उन पर ‘दंगों’ के लिए कार्रवाई की जा सके, लेकिन डॉक्टरों और दाखिल करने वाले क्लर्कों ने मना कर दिया। बल्कि दाख़िले की वजह उन्होंने ‘फोड़े’ लिखा। क्लाइन ने कहा ‘ऐसा करके हमने अनगिनत मरीज़ों को दोबारा पुलिस की बर्बरता का सामना करने से बचाया’।</span></p>
<h3 style="margin:2em 0;"><span style="font-weight: 400;">कैमरा मेरी बंदूक़ था</span></h3>
<p><span style="font-weight: 400;">उस सुबह के बाद भी कैमरे चलते रहे, दशकों तक, तस्वीरें उन घटनाओं की दस्तावेज़ हो गईं तथा राजनीतिक शिक्षा, साझी स्मृति और प्रतिरोध का हिस्सा हो गईं। पीटर मगुबाने </span><a href="https://www.thejournalist.org.za/kau-kauru/camera-gun-legend-peter-magubane/"><span style="font-weight: 400;">याद</span></a><span style="font-weight: 400;"> करते हैं कि सोवेटो में उस सुबह अपनी तस्वीर उतारे जाने के लिए मना करने वाले युवा प्रदर्शनकारियों से उन्होंने कहा था ‘जो संघर्ष दर्ज न किया जाए वह संघर्ष ही नहीं’। मगुबाने ने ख़ुद 1969 में अपनी तस्वीरों के लिए 586 दिन एकांत कारावास में बिताए, वे अमूमन बाइबल को खोखला करके उसमें कैमरा छिपा लिया करते थे।</span></p>
<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;">
<div id="attachment_148077" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-148077" class="wp-image-148077 size-large img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/03_Peter-Magubane-funeral-procession-in-Zwelitsha-King-Williams-Town-Eastern-Cape-1978-1024x917.png" alt="" width="1024" height="917" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/03_Peter-Magubane-funeral-procession-in-Zwelitsha-King-Williams-Town-Eastern-Cape-1978-1024x917.png 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/03_Peter-Magubane-funeral-procession-in-Zwelitsha-King-Williams-Town-Eastern-Cape-1978-300x269.png 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/03_Peter-Magubane-funeral-procession-in-Zwelitsha-King-Williams-Town-Eastern-Cape-1978-768x688.png 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/03_Peter-Magubane-funeral-procession-in-Zwelitsha-King-Williams-Town-Eastern-Cape-1978.png 1342w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"><p id="caption-attachment-148077" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-weight: 400;">ज़्वेलित्शा, किंग विलियम्स टाउन (अब क़ोंसे), पूर्वी केप, 1978 में अंतिम संस्कार जुलूस। साभार: पीटर मगुबाने</span></small></p></div>
</div>
<p><i><span style="font-weight: 400;">सोवेटो: द फ़्रूट ऑफ़ फ़ियर (1986) </span></i><span style="font-weight: 400;">में छपी मुगबाने की तस्वीरों को देखें: मातम करने वालों से भरी एक बस, खिड़कियों से निकलती उनकी बुलंद मुट्ठियाँ, बस की छत पर बैठे और लोग; उनके पीछे गाड़ियों का एक क़ाफ़िला, उनके पीछे फैली पहाड़ियाँ। यह साल था 1978; जगह पूर्वी केप, </span><a href="https://sahistory.org.za/people/stephen-bantu-biko"><span style="font-weight: 400;">स्टीव बीको</span></a><span style="font-weight: 400;"> का इलाक़ा। स्टीव उस ब्लैक कॉन्‌शस्‌नेस्‌ मूवमेंट [ब्लैक चेतना आंदोलन] के सह-संस्थापक थे जिसने सोवेटो विद्रोह को प्रेरित किया। बीको की सितंबर 1977 में पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गई थी। यहाँ, मुगबाने ने रंगभेदी शासन के दौर में राजनीतिक प्रतिरोध के एक नए स्वरूप को दर्ज किया, जब सभाओं और जुलूसों पर प्रतिबंध लग गए तो अंतिम यात्राओं ने उनकी जगह ले ली। इसी तरह कैमरे ने भी एक नई भूमिका ले ली। जैसा कि मगुबाने ने <a href="https://www.thejournalist.org.za/kau-kauru/camera-gun-legend-peter-magubane/">कहा</a> ‘मैं अपनी बंदूक़ लेके चल सकता था; कैमरा ही मेरी बंदूक़ था। मैं इस बंदूक़ से रंगभेद को मार सकता था’।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एक और तस्वीर देखें, यह अर्नेस्ट कोल ने ली थी। ब्लैक पुरुषों की एक क़तार, वे निर्वस्त्र थे और एक दीवार की ओर मुँह करके खड़े थे, उनके हाथ ऊपर थे और रंगभेदी प्रवासी मज़दूर प्रणाली के तहत खदानों में काम करने के लिए उनकी चिकित्सा जाँच की जा रही थी। लोगों को अलग-अलग श्रेणियों में रखने वाली व्यवस्था ने कोल के साथ भी ऐसा ही किया: अपने नेगेटिवों के साथ दक्षिण अफ़्रीका से बाहर जाने के लिए उन्हें एक पासपोर्ट की ज़रूरत थी, जिसके लिए उन्हें ख़ुद को फिर से ब्लैक से ‘कलर्ड’ [मिश्रित जाति] की श्रेणी में डलवाना पड़ा, यहाँ तक कि अपने नाम की वर्तनी ‘Kole’ से बदलकर ‘Cole’ करनी पड़ी ताकि यह अधिक इंग्लिश लगे। वे जिन तस्वीरों के नेगेटिव देश से बाहर ले जा पाए, वे 1967 में यूनाइटिड स्टेट्स में एक क़िताब के रूप में छपीं। क़िताब का नाम था </span><i><span style="font-weight: 400;">हाउस ऑफ़ बॉन्डेज़</span></i><span style="font-weight: 400;">  [ज़ंजीरों का घर], इसमें खदानकर्मियों वाली तस्वीर भी थी। इस क़िताब को दक्षिण अफ़्रीका में बैन कर दिया गया। दक्षिण अफ़्रीका एम्बसी ने कोल का पासपोर्ट रिन्यू करने से मना कर दिया जिस वजह से उन्हें सालों तक सड़कों पर रहना पड़ा। 1990 में दक्षिण अफ़्रीका के महानतम फ़ोटोग्राफ़रों में से एक ने न्यूयॉर्क में देशहीन व्यक्ति के रूप में दम तोड़ा। उनकी अस्थियाँ बाद में दक्षिण अफ़्रीका लाई गईं और मामेलोदी में दफ़नाई गईं।</span></p>
<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;">
<div id="attachment_148086" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-148086" class="wp-image-148086 size-large img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/04_Lesley-Lawson-Night-cleaner-polishing-the-boardroom-table-Johannesburg-1984-1024x688.jpg" alt="" width="1024" height="688" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/04_Lesley-Lawson-Night-cleaner-polishing-the-boardroom-table-Johannesburg-1984-1024x688.jpg 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/04_Lesley-Lawson-Night-cleaner-polishing-the-boardroom-table-Johannesburg-1984-300x202.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/04_Lesley-Lawson-Night-cleaner-polishing-the-boardroom-table-Johannesburg-1984-768x516.jpg 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/04_Lesley-Lawson-Night-cleaner-polishing-the-boardroom-table-Johannesburg-1984-1536x1032.jpg 1536w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/04_Lesley-Lawson-Night-cleaner-polishing-the-boardroom-table-Johannesburg-1984.jpg 1696w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"><p id="caption-attachment-148086" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-weight: 400;">रात में सफ़ाईकर्मी बोर्डरूम का टेबल साफ़ करते हुए, जोहंनेसबेरग, 1984। साभार: लेस्ली लॉसन</span></small></p></div>
</div>
<p><span style="font-weight: 400;">लेस्ली लॉसन की ली हुई एक तस्वीर है </span><i><span style="font-weight: 400;">वर्किंग विमन </span></i><span style="font-weight: 400;">(1985) [कामकाजी महिलाएँ]। लॉसन ने 80 के दशक के शुरुआती दौर में दक्षिण अफ़्रीका में काम करती हुई ब्लैक महिलाओं की तस्वीरें लीं, इनमें शहर के बाहरी श्वेत इलाक़ों के रसोईघरों में घरेलू कामगार महिलाएँ और फ़ैक्टरियों में उत्पादन लाइनों में काम कर रही मज़दूरों से लेकर श्वेत मालिकों के खेतों में काम करने वाली खेत मज़दूरों तक सब शामिल थीं। इस क़िताब में लेस्ली की तस्वीरों के साथ इन महिलाओं के अपने शब्द भी छपे जिनमें उन्होंने काम के घंटों, वेतन और काम पर जाने के सफ़र के बारे में बात की। ऐसा करके लेस्ली ने महिलाओं के उस श्रम को तस्वीरों में दर्ज किया जो रंगभेदी शासन की अर्थव्यवस्था को चलाता था। लेकिन यह श्रम उस दशक के प्रतिमा विज्ञान (आइकनोग्राफी) से लगभग ग़ायब था। लॉसन ने दक्षिण अफ्रीकी उच्च शिक्षा समिति (SACHED) के साथ काम किया, जो मज़दूरों का शिक्षा ट्रस्ट था, और “वर्किंग विमन” न केवल मज़दूरों के अध्ययन समूहों (स्टडी ग्रूप) के लिए एक शिक्षण टूल के रूप में काम आई बल्कि एक दस्तावेज़ी अभिलेख के रूप में भी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">संतु मोफोकेंग की 1986 की फोटोग्राफी शृंखला, <em>ट्रेन चर्च</em></span><span style="font-weight: 400;"> को देखें। एक तस्वीर भोर में सोवेतो-जोहान्सबर्ग कम्यूटर लाइन के एक डिब्बे को कैद करती है: मज़दूर हाथ उठाए, गीत गा रहे हैं, जबकि एक व्यक्ति ट्रेन की भीतरी दीवार को हाथ से ड्रम की तरह बजा रहा है। कम्यूटर लाइन रंगभेदी अर्थव्यवस्था की दैनिक प्रणाली का हिस्सा थी, जो ब्लैक मज़दूरों को भोर से पहले और अंधेरे के बाद श्वेत शहर से ले जाती और लाती थी। यह एक चर्च में बदल गई थी, जहाँ अधिकतर मध्यम आयु वर्ग की महिलाएँ काम के कपड़ों में गाती थीं, प्रचार करती थीं और सांत्वना पाती थीं। यह “एक दैनिक अनुष्ठान” था, जैसा कि मोफोकेंग ने इसे </span><a href="https://americansuburbx.com/2012/05/santu-mofokeng-photographing-resistance-to-the-menace-and-alienation-of-apartheid-transport-santu-mofokengs-train-churches-1996.html"><span style="font-weight: 400;">कहा</span></a><span style="font-weight: 400;">। रंगभेदी अर्थव्यवस्था के अमानवीय तर्कों के बावजूद, ब्लैक मज़दूर लगातार उस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन का सक्रिय निर्माण कर रहे थे, जो व्यवस्था उन्हें हासिल नहीं करने देती थी। मोफोकेंग ने कहा कि उनकी अपनी प्रतिबद्धता “सामान्य ब्लैक दक्षिण अफ़्रीकियों को जीवन के दैनिक काम-काज में व्यस्त” तस्वीरों में क़ैद करने की थी – जो अस्तित्व बनाए रखने और सामूहिक जीवन में छिपा प्रतिरोध का एक स्वरूप था।</span></p>
<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;">
<div id="attachment_148094" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-148094" class="wp-image-148094 size-large img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/05_Santu-Mofokeng_Hands-in-Worship-From-Train-Church-1986-1024x671.webp" alt="" width="1024" height="671" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/05_Santu-Mofokeng_Hands-in-Worship-From-Train-Church-1986-1024x671.webp 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/05_Santu-Mofokeng_Hands-in-Worship-From-Train-Church-1986-300x197.webp 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/05_Santu-Mofokeng_Hands-in-Worship-From-Train-Church-1986-768x503.webp 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/05_Santu-Mofokeng_Hands-in-Worship-From-Train-Church-1986-1536x1007.webp 1536w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/05_Santu-Mofokeng_Hands-in-Worship-From-Train-Church-1986.webp 1654w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"><p id="caption-attachment-148094" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-weight: 400;">पूजा करते हाथ, ट्रेन चर्च शृंखला से जोहान्सबर्ग-सोवेटो लाइन, 1986। साभार: संतु मोफोकेंग</span></small></p></div>
</div>
<p><span style="font-weight: 400;">इनमें से कोई भी तस्वीर अकेले सफल नहीं होती; सब ही इस सामूहिक जीवन में रची-बसी थीं और कई तो राजनीतिक संगठन में काम आईं। <a href="https://sahistory.org.za/people/omar-badsha">ओमर बादशाह</a> का जन्म 1945 में डरबन के भारतीय समाज में हुआ। फ़ोटोग्राफ़र बनने से पहले वे मज़दूर संगठन कार्यकर्ता थे, और केमिकल वर्कर्स इंडस्ट्रीयल यूनीयन के पहले महासचिव थे। उन्होंने 1975 में अपना पहला कैमरा ख़रीदा ताकि फ़ैक्टरी के हालात की तस्वीरें ले सकें और मज़दूरों को जागरूक कर सकें। 1981 में बादशाह ने एफ़्रापिक्स नाम के कलेक्टिव के गठन में मदद की। यह लगभग चालीस महिला और पुरुष फ़ोटोग्राफ़रों का समूह था जो जोहान्सबर्ग में दक्षिण अफ़्रीका के चर्चों की काउन्सिल के खोत्सो हाउस से काम करता था, इसके डार्करूम (वे अंधेरे कमरे जहाँ नेगेटिव से तस्वीरें तैयार की जाती हैं) डरबन और केप टाउन में थे। खोत्सो हाउस पर छापा मारा गया था और 1986 में इस पर बमबारी भी की गई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन तमाम तस्वीरों और राजनीतिक कार्यों को एक कड़ी जोड़ती थी ब्लैक चेतना, एक आंदोलन और वे विचार जिन्हें स्टीव बीको ने सबसे पहले सुसंगत रूप से पेश किया था। </span><a href="https://consciousness.co.za/the-definition-of-black-consciousness-by-bantu-stephen-biko/"><span style="font-weight: 400;">दक्षिण अफ्रीकी छात्र संगठन के 1973 के नीति घोषणापत्र</span></a><span style="font-weight: 400;"> में, बीको ने लिखा कि ब्लैक चेतना आंदोलन “ब्लैक समुदाय को उनके स्वयं में, उनके प्रयासों, उनके मूल्य-तंत्रों, उनकी संस्कृति, उनके धर्म और उनके जीवन-दृष्टिकोण के प्रति एक नए स्वाभिमान से भरना चाहता है”। बीको द्वारा परिभाषित ‘ब्लैक व्यक्ति’ एक राजनीतिक श्रेणी थी, जिसमें वे सभी आते थे जिन्हें रंगभेदी राज्य ने अपनी गैर-श्वेत श्रेणियों में रखा था – खानों और टाउनशिप के अफ्रीकी मज़दूर, केप की फैक्ट्रियों और बंदरगाहों के कलर्ड मज़दूर, भारतीय और चीनी बंधुआ मज़दूरों के वंशज, जिन्हें ब्रिटेन ने गन्ना काटने या सोने की खानों में काम करने के लिए भेजा था। उन्होंने इन सभी को उस बहुमत के रूप में रखा जो श्वेत पूँजी से उनके संबंध द्वारा परिभाषित था। इसी कारण, बीको ने जोर देकर कहा, “ब्लैक समुदाय के विभिन्न वर्गों के बीच ब्लैक एकजुटता के महत्व को कम नहीं आँका जाना चाहिए”। रंगभेद-विरोधी आंदोलन की तस्वीरें भी पूरे औपनिवेशिक दृश्य और नस्लीय व्यवस्था को साफ़-साफ़ पेश करने और उसे ध्वस्त करने के लिए एकजुटता बनाने से जुड़ी थी।</span></p>
<h3 style="margin:2em 0;"><span style="font-weight: 400;">बर्बरता को छिपाने की कोशिश</span></h3>
<p><span style="font-weight: 400;">आज पचास साल बाद और रंगभेद के कानूनी अंत के तीन दशक से भी अधिक समय बाद, नस्ली-पूँजीवादी व्यवस्था अभी भी बनी हुई है। हेक्टर पीटरसन की तस्वीर और सोवेतो में 16 जून की वार्षिक स्मृति दक्षिण अफ्रीका, पूरे महाद्वीप और पूरे प्रवासी समुदाय में नई पीढ़ियों को मुक्ति के अधूरे काम के लिए उनके अपने संघर्षों में प्रेरित करती रहती है।</span></p>
<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;">
<div id="attachment_148102" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-148102" class="wp-image-148102 size-large img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/06_Alf-Kumalo_Youths-in-Diepsloot-Soweto-are-silhouetted-against-the-night-sky-1970s-1024x689.png" alt="" width="1024" height="689" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/06_Alf-Kumalo_Youths-in-Diepsloot-Soweto-are-silhouetted-against-the-night-sky-1970s-1024x689.png 1024w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/06_Alf-Kumalo_Youths-in-Diepsloot-Soweto-are-silhouetted-against-the-night-sky-1970s-300x202.png 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/06_Alf-Kumalo_Youths-in-Diepsloot-Soweto-are-silhouetted-against-the-night-sky-1970s-768x517.png 768w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/06_Alf-Kumalo_Youths-in-Diepsloot-Soweto-are-silhouetted-against-the-night-sky-1970s-1536x1034.png 1536w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/06/06_Alf-Kumalo_Youths-in-Diepsloot-Soweto-are-silhouetted-against-the-night-sky-1970s.png 1682w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"><p id="caption-attachment-148102" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-weight: 400;">डीप्स्लूट, जोहान्सबर्ग में युवा, रात के आकाश के विरुद्ध छायाचित्र, 1970 के दशक। साभार: एल्फ कुमालो</span></small></p></div>
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<p><span style="font-weight: 400;">यह संघर्ष केवल दक्षिण अफ़्रीका तक सीमित नहीं है। अक्टूबर 2023 में अमेरिका-समर्थित इज़राइली जनसंहार शुरू होने के बाद से, दो सौ से अधिक फ़िलिस्तीनी पत्रकार – जिनमें फोटोग्राफ़र भी शामिल हैं – मारे गए हैं। जिन लोगों ने दुनिया को ग़ज़ा को देखते रहने के लिए मजबूर किया है, उनमें बिसान ओव्दा शामिल हैं, जिनके ग़ज़ा से रोज़ आने वाल सोशल मीडिया वीडियो करोड़ों लोगों तक पहुँचे हैं। इसी तरह वाएल दहदूह, अल जज़ीरा के ब्यूरो प्रमुख,  ने जनवरी 2024 में अपने बेटे, कैमरामैन हमज़ा दहदूह, को दफनाने के बाद भी रिपोर्टिंग जारी रखी। उनके साथ असंख्य फ़िलिस्तीनी फोटोग्राफ़र, पत्रकार और आम लोग हैं, जो अपनी दुनिया की बर्बादी को देख भी रहे हैं और उसका लेखा-जोखा भी बना रहे हैं। ट्राईकॉन्टिनेंटल की डोसियर, </span><a href="https://dev.thetricontinental.org/dossier-cultural-resistance-palestine/"><i><span style="font-weight: 400;">Despite Everything: Cultural Resistance for a Free Palestine</span></i></a><span style="font-weight: 400;">, नक़बा के बाद से प्रतिरोध का दस्तावेज़ीकरण करने वाले फ़िलिस्तीनी सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की लंबी यात्रा का पता लगाती है, और इस बात पर जोर देती है कि दस्तावेजीकरण के बिना कोई संघर्ष नहीं है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जैसा कि मिरियम मेकबा ‘</span><a href="https://www.youtube.com/watch?v=YGbEQ210_J4"><i><span style="font-weight: 400;">सोवेतो ब्लूज़</span></i></a><span style="font-weight: 400;">‘ में गाती हैं, राज्य ने उस जनसंहार को “शहर के बीच थोड़ी-सी बर्बरता” बनाकर कमतर आँकने की कोशिश की। पचास साल बाद, तस्वीरें, गीत, गवाहियाँ और संघर्ष के अभिलेख उस मिटाने की कोशिश को विफल कर रहे हैं।</span></p>
<blockquote><p><span style="font-weight: 400;">बच्चों को मालिक का एक ख़त मिला</span><br>
<span style="font-weight: 400;">उसमें लिखा था: खोसा, सोथो, ज़ुलु अब और नहीं</span><br>
<span style="font-weight: 400;">बच्चों ने फ़रमान अस्वीकार किया, उन्होंने जवाब भेजा</span><br>
<span style="font-weight: 400;">तब पुलिसवाले उतरे बचाव में</span><br>
<span style="font-weight: 400;">बच्चे हवा में उछाले जा रहे थे, गोलियाँ, वो मर रहे थे</span><br>
<span style="font-weight: 400;">माएँ चिल्ला रही थीं, रो रही थीं</span><br>
<span style="font-weight: 400;">पिता शहरों में काम कर रहे थे</span><br>
<span style="font-weight: 400;">शाम के अख़बार ने कहा:</span><br>
<span style="font-weight: 400;">बस ज़रा-सी बर्बरता, शहर के बीचोंबीच</span></p></blockquote>
<p><span style="font-weight: 400;">एकजुटता में</span>,</p>
<p><span style="font-weight: 400;">टिंग्स चक </span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कला निर्देशक, </span><span style="font-weight: 400;">ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान</span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>क्रांति सिर्फ़ संस्कृति और विचारों से ही जन्म लेती है</title>
		<link>https://dev.thetricontinental.org/hi/sanskriti-vichar-kranti/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Atul]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 May 2026 03:00:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized @hi]]></category>
		<category><![CDATA[art]]></category>
		<category><![CDATA[poetry]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://thetricontinental.org/?p=146673</guid>

					<description><![CDATA[दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद-विरोधी फोटोग्राफरों ने सबूत सहेजे, सामूहिक स्मृति बनाई, और कैमरे को राजनीतिक शिक्षा व अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता का हथियार बनाया।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-144984 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/AB27_Header-1.jpg" alt="" width="950" height="550" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/AB27_Header-1.jpg 950w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/AB27_Header-1-300x174.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/AB27_Header-1-768x445.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 950px) 100vw, 950px"></div>
<div class="rm-b-e-md">

<p class="single-post--content--text-small text-center"><span style="font-weight: 400;">‘पोर क्यू कैंटामोस / कैनसियोन नुएवा’ (हम क्यों गाते हैं / नया गीत) </span><a href="https://www.youtube.com/watch?v=tPvHCfYDIik"><span style="font-weight: 400;">सुनिए</span></a><span style="font-weight: 400;">, जो ‘ए डोस वोसेस’ (दो आवाज़ों में) से लिया गया है। यह मारियो बेनेदेत्ती और डैनियल विग्लियेट्टी के बीच एक सहयोग है, जिसमें बेनेदेत्ती द्वारा ‘पोर क्यू कैंटामोस’ का पाठ और विग्लियेटी का गीत ‘कैनसियोन नुएवा’ एक साथ प्रस्तुत किए गए हैं।</span></p>
</div>
<p><span style="font-weight: 400;">लैटिन अमेरिका में जनता के आंदोलनों की राह और उनकी संस्कृति का विकास हमेशा से आपस में घुले-मिले रहे हैं। पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में स्पैनिश और पुर्तगाली उपनिवेशवाद से लेकर उन्नीसवीं सदी के स्वतंत्रता आंदोलनों और 1823 के मोनरो सिद्धांत के दौर तक लैटिन अमेरिका के लोगों ने वर्चस्व के हर रूप का विरोध किया है। क्यूबा की आज़ादी के संघर्ष के प्रमुख नेता जोस मार्टी ने 1891 में इस महाद्वीप की राजनीतिक और सांस्कृतिक एकता के बारे में </span><i><span style="font-weight: 400;">नुएस्ट्रा अमेरिका</span></i><span style="font-weight: 400;"> (हमारा अमेरिका) नाम से एक निबंध लिखा। यह लैटिन अमेरिकी जनता के प्रतिरोध की सबसे सशक्त अभिव्यक्तियों में से एक है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मार्टी के लिए नुएस्ट्रा अमेरिका सिर्फ़ उस विशाल भौगोलिक क्षेत्र का नाम नहीं था जो रीओ ग्रांडे से लेकर मैगलन जलडमरूमध्य’ तक फैला हुआ है, बल्कि यह इस महाद्वीप के इतिहासों, संस्कृतियों और संघर्षों में रचा-बस एक सांस्कृतिक प्रोजेक्ट है। यह मार्टी के चिंतन की साम्राज्यवाद-विरोधी ताकत थी: लैटिन अमेरिका ख़ुद को जानकर ही ख़ुद को मुक्त कर सकता था, उन स्वदेशी, अफ्रीकी, किसान और लोकप्रिय जड़ों को पहचानकर जिनका उपनिवेशवाद और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने तिरस्कार किया था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जैसा कि मार्टी ने नुएस्ट्रा अमेरिका में लिखा: ‘एक समस्या के सभी पहलुओं को जान लेने के बाद उन्हें हल करना, उन्हें बिना जाने हल करने से आसान होता है।… समझ तैयार करना ही समस्या को हल करना है। और इस समझ के साथ किसी देश को जानना और उस पर शासन करना ही निरंकुशता से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय है’। लैटिन अमेरिका के पूरे इतिहास में इस स्व-ज्ञान को पुनरुत्पादित करने का एक प्रमुख साधन यहाँ का साहित्य रहा है। कविताओं, उपन्यासों, निबंधों और गीतों के ज़रिए इस महाद्वीप के लोगों ने अपने यथार्थ को प्रस्तुत किया है। यह प्रस्तुति अमूर्त नहीं बल्कि उनके भोगे गए अनुभव हैं।</span></p>
<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;">
<div id="attachment_144815" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-144815" class="size-full wp-image-144815 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/01_writers-on-the-truck.jpeg" alt="" width="994" height="426" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/01_writers-on-the-truck.jpeg 994w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/01_writers-on-the-truck-300x129.jpeg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/01_writers-on-the-truck-768x329.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 994px) 100vw, 994px"><p id="caption-attachment-144815" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-weight: 400;">लेखक ट्रक द्वारा मिनास दे फ्रियो, क्यूबा की यात्रा करते हुए, तिथि अज्ञात। स्रोत: रेविस्ता कासा दे लास अमेरिकास।</span></small></p></div>
</div>
<p><span style="font-weight: 400;">बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में लैटिन अमेरिका में गहन राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन हुए। 1959 में क्यूबा की क्रांति ने इस टापू देश को यूनाइटिड स्टेट्स (यूएस) की अधीनता से निकाला और एक ऐसे समाजवादी परिवर्तन की प्रक्रिया की शुरुआत की जो आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन का पुनर्निर्माण करना चाहती थी। इसने इस क्षेत्र की अन्य संघर्षरत जनता को उम्मीद दी। इसके जवाब में यूएस ने अपना साम्राज्यवादी हमला और तीखा कर दिया: नुएस्ट्रा अमेरिका में 1961 में यूएस ने क्यूबा के ख़िलाफ़ बे ऑफ़ पिग्स असफल आक्रमण में सहयोग दिया, 1964 ब्राज़ील में सैन्य तख़्तापलट की कोशिश का समर्थन किया, 1973 से पहले चिली में साल्वाडोर अलेंदे की सरकार को अस्थिर करने की कोशिशें कीं, और 1970 के दशक में पूरे महाद्वीप में तानाशाहों के पक्ष में और विद्रोहों को दबाने के लिए आक्रामक कार्यक्रमों को समर्थन दिया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस पृष्ठभूमि में, साहित्य प्रतिरोध में अपनी अहम भूमिका निभाता रहा, ख़ासतौर से 1960 और 1970 के दशक में लैटिन अमेरिका में बेहद तेज़ी से बढ़ती साक्षरता के दौरान। इस दौर में कई लेखकों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। इस दौर में कला और राजनीति के अंतरसंबंध पर हमेशा से चली आ रही बहस एक बार फिर उभरी। लैटिन अमेरिका के इस दौर में इस बहस के केंद्र में थी क्यूबा की क्रांति और इसकी सांस्कृतिक नीति।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">क्रांति के पहले साल में नई सरकार ने कई सांस्कृतिक संस्थानों की स्थापना की, इनमें शामिल थे नेशनल थिएटर, क्यूबन इंस्टिट्यूट ऑफ़ सिनेमैटोग्राफ़िक आर्ट एंड इंडस्ट्री (आईसीएआईसी), और कासा दे लास अमेरिकास। हायदी संतामारिया के नेतृत्व में कासा दे लास अमेरिकास लैटिन अमेरिका में संस्कृति, कला और साहित्य के बारे में विचार का एक अनिवार्य केंद्र बना। उरुग्वे के लेखक </span><span style="font-weight: 400;">मारियो बेनेदेत्ती</span><span style="font-weight: 400;"> (1920-2009) ने कासा के राजनीतिक और सांस्कृतिक काम में बहुत अहम भूमिका निभाई। उन्होंने पूरे लैटिन अमेरिका में साहित्य को प्रतिरोध के क्षेत्र के रूप में स्थापित करने में मदद की। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के अन्य कई लैटिन अमेरिकी लेखकों की ही तरह मारियो का साहित्यिक और राजनीतिक विकास भी कासा दे लास अमेरिकास से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कासा की पत्रिका </span><i><span style="font-weight: 400;">रेविस्ता कासा दे लास अमेरिकास</span></i><span style="font-weight: 400;"> पहली बार 1960 में छपी। इसने लैटिन अमेरिकी और कैरिबियाई</span><span style="font-weight: 400;"> संस्कृति के मुक्ति से जुड़े पहलू को फैलाने और विकसित करने में केंद्रीय भूमिका अदा की। ऐसा करके इसने एक नए समाज के निर्माण में अपना योगदान दिया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन संस्थानों के गठन के साथ-साथ, 1961 में फ़िदेल कास्त्रो ने अपने भाषण </span><i><span style="font-weight: 400;">पलाब्रास ए लॉस इंटेलेक्चुअल्स </span></i><span style="font-weight: 400;">(बुद्धिजीवियों के लिए कुछ शब्द) में क्रांति की सांस्कृतिक नीति की आधारशीला की रूपरेखा पेश की। कोनराडो बेनीतेज़ ब्रिगेड जैसे कार्यक्रम क्यूबा के साक्षरता अभियान के केंद्र में थे, और इसके साथ ही क्लासिकल साहित्यिक रचनाओं की लाखों प्रतियों का मुफ़्त वितरण संस्कृति को लोगों के एक अधिकार के तौर पर स्थापित करने की व्यापक कोशिश का अहम अंग बना। ग़ौरतलब है कि क्रांति की प्रक्रिया में जो पहली किताब छापी और बाँटी गई वह थी मिगुएल दे सर्वेंट्स की </span><i><span style="font-weight: 400;">डॉन क्विक्सोट</span></i><span style="font-weight: 400;">।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लेकिन इसके साथ क्यूबा के ख़िलाफ़ यूएस का साम्राज्यवादी हमला भी सांस्कृतिक क्षेत्र तक फैल गया। कासा दे लास अमेरिकास के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए सीआईए के पैसे से चलने वाली कांग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ़्रीडम ने 1966 में पेरिस से </span><i><span style="font-weight: 400;">मुंडो नुएवो</span></i><span style="font-weight: 400;"> (नई दुनिया) नाम की पत्रिका निकाली। इस पत्रिका के निदेशक थे उरुग्वेयाई आलोचक एमीर रोद्रिगेज़ मोनेगाल। इस पत्रिका ने ख़ुद को एक स्वतंत्र साहित्यिक पत्रिका के रूप में पेश करते हुए लैटिन अमेरिका में तेज़ी से उभर रहे लेखकों को क्यूबाई क्रांतिकारी प्रोजेक्ट से हटाकर उदार कम्युनिज़म-विरोधी ख़ेमे में ला दिया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जैसे-जैसे पूरे महाद्वीप में क्रांति और प्रति-क्रांति के बीच टकराव हुए, वैसे-वैसे लेखकों ने क्यूबा में समाजवाद के निर्माण और शीतयुद्ध के दौरान यूएस द्वारा किए गए सांस्कृतिक हमले, दोनों पर अलग-अलग राय देनी शुरू कर दी। लैटिन अमेरिका में लेखन में आए ज़बरदस्त उत्थान के दौर के प्रमुख लेखक, जैसे जूलियो कोर्टाज़ार, मारियो वर्गास ल्योसा, गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ और कार्लोस फुएंतेस, इस बहस में ख़ास और कभीकभार अंतर्विरोधी तौर पर शामिल हुए। इससे यह उजागर हुआ कि साहित्य और कला अपने दौर के व्यापक राजनीतिक संघर्षों से अछूते नहीं रह सकते।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसी संदर्भ में </span><span style="font-weight: 400;">वर्ग संघर्ष में बेनेदेत्ती द्वारा प्रतिपादित लेखक की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। हवाना में कल्चरल कांग्रेस के बाद 1968 में </span><i><span style="font-weight: 400;">क्यूबा </span></i><span style="font-weight: 400;"> पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में बेनेदेत्ती ने यह राय पेश की:</span></p>
<blockquote><p><span style="font-weight: 400;">अगर हर क्रांतिकारी का यह फ़र्ज़ है कि क्रांति लाने के लिए काम किया जाए, तो उसी तरह हर लेखक का फ़र्ज़ है साहित्य रचना … साहित्य, अन्य कार्यों के साथ-साथ, इंसान के वैचारिक पटल का विस्तार करता है। लोग महान साहित्य के अर्थों – अंतिम या फ़ौरी – को जहाँ तक समझ पाते हैं, वे हमारे संघर्षों के क़रीब आते हैं। और अगर वे दुश्मन द्वारा उन पर थोपे गए अलगाव का विश्लेषण कर पाएँ तो यह क़रीबी और गहरी हो जाती है। इसलिए, हम जुझारू लेखकों पर कोई संकीर्ण थीम या सामान्य दृष्टिकोण थोपने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं करते।</span></p></blockquote>
<p><span style="font-weight: 400;">इसलिए, साहित्य की संभावना लेखक की राजनीतिक राय से आगे जाती है, हालाँकि साम्राज्यवाद के तेज़ हमलों के दौर में, ये राय राजनीतिक प्रक्रियाओं को मज़बूत या कमज़ोर करने के लिए अहम हो जाती हैं। बेनेदेत्ती का कहना यह था कि साहित्य की क्रांतिकारी ताक़त किसी निर्देशित थीम, विधा या नारे तक सीमित नहीं की जा सकती। साहित्य लोगों के वैचारिक पटल को फैलाता है, अलगाव को पहचान पाने की उनकी क्षमता को धार देता है और उन्हें अपनी व्यवस्थित, कल्पनात्मक और भावनात्मक शक्ति के ज़रिए संघर्षों के नज़दीक लाता है।</span></p>
<h3 style="margin:2em 0;"><strong>संस्कृति विलासिता की वस्तु नहीं, एक अधिकार है</strong></h3>
<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-144831 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/03_Mario-Benedetti_950x950.jpg" alt="" width="950" height="950" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/03_Mario-Benedetti_950x950.jpg 950w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/03_Mario-Benedetti_950x950-300x300.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/03_Mario-Benedetti_950x950-150x150.jpg 150w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/03_Mario-Benedetti_950x950-768x768.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 950px) 100vw, 950px"></div>
<p><span style="font-weight: 400;">मारियो बेनेदेत्ती लैटिन अमेरिका के बीसवीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में से एक हैं। कविता, उपन्यास, कहानी और निबंध, सभी विधाओं में इन्होंने एक सीधी और बेहद मानवीय शैली का विकास किया जिसने उरुग्वे और बाक़ी लैटिन अमेरिका की सामाजिक और भावनात्मक पेचीदगियों को उजागर किया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अपने साहित्यिक योगदान के अलावा बेनेदेत्ती ने लैटिन अमेरिकी वामपंथ की सांस्कृतिक और राजनीतिक ज़िंदगी में भी एक केंद्रीय भूमिका निभाई। </span><span style="font-weight: 400;">कासा दे लास अमेरिकास के साथ उनके जुड़ाव ने – पहले इसके साहित्य पुरस्कार के लिए निर्णायक मंडल के सदस्य के रूप में और बाद में सेंटर फ़ॉर लिटरेरी रिसर्च (साहित्यिक अनुसंधान केंद्र) के संस्थापक और निदेशक के रूप में – एक ऐसी लैटिन अमेरिकी साहित्यिक संस्कृति के विकास में योगदान दिया, जो यूरोपीय साहित्यिक परंपराओं को स्वीकार करते हुए भी, नुएस्ट्रा अमेरिका के राजनीतिक, सौंदर्यात्मक और सांस्कृतिक महत्व पर ज़ोर देती थी। इस अनुभव ने लैटिन अमेरिकी पाठकों और क्रांतिकारी प्रक्रियाओं के साथ संवाद में साहित्यिक अभ्यास पर उनके चिंतन को गहरा किया, बिना साहित्य को कठोर नियमों या हठधर्मिता में सीमित किए। क्रांतिकारी प्रक्रियाओं में बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की भूमिका पर उनके विचार विशेष रूप से महत्वपूर्ण बने हुए हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">1968 में कल्चरल कोंग्रेस ऑफ़ हवाना में </span><span style="font-weight: 400;">बेनेदेत्ती ने बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं के बीच के तनाव के बारे में बात रखी। ऐसे समय में जब राजनीतिक संघर्षों का स्वरूप मुख्य रूप से हथियारबंद था, बुद्धिजीवियों और कलाकारों से अमूमन लड़ाई में सीधे शामिल होने की माँग की जाती थी। बेनेदेत्ती के लिए वैचारिक काम अपने आप में क्रांतिकारी प्रक्रिया का एक ज़रूरी हिस्सा था। उनका मत था कि बुद्धिजीवी ‘अपने मूल अर्थ में ही परंपरा-विरोधी होता है, अपने सामाजिक परिवेश का आलोचक होता है, और बेहतरीन याददाश्त वाला गवाह’।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि संस्कृति विलासिता की वस्तु नहीं बल्कि एक अधिकार है। ‘एक कलाकार जो अपने सपने देखने, सौंदर्य रचना, कल्पना के निर्माण के अधिकार की रक्षा उसी दृढ़ संकल्प और विश्वास से करता है जितना कि अपने भोजन, मकान और स्वास्थ्य के अधिकार की रक्षा करता है – सिर्फ़ वही कलाकार अपनी रचनाओं को किसी विलासिता की वस्तु की बजाय एक आवश्यकता के तौर पर पेश करने की क्षमता रखता है, सिर्फ़ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए भी।’</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस तरह बेनेदेत्ती के मुताबिक़ क्रांतिकारी संस्कृति को राजनीतिक संघर्ष से गौण नहीं माना जा सकता था। कला, साहित्य और कल्पना भी उस शक्ति का हिस्सा थे जिनसे लोगों के लिए अपनी परिस्थितियों की व्याख्या करना, अपनी गरिमा की रक्षा करना और नए समाज के लिए संघर्ष करना संभव हुआ।</span></p>
<div class="single-post--content--media-block single-post--content--image" style="text-align:center; margin:3em 0;">
<div id="attachment_144823" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-144823" class="size-full wp-image-144823 img-responsive" src="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/02_mario_benedetti_jurado_premio_casa_americas_haydee_santamaria_alejo_carpentir_1978_s.jpg" alt="" width="300" height="445" srcset="https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/02_mario_benedetti_jurado_premio_casa_americas_haydee_santamaria_alejo_carpentir_1978_s.jpg 300w, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/05/02_mario_benedetti_jurado_premio_casa_americas_haydee_santamaria_alejo_carpentir_1978_s-202x300.jpg 202w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px"><p id="caption-attachment-144823" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-weight: 400;">पुरस्कार के निर्णायक मंडल में बेनेदेत्ती, हायदी संतामारिया और अलेहो कारपेंटियर के साथ, 1978। स्रोत: फुंडासियोन मारियो बेनेदेत्ती।</span></small></p></div>
</div>
<p><span style="font-weight: 400;">बेनेदेत्ती के साहित्य का सबसे बड़ा हिस्सा उनकी कविताएँ हैं। उनके पूरे साहित्य में उन्होंने कई विधाओं में लिखने का प्रयास किया, जिनमें हाइकू भी शामिल हैं, इनके ज़रिए उन्होंने साधारण जीवन की विविधता को चित्रित किया। </span><span style="font-weight: 400;">उनकी कविता में, उनके अधिकांश लेखन की तरह, सबसे बढ़कर निकटता और एकजुटता की एक नीति दिखाई देती है, जैसा कि उनके एक हाइकु (हाइकै) में देखा जा सकता है:</span></p>
<table class="single-post--content--poem-translation">
<tbody>
<tr>
<td><em>la más cercana<br>
</em><em>de todas las fronteras<br>
</em><em>es con mi prójimo</em></td>
<td><span style="font-weight: 400;">सब सरहदों में से</span><br>
<span style="font-weight: 400;">सबसे नज़दीक है</span><br>
<span style="font-weight: 400;">मेरे पड़ोसी के साथ वाली सरहद</span></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><span style="font-weight: 400;">उनका गद्य भी उनके साहित्यिक योगदान का एक अहम हिस्सा है। नौ से अधिक संग्रहों में, उन्होंने स्मृति, उरुग्वे में तानाशाही के तहत जीवन, प्रेम, और दैनिक अस्तित्व की अंतरंग बनावट जैसे विषयों पर लिखा, जिससे व्यक्तिगत लगने वाले अनुभवों को राजनीतिक आधार मिला। ‘मोंतेविदियानोस’ (मोंतेविदियावासी), ‘जियोग्राफियास’ (भूगोल), और ‘बुजोन दे तिएम्पो’ (समय का मेलबॉक्स) जैसे उनके कहानी संग्रह, साथ ही उपन्यास ‘प्रिमावेरा कॉन उना एस्किना रोटा’ (टूटे शीशे में वसंत) यह दर्शाते हैं कि उनके लेखन में भावनात्मकता और राजनीति कैसे अविभाज्य हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बेनेदेत्ती का जीवन और साहित्य संस्कृति और कला के साथ एक संघर्षशील (मिलिटेंट) जुड़ाव को दर्शाते हैं, जो क्रांतिकारी निर्माण के मूलभूत आयाम हैं। उनकी कविता और गद्य सूक्ष्म और गहन दोनों हैं, जो एक नए समाज में एक नए मनुष्य के निर्माण के विरोधाभासों को उजागर करते हैं।</span></p>
<h3 style="margin:2em 0;"><b>हम किस लिए गाते हैं?</b></h3>
<p><span style="font-weight: 400;">इक्कीसवीं सदी में वर्ग संघर्ष की गतिशीलता तीव्र बनी हुई है। पतनशील यूएस साम्राज्य फ़िलिस्तीन से लेकर वेनेजुएला और क्यूबा तक, वैश्विक दक्षिण के क्षेत्रों और लोगों के खिलाफ अपने हमले तेज़ कर रहा है, लेकिन इन क्षेत्रों के लोगों ने भी अपना प्रतिरोध जारी रखा हुआ है। ‘विचारों और भावनाओं की लड़ाई’, जैसा कि इसके बारे में फ़िदेल ने कहा था, बहुत तेज़ी से हमारे दौर के केंद्र में आ गई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एक लेखक और क्रांतिकारी दोनों रूपों में </span><span style="font-weight: 400;">मारियो बेनेदेत्ती की विरासत यह समझने के लिए बेहद अहम है कि एक बुद्धिजीवी सिर्फ़ एक संस्कृतिकर्मी के रूप में ही काम नहीं कर सकता बल्कि क्रांतिकारी प्रक्रिया के भीतर एक संगठनकर्ता के तौर पर भी काम कर सकता है। </span><span style="font-weight: 400;">कासा दे लास अमेरिकास अब भी नुएस्ट्रा अमेरिका में सबसे ज़रूरी सांस्कृतिक संस्थानों में से एक बना हुआ है। यह ऐसी कला के निर्माण को प्रोत्साहन देता है जिसकी जड़ें हमारे लोगों के अनुभवों में हो और ऐसा करके यह उस विश्वास को ज़िंदा रखे हुए है कि संस्कृति राजनीतिक संघर्ष से अलग नहीं है बल्कि इसका एक अनिवार्य स्वरूप है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस समय जब यूएस ने घेरेबंदी, प्रतिबंधों और दुनिया से काट देने की नीति के ज़रिए क्यूबा को बर्बाद करने के प्रयास तेज़ कर दिए हैं, ऐसे में क्यूबा की क्रांति की लौ को जलाए रखने के लिए ज़रूरी है कि जन संगठनों की ओर से इसके साथ एकजुटता दिखाई जाए। ऐसा करने से मौजूदा और आने वाली नस्लें भी इस संघर्ष को जारी रखेंगी। जैसा कि </span><span style="font-weight: 400;">बेनेदेत्ती अपनी एक कविता में सवाल करते हैं ‘हम किस लिए गाते हैं?’</span></p>
<table class="single-post--content--poem-translation">
<tbody>
<tr>
<td><em>Cantamos porque llueve sobre el surco<br>
</em><em>Y somos militantes de la vida<br>
</em><em>Y porque no podemos ni queremos<br>
</em><em>Dejar que la canción se haga ceniza</em></td>
<td><span style="font-weight: 400;">हम गाते हैं ताकि खेत में पड़ती रहे बारिश</span><br>
<span style="font-weight: 400;">और ज़िंदगी के लिए लड़ने वाले हम</span><br>
<span style="font-weight: 400;">न चाहते हैं और न होने देंगे</span><br>
<span style="font-weight: 400;">कि गीत राख़ हो जाएँ</span></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><span style="font-weight: 400;">स्नेह सहित,</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मिगेल योशिदा</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान</span><span style="font-weight: 400;"> में कला और संस्कृति विभाग और नुएस्ट्रा अमेरिका कार्यालय के सदस्य; एक्सप्रेसाओ पोपुलर, ब्राजील में संपादक।</span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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