सोवेटो पचास बरस बाद: जो दस्तावेज़ों में न मिले वह संघर्ष भुला दिया जाता है

यह कला बुलेटिन अब्दुल्ला इब्राहिम (1934-2026) को समर्पित है। वे दक्षिण अफ़्रीका के मशहूर जैज़ संगीतकार और नस्लभेद विरोधी कार्यकर्ता थे जिनका इसी महीने देहांत हो गया। जीते जी उन्होंने सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के साधनों, ख़ासतौर से पीआनो, को राजनीतिक प्रतिरोध के सशक्त हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। यही प्रतिरोध उनके गीत ‘सोवेटो’ में भी साफ़ झलकता है।

दक्षिण अफ़्रीका के शहर सोवेटो के ऑर्लैंडो वेस्ट इलाक़े में दो सड़कों, मोइमा और विलाकाज़ी, के कोने पर खड़े होकर देखें। बारह बरस के हेक्टर पीटरसन को 16 जून 1976, यानी आधी सदी पहले इसी महीने में, सुबह के साढ़े नौ बजे गोली मार दी गई थी। इसी जगह के क़रीब फ़ोटोग्राफ़र मसाना सैम्यूअल ‘सैम’ नज़ीमा ने अपने पेनटैक्स एस एल कैमरे और एक 50 मिमि लेंस से छह तस्वीरें ली थीं; इनमें से तीसरी तस्वीर दुनियाभर में देखी गई: अठारह साल के मबुइसा मखुबो हेक्टर के शरीर को उठाए भाग रहे थे, उनकी बहन एंटोनेट सिथोले उनके साथ भाग रही थी। उनके नीचे बिछी डामर की सड़क पर एक गहरी परछाईं पड़ रही थी। ये परछाईं कुछ बातों की गवाही दे थी – तस्वीर सुबह के वक़्त ली गई थी, सोवेटो रोड का वह ख़ास हिस्सा जहाँ यह घटना घटी और वह घड़ी जब रंगभेदी राज्यतंत्र ने एक स्कूली छात्र को गोली मारी।

16 जून 1976 को हेक्टर पीटरसन को मबुइसा मखुबो द्वारा उठाकर ले जाते हुए। साभार: सैम नज़ीमा

यह तस्वीर एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक बन गई। 80 के दशक में अंतर्राष्ट्रीय रंगभेद-विरोधी आंदोलनों ने इसे अनगिनत बार पोस्टरों और टीशर्टों पर छापा, जिनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के लोगों के साथ एकजुटता संगठन (OSPAAAL) और लंदन में रंगभेद-विरोधी आंदोलन (AAM) से लेकर बोत्सवाना के गैबोरोन में मेडू कला समूह (Medu Art Ensemble) आदि शामिल थे। इन सभी समूहों ने मिलकर रंगभेदी शासन की क्रूरता को दुनिया के सामने रखा और उसे हराने के लिए एक वैश्विक आंदोलन खड़ा करने में सहायता की। लेकिन यह बुलेटिन इस एक तस्वीर के बारे में नहीं है बल्कि फ़ोटोग्राफ़रों की उस पूरी पीढ़ी के बारे में है जिन्होंने नस्लभेद को अपनी तस्वीरों में क़ैद किया, उसमें निहित अंधकार को उजागर किया और उस मुक्ति संघर्ष को इतिहास के पन्नों के लिए दर्ज किया जो इस बर्बर शासन के ख़िलाफ़ लड़ा गया।

सोवेटो विद्रोह को तस्वीरों में उतारना

16 जून 1976 को 3,000 से 10,000 के बीच स्कूली छात्रों ने ग्यारह क़तारों में ऑर्लैंडो स्टेडियम की ओर मार्च निकाला। उनकी तात्कालिक शिकायत थी कि अफ़्रीकन स्कूलों में बिना सलाह-मशवरा किए शिक्षा का माध्यम अफ्रीकान्स बना दिया गया था। इसके अलावा उनकी व्यापक शिकायत बंटू शिक्षा के विरुद्ध थी – या, जैसा कि इसे दो दशक लगाकर तैयार करने वाले प्रधानमंत्री हेंड्रिक फर्वूर्ड कहते थे, एक ‘अलग और निम्न’ व्यवस्था, जिसे ब्लैक बच्चों को यह समझाने के लिए डिज़ाइन किया गया था कि उनके श्रम के अलावा उनके लिए कोई स्थान नहीं है। सोवेटो स्टूडेंट्स रिप्रेज़ेंटटिव काउन्सिल ने नेलेडी हाई स्कूल से 13 जून को मार्च निकालने का फ़ैसला किया। इस काउन्सिल का नेतृत्व कर रहे थे उन्नीस वर्षीय टेबोहो ‘त्सीत्सी’ माशिनिनी, उन्नीस वर्षीय मर्फ़ी मोरोबे और सोलह वर्षीय सेथ मज़ीबुको।

सुबह साढ़े नौ बजे पहली बार गोलियाँ चलाई गईं। पंद्रह साल लेस्ली ‘हेस्टिंग्स’ एनडलोवु मारे जाने वाले पहले छात्र थे; हेक्टर पीटरसन दूसरे। दिन ढलते-ढलते, सोवेटो में कम-से-कम तेईस छात्र मारे गए थे, इनमें से ज़्यादातर बच्चे थे। साल ख़त्म होते-होते, पूरे देश में 700 से ज़्यादा छात्रों की हत्या कर दी गई थी।

घुटनों के बल बैठकर लिखते छात्र, 60 का दशक, साभार: अर्नेस्ट कोल

इन छात्रों को फ़ोटोग्राफ़रों का साथ रहा। सैम नज़ीमा द वर्ल्ड  के लिए काम करते थे, यह उस समय देश का प्रमुख ब्लैक अख़बार था; पीटर माग़ुबाने रैंड डेली मेल के लिए तस्वीरें खींचते थे; और ऐल्फ़ कुमालो संडे टाइम्ज़ के लिए काम करते थे। इन्होंने तस्वीरें खींची। मार खाई। कुछ गिरफ़्तार भी हुए। लेकिन तमाम जोखिमों के बावजूद इन फ़ोटोग्राफ़रों ने हर संभव तरीक़े से नेगेटिव पहुँचाने का काम किया।

कुमालो सोवेटो में रहते थे और उन्होंने लगभग आधी सदी तक इस शहर को तस्वीरों में दर्ज किया। जिस रंगभेदी शासन को वे अपनी तस्वीरों के ज़रिए उजागर कर रहे थे उसने उन्हें प्रताड़ित किया। वे याद करते हैं ‘मुझे गिरफ़्तार किया गया, मारा गया। उन्होंने मेरा सिर फोड़ दिया’।

ये तस्वीरें सिर्फ़ सोवेटो में उस दिन हुई बर्बरता की गवाह भर नहीं हैं। क्रिस हानी बारागवानाथ अस्पताल में डॉक्टर मैल्कम क्लाइन ने पाया कि कुछ घायलों के ‘घाव अजीब’ थे: उनके शरीर के ऊपरी हिस्सों में गोली घुसने के छोटे छेद और निचले हिस्से से निकलने के बड़े छेद’ मिले। डॉक्टरों को बाद में समझ आया कि पुलिस हेलिकॉप्टरों से गोलियाँ चला रही थी। पुलिस ने गोलियों से घायल दाखिल हर मरीज़ के नाम की लिस्ट माँगी ताकि उन पर ‘दंगों’ के लिए कार्रवाई की जा सके, लेकिन डॉक्टरों और दाखिल करने वाले क्लर्कों ने मना कर दिया। बल्कि दाख़िले की वजह उन्होंने ‘फोड़े’ लिखा। क्लाइन ने कहा ‘ऐसा करके हमने अनगिनत मरीज़ों को दोबारा पुलिस की बर्बरता का सामना करने से बचाया’।

कैमरा मेरी बंदूक़ था

उस सुबह के बाद भी कैमरे चलते रहे, दशकों तक, तस्वीरें उन घटनाओं की दस्तावेज़ हो गईं तथा राजनीतिक शिक्षा, साझी स्मृति और प्रतिरोध का हिस्सा हो गईं। पीटर मगुबाने याद करते हैं कि सोवेटो में उस सुबह अपनी तस्वीर उतारे जाने के लिए मना करने वाले युवा प्रदर्शनकारियों से उन्होंने कहा था ‘जो संघर्ष दर्ज न किया जाए वह संघर्ष ही नहीं’। मगुबाने ने ख़ुद 1969 में अपनी तस्वीरों के लिए 586 दिन एकांत कारावास में बिताए, वे अमूमन बाइबल को खोखला करके उसमें कैमरा छिपा लिया करते थे।

ज़्वेलित्शा, किंग विलियम्स टाउन (अब क़ोंसे), पूर्वी केप, 1978 में अंतिम संस्कार जुलूस। साभार: पीटर मगुबाने

सोवेटो: द फ़्रूट ऑफ़ फ़ियर (1986) में छपी मुगबाने की तस्वीरों को देखें: मातम करने वालों से भरी एक बस, खिड़कियों से निकलती उनकी बुलंद मुट्ठियाँ, बस की छत पर बैठे और लोग; उनके पीछे गाड़ियों का एक क़ाफ़िला, उनके पीछे फैली पहाड़ियाँ। यह साल था 1978; जगह पूर्वी केप, स्टीव बीको का इलाक़ा। स्टीव उस ब्लैक कॉन्‌शस्‌नेस्‌ मूवमेंट [ब्लैक चेतना आंदोलन] के सह-संस्थापक थे जिसने सोवेटो विद्रोह को प्रेरित किया। बीको की सितंबर 1977 में पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गई थी। यहाँ, मुगबाने ने रंगभेदी शासन के दौर में राजनीतिक प्रतिरोध के एक नए स्वरूप को दर्ज किया, जब सभाओं और जुलूसों पर प्रतिबंध लग गए तो अंतिम यात्राओं ने उनकी जगह ले ली। इसी तरह कैमरे ने भी एक नई भूमिका ले ली। जैसा कि मगुबाने ने कहा ‘मैं अपनी बंदूक़ लेके चल सकता था; कैमरा ही मेरी बंदूक़ था। मैं इस बंदूक़ से रंगभेद को मार सकता था’।

एक और तस्वीर देखें, यह अर्नेस्ट कोल ने ली थी। ब्लैक पुरुषों की एक क़तार, वे निर्वस्त्र थे और एक दीवार की ओर मुँह करके खड़े थे, उनके हाथ ऊपर थे और रंगभेदी प्रवासी मज़दूर प्रणाली के तहत खदानों में काम करने के लिए उनकी चिकित्सा जाँच की जा रही थी। लोगों को अलग-अलग श्रेणियों में रखने वाली व्यवस्था ने कोल के साथ भी ऐसा ही किया: अपने नेगेटिवों के साथ दक्षिण अफ़्रीका से बाहर जाने के लिए उन्हें एक पासपोर्ट की ज़रूरत थी, जिसके लिए उन्हें ख़ुद को फिर से ब्लैक से ‘कलर्ड’ [मिश्रित जाति] की श्रेणी में डलवाना पड़ा, यहाँ तक कि अपने नाम की वर्तनी ‘Kole’ से बदलकर ‘Cole’ करनी पड़ी ताकि यह अधिक इंग्लिश लगे। वे जिन तस्वीरों के नेगेटिव देश से बाहर ले जा पाए, वे 1967 में यूनाइटिड स्टेट्स में एक क़िताब के रूप में छपीं। क़िताब का नाम था हाउस ऑफ़ बॉन्डेज़  [ज़ंजीरों का घर], इसमें खदानकर्मियों वाली तस्वीर भी थी। इस क़िताब को दक्षिण अफ़्रीका में बैन कर दिया गया। दक्षिण अफ़्रीका एम्बसी ने कोल का पासपोर्ट रिन्यू करने से मना कर दिया जिस वजह से उन्हें सालों तक सड़कों पर रहना पड़ा। 1990 में दक्षिण अफ़्रीका के महानतम फ़ोटोग्राफ़रों में से एक ने न्यूयॉर्क में देशहीन व्यक्ति के रूप में दम तोड़ा। उनकी अस्थियाँ बाद में दक्षिण अफ़्रीका लाई गईं और मामेलोदी में दफ़नाई गईं।

रात में सफ़ाईकर्मी बोर्डरूम का टेबल साफ़ करते हुए, जोहंनेसबेरग, 1984। साभार: लेस्ली लॉसन

लेस्ली लॉसन की ली हुई एक तस्वीर है वर्किंग विमन (1985) [कामकाजी महिलाएँ]। लॉसन ने 80 के दशक के शुरुआती दौर में दक्षिण अफ़्रीका में काम करती हुई ब्लैक महिलाओं की तस्वीरें लीं, इनमें शहर के बाहरी श्वेत इलाक़ों के रसोईघरों में घरेलू कामगार महिलाएँ और फ़ैक्टरियों में उत्पादन लाइनों में काम कर रही मज़दूरों से लेकर श्वेत मालिकों के खेतों में काम करने वाली खेत मज़दूरों तक सब शामिल थीं। इस क़िताब में लेस्ली की तस्वीरों के साथ इन महिलाओं के अपने शब्द भी छपे जिनमें उन्होंने काम के घंटों, वेतन और काम पर जाने के सफ़र के बारे में बात की। ऐसा करके लेस्ली ने महिलाओं के उस श्रम को तस्वीरों में दर्ज किया जो रंगभेदी शासन की अर्थव्यवस्था को चलाता था। लेकिन यह श्रम उस दशक के प्रतिमा विज्ञान (आइकनोग्राफी) से लगभग ग़ायब था। लॉसन ने दक्षिण अफ्रीकी उच्च शिक्षा समिति (SACHED) के साथ काम किया, जो मज़दूरों का शिक्षा ट्रस्ट था, और “वर्किंग विमन” न केवल मज़दूरों के अध्ययन समूहों (स्टडी ग्रूप) के लिए एक शिक्षण टूल के रूप में काम आई बल्कि एक दस्तावेज़ी अभिलेख के रूप में भी।

संतु मोफोकेंग की 1986 की फोटोग्राफी शृंखला, ट्रेन चर्च को देखें। एक तस्वीर भोर में सोवेतो-जोहान्सबर्ग कम्यूटर लाइन के एक डिब्बे को कैद करती है: मज़दूर हाथ उठाए, गीत गा रहे हैं, जबकि एक व्यक्ति ट्रेन की भीतरी दीवार को हाथ से ड्रम की तरह बजा रहा है। कम्यूटर लाइन रंगभेदी अर्थव्यवस्था की दैनिक प्रणाली का हिस्सा थी, जो ब्लैक मज़दूरों को भोर से पहले और अंधेरे के बाद श्वेत शहर से ले जाती और लाती थी। यह एक चर्च में बदल गई थी, जहाँ अधिकतर मध्यम आयु वर्ग की महिलाएँ काम के कपड़ों में गाती थीं, प्रचार करती थीं और सांत्वना पाती थीं। यह “एक दैनिक अनुष्ठान” था, जैसा कि मोफोकेंग ने इसे कहा। रंगभेदी अर्थव्यवस्था के अमानवीय तर्कों के बावजूद, ब्लैक मज़दूर लगातार उस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन का सक्रिय निर्माण कर रहे थे, जो व्यवस्था उन्हें हासिल नहीं करने देती थी। मोफोकेंग ने कहा कि उनकी अपनी प्रतिबद्धता “सामान्य ब्लैक दक्षिण अफ़्रीकियों को जीवन के दैनिक काम-काज में व्यस्त” तस्वीरों में क़ैद करने की थी – जो अस्तित्व बनाए रखने और सामूहिक जीवन में छिपा प्रतिरोध का एक स्वरूप था।

पूजा करते हाथ, ट्रेन चर्च शृंखला से जोहान्सबर्ग-सोवेटो लाइन, 1986। साभार: संतु मोफोकेंग

इनमें से कोई भी तस्वीर अकेले सफल नहीं होती; सब ही इस सामूहिक जीवन में रची-बसी थीं और कई तो राजनीतिक संगठन में काम आईं। ओमर बादशाह का जन्म 1945 में डरबन के भारतीय समाज में हुआ। फ़ोटोग्राफ़र बनने से पहले वे मज़दूर संगठन कार्यकर्ता थे, और केमिकल वर्कर्स इंडस्ट्रीयल यूनीयन के पहले महासचिव थे। उन्होंने 1975 में अपना पहला कैमरा ख़रीदा ताकि फ़ैक्टरी के हालात की तस्वीरें ले सकें और मज़दूरों को जागरूक कर सकें। 1981 में बादशाह ने एफ़्रापिक्स नाम के कलेक्टिव के गठन में मदद की। यह लगभग चालीस महिला और पुरुष फ़ोटोग्राफ़रों का समूह था जो जोहान्सबर्ग में दक्षिण अफ़्रीका के चर्चों की काउन्सिल के खोत्सो हाउस से काम करता था, इसके डार्करूम (वे अंधेरे कमरे जहाँ नेगेटिव से तस्वीरें तैयार की जाती हैं) डरबन और केप टाउन में थे। खोत्सो हाउस पर छापा मारा गया था और 1986 में इस पर बमबारी भी की गई।

इन तमाम तस्वीरों और राजनीतिक कार्यों को एक कड़ी जोड़ती थी ब्लैक चेतना, एक आंदोलन और वे विचार जिन्हें स्टीव बीको ने सबसे पहले सुसंगत रूप से पेश किया था। दक्षिण अफ्रीकी छात्र संगठन के 1973 के नीति घोषणापत्र में, बीको ने लिखा कि ब्लैक चेतना आंदोलन “ब्लैक समुदाय को उनके स्वयं में, उनके प्रयासों, उनके मूल्य-तंत्रों, उनकी संस्कृति, उनके धर्म और उनके जीवन-दृष्टिकोण के प्रति एक नए स्वाभिमान से भरना चाहता है”। बीको द्वारा परिभाषित ‘ब्लैक व्यक्ति’ एक राजनीतिक श्रेणी थी, जिसमें वे सभी आते थे जिन्हें रंगभेदी राज्य ने अपनी गैर-श्वेत श्रेणियों में रखा था – खानों और टाउनशिप के अफ्रीकी मज़दूर, केप की फैक्ट्रियों और बंदरगाहों के कलर्ड मज़दूर, भारतीय और चीनी बंधुआ मज़दूरों के वंशज, जिन्हें ब्रिटेन ने गन्ना काटने या सोने की खानों में काम करने के लिए भेजा था। उन्होंने इन सभी को उस बहुमत के रूप में रखा जो श्वेत पूँजी से उनके संबंध द्वारा परिभाषित था। इसी कारण, बीको ने जोर देकर कहा, “ब्लैक समुदाय के विभिन्न वर्गों के बीच ब्लैक एकजुटता के महत्व को कम नहीं आँका जाना चाहिए”। रंगभेद-विरोधी आंदोलन की तस्वीरें भी पूरे औपनिवेशिक दृश्य और नस्लीय व्यवस्था को साफ़-साफ़ पेश करने और उसे ध्वस्त करने के लिए एकजुटता बनाने से जुड़ी थी।

बर्बरता को छिपाने की कोशिश

आज पचास साल बाद और रंगभेद के कानूनी अंत के तीन दशक से भी अधिक समय बाद, नस्ली-पूँजीवादी व्यवस्था अभी भी बनी हुई है। हेक्टर पीटरसन की तस्वीर और सोवेतो में 16 जून की वार्षिक स्मृति दक्षिण अफ्रीका, पूरे महाद्वीप और पूरे प्रवासी समुदाय में नई पीढ़ियों को मुक्ति के अधूरे काम के लिए उनके अपने संघर्षों में प्रेरित करती रहती है।

डीप्स्लूट, जोहान्सबर्ग में युवा, रात के आकाश के विरुद्ध छायाचित्र, 1970 के दशक। साभार: एल्फ कुमालो

यह संघर्ष केवल दक्षिण अफ़्रीका तक सीमित नहीं है। अक्टूबर 2023 में अमेरिका-समर्थित इज़राइली जनसंहार शुरू होने के बाद से, दो सौ से अधिक फ़िलिस्तीनी पत्रकार – जिनमें फोटोग्राफ़र भी शामिल हैं – मारे गए हैं। जिन लोगों ने दुनिया को ग़ज़ा को देखते रहने के लिए मजबूर किया है, उनमें बिसान ओव्दा शामिल हैं, जिनके ग़ज़ा से रोज़ आने वाल सोशल मीडिया वीडियो करोड़ों लोगों तक पहुँचे हैं। इसी तरह वाएल दहदूह, अल जज़ीरा के ब्यूरो प्रमुख,  ने जनवरी 2024 में अपने बेटे, कैमरामैन हमज़ा दहदूह, को दफनाने के बाद भी रिपोर्टिंग जारी रखी। उनके साथ असंख्य फ़िलिस्तीनी फोटोग्राफ़र, पत्रकार और आम लोग हैं, जो अपनी दुनिया की बर्बादी को देख भी रहे हैं और उसका लेखा-जोखा भी बना रहे हैं। ट्राईकॉन्टिनेंटल की डोसियर, Despite Everything: Cultural Resistance for a Free Palestine, नक़बा के बाद से प्रतिरोध का दस्तावेज़ीकरण करने वाले फ़िलिस्तीनी सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की लंबी यात्रा का पता लगाती है, और इस बात पर जोर देती है कि दस्तावेजीकरण के बिना कोई संघर्ष नहीं है।

जैसा कि मिरियम मेकबा ‘सोवेतो ब्लूज़‘ में गाती हैं, राज्य ने उस जनसंहार को “शहर के बीच थोड़ी-सी बर्बरता” बनाकर कमतर आँकने की कोशिश की। पचास साल बाद, तस्वीरें, गीत, गवाहियाँ और संघर्ष के अभिलेख उस मिटाने की कोशिश को विफल कर रहे हैं।

बच्चों को मालिक का एक ख़त मिला
उसमें लिखा था: खोसा, सोथो, ज़ुलु अब और नहीं
बच्चों ने फ़रमान अस्वीकार किया, उन्होंने जवाब भेजा
तब पुलिसवाले उतरे बचाव में
बच्चे हवा में उछाले जा रहे थे, गोलियाँ, वो मर रहे थे
माएँ चिल्ला रही थीं, रो रही थीं
पिता शहरों में काम कर रहे थे
शाम के अख़बार ने कहा:
बस ज़रा-सी बर्बरता, शहर के बीचोंबीच

एकजुटता में,

टिंग्स चक 

कला निर्देशक, ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान

क्रांति सिर्फ़ संस्कृति और विचारों से ही जन्म लेती है

‘पोर क्यू कैंटामोस / कैनसियोन नुएवा’ (हम क्यों गाते हैं / नया गीत) सुनिए, जो ‘ए डोस वोसेस’ (दो आवाज़ों में) से लिया गया है। यह मारियो बेनेदेत्ती और डैनियल विग्लियेट्टी के बीच एक सहयोग है, जिसमें बेनेदेत्ती द्वारा ‘पोर क्यू कैंटामोस’ का पाठ और विग्लियेटी का गीत ‘कैनसियोन नुएवा’ एक साथ प्रस्तुत किए गए हैं।

लैटिन अमेरिका में जनता के आंदोलनों की राह और उनकी संस्कृति का विकास हमेशा से आपस में घुले-मिले रहे हैं। पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में स्पैनिश और पुर्तगाली उपनिवेशवाद से लेकर उन्नीसवीं सदी के स्वतंत्रता आंदोलनों और 1823 के मोनरो सिद्धांत के दौर तक लैटिन अमेरिका के लोगों ने वर्चस्व के हर रूप का विरोध किया है। क्यूबा की आज़ादी के संघर्ष के प्रमुख नेता जोस मार्टी ने 1891 में इस महाद्वीप की राजनीतिक और सांस्कृतिक एकता के बारे में नुएस्ट्रा अमेरिका (हमारा अमेरिका) नाम से एक निबंध लिखा। यह लैटिन अमेरिकी जनता के प्रतिरोध की सबसे सशक्त अभिव्यक्तियों में से एक है।

मार्टी के लिए नुएस्ट्रा अमेरिका सिर्फ़ उस विशाल भौगोलिक क्षेत्र का नाम नहीं था जो रीओ ग्रांडे से लेकर मैगलन जलडमरूमध्य’ तक फैला हुआ है, बल्कि यह इस महाद्वीप के इतिहासों, संस्कृतियों और संघर्षों में रचा-बस एक सांस्कृतिक प्रोजेक्ट है। यह मार्टी के चिंतन की साम्राज्यवाद-विरोधी ताकत थी: लैटिन अमेरिका ख़ुद को जानकर ही ख़ुद को मुक्त कर सकता था, उन स्वदेशी, अफ्रीकी, किसान और लोकप्रिय जड़ों को पहचानकर जिनका उपनिवेशवाद और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने तिरस्कार किया था।

जैसा कि मार्टी ने नुएस्ट्रा अमेरिका में लिखा: ‘एक समस्या के सभी पहलुओं को जान लेने के बाद उन्हें हल करना, उन्हें बिना जाने हल करने से आसान होता है।… समझ तैयार करना ही समस्या को हल करना है। और इस समझ के साथ किसी देश को जानना और उस पर शासन करना ही निरंकुशता से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय है’। लैटिन अमेरिका के पूरे इतिहास में इस स्व-ज्ञान को पुनरुत्पादित करने का एक प्रमुख साधन यहाँ का साहित्य रहा है। कविताओं, उपन्यासों, निबंधों और गीतों के ज़रिए इस महाद्वीप के लोगों ने अपने यथार्थ को प्रस्तुत किया है। यह प्रस्तुति अमूर्त नहीं बल्कि उनके भोगे गए अनुभव हैं।

लेखक ट्रक द्वारा मिनास दे फ्रियो, क्यूबा की यात्रा करते हुए, तिथि अज्ञात। स्रोत: रेविस्ता कासा दे लास अमेरिकास।

बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में लैटिन अमेरिका में गहन राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन हुए। 1959 में क्यूबा की क्रांति ने इस टापू देश को यूनाइटिड स्टेट्स (यूएस) की अधीनता से निकाला और एक ऐसे समाजवादी परिवर्तन की प्रक्रिया की शुरुआत की जो आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन का पुनर्निर्माण करना चाहती थी। इसने इस क्षेत्र की अन्य संघर्षरत जनता को उम्मीद दी। इसके जवाब में यूएस ने अपना साम्राज्यवादी हमला और तीखा कर दिया: नुएस्ट्रा अमेरिका में 1961 में यूएस ने क्यूबा के ख़िलाफ़ बे ऑफ़ पिग्स असफल आक्रमण में सहयोग दिया, 1964 ब्राज़ील में सैन्य तख़्तापलट की कोशिश का समर्थन किया, 1973 से पहले चिली में साल्वाडोर अलेंदे की सरकार को अस्थिर करने की कोशिशें कीं, और 1970 के दशक में पूरे महाद्वीप में तानाशाहों के पक्ष में और विद्रोहों को दबाने के लिए आक्रामक कार्यक्रमों को समर्थन दिया।

इस पृष्ठभूमि में, साहित्य प्रतिरोध में अपनी अहम भूमिका निभाता रहा, ख़ासतौर से 1960 और 1970 के दशक में लैटिन अमेरिका में बेहद तेज़ी से बढ़ती साक्षरता के दौरान। इस दौर में कई लेखकों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। इस दौर में कला और राजनीति के अंतरसंबंध पर हमेशा से चली आ रही बहस एक बार फिर उभरी। लैटिन अमेरिका के इस दौर में इस बहस के केंद्र में थी क्यूबा की क्रांति और इसकी सांस्कृतिक नीति।

क्रांति के पहले साल में नई सरकार ने कई सांस्कृतिक संस्थानों की स्थापना की, इनमें शामिल थे नेशनल थिएटर, क्यूबन इंस्टिट्यूट ऑफ़ सिनेमैटोग्राफ़िक आर्ट एंड इंडस्ट्री (आईसीएआईसी), और कासा दे लास अमेरिकास। हायदी संतामारिया के नेतृत्व में कासा दे लास अमेरिकास लैटिन अमेरिका में संस्कृति, कला और साहित्य के बारे में विचार का एक अनिवार्य केंद्र बना। उरुग्वे के लेखक मारियो बेनेदेत्ती (1920-2009) ने कासा के राजनीतिक और सांस्कृतिक काम में बहुत अहम भूमिका निभाई। उन्होंने पूरे लैटिन अमेरिका में साहित्य को प्रतिरोध के क्षेत्र के रूप में स्थापित करने में मदद की। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के अन्य कई लैटिन अमेरिकी लेखकों की ही तरह मारियो का साहित्यिक और राजनीतिक विकास भी कासा दे लास अमेरिकास से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था।

कासा की पत्रिका रेविस्ता कासा दे लास अमेरिकास पहली बार 1960 में छपी। इसने लैटिन अमेरिकी और कैरिबियाई संस्कृति के मुक्ति से जुड़े पहलू को फैलाने और विकसित करने में केंद्रीय भूमिका अदा की। ऐसा करके इसने एक नए समाज के निर्माण में अपना योगदान दिया।

इन संस्थानों के गठन के साथ-साथ, 1961 में फ़िदेल कास्त्रो ने अपने भाषण पलाब्रास ए लॉस इंटेलेक्चुअल्स (बुद्धिजीवियों के लिए कुछ शब्द) में क्रांति की सांस्कृतिक नीति की आधारशीला की रूपरेखा पेश की। कोनराडो बेनीतेज़ ब्रिगेड जैसे कार्यक्रम क्यूबा के साक्षरता अभियान के केंद्र में थे, और इसके साथ ही क्लासिकल साहित्यिक रचनाओं की लाखों प्रतियों का मुफ़्त वितरण संस्कृति को लोगों के एक अधिकार के तौर पर स्थापित करने की व्यापक कोशिश का अहम अंग बना। ग़ौरतलब है कि क्रांति की प्रक्रिया में जो पहली किताब छापी और बाँटी गई वह थी मिगुएल दे सर्वेंट्स की डॉन क्विक्सोट

लेकिन इसके साथ क्यूबा के ख़िलाफ़ यूएस का साम्राज्यवादी हमला भी सांस्कृतिक क्षेत्र तक फैल गया। कासा दे लास अमेरिकास के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए सीआईए के पैसे से चलने वाली कांग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ़्रीडम ने 1966 में पेरिस से मुंडो नुएवो (नई दुनिया) नाम की पत्रिका निकाली। इस पत्रिका के निदेशक थे उरुग्वेयाई आलोचक एमीर रोद्रिगेज़ मोनेगाल। इस पत्रिका ने ख़ुद को एक स्वतंत्र साहित्यिक पत्रिका के रूप में पेश करते हुए लैटिन अमेरिका में तेज़ी से उभर रहे लेखकों को क्यूबाई क्रांतिकारी प्रोजेक्ट से हटाकर उदार कम्युनिज़म-विरोधी ख़ेमे में ला दिया।

जैसे-जैसे पूरे महाद्वीप में क्रांति और प्रति-क्रांति के बीच टकराव हुए, वैसे-वैसे लेखकों ने क्यूबा में समाजवाद के निर्माण और शीतयुद्ध के दौरान यूएस द्वारा किए गए सांस्कृतिक हमले, दोनों पर अलग-अलग राय देनी शुरू कर दी। लैटिन अमेरिका में लेखन में आए ज़बरदस्त उत्थान के दौर के प्रमुख लेखक, जैसे जूलियो कोर्टाज़ार, मारियो वर्गास ल्योसा, गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ और कार्लोस फुएंतेस, इस बहस में ख़ास और कभीकभार अंतर्विरोधी तौर पर शामिल हुए। इससे यह उजागर हुआ कि साहित्य और कला अपने दौर के व्यापक राजनीतिक संघर्षों से अछूते नहीं रह सकते।

इसी संदर्भ में वर्ग संघर्ष में बेनेदेत्ती द्वारा प्रतिपादित लेखक की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। हवाना में कल्चरल कांग्रेस के बाद 1968 में क्यूबा  पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में बेनेदेत्ती ने यह राय पेश की:

अगर हर क्रांतिकारी का यह फ़र्ज़ है कि क्रांति लाने के लिए काम किया जाए, तो उसी तरह हर लेखक का फ़र्ज़ है साहित्य रचना … साहित्य, अन्य कार्यों के साथ-साथ, इंसान के वैचारिक पटल का विस्तार करता है। लोग महान साहित्य के अर्थों – अंतिम या फ़ौरी – को जहाँ तक समझ पाते हैं, वे हमारे संघर्षों के क़रीब आते हैं। और अगर वे दुश्मन द्वारा उन पर थोपे गए अलगाव का विश्लेषण कर पाएँ तो यह क़रीबी और गहरी हो जाती है। इसलिए, हम जुझारू लेखकों पर कोई संकीर्ण थीम या सामान्य दृष्टिकोण थोपने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं करते।

इसलिए, साहित्य की संभावना लेखक की राजनीतिक राय से आगे जाती है, हालाँकि साम्राज्यवाद के तेज़ हमलों के दौर में, ये राय राजनीतिक प्रक्रियाओं को मज़बूत या कमज़ोर करने के लिए अहम हो जाती हैं। बेनेदेत्ती का कहना यह था कि साहित्य की क्रांतिकारी ताक़त किसी निर्देशित थीम, विधा या नारे तक सीमित नहीं की जा सकती। साहित्य लोगों के वैचारिक पटल को फैलाता है, अलगाव को पहचान पाने की उनकी क्षमता को धार देता है और उन्हें अपनी व्यवस्थित, कल्पनात्मक और भावनात्मक शक्ति के ज़रिए संघर्षों के नज़दीक लाता है।

संस्कृति विलासिता की वस्तु नहीं, एक अधिकार है

मारियो बेनेदेत्ती लैटिन अमेरिका के बीसवीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में से एक हैं। कविता, उपन्यास, कहानी और निबंध, सभी विधाओं में इन्होंने एक सीधी और बेहद मानवीय शैली का विकास किया जिसने उरुग्वे और बाक़ी लैटिन अमेरिका की सामाजिक और भावनात्मक पेचीदगियों को उजागर किया।

अपने साहित्यिक योगदान के अलावा बेनेदेत्ती ने लैटिन अमेरिकी वामपंथ की सांस्कृतिक और राजनीतिक ज़िंदगी में भी एक केंद्रीय भूमिका निभाई। कासा दे लास अमेरिकास के साथ उनके जुड़ाव ने – पहले इसके साहित्य पुरस्कार के लिए निर्णायक मंडल के सदस्य के रूप में और बाद में सेंटर फ़ॉर लिटरेरी रिसर्च (साहित्यिक अनुसंधान केंद्र) के संस्थापक और निदेशक के रूप में – एक ऐसी लैटिन अमेरिकी साहित्यिक संस्कृति के विकास में योगदान दिया, जो यूरोपीय साहित्यिक परंपराओं को स्वीकार करते हुए भी, नुएस्ट्रा अमेरिका के राजनीतिक, सौंदर्यात्मक और सांस्कृतिक महत्व पर ज़ोर देती थी। इस अनुभव ने लैटिन अमेरिकी पाठकों और क्रांतिकारी प्रक्रियाओं के साथ संवाद में साहित्यिक अभ्यास पर उनके चिंतन को गहरा किया, बिना साहित्य को कठोर नियमों या हठधर्मिता में सीमित किए। क्रांतिकारी प्रक्रियाओं में बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की भूमिका पर उनके विचार विशेष रूप से महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

1968 में कल्चरल कोंग्रेस ऑफ़ हवाना में बेनेदेत्ती ने बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं के बीच के तनाव के बारे में बात रखी। ऐसे समय में जब राजनीतिक संघर्षों का स्वरूप मुख्य रूप से हथियारबंद था, बुद्धिजीवियों और कलाकारों से अमूमन लड़ाई में सीधे शामिल होने की माँग की जाती थी। बेनेदेत्ती के लिए वैचारिक काम अपने आप में क्रांतिकारी प्रक्रिया का एक ज़रूरी हिस्सा था। उनका मत था कि बुद्धिजीवी ‘अपने मूल अर्थ में ही परंपरा-विरोधी होता है, अपने सामाजिक परिवेश का आलोचक होता है, और बेहतरीन याददाश्त वाला गवाह’।

उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि संस्कृति विलासिता की वस्तु नहीं बल्कि एक अधिकार है। ‘एक कलाकार जो अपने सपने देखने, सौंदर्य रचना, कल्पना के निर्माण के अधिकार की रक्षा उसी दृढ़ संकल्प और विश्वास से करता है जितना कि अपने भोजन, मकान और स्वास्थ्य के अधिकार की रक्षा करता है – सिर्फ़ वही कलाकार अपनी रचनाओं को किसी विलासिता की वस्तु की बजाय एक आवश्यकता के तौर पर पेश करने की क्षमता रखता है, सिर्फ़ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए भी।’

इस तरह बेनेदेत्ती के मुताबिक़ क्रांतिकारी संस्कृति को राजनीतिक संघर्ष से गौण नहीं माना जा सकता था। कला, साहित्य और कल्पना भी उस शक्ति का हिस्सा थे जिनसे लोगों के लिए अपनी परिस्थितियों की व्याख्या करना, अपनी गरिमा की रक्षा करना और नए समाज के लिए संघर्ष करना संभव हुआ।

पुरस्कार के निर्णायक मंडल में बेनेदेत्ती, हायदी संतामारिया और अलेहो कारपेंटियर के साथ, 1978। स्रोत: फुंडासियोन मारियो बेनेदेत्ती।

बेनेदेत्ती के साहित्य का सबसे बड़ा हिस्सा उनकी कविताएँ हैं। उनके पूरे साहित्य में उन्होंने कई विधाओं में लिखने का प्रयास किया, जिनमें हाइकू भी शामिल हैं, इनके ज़रिए उन्होंने साधारण जीवन की विविधता को चित्रित किया। उनकी कविता में, उनके अधिकांश लेखन की तरह, सबसे बढ़कर निकटता और एकजुटता की एक नीति दिखाई देती है, जैसा कि उनके एक हाइकु (हाइकै) में देखा जा सकता है:

la más cercana
de todas las fronteras
es con mi prójimo
सब सरहदों में से
सबसे नज़दीक है
मेरे पड़ोसी के साथ वाली सरहद

उनका गद्य भी उनके साहित्यिक योगदान का एक अहम हिस्सा है। नौ से अधिक संग्रहों में, उन्होंने स्मृति, उरुग्वे में तानाशाही के तहत जीवन, प्रेम, और दैनिक अस्तित्व की अंतरंग बनावट जैसे विषयों पर लिखा, जिससे व्यक्तिगत लगने वाले अनुभवों को राजनीतिक आधार मिला। ‘मोंतेविदियानोस’ (मोंतेविदियावासी), ‘जियोग्राफियास’ (भूगोल), और ‘बुजोन दे तिएम्पो’ (समय का मेलबॉक्स) जैसे उनके कहानी संग्रह, साथ ही उपन्यास ‘प्रिमावेरा कॉन उना एस्किना रोटा’ (टूटे शीशे में वसंत) यह दर्शाते हैं कि उनके लेखन में भावनात्मकता और राजनीति कैसे अविभाज्य हैं।

बेनेदेत्ती का जीवन और साहित्य संस्कृति और कला के साथ एक संघर्षशील (मिलिटेंट) जुड़ाव को दर्शाते हैं, जो क्रांतिकारी निर्माण के मूलभूत आयाम हैं। उनकी कविता और गद्य सूक्ष्म और गहन दोनों हैं, जो एक नए समाज में एक नए मनुष्य के निर्माण के विरोधाभासों को उजागर करते हैं।

हम किस लिए गाते हैं?

इक्कीसवीं सदी में वर्ग संघर्ष की गतिशीलता तीव्र बनी हुई है। पतनशील यूएस साम्राज्य फ़िलिस्तीन से लेकर वेनेजुएला और क्यूबा तक, वैश्विक दक्षिण के क्षेत्रों और लोगों के खिलाफ अपने हमले तेज़ कर रहा है, लेकिन इन क्षेत्रों के लोगों ने भी अपना प्रतिरोध जारी रखा हुआ है। ‘विचारों और भावनाओं की लड़ाई’, जैसा कि इसके बारे में फ़िदेल ने कहा था, बहुत तेज़ी से हमारे दौर के केंद्र में आ गई है।

एक लेखक और क्रांतिकारी दोनों रूपों में मारियो बेनेदेत्ती की विरासत यह समझने के लिए बेहद अहम है कि एक बुद्धिजीवी सिर्फ़ एक संस्कृतिकर्मी के रूप में ही काम नहीं कर सकता बल्कि क्रांतिकारी प्रक्रिया के भीतर एक संगठनकर्ता के तौर पर भी काम कर सकता है। कासा दे लास अमेरिकास अब भी नुएस्ट्रा अमेरिका में सबसे ज़रूरी सांस्कृतिक संस्थानों में से एक बना हुआ है। यह ऐसी कला के निर्माण को प्रोत्साहन देता है जिसकी जड़ें हमारे लोगों के अनुभवों में हो और ऐसा करके यह उस विश्वास को ज़िंदा रखे हुए है कि संस्कृति राजनीतिक संघर्ष से अलग नहीं है बल्कि इसका एक अनिवार्य स्वरूप है।

इस समय जब यूएस ने घेरेबंदी, प्रतिबंधों और दुनिया से काट देने की नीति के ज़रिए क्यूबा को बर्बाद करने के प्रयास तेज़ कर दिए हैं, ऐसे में क्यूबा की क्रांति की लौ को जलाए रखने के लिए ज़रूरी है कि जन संगठनों की ओर से इसके साथ एकजुटता दिखाई जाए। ऐसा करने से मौजूदा और आने वाली नस्लें भी इस संघर्ष को जारी रखेंगी। जैसा कि बेनेदेत्ती अपनी एक कविता में सवाल करते हैं ‘हम किस लिए गाते हैं?’

Cantamos porque llueve sobre el surco
Y somos militantes de la vida
Y porque no podemos ni queremos
Dejar que la canción se haga ceniza
हम गाते हैं ताकि खेत में पड़ती रहे बारिश
और ज़िंदगी के लिए लड़ने वाले हम
न चाहते हैं और न होने देंगे
कि गीत राख़ हो जाएँ

स्नेह सहित,

मिगेल योशिदा

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान में कला और संस्कृति विभाग और नुएस्ट्रा अमेरिका कार्यालय के सदस्य; एक्सप्रेसाओ पोपुलर, ब्राजील में संपादक।

भविष्य

इस दस्तावेज़ में जो कलाकृतियाँ हैं, वे कासा दे लास अमेरिकास के ‘आर्ते दे न्वेस्त्रा अमेरिका आयदेए सांतामारिया’ (आयदेए सांतामारिया हमारे अमेरिका की कला) संग्रह से ली गई हैं। सन् 1959 में क्यूबा की क्रांति के बाद जब कासा दे लास अमेरिकास की स्थापना हुई, तब से यह संस्था साम्राज्यवाद-विरोधी सांस्कृतिक अंतरराष्ट्रीयता का एक प्रमुख मंच बनी रही है, और इसने नामी कलाकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं से गहरे संबंध बनाए हैं। कासा की दीर्घाओं में मुख्यतः लातिन अमेरिकी और कैरिबियाई कलाकारों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी की रचनाओं की प्रदर्शनियाँ लगती रही हैं — अनेक विधाओं, विषयों और तकनीकों में। इनमें से कई कलाकृतियाँ पहले कासा की दीर्घाओं में प्रदर्शित हुईं, कुछ ने इसकी प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीते, और कुछ स्वयं कलाकारों ने भेंट में दीं। ये सब अब इस संग्रह का हिस्सा बन चुकी हैं, और मिलकर एक असाधारण कलात्मक विरासत रचती हैं।

होसे वेंचुरेली (चिली), सेरिग्राफ़ (प्रिंट), 1970, संस्करण 15/90, आकार: 260 x 430 मि.मी.

पिछले सौ महीनों से हर महीने ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की टीम ने किसी महत्त्वपूर्ण विषय का गहराई से अध्ययन करके एक डोसियर आपके सामने प्रस्तुत किया है। ये डोसियर साम्राज्यवाद के इतिहास और राष्ट्रीय मुक्ति से लेकर आर्थिक नीति, संप्रभुता, युद्ध और बदलती हुई वैश्विक व्यवस्था के विश्लेषण से जुड़े हुए रहे हैं और दुनिया की अनेक भाषाओं में छपे, जिनमें अंग्रेज़ी, हिंदी और पुर्तगाली से लेकर अरबी, थाई और स्पैनिश तक शामिल हैं।1 यह हमारा सौवाँ डोसियर है, इसलिए हमने अपने संस्थान की एक प्रमुख अवधारणा—‘भविष्य’—का ऐतिहासिक-भौतिकवादी विवेचन प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।

जब 2015 में हमारे संस्थान की नींव पड़ी तो हमारे सामने शोध के लिए तीन प्रमुख विषय थे:

  1. समकालीन पूँजीवाद और इसे आकार देने वाले वर्ग संघर्ष को और बेहतर रूप से समझना।
  2. हमने जिसे ख़ास क़िस्म के चरम दक्षिणपंथ का नाम दिया है उसे और अच्छी तरह समझना।2
  3. भविष्य – या आने वाले दौर को बेहतर तरह से समझना।

यह तीसरा विषय ऐतिहासिक प्रक्रिया की भौतिकतावादी समझ से निकला है जो वर्तमान को शाश्वत यथार्थ नहीं मानता बल्कि उसमें परिवर्तन की संभावना देखता है। दूसरे शब्दों में, वर्तमान को एक नए भविष्य में बदला जा सकता है। हम जिस पूँजीवादी व्यवस्था में रहते हैं वह शाश्वत नहीं: इसे वर्ग संघर्ष और उत्पादक शक्तियों के विकास के ज़रिए एक समाजवादी व्यवस्था में बदला जा सकता है।

यहाँ, हम पहली बार भविष्य का एक दार्शनिक और राजनीतिक आकलन पेश कर रहे हैं। राष्ट्र मुक्ति पर आधारित मार्क्सवाद से प्रेरणा लेते हुए हमारा मत है कि इस भविष्य को सिर्फ़, लक्ष्य के आधार पर, समाजवाद ही नहीं कहा जाना चाहिए, बल्कि ऐसे भविष्य की संवेदना के आधार पर, उम्मीद भी कहा जाना चाहिए।3

हमें पूरा भरोसा है कि आप इस डोसियर को पिछले निन्यानवे डोसियरों की ही तरह पढ़ेंगे और इसे दूसरों के साथ साझा करेंगे, रीडिंग सर्कलों तथा राजनीतिक अध्ययन की दूसरी जगहों पर इस पर बातचीत और बहस करेंगे। आपके सुझावों का हमेशा स्वागत है।


दुनिया की हर भाषा में ‘भविष्य’ के लिए एक शब्द है, आने वाले कल के लिए। उदाहरण के लिए, दुनिया की कुछ सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में इसके लिए निम्नलिखित शब्द हैं:

अंग्रेज़ी: फ़्यूचर (future), वह वक़्त जो अभी आया नहीं है।
मैंडरिन चाइनीज़: वेलाय (未来), जो अब तक आया नहीं।
हिंदी: भविष्य, जो होने वाला है।
स्पैनिश: फूटूरो (futuro), आने वाला वक़्त।
फ़्रेंच: ऐवेनीर (avenir), जो आने वाला है।
अरबी: मुस्तक़बिल (مستقبل), जिससे सामना होने वाला है।
बंगाली: भोबिश्योत (ভবিষ্যৎ), जो होने वाला है।
पुर्तगाली: फूटूरो (futuro), आने वाला समय।
रूसी: बुदुश्ची (будущее), जो होने वाला है।
उर्दू: मुस्तक़बिल (مستقبل), जिससे सामना होने वाला हो।

ये तमाम शब्द एक ही अर्थ पेश नहीं करते; परिवर्तन के प्रति इनका सांस्कृतिक दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। इनमें से कुछ खाली कैलेंडर के बारे में हैं, यह विचार कि कल भी है, जैसे आज है, जबकि अन्य उन मुलाकातों के बारे में हैं जो घटित होंगी और जिनका सामना करना होगा। यह ज़रूरी है कि आप जब इस तरह का एक दस्तावेज़ पढ़ रहे हैं – जो एक भाषा में लिखा गया और कई भाषाओं में जिसका अनुवाद हुआ है – तो इसमें भी ‘भविष्य’ शब्द अपने में अनेक ऐसे अर्थ समाहित किए हुए है जो एक भाषा से दूसरी भाषा के सफ़र में कुछ-कुछ पीछे छूट जाते हैं। हालाँकि ये शब्द अलग-अलग तरह से आने वाले वक़्त को दर्शाते हैं, लेकिन फिर भी पूँजीवादी सभ्यता में बोली जाने वाली हर भाषा में हम एक सवाल ज़रूर कर सकते हैं: क्या भविष्य सच में है या फिर हम उस सतत वर्तमान में ही रह रहे हैं जैसा कि पूँजीवादी यथार्थवाद हमें बताता है?4 क्या सच में ऐसा कोई आने वाला कल है जो आज से अलग हो सकता है?

हम जलवायु संकट और जलवायु नस्लभेद, निरंतर चल रहे युद्ध और अंतहीन जनसंहार, वित्तीय पूँजी की तानाशाही तथा सरकारी ख़र्च में कटौती को आम बात बना देने के इस दौर को जब समझने की कोशिश कर रहे हैं तो हमारे आंदोलनों के लिए ऊपर पूछे गए सवाल अहम हो जाते हैं।5 हमारी चेतना को दशकों से पूँजीवादी यथार्थवाद ने कोहरे से ढाँप रखा है जिसकी वजह से हम वैश्विक बर्बादी से आगे किसी और चीज़ की कल्पना ही नहीं कर पाए।

क्या कोई भविष्य है? बेशक, एक भविष्य है। हम उसके निर्माण के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और हम अब भी उसका निर्माण कर रहे हैं।


एमिलियो पेट्टोरूटी (अर्जेंटीना), पाजारो रोहो (लाल पक्षी), 1959, कैनवास पर तेलचित्र, 116 x 63 से.मी.

भाग 1: विघटन

सत्ता की भाषा में भविष्य को वर्तमान का सीधा और सामान्य आगे बढ़ना माना जाता है। इसे कैलेंडर, विकास के आंकड़ों और अनुमान से समझाया जाता है। इस सोच में भविष्य के लिए लड़ना नहीं पड़ता, बस उसका इंतज़ार करना होता है। वह अपने आप आ जाता है, जैसे बही-खाते का अगला पन्ना। भविष्य की यह सोच काफी रूढ़िवादी है। यह मान लेती है कि वर्तमान को परिभाषित करने वाली शोषण, श्रेणीबद्धता और प्रभुत्व की संरचनाओं को पलटने के बजाय उन्हें संशोधित कर लिया जाएगा। भविष्य का ऐसा दृष्टिकोण पूँजीवादी समाज के सभी प्रमुख संस्थानों — जैसे मीडिया, स्कूल, विश्वविद्यालय, थिंक-टैंक और चैरिटी फ़ाउन्डेशनों — द्वारा प्रचारित-प्रसारित किया जाता है, जो परिवर्तन के खोखले नारों तो देते हैं लेकिन वास्तव में इसी विचार का प्रचार करते हैं कि ‘पूँजीवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है’, जबकि वो हमारा दम घोंट रही है।

हमारे नज़रिए में भविष्य सिर्फ कैलेंडर की कोई तारीख नहीं है। वह एक टूटन है। वह मौजूदा व्यवस्था से एक अलगाव है — सामाजिक संबंधों, राजनीतिक सत्ता और इंसानी संभावनाओं में गहरे बदलाव का नाम है। इस तरह भविष्य की बात करना यूटोपिया नहीं है, बल्कि राजनीति के उस पक्ष को दोबारा हासिल करना है जिसे जानबूझकर दबाया गया है। यानी जिस दुनिया में हम रहते हैं उससे मूलतः भिन्न दुनिया की कल्पना करने और उसका निर्माण करने की क्षमता को पुख़्ता करना, जिसे बीसवीं और इक्कीसवीं सदी की समाजवादी और राष्ट्रीय मुक्ति परियोजनाओं ने बनाने का प्रयास किया था। वे प्रयास भले असमान रहे थे, लेकिन उनसे कुछ ठोस आकार बन रहा था। ऐसा दृष्टिकोण प्रबंधित निरंतरता (सुधारवाद) और अनियोजित विघटन (आपदावाद) दोनों विचारों को अस्वीकार करता है। शासक वर्ग झूठे भविष्यों के ख़्वाब बेचता है, जैसे उद्यमिता का मिथक, हरित पूँजीवाद, या सैन्यीकृत सुरक्षा, लेकिन ऐसी कोई योजना नहीं पेश करता जो मुक्तिकामी हो।

भविष्य के इस दृष्टिकोण का विकास मार्क्सवादी दार्शनिक अर्न्स्ट ब्लोख के ‘अभी-नहीं’ (Noch-Nicht) के विचार से हुआ है।6 मार्क्स के लेखों के आधार पर ब्लोख ने लिखा था कि भविष्य कोई अमूर्त चीज़ नहीं है जिसे कल पर टाल दिया जाए, बल्कि एक सक्रिय शक्ति है जो वर्तमान के भीतर समाई हुई है, और वर्तमान की बेड़ियों से बाहर आने के लिए संघर्षरत है। ब्लोख का मानना है कि वास्तविकता अधूरी है, और इसलिए वे उन दार्शनिक धाराओं से अलग हैं जो दुनिया को बंद, पूर्ण और पूरी तरह व्याख्यायित मानती हैं। उनका तर्क था कि वर्तमान ऐसी प्रवृत्तियों, आकांक्षाओं और विरोधाभासों से भरा है जो उससे आगे की ओर इशारा करते हैं। ‘अभी-नहीं’ कोई यूटोपिया नहीं है जो इतिहास के ऊपर तैरता हो, बल्कि एक अप्रकट संभावना है, जो भौतिक परिस्थितियों और सामूहिक संघर्ष में छिपी है। ‘अभी-नहीं’ का भाव हम बांडुंग सम्मेलन (1955) के अंतिम ज्ञापन में, गुटनिरपेक्ष आंदोलन शिखर सम्मेलन (1961) के बेलग्रेड घोषणापत्र में, ट्राईकॉन्टिनेंटल सम्मेलन (1966) के प्रस्तावों में, और संयुक्त राष्ट्र महासभा (1974) द्वारा पारित नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की घोषणा में देख सकते हैं — जहाँ उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्षों के सपनों को अभिव्यक्ति मिली। इस भाव को हम अक्टूबर क्रान्ति (1917), वियतनामी क्रान्ति (1945), चीनी क्रान्ति (1949) और क्यूबाई क्रान्ति (1959) के बाद शुरू हुईं क्रांतिकारी प्रक्रियाओं में भी देख सकते हैं।7

इस मार्क्सवादी परम्परा में भविष्य अपरिहार्य/अटल नहीं है। यह दृष्टि दो भौतिकवादी सिद्धांतों पर टिकी है जो पूँजीवादी व्यवस्था के विरोधाभासों से उभरते हैं।

पहला सिद्धांत यह है कि इतिहास की वास्तविक गति उत्पादक शक्तियों को विकसित करती है और सामाजिक अधिशेष का विस्तार करती है। पर क्योंकि यह विस्तार निजी सम्पत्ति के क़ब्ज़े में रहते हैं, इससे जनता के बड़े हिस्से के लिए असमानता और सामाजिक पीड़ा बढ़ती है। यह पहचानना ज़रूरी है कि आज की उत्पादक शक्तियाँ केवल कारखानों और मशीनरी तक सीमित नहीं हैं। उनमें देखभाल का काम, डिजिटल संरचनाएँ, और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ आदि भी शामिल हैं, जो सामूहिक श्रम से चलती हैं। यह नोट करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि पूँजीवाद इन शक्तियों का विकास तो करता है किन्तु उनकी संभावनाओं को कमज़ोर भी करता है — निजी स्वामित्व के ज़रिए, प्लैटफ़ॉर्म पूंजी की तानाशाही के ज़रिए, यूनियनें तोड़कर, कटौतियाँ करके, सेना को हावी करके या पूँजीवादी नियन्त्रण के दूसरे तरीक़ों से।

दूसरा सिद्धांत यह है कि पूँजीवाद से उत्पन्न सामाजिक पीड़ा ज़िल्लत और आक्रोश पैदा करती है, जिनसे स्वतःस्फूर्त विद्रोह खड़े हो सकते हैं। किन्तु ऐसे संघर्ष अपने आप ही मुक्तिकामी दिशा में नहीं बढ़ते। उन्हें राजनीतिक ताक़तें या तो लोगों की ठोस माँगों को आगे बढ़ाकर समाजवाद की ओर मोड़ सकती हैं, या उसके विपरीत, उन माँगों को विकृत करके लोगों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ एक विषैले, समाज-विरोधी एजेंडे की तरफ़ मोड़ सकती हैं।8 इसलिए भविष्य ऐसी चीज़ नहीं है जो हम पर घटित होती है, बल्कि ऐसी चीज़ है जिसे हमें निर्मित करना है। और हम उसका निर्माण केवल उन संरचनाओं में दरार डालकर ही कर सकते हैं जो ज़िल्लत और पीड़ा पैदा करती हैं। ऐसा दृष्टिकोण भाग्यवाद और अपरिहार्यता से बिलकुल अलग है, और हमें याद दिलाता है कि इतिहास खुला है और वर्तमान में कई संभावनाएँ मौजूद हैं जिन्हें संघर्ष के द्वारा सक्रिय किया जा सकता है।

इस परंपरा में उम्मीद कोरा आशावाद या निष्क्रिय प्रतीक्षा नहीं है, बल्कि बेहतर दुनिया रचने का दृढ़ संकल्प है। यह संकल्प ज़िल्लत, उत्पीड़न तथा मुसीबतों भरी ज़िंदगी को नियति के रूप में अस्वीकार करने से आता है। वैश्विक दक्षिण के आंदोलन, जो हमारे संस्थान के कार्य का मार्गनिर्देशन करते हैं, उम्मीद को विलासिता की चीज़ नहीं मानते। वे मानते हैं कि उम्मीद गरिमा के लिए सामूहिक प्रयास कर रहे किसानों, मज़दूरों और महिलाओं के अनेकों आंदोलनों तथा संगठनों के संघर्ष से पैदा होती है।9 ये आंदोलन वर्तमान के एक बेहतर रूप के लिए नहीं लड़ रहे, बल्कि एक बिल्कुल अलग सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए लड़ रहे हैं। उनके लिए भविष्य कैलेंडर के हिसाब से नहीं बल्कि संरचनात्मक रूपान्तरण से आएगा। उम्मीद करने का मतलब है यह पहचानना कि वर्तमान असह्य और परिवर्तनीय है, तथा शोषण व उत्पीड़न की स्थितियाँ न तो प्राकृतिक हैं और न ही अंतिम। ऐसी उम्मीद शासक वर्ग को अच्छी नहीं लगती, क्योंकि यह ऐसी शक्ति है जो इंसान की चेतना को बदल सकती है, और लोगों को वर्तमान को सहने की कोशिशों से हटाकर भविष्य बनाने के काम के लिए प्रेरित कर सकती है।

विघटन (मौजूदा व्यवस्था में दरार डालने) की इस परंपरा में भविष्य कोई व्यक्तिगत सर्जना नहीं है — उसका एक सामूहिक चरित्र है। पूँजीवादी संस्कृति हमें व्यक्तिगत भविष्यों के बारे में सोचने के लिए प्रोत्साहित करती है, जैसे करियर, घर, व्यक्तिगत सुरक्षा, और ‘आत्म-सुधार’ की अंतहीन परियोजना, पर परिवर्तन की सामूहिक जगहों को बंद कर देती है। यह संस्कृति सामूहिक ज़िम्मेदारी या सामाजिक रूपान्तरण की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत चिंताओं को बढ़ाने की संस्कृति है। पूँजीवाद में कैलेंडरबद्ध भविष्य को कंट्रोल किया जा सकता है, यानी उसका पूर्वानुमान, निर्धारण, मूल्यांकन आदि कर उसे सुरक्षित किया जा सकता है। इसका प्रबंधन करने वाले संस्थानों को निष्पक्ष बताया जाता है तथा उनके निर्णयों को राजनीतिक नहीं तकनीकी अनिवार्यता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस तरह जनता की बजाय जनता के भविष्य के बारे में विशेषज्ञ, बाज़ार नियम, सरकार तथा सुरक्षा तंत्र आदि फ़ैसला लेते हैं। ये संस्थान कोई मुक्तिकामी रास्ता नहीं दिखाते, बस आपदा/संकट को मैनेज करते हुए उसे जारी रखने की ज़मीन तैयार करते हैं। इसी ज़मीन से एक ख़ास क़िस्म की चरम दक्षिणपंथी कट्टरता पैदा होती है, जो सामाजिक बहिष्कार, श्रेणीबद्धता और हिंसा पर आधारित एक झूठे भविष्य की अवधारणा प्रस्तुत करता है। इस तरह का दक्षिणपंथ दरअसल पूँजीवाद की ही असमर्थता का एक लक्षण है क्योंकि वह सकारात्मक भविष्य बना नहीं कर सकता।10 लेकिन भविष्य इस दक्षिणपंथी कट्टरता द्वारा भी निर्मित नहीं किया जा सकता। इस काम को मेहनतकशों की सम्प्रभुता की जगह से पुनर्स्थापित करने की ज़रूरत है। न तो संकट अंतिम सच है, और न ही मुक्ति। संकट के ख़िलाफ़ लड़ना होगा और मुक्ति के लिए लड़ना होगा। विच्छेद (दरार) या संरचनात्मक बदलाव के दृष्टिकोण से इस काम के लिए हमें व्यक्तिगत प्रगति की दिशा में आगे बढ़ने की नहीं, बल्कि संगठित शक्तियों की ज़रूरत होगी। ऐसी शक्तियाँ जो सत्ता का सामना कर सकें, जैसे राजनीतिक दल, ट्रेड यूनियन, और सामाजिक आंदोलन। इन शक्तियों के बिना ‘अभी-नहीं’ एक दिशाहीन सपना ही बना रहेगा। उम्मीद को बरकारार रखने के लिए ढाँचा, अनुशासन और दृढ़ता जरूरी हैं।

भविष्य ऐसी चीज़ नहीं है जो मानव इतिहास के बाहर स्थित हो। वह किसी न किसी रूप में उन संघर्षों में विद्यमान है जो एक नई वैकल्पिक दुनिया का पूर्वाभास देते हैं। ऐसे कई संघर्षों के उदाहरण हमारे सामने हैं। जैसे श्रम के सहकारी रूप, देखभाल की सहकारी प्रथाएँ, सहभागी लोकतंत्र के प्रयोग, तथा चीन व क्यूबा जैसे देशों में समाजवादी निर्माण की अधूरी और विवादित प्रक्रियाएँ।11 ये संघर्ष बेमतलब कोशिशें नहीं कर रहे बल्कि अपने-अपने तरीक़े से एक अलग सामाजिक व्यवस्था का नमूना पेश कर रहे हैं। इनका अध्ययन करने का उद्देश्य उन्हें रोमानी बनाना नहीं है, बल्कि उनके महत्त्व और उनकी अप्रकट संभावनाओं को समझना है। ये संघर्ष हमें याद दिलाते हैं कि जिस दुनिया का निर्माण हम करना चाहते हैं वह कोई अमूर्त क्षितिज नहीं, बल्कि एक ठोस संभावना है। एक मार्क्सवादी का काम भविष्य की भविष्यवाणी करना नहीं है, बल्कि उसके निर्माण के लिए जनता को संगठित करना है। वर्तमान से अलग कुछ देखने के लिए स्पष्टता, साहस और सामूहिक अनुशासन की आवश्यकता होती है। भविष्य तभी आ सकता है जब आज में दरार डालने की कोशिश करेंगे। इसलिए भविष्य संघर्ष का क्षेत्र है। उसके लिए लड़ने के लिए उन सभी शक्तियों की पहचान करना ज़रूरी है जो इस काम में रुकावटें खड़ी करती हैं।

सिल्वानो लोरा (डोमिनिकन गणराज्य), सेरिग्राफ़ (प्रिंट), 1976, संस्करण 18/60, आकार: 640 x 570 मि.मी.

भविष्य के शत्रु

भविष्य कोई खाली जगह नहीं है जो मानवीय आकांक्षा से भरे जाने की प्रतीक्षा कर रहा हो। शक्तिशाली ताक़तें उसके लिए सक्रिय रूप से योजनाएँ बनाती हैं, ढाँचे खड़े करती हैं और उसे रोकने के सभी प्रयास करती हैं ताकि प्रभुत्व के मौजूदा संबंध ज्यों के त्यों बने रह सकें। भविष्य के शत्रु अमूर्त नहीं हैं बल्कि वो ठोस शक्तियाँ हैं जो वर्तमान व्यवस्था को भविष्य तक ले जाना चाहती हैं।12 भविष्य के चार मुख्य शत्रु हैं — वित्तीय पूँजी, प्लैटफ़ॉर्म पूँजी, निष्कर्षणवाद और सैन्यवाद। ये शक्तियाँ केवल वर्तमान के सामाजिक संबंधों को बनाए रखने के साथ ही भविष्य पर भी ही क़ब्ज़ा जमाने का प्रयास करती हैं।

वित्तीय पूँजी इस तारामंडल के केन्द्र में विराजमान है। उपनिवेशवाद और नव-उपनिवेशवाद की आमदनी, निवेश प्रवाहों, सट्टेबाज़ी के जादू और ऋण की शक्ति पर नियंत्रण के ज़रिए वित्तीय पूँजी राष्ट्रों और समाजों को अनुशासन में रखती है, और उनके सम्भावित भविष्यों के दायरे को संकुचित करती है।13 क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ, बहुपक्षीय ऋणदाता, और निजी वित्तीय संस्थान — जो अधिकतर उत्तरी वैश्विक क्षेत्र में स्थित हैं — उत्तर के शासक वर्ग के हक़ में भविष्य के योजनाकारों की तरह काम करते हैं। वे सुनिश्चित करते हुए कि आने वाला कल मानवीय समृद्धि के बजाय पूँजी संचय के लिए अनुकूल बना रहे। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और कई अन्य संस्थानों के आदेश ऋणग्रस्त पूर्व-उपनिवेशित देशों के लिए एक भौतिक वास्तविकता बन जाते हैं।14

प्लैटफ़ॉर्म पूँजी — पूँजीवादी टेक्नॉलजी एकाधिकार कंपनियाँ नवाचार और दक्षता को डाटा निष्कर्षण, श्रम के पुनर्संगठन और सामाजिक जीवन के विखण्डन की दिशा में मोड़ देती हैं। एल्गोरिदम समय, ध्यान (attention) और इच्छा का प्रबंधन करते हैं, जबकि प्लैटफ़ॉर्म श्रमिक मज़दूरों को उनकी स्थिरता और सामूहिक शक्ति से वंचित कर देता है।15

निष्कर्षणवाद — जलवायु आपदा के वैज्ञानिक साक्ष्यों के बावजूद, तेल, गैस, कोयला, खनन और कृषि-व्यवसाय समूह ऊर्जा प्रणालियों, श्रम बाज़ारों और राज्य की नीतियों को आकार दे रहे हैं। उनकी योजना के तीन ही स्तंभ हैं: निष्कर्षण करो, मुनाफ़ा कमाओ, और भूल जाओ। मिसाल के तौर पर, जलवायु संकट का कारण दूरदर्शिता का अभाव नहीं है, बल्कि पूँजीवादी निगमों के सोचे समझे फ़ैसलों का परिणाम है, क्योंकि उनके लिए ग्रह का विनाश संचय की एक स्वीकार्य लागत है।16

सैन्यवाद — पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा उत्पन्न युद्ध, विस्थापन और जलवायु संकटों का हल सामाजिक और राजनीतिक समाधान से नहीं किया जाता, बल्कि एक स्थायी युद्ध अर्थव्यवस्था से किया जाता है। यानी राजनीतिक समस्याओं पर सैन्य समाधान थोपती है। साम्राज्यवादी केन्द्रों में सैन्यवाद शस्त्र संचय, सीमा शासन, निगरानी और आपातकालीन शासन के सामान्यीकरण के रूप में प्रकट होता है। वैश्विक दक्षिण में यह साम्राज्यवादी आक्रमण, छद्म युद्ध, क़ब्ज़े, और दुर्लभ सार्वजनिक संसाधनों को सैन्य गतिविधियों या सुरक्षा संरचनाओं की ओर मोड़ दिए जाने के रूप में सामने आता है। इन उपायों से हमेशा हथियार उद्योग को फ़ायदा होता है। सैन्यवाद राजनीतिक संभावनाओं को कम कर देता है: आपातस्थितियों का हवाला देकर तानाशाही उपायों को न्यायसंगत ठहराया जाता हैं, असहमति का दमन किया जाता हैं, और डर का समाजीकरण किया जाता हैं। दुनिया के बड़े हिस्सों में, और विशेषकर वैश्विक दक्षिण में, भविष्य किसी वादे के रूप में नहीं बल्कि स्थायी अस्थिरता, विस्थापन और मृत्यु के रूप में दिखाई देता है। युद्ध उन संकटों के प्रबंधन का एक तंत्र बन जाता है जिन्हें पूँजीवाद स्वयं पैदा करता है।17

भविष्य के ये शत्रु केवल सामाजिक रूपान्तरण में बाधा नहीं डालते, वे सक्रिय रूप से एक ऐसे भविष्य का निर्माण करते हैं जिसमें मुट्ठी-भर लोगों के विशेषाधिकार सुरक्षित रहते हैं, जबकि अधिकतर मानवता को चिंताओं, असुरक्षा और निराशा। इन शक्तियों को चुनौती दिए बिना भविष्य को पुनः हासिल नहीं किया जा सकता।

परिवर्तन के लिए तैयार सामाजिक ताक़तें

जब सम्पत्तिधारी वर्ग शाश्वत वर्तमान पर ज़िद किए बैठा हो, तो भविष्य को सामूहिक जन-संघर्ष से ही वापस हासिल किया जा सकता है। मौजूदा व्यवस्था से विच्छेद कर पाने की सामर्थ्य रखने वाली सामाजिक ताक़तें यहीं मौजूद हैं, भले ही वे टुकड़ों में बँटी हैं, विषम हैं, और उन्हें जानबूझकर ओझल किया गया है। इनमें औपचारिक और अनौपचारिक दोनों सेक्टरों के मज़दूर, किसान और भूमिहीन खेतिहर मज़दूर, महिलाएँ, युवा, उत्पीड़ित समुदाय, और वे सभी समूह शामिल हैं जिन्हें मार्क्स ने ‘अतिरिक्त आबादी’ कहा था। यानी, वे सभी लोग जो पूँजीवादी संचय के कारण हाशिये पर हैं लेकिन पूँजीवाद के लिए अनिवार्य हैं, एक आरक्षित श्रम-सेना के रूप में या सामाजिक पुरुत्पादन श्रमिक के रूप में।18

‘उत्तर-मार्क्सवाद’ और बिखरे हुए राजनीतिक कर्ताओं पर नई-नई सैद्धान्तिक बहस के बावजूद, मज़दूर वर्ग — शहरी हो या ग्रामीण — अभी भी धुरी पर बना हुआ है, हालाँकि उसका गठन बदला ज़रूर है। अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और विश्व बैंक की रिपोर्टें बताती हैं कि कुल वैश्विक श्रम-बल तक़रीबन चार अरब के आसपास है (यानी वे सब जो काम पर हैं और जो काम तलाश रहे हैं)। बड़े क्षेत्रों के हिसाब से वैश्विक रोज़गार का अनुमानित ब्यौरा कुछ इस तरह है:

  1. कृषि: 92 करोड़ 30 लाख
  2. उद्योग: 80 करोड़
  3. सेवाएँ: 1 अरब 80 करोड़
  4. परिवहन/रसद: 23 करोड़
  5. प्लैटफ़ॉर्म श्रमिक: 15 करोड़ 40 लाख से 43 करोड़ 50 लाख19

कारख़ानों के मज़दूर आज सेवा, परिवहन, गोदाम, देखभाल, डिलीवरी और प्लैटफ़ॉर्म (यानी उबरीकृत) कामगारों के बराबर में खड़े हैं। वैश्विक दक्षिण के अधिकतर हिस्सों में अनौपचारिक मज़दूरी अपवाद नहीं, बल्कि चलन है। ये कामगार — कारख़ाने में खटें, खेत में, या गोदाम में — हर वक़्त अनिश्चितता के साये में जीते हैं: क़ानूनी संरक्षण या तो कमज़ोर है या है ही नहीं, और बेरोज़गारी का डर हमेशा सिर पर मँडराता रहता है। फिर भी, यूनियनों की सिकुड़ती ताक़त के बावजूद, इन कामगारों के हाथ में एक निर्णायक शक्ति है: ये ही माल पैदा करते हैं, ये ही उसे ढोते हैं, ये ही ज़मीन जोतते हैं, ये ही खदानें खोदते हैं, ये ही बीमारों-बूढ़ों की देखभाल करते हैं, ये ही शहर बनाते हैं, और ये ही रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को चलाते हैं। उनके संघर्ष, वे चाहे रसद केन्द्रों में हड़तालें या लेकर भूमिहीन मज़दूरों की बग़ावतें या घरेलू कामगारों की काम-बन्दी, साबित करते हैं कि पूँजी और श्रम के बीच का अन्तर्विरोध ख़त्म नहीं हुआ है।

संघर्ष हमेशा ऐसे नहीं आते कि मज़दूर सचेतन रूप से पूँजी के ख़िलाफ़ संगठित हो। वे अक्सर दमन की दूसरी धुरियों — जैसे पितृसत्ता और सामाजिक ऊँच-नीच (जाति, नस्ल) — से होकर सतह पर आते हैं, या पीढ़ीगत तजुर्बे और दूसरी सामाजिक बुनावटों से गतिशील होते हैं। महिला आन्दोलनों ने, मिसाल के तौर पर, यह उजागर किया है कि आर्थिक व्यवस्थाएँ शरीरों और वक़्त के शोषण पर टिकी हैं — ख़ासकर स्त्रियों के शारीरिक श्रम और वक़्त पर, और उसमें भी ख़ासकर काली, प्रवासी, और नस्ली रूप से चिन्हित मज़दूर-तबक़े की महिलाओं पर। इसी तरह गरिमा के सवाल से जुड़े संघर्ष उन पहचानों से होकर गुज़रते हैं जो अपने-आप में वर्गीय नहीं हैं, लेकिन जो यह बताती हैं कि पूँजीवाद किस मक्कारी से पुरानी ऊँच-नीच को अपने संचय के काम में लगाता है। मिसाल के तौर पर, जाति और नस्ल की व्यवस्था को पूँजीवाद अपने मतलब के लिए इस्तेमाल और पुन: संगठित करता है। इसलिए गरिमा के लिए लड़ी जा रही लड़ाइयाँ भी समाजवादी संघर्ष का आधार तय करती हैं। ‘अतिरिक्त जनसंख्या’ — प्रवासी, बेरोज़गार, भूमिहीन किसान और शहरी ग़रीब — को अक्सर राजनीतिक रूप से सीमांत माना जाता है, लेकिन ये समूह ही पूँजीवादी व्यवस्था के सबसे गंदे रूप का अनुभव करते हैं। आवास, बुनियादी ज़रूरतों और सम्मान के लिए उनकी लड़ाइयाँ दरअसल ज़िन्दगी को क़ायम रखने की लड़ाइयाँ हैं। ये तमाम संघर्ष दिखाते हैं कि मज़दूर वर्ग के भीतर कितनी ऊर्जा है, जो पूँजीवाद के विरुद्ध एक ऐतिहासिक मोर्चा खड़ा करने और भविष्य के लिए लड़ने में समर्थ है।

हमारे शहरों और देहातों को हिला देने वाले बहुत-से बड़े विरोध संघर्ष या तो छोटे-छोटे संगठनों से आकार पाते हैं या सोशल मीडिया पर व्यक्तियों से की गई अपीलों से आगे खड़े होते हैं। पूँजी बँटवारे पर फलती-फूलती है: औपचारिक बनाम अनौपचारिक, शहर बनाम देहात, आदमी बनाम औरत, नागरिक बनाम प्रवासी।20 और आज, खण्डित वर्ग संरचना और सामाजिक संगठन का बिखराव राजनीतिक संगठन और सैद्धांतिक कार्य-एकता के आगे बड़ी रुकावटें बन कर खड़े हैं। इस तरह के कई उदाहरण हमारे सामने हैं कि जनता के आक्रोश को प्रतिक्रियावादी ताक़तें कैसे हड़पती हैं या आक्रोश मायूसी में कैसे बदल जाता है। वर्तमान से विच्छेद के लिए ज़रूरी है कि विविधता को मिटाए बिना एकता का निर्माण हो, ऐसी राजनीतिक परियोजनाएँ खड़ी की जाएँ जो साझा हितों को ज़बान दे सकें। ऐसे संगठन के बिना सामाजिक ताक़तें बस प्रतिक्रिया करती रह जाती हैं। पर ऐसा संगठन होने पर सामाजिक ताक़तें इतिहास की कर्ता बन जाती हैं — जो भविष्य को अपना बनाने की हैसियत रखती हैं। दुनिया भर में वामपन्थ के सामने आज असल संगठनात्मक सवाल यह है कि जनता जिस तकलीफ़ और ज़द्दोजहद से गुज़रती है उन वस्तुनिष्ट/तथ्यात्मक स्थितियों में से व्यक्तिपरक/विशेष समूहों की माँगों पर आधारित विभिन्न संघर्ष-मंचों का निर्माण कैसे किया जाए।

समय

पूँजीवाद समय के अपने विचार को समाजों पर थोपता है — एक ऐसा विचार जिसमें जल्दबाज़ी तो है पर दिशा नहीं, रफ़्तार तो है पर मंज़िल नहीं, संकट तो है पर हल नहीं। एक सनकी-सी हड़बड़ी सामाजिक ज़िन्दगी को अपनी गिरफ़्त में ले लेती है। अपने दिन पर क़ाबू रखने की हमारी ताक़त छिन जाती है, और एक अव्यवस्था पैदा होती है जो हमारे आराम और फ़ुरसत के समय को भीतर से खा जाती है। फ़ुरसत के समय के बिना, समुदाय निर्माण के लिए आसानी से वक्त नहीं निकलता। (हालाँकि यह भी देखा गया है कि सरकारों द्वारा सामाजिक नीति से हाथ खींच लेने के बाद मज़दूर-वर्ग की महिलाओं ने मिलकर सामाजिक पुनरुत्पादन (देखभाल कार्यों) के मंच बनाए, जिनके चलते अनेक विरोध आंदोलनों में उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ी है)। समय के बिना, कार्य-स्थलों, गली-मोहल्लों और समुदायों में संगठनात्मक कार्य करना असम्भव है।

पूँजीवाद के अन्तर्विरोध ख़ुद-ब-ख़ुद संघर्ष उत्पन्न करते हैं। ऐसे संघर्ष अक्सर कम मज़दूरी और काम की ख़राब स्थितियों से भड़कते हैं, लेकिन बहुत बार सामाजिक पुनरुत्पादन की ज़रूरतों से भी उभरते हैं, जैसे पानी, सार्वजनिक जगह, सस्ते अनाज और ईंधन आदि की कमी से। ऐसे संघर्ष कभी उन सामाजिक ताने-बानों और रिश्तों पर खड़े होते हैं जो समय के साथ स्थापित हुए होते हैं, और कभी काम और जीवन-स्तर में तेज़ गिरावट से अचानक फूट पड़ते हैं। ये सहज उभार, वीरतापूर्ण तो होते हैं पर पर्याप्त नहीं हैं; ये अनुशासित संगठन के बग़ैर वर्तमान में उथल-पुथल तो मचा सकते हैं, पर शायद ही कभी भविष्य को नया रूप दे पाते हैं। इतिहास की प्रमुख क्रान्तियों, लंबे समयों तक चकी सन्तुलित क्रान्तिकारी गतिविधियों की कहानियाँ हैं, जिन्होंने समुदायों को दुनिया को बदल देने वाले महान संघर्षों के लिए तैयार किया। सहज संघर्ष वास्तविक क्रोध और शिकायतों का आईना हैं। वे सड़कें घेर सकते हैं, उम्मीद की चिनगारी जला सकते हैं, और हुकूमतें तक गिरा सकते हैं। लेकिन इतिहास का तजुर्बा (जैसे 2011 का मिस्र) बताता है कि संगठनात्मक निरन्तरता और मज़बूती के बिना ये लमहे दमन, सह-विलयन, और थकान की भेंट चढ़ जाते हैं। सम्पत्तिधारी वर्ग वक्त को रणनीतिक तरीक़े से बरतना जानता है — वे दशकों की योजनाएँ बनाते हैं। जो आंदोलन केवल विरोध की तात्कालिकता में कार्य करते हैं, वे भविष्य बनाने का दीर्घकालिक काम अपने शत्रुओं के हाथों सौंप देते हैं।

संगठन

तात्कालिकता से आगे जाकर कुछ टिकाऊ खड़ा करने के लिए संगठन चाहिए — जिनके सामाजिक आन्दोलनों से लेकर लोकतान्त्रिक-केन्द्रवादी लेनिनवादी पार्टियों जैसे कई रूप हो सकते हैं। इन दो रूपों के बीच की बहस इस डोसियर का विषय नहीं है। हमारा मक़सद यह बताना है कि राजनीतिक संगठन (भले उसका जो भी रूप हो) ही वो ज़रिया है जिससे वक़्त को मुक्ति की दिशा में ढाला जाता है। पार्टियाँ, मोर्चे, ट्रेड यूनियन, किसान संगठन, महिला संघ और युवा आंदोलन — ये सब विशिष्ट किन्तु अन्तर्सम्बद्ध भूमिकाएँ निभाते हैं। लेनिनवादी ढाँचे की पार्टियाँ दूरगामी कार्यक्रमों की योजना बना सकती हैं और राज्य सत्ता को चुनौती दे सकती हैं। जन संगठन संघर्षों को दैनिक जीवन में स्थापित कर सकते हैं और समुदायों को ठहराव और निरन्तरता मुहैय्या करा सकते हैं। मोर्चे विविध ताक़तों के दरमियान वैचारिक एकरूपता की माँग किए बग़ैर एकता को सम्भव बना सकते हैं। संगठन ही बिखरे और परेशानहाल मज़दूर वर्ग को अपने बचे-खुचे समय को साझा करने का (सामाजिक बानाने का), और उन्हें अपनी शर्तों पर समाज बनाने का मौक़ा देता है।

अनुशासन

लेनिनवादी पार्टी की ख़ूबी यही है कि इस परम्परा में अनुशासन को केन्द्रीय स्थान हासिल है। अनुशासन का मतलब आज्ञापालन या नौकरशाही कठोरता से नहीं है (हालाँकि ऐसी पार्टियाँ ध्यान न देने पर इन बुराइयों में गिर सकती हैं)। अनुशासन का मतलब है ऐसे कैडर तैयार करना जो राजनीतिक रूप से शिक्षित हों और पार्टी-स्वरूप की अनिवार्यता को समझें, उन सामूहिक प्रक्रियाओं को समझें जो एक साझा राजनीतिक समझ या कार्यक्रम गढ़ने के लिए जरूरी हैं, पार्टी के भीतर प्रतिनिधित्ववादी नेतृत्व की आवश्यक संरचनाओं को समझें, और साझा लक्ष्यों, रणनीतियों, और जवाबदेही के तरीक़ों के प्रति पूर्ण समर्पण रखें। अनुशासन संगठनों को ऊर्जा सहेजने, तजुर्बे से सीखने, और संकट के लमहों से आगे भी टिके रहने का माद्दा देता है — संगठन विद्रोह को एक परियोजना में बदल देता है।

इस पूरे काम में मुख्य एजेंट वे लोग हैं जिन्हें अंतोनियो ग्राम्शी ने ‘नए बुद्धिजीवी’ का नाम दिया था। राजनीतिक परियोजना के वे स्थायी क़ार्यकर्ता जो मज़दूर वर्ग, किसानों और जनआन्दोलनों की भीतर से आते हैं।21 उनका काम है स्पष्टीकरण, विश्लेषण-संश्लेषण और संचार के ज़रिए जीवित अनुभव को राजनीतिक रणनीति में बदलना। वे आंदोलनों को यह समझने में मदद करते हैं कि वे किसके ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं — और यह भी कि भविष्य में क्या-क्या शामिल होना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीयतावाद

पूँजीवाद में दरार डालने का काम राष्ट्रीय सरहदों के भीतर टिकाऊ नहीं रह सकता। पूँजीवाद वित्त, व्यापार, सैन्य गुटों, आपूर्ति शृंखलाओं और वैचारिक संस्थानों अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संगठित है। इसलिए जो ताक़तें भविष्य का निर्माण करना चाहती हैं, उन्हें भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित होना होगा। अंतरराष्ट्रीयतावाद नैतिकता या भावुकता की जगह से आना चाहिए। विश्व अर्थव्यवस्था की संरचना और उत्पीड़ितों के समान हालात अंतरराष्ट्रीयतावाद को व्यावहारिक अनिवार्यता बनाते हैं। इसका मतलब है मुल्कों और संघर्षों के आर-पार रिश्ते बनाना, इन्क़लाबी प्रक्रियाओं से सबक़ लेना, साम्राज्यवाद के विरुद्ध सम्प्रभुता की रक्षा करना, और राजनीतिक शिक्षा, अभियानों और भौतिक एकजुटता के विभिन्न रूपों में तालमेल बैठाना। अंतरराष्ट्रीयतावाद के बिना सफलताएँ अकेली और बेसहारा रह जाती हैं, लेकिन उसके साथ, स्थानीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तरों पर संघर्ष उस पैमाने तक पहुँचने लगते हैं जो एक वैश्विक पूँजीवादी व्यवस्था का सामना करने के लिए आवश्यक है।

भविष्य को एक ही वार में नहीं छीना जा सकता। उसे सब्र से, सामूहिक ढंग से, और होशियारी से खड़ा करना होगा। वक़्त संघर्ष के लिए गुंजाइश पैदा करता है, संगठन उसे शक्ल देता है, अनुशासन उसे सहनशक्ति देता है, और अंतरराष्ट्रीयतावाद उसे विस्तार देता है। शासक वर्ग के उस नियोजित भविष्य के मुक़ाबले, जो शोषण और बहिष्कार पर खड़ा है, ये औज़ार उत्पीड़ितों को अपने ख़ुद के भविष्य की योजना बनाने की हिम्मत देते हैं — एक ऐसा भविष्य जो गरिमा और बराबरी, और ज़िन्दगी से जुड़ा हो।

अल्फ्रेडो प्लांक, इग्नासियो कोलोम्ब्रेस, कार्लोस सेस्सानो, हुआन मैनुएल सांचेज़ और नानी कैपुरो (अर्जेंटीना), चे (सामूहिक श्रृंखला), 1968, कैनवास पर तेलचित्र, प्रत्येक 195 x 150 से.मी.

भाग 2: भविष्य का निर्माण

वर्तमान के स्थान पर क्या बनाया जाना चाहिए? भविष्य केवल संघर्ष, संगठन और अनुशासन का विषय बनकर नहीं रह सकता; उसे भौतिक, संस्थागत और अंतरराष्ट्रीय रूप भी लेना होगा। इसका अर्थ है स्वामित्व, योजना, संप्रभुता और उन समन्वय के रूपों से जुड़े प्रश्नों का सामना करना, जिनके माध्यम से एक अलग सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखा जा सकता है।

सार्वजनिक स्वामित्व और योजना

भविष्य का प्रश्न स्वामित्व और समन्वय के प्रश्न से अलग नहीं किया जा सकता। पूँजीवाद के तहत, उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व एक छोटे वर्ग को यह तय करने की शक्ति देता है कि क्या उत्पादन होगा, कैसे होगा और किसके लिए होगा। यह शक्ति पूरे समाज के हित में नहीं, बल्कि लाभ, प्रतिस्पर्धा और अल्पकालिक संचय की अनिवार्यताओं के अनुसार प्रयोग की जाती है। परिणामस्वरूप एक गहरा विरोधाभास उत्पन्न होता है: उत्पादन शक्तियाँ अत्यधिक सामाजिकीकृत हो चुकी हैं, जबकि उन पर नियंत्रण सीमित रूप से निजी हाथों में बना रहता है। आज श्रम पहले से ही सामूहिक और अंतरराष्ट्रीय है, लेकिन इस सामूहिक प्रयास के तकनीकी आधार और आर्थिक अधिशेष पर एक अल्पसंख्यक वर्ग का क़ब्ज़ा है। इसलिए, किसी भी समाजवादी भविष्य पर गंभीर चर्चा को इस विरोधाभास का सामना करते हुए संपत्ति संबंधों में परिवर्तन करना होगा।

सार्वजनिक स्वामित्व का मतलब संपत्तियों को निजी हाथों से राज्य के हाथों में कानूनी रूप से स्थानांतरित करना भर नहीं है। स्वयं राज्य भी वर्ग संघर्ष का एक क्षेत्र है और उसे विकास की दिशा को निर्देशित करने के एक साधन के रूप में हासिल करना आवश्यक है। जब ऊर्जा, परिवहन, वित्त, भूमि, संचार और भारी उद्योग जैसे रणनीतिक क्षेत्र सार्वजनिक स्वामित्व में होते हैं, तो समाज को उत्पादन और नवाचार को निजी संचय के बजाय सामूहिक आवश्यकताओं की ओर मोड़ने की क्षमता मिलती है। पूँजीवाद संसाधनों का व्यवस्थित रूप से ग़लत आवंटन करता है—विलासिता संबंधी उपभोग और विनाशकारी उद्योगों का अत्यधिक उत्पादन करता है, जबकि देखभाल, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे क्षेत्रों में कमी बनी रहती है। सार्वजनिक स्वामित्व उत्पादन को सामाजिक पुनरुत्पादन, दीर्घकालिक निवेश और साझा समृद्धि की ओर पुनर्निर्देशित करने के लिए भौतिक आधार प्रदान करता है।

सार्वजनिक स्वामित्व के पक्ष में तर्क तकनीक से भी जुड़ा हुआ है। निजी स्वामित्व के तहत, तकनीकी विकास को लाभप्रदता, बौद्धिक संपदा के एकाधिकार और श्रम अनुशासन के अधीन कर दिया जाता है। नवाचार को लागत कम करने, निगरानी, सैन्यीकरण और ज्ञान की घेरेबंदी की ओर निर्देशित किया जाता है, बजाय इसके कि वह सामाजिक रूप से आवश्यक श्रम समय को कम करे या सामूहिक कल्याण को बेहतर बनाए। उत्पादन की शक्तियों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण से तकनीक का उपयोग सामाजिक हित में किया जा सकता है: कार्यदिवस को छोटा करने, रोजगार सृजित करने, सार्वजनिक सेवाओं का विस्तार करने, मानव कौशल को बढ़ाने और पारिस्थितिक नुक़सान को कम करने के लिए। वही डिजिटल और लॉजिस्टिक प्रणालियाँ, जिनका उपयोग पूँजीवाद शोषण को तीव्र करने के लिए करता है, अपने भीतर तर्कसंगत और मानवीय उत्पादन तथा वितरण की संभावना भी समेटे हुए हैं।

पूँजीवादी विचारधारा योजना को स्वभावतः अधिनायकवादी और अक्षम बताती है, जबकि बाज़ार को समन्वय के एक तटस्थ और लोकतांत्रिक तंत्र के रूप में प्रस्तुत करती है। वास्तव में पूँजीवाद पहले से ही अत्यधिक योजनाबद्ध है—लेकिन यह योजना पूँजीपतियों के हितों में होती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, वित्तीय संस्थान और सैन्य गठबंधन व्यापक आंतरिक योजना, दीर्घकालिक पूर्वानुमान और रणनीतिक समन्वय में संलग्न रहते हैं। बाज़ार योजना का स्थान नहीं लेता; बल्कि यह सामाजिक निर्णय-प्रक्रिया को खंडित करता है, ज़िम्मेदारी को अस्पष्ट बनाता है और सामूहिक जीवन को संचय की संकीर्ण तर्क प्रणाली के अधीन कर देता है। क़ीमतें संकेत तो देती हैं, लेकिन तब, जब सामाजिक और पारिस्थितिक क्षति पहले ही हो चुकी होती है। बाज़ार अल्पकालिक लाभप्रदता को बढ़ावा देता है, न कि दीर्घकालिक सामाजिक तर्कसंगतता को।

समाजवादी योजना का अर्थ लोकप्रिय जीवन से कटा हुआ नौकरशाही आदेश नहीं है; बल्कि यह समय के साथ सामाजिक श्रम के सचेत और लोकतांत्रिक समन्वय से संबंधित है। योजना पूँजीवादी अल्पकालिकता के ख़िलाफ़ एक समयगत हथियार है। यह समाज को सामूहिक प्राथमिकताएँ तय करने की ओर प्रेरित करती है—जैसे डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन उत्सर्जन में कमी), औद्योगिक विविधीकरण, खाद्य संप्रभुता और सार्वभौमिक देखभाल—और उनके अनुसार संसाधनों को संगठित करने की क्षमता देती है। यह क्षेत्रों (सेक्टर्स) और सामाजिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना संभव बनाती है, बजाय इसके कि विकास को बाज़ार प्रतिस्पर्धा के असमान और विनाशकारी परिणामों पर छोड़ दिया जाए। योजना वह माध्यम है जिसके द्वारा समाज इस समझ पर कार्य कर सकता है कि भविष्य स्वतः नहीं बनता, बल्कि उसे सचेत रूप से निर्मित करना पड़ता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि योजना लोकतंत्र को नकारती नहीं है; बल्कि इसके विस्तार की माँग करती है। योजनाबद्ध व्यवस्था को मुक्ति-दायी बनाने के लिए उसे जनभागीदारी, श्रमिक नियंत्रण और सामाजिक आवश्यकताओं को व्यक्त करने में सक्षम जनसंगठनों में निहित होना चाहिए। पूँजीवाद के तहत श्रम का समाजीकरण पहले से ही विशाल नेटवर्कों के पार समन्वय की माँग करता है; समाजवाद इस समन्वय को पारदर्शी, जवाबदेह और मानव विकास की ओर उन्मुख बनाने का प्रयास करता है। जब श्रमिक, समुदाय और सार्वजनिक संस्थाएँ लक्ष्यों को निर्धारित करने और परिणामों की निगरानी में भाग लेते हैं, तो योजना एक तकनीकी थोपने के बजाय सामूहिक सीखने की प्रक्रिया बन जाती है। इसी प्रकार की प्रक्रियाओं के माध्यम से सामाजिक अधिशेष को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, संस्कृति और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन की ओर सचेत रूप से निर्देशित किया जा सकता है।22

एक नए अंतरराष्ट्रीयतावाद की ओर

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, एक शक्तिशाली समाजवादी गुट के उदय और उपनिवेशवाद-उन्मूलन की लगातार लहरों ने ऐसे अंतरराष्ट्रीयतावाद की नींव रखी, जो साम्राज्यवाद और नव-उपनिवेशवाद के विरोध पर आधारित था। यह नए आर्थिक और सामाजिक मॉडल बनाने और एक नई वैश्विक व्यवस्था बनाने का प्रयास था।23

यह अंतरराष्ट्रीयतावाद ऋण संकट, नवउदारवाद के आक्रमण और सोवियत संघ तथा समाजवादी गुट के पतन के साथ ढह गया। इसके स्थान पर अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) द्वारा थोपा गया एक दिखावटी वैश्वीकरण आया—बाज़ारों का खुलना, उत्पादक क्षेत्रों से राज्य की वापसी, पूँजी नियंत्रणों का हटना, संसाधनों का समर्पण, और शैक्षणिक व सांस्कृतिक अधीनता—जो संप्रभुता के व्यापक क्षरण का प्रतीक था। सोवियत संघ के पतन के दशकों बाद, एक नए अंतरराष्ट्रीयतावाद के उदय के लिए वस्तुगत परिस्थितियाँ उभर रही हैं। ग्लोबल उत्तर गहरे संकट से गुज़र रहा है, जिसकी पहचान उद्योग-विहीनता और उत्पादन क्षमता के क्षरण से होती है, जबकि चीन और ग्लोबल दक्षिण के देश वैश्विक अर्थव्यवस्था के इंजन के रूप में उभर रहे हैं। ब्रिक्स, शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) और अन्य द्विपक्षीय मंचों का उदय इन बदलती वस्तुगत परिस्थितियों को दर्शाता है।

हालाँकि संयुक्त राष्ट्र और इसकी एजेंसियों पर अब भी संयुक्त राज्य अमेरिका(यूएस) तथा उसके सहयोगियों का प्रभाव बना हुआ है, जिससे उनका प्रभाव कई मामलों में कम हो गया है। दुनिया भर में बढ़ते संघर्ष—ग़ज़ा, वेनेज़ुएला, क्यूबा से लेकर कांगो गणतंत्र और ईरान तक—इस असंतुलन को उजागर करते हैं। इसी तरह आईएमएफ और विश्व बैंक संरचनात्मक समायोजन (Structural Adjustment) नीतियों के माध्यम से अपना प्रभाव बनाए रखते हैं। जलवायु पर बने ढाँचे लोगों के लिए उपयोगी साबित नहीं हुए हैं। महामारी अपने साथ ‘वैक्सीन रंगभेद’ लेकर आई। इससे भी बुरा यह है कि ग्लोबल दक्षिण के कई बहुपक्षीय संगठन निष्क्रिय हैं या नवउदारवाद की सोच से प्रभावित हैं।

एक नई वैश्विक संरचना पर बहस अक्सर ‘बहुध्रुवीयता’(multipolarity) पर केंद्रित रही है, लेकिन इसकी सीमाएँ हैं क्योंकि यह शीतयुद्ध जैसी प्रतिस्पर्धात्मक मानसिकता को दोहरा सकती है। इसके विपरीत, नए अंतरराष्ट्रीयतावाद को ‘बहुपक्षवाद’ (multilateralism) पर आधारित होना चाहिए। इस संदर्भ में सयुक्त राष्ट्र को पुनः सक्रिय करना और यूएन चार्टर को विश्व के लोगों की साझा धरोहर के रूप में बनाए रखना ख़ास महत्त्व रखता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र महासभा, दोनों में सुधार की आवश्यकता है, और ग्लोबल दक्षिण के देशों को विश्व स्वास्थ्य संगठन, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन और अंकटाड जैसी एजेंसियों के लिए एक साझा एजेंडा विकसित करना होगा। इन संस्थाओं के लिए ऐसी नीतियाँ और कार्यक्रम तैयार करने हेतु नए बौद्धिक और राजनीतिक संघर्ष की तत्काल आवश्यकता है, जो ग्लोबल दक्षिण के लोगों की आकांक्षाओं को सही रूप में व्यक्त कर सकें।

नए बहुपक्षवाद के साथ-साथ, वामपंथी और देशभक्त शक्तियों को उन क्षेत्रीय संगठनों का समर्थन और सुदृढ़ीकरण करना चाहिए, जिन्होंने पिछले तीस वर्षों में अपनी दिशा खो दी है, और जहाँ यह संभव न हो, वहाँ नए संगठनों के निर्माण की वकालत करनी चाहिए। 2000 के दशक और शुरुआती 2010 के वर्षों में लैटिन अमेरिका में पिंक टाइड के दौरान बने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन इस बात का उदाहरण हैं कि क्या संभव है।
समकालीन समय में साहेल देशों के गठबंधन ने अफ्रीका में अधिक सशक्त एकीकरण की इच्छा को व्यक्त किया है, जबकि ECOWAS (पश्चिमी अफ्रीकी देशों का आर्थिक समुदाय) की नव-उपनिवेशवादी तर्क प्रणाली का प्रतिरोध भी किया है।24 इसी तरह, ब्रिक्स द्वारा वित्त, व्यापार, अवसंरचना से लेकर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, जलवायु सहयोग और अनुसंधान तक विभिन्न क्षेत्रों में शुरू की गई प्रक्रियाएँ ऐसे क्षेत्रीय संगठनों के लिए एक और मॉडल प्रस्तुत करती हैं।

नया अंतरराष्ट्रीयतावाद संप्रभुता की रक्षा से शुरू होता है, लेकिन वहीं समाप्त नहीं होता। इसे परिवर्तित सामाजिक संबंधों पर आधारित भविष्य की एक अंतरराष्ट्रीयवादी दृष्टि को भी समाहित करना होगा। यह दृष्टि केवल एक देश में साकार नहीं की जा सकती—और न ही केवल राज्यों द्वारा आगे बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए दुनिया भर के आंदोलनों की लामबंदी आवश्यक है, ताकि पूँजीवाद से आगे बढ़ा जा सके। समाजवादियों को चाहिए कि वे भविष्य की दिशा में मज़बूत आधार स्थापित करें, उन परियोजनाओं को बढ़ावा देते हुए, उनसे सीखते हुए और उन पर आगे निर्माण करते हुए, जिनमें शक्तियों के संतुलन को बदलने की क्षमता हो।

फिर भी, कोई भी कार्यक्रम—चाहे वह कितना ही आवश्यक क्यों न हो—अपने आप कायम नहीं रह सकता, जब तक उसे आगे बढ़ाने वाली सामाजिक शक्ति न हो और संघर्ष को प्रेरित करने वाला कोई क्षितिज न हो। यदि भविष्य को संस्थाओं, स्वामित्व, योजना और अंतरराष्ट्रीय समन्वय के माध्यम से निर्मित करना है, तो उसे एक राजनीतिक संवेदना के रूप में भी जिया जाना चाहिए।
वह संवेदना है—आशा।

लुइस गोंज़ालेज़ पाल्मा (ग्वाटेमाला), ला रोसा (गुलाब), 1991, टोनिंग और हस्त-रंगांकन के साथ जेलटिन सिल्वर प्रिंट, 47 x 48.5 से.मी.

 भाग 3: आशा

आज पूँजीवाद अपनी वैधता के संकट से गुजर रहा है, क्योंकि इसके विचार और मूल्य—व्यक्तिवाद, उद्यमिता, उपभोक्तावाद—अब वह सामाजिक गतिशीलता और भौतिक समृद्धि प्रदान नहीं कर पा रहे हैं, जिनका वादा लंबे समय से नवउदारवाद करता आया है। साथ ही, जैसे-जैसे यूएस के नेतृत्व वाला साम्राज्यवादी गुट आर्थिक और राजनीतिक रूप से अपनी शक्ति में गिरावट देख रहा है, वह उन दो क्षेत्रों में और अधिक ज़ोर लगा रहा है, जहाँ उसकी शक्ति अभी भी काफ़ी हद तक अप्रतिद्वंद्वी बनी हुई है: सांस्कृतिक उत्पादन और सैन्य शक्ति। हालाँकि इनकी अभिव्यक्तियाँ बहुत भिन्न हैं, लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही है—वर्तमान को बनाए रखना और भविष्य की संभावनाओं को सीमित करना। सैन्य आक्रामकता के माध्यम से, यूएस के नेतृत्व वाला गुट उन सभी देशों को दबाव में रखना चाहता है, जो ‘वाशिंगटन कन्शेंसस’ और निजी पूँजी के हितों के आगे झुकने से इनकार करते हैं, और इस तरह वह अधीनता को अस्वीकार करने वाले किसी भी राजनीतिक परिदृश्य को बंद कर देता है। सांस्कृतिक उत्पादन के साधनों पर अपने एकाधिकार के ज़रिए, इसका उद्देश्य न केवल सूचना को नियंत्रित करना है – यानी सत्य के रूप में स्वीकृत जानकारी को नियंत्रित करना – बल्कि शोषित जनसमूह की संस्कृति और मूल्यों को भी आकार देना है। इस प्रक्रिया में, यह हमारी कल्पना की सीमाओं को संकुचित कर देता है और अंततः इस बात को भी सीमित कर देता है कि हम किस प्रकार की आशा करने का साहस कर सकते हैं। आशा के अभाव में, श्रमिक वर्ग को दो प्रकार की राजनीतिक स्थितियों में धकेल दिया जाता है: या तो उसे अति-दक्षिणपंथ के कठोर निराशावाद की ओर धकेल दिया जाता है, जहाँ एक अलग भविष्य की कल्पना का ही उपहास किया जाता है; या फिर वह पलायनवादी पराजयवाद के अधीन हो जाता है, जो यह मान लेता है कि भविष्य पहले ही खो चुका है।

चीनी भाषा में ‘भविष्य’ की दो अवधारणाएँ यह स्पष्ट करने में मदद करती हैं कि यहाँ क्या दाँव पर लगा है। ‘未来’ (wèilái) शब्द, जिसका अर्थ भविष्य है—या शाब्दिक रूप से ‘जो अभी तक आया नहीं है’—दो भागों से मिलकर बना है: 未 (wèi) का अर्थ है ‘अभी नहीं’ या ‘नहीं हुआ’, और 来 (lái) का अर्थ है ‘आना’ या ‘पहुँचना’। साथ मिलकर, ये भविष्य की मूल विशेषता—उसकी अपूर्णता—पर ज़ोर देते हैं। निराशावाद और आशा के बीच का फ़र्क़ इसी में निहित है: भविष्य पूर्वनिर्धारित नहीं है। यह एक संभावना है, और यहीं मानव क्रिया की भूमिका सामने आती है।

इस संदर्भ में, आशा विचारों और भावनाओं के संघर्ष का मैदान बन जाती है। यही कारण है कि आशा को महज़ एक भावना से कहीं अधिक, एक अभ्यास के रूप में विकसित होना चाहिए – एक ऐसा अभ्यास जो जन शिक्षा और संस्कृति के माध्यम से निर्मित हो, इतिहास में निहित हो, और जिसे हमारे दैनिक जीवन में सक्रिय रूप से जिया जाए।

विचारों की लड़ाई

शासक वर्ग अपने मूल्यों—व्यक्तिवाद, निर्दयता और रूढ़िवाद—को बढ़ावा देकर वर्ग संबंधों और साझा वर्ग हितों को धुँधला करने का काम करता है। वह प्रभुत्वशाली वर्गों के अधीन लोगों को इस तरह प्रशिक्षित करता है कि वे राजनीतिक गतिविधियों को समय की बर्बादी, अव्यावहारिक या काल्पनिक मानकर तुरंत ख़ारिज कर दें, और सामूहिक कार्रवाई को या तो भोलापन या ख़तरनाक समझें। ऐसी परिस्थितियों में, आशा के व्यक्तिगत रूप से उत्पन्न होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसे एक अभ्यास के रूप में निर्मित करना होगा, जो संभावनाओं के क्षितिज को फिर से खोल सके और पूँजीवादी वर्तमान के रोज़मर्रा की ‘सामान्य समझ’ को चुनौती दे सके।

इसलिए, आशा को ठोस राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से संगठित करना आवश्यक है, जो संभावनाओं के क्षितिज को फिर से खोलें। इसके लिए हमें:

राजनीतिक कल्पना विकसित करनी होगी– वामपंथी शक्तियों को संगठित श्रम और सामाजिक संबंधों के वैकल्पिक रूपों का निर्माण करके भविष्य को स्पष्ट और समझने योग्य बनाना होगा। भविष्य की आशा को तब संगठित किया जा सकता है जब वह वर्तमान में लोगों की भौतिक परिस्थितियों को बदलने वाली ठोस कार्रवाइयों से जुड़ी हो, और जब श्रमिक वर्ग स्वयं को पूँजीवादी संकटों के दर्शक के बजाय इतिहास के नायक के रूप में पहचान सके।

पढ़ो ताकि सीख सको, और सीखो ताकि कर सको– हो ची मिन्ह ने कहा था, ‘आप हज़ार किताबें पढ़ सकते हैं, लेकिन अगर आप जो पढ़ते हैं उसे लागू नहीं करते, तो आप केवल किताबों की एक अलमारी हैं।’25 पढ़ना तब आशा का अभ्यास बनता है जब वह क्रिया से जुड़ता है। अध्ययन सामूहिक होना चाहिए और उन समस्याओं की ओर उन्मुख होना चाहिए जिनका सामना लोग अपने कार्यस्थलों, पड़ोस और संगठनों में करते हैं। उद्देश्य केवल ज्ञान का संचय नहीं है, बल्कि एक साझा भाषा, विश्लेषण और आत्मविश्वास का विकास करना है, जिसे व्यवहार में परखा जा सके।

लोकप्रिय प्रति-संस्कृति का विकास करें– एक प्रति-विचारधारा बिना प्रति-संस्कृति के नहीं बनाई जा सकती। इसका अर्थ है लोकप्रिय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के ऐसे रूपों का निर्माण करना जो व्यक्तिवाद और निराशावाद के प्रभाव को तोड़ें, गरिमा का निर्माण करें और एकजुटता को आकर्षक बनाएँ, साथ ही श्रमिक वर्ग की संस्कृति का सम्मान करें।

भविष्य की बात लोगों तक पहुँचाएँ– वामपंथ को अपने कार्यक्रम को ऐसे आसान रूप में बदलना चाहिए, जिसे लोग आसानी से समझ सकें। ‘शिक्षाप्रद’ (didactic) होने का अर्थ लोगों से ऊपर से बात करना नहीं है; इसका अर्थ है रणनीतिक होना और प्रस्तावों को इस तरह स्पष्ट रूप से संप्रेषित करना कि वे लोगों के अनुभवों से जुड़े हों और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाए जा सकें। उद्देश्य अमूर्तता से आगे बढ़कर दिशा प्रदान करना है, ताकि लोग समझ सकें कि क्या किया जा सकता है, किसके द्वारा, और किन संसाधनों के साथ।26

स्रोत की ओर लौटें- क्रांतिकारी इतिहास और संस्कृति और सामान्य रूप से इतिहास और संस्कृति को बचाएँ। इतिहास आशा का एक अभ्यास है क्योंकि यह इस विचार को तोड़ता है कि वर्तमान शाश्वत है। विघटन, सामूहिक संघर्ष और परिवर्तन के क्षणों की ओर लौटकर, लोग इस बात के प्रमाण प्राप्त करते हैं कि बदलाव संभव है और यह भी सीखते हैं कि उसे कैसे हासिल किया गया। इतिहास केवल पुरानी यादों में खोना नहीं है—यह रणनीति, त्याग और आत्मविश्वास का एक विद्यालय है।27

स्थायी प्रेरक बनें– वामपंथ को हर सामूहिक मंच पर काम करना चाहिए ताकि मजदूर वर्ग के विचार फैलाए जा सकें। उसे वहाँ उपस्थित होना चाहिए जहाँ लोग एकत्र होते हैं—एक अतिथि वक्ता के रूप में नहीं, बल्कि एक संगठित करने वाली शक्ति के रूप में। अंतोनियो ग्राम्शी के ‘नए बुद्धिजीवी’ की अवधारणा एक ‘निर्माता’ और ‘संगठक’ की है—एक ‘स्थायी प्रेरक’, जो कभी-कभार की वाकपटुता के बजाय व्यावहारिक जीवन से जुड़ा होता है।

भावनाओं की लड़ाई

शासक वर्ग को लगातार यह कोशिश करनी पड़ती है कि पूँजीवादी समाज में होने वाले शोषण और अभाव के कारण पैदा होने वाले लोगों के ग़ुस्से और असंतोष को एक अलग दिशा में मोड़ दे। असंतोष तब ख़तरनाक हो जाता है जब वह संगठित हो, जब वह अपने दुश्मन को पहचानता हो, और जब वह एकजुटता के साथ प्रतिक्रिया देता हो। इसलिए इसे लगातार सामूहिक संघर्ष से हटाकर डर, नाराज़गी, निराशा और हार मान लेने की ओर मोड़ दिया जाता है। आज यह संघर्ष और तीव्र हो गया है, क्योंकि आज का मीडिया और इंटरनेट ऐसा हो गया है कि युवा मज़दूरों को ऑनलाइन प्लैटफॉर्मों में खींच लिया जाता है। यहाँ उनके भीतर व्यक्तिगत सोच (सिर्फ अपने बारे में सोचने) को बढ़ावा मिलता है। उन्हें इसमें फँसाकर पैसा बनाया जाता है। इन माध्यमों का उनकी विवेकबुद्धि पर असर पड़ता है और उनकी चेतना कुंद होती है। इन प्लैटफॉर्मों पर कट्टर दक्षिणपंथी ताक़तों का असर रहता है।28 इन स्थानों में असंतोष को भाँपकर क्षणिक भावनात्मक भागीदारी के माध्यम से अस्थायी राहत दी जाती है। परिणाम यह नहीं होता कि असंतोष समाप्त हो जाए, बल्कि उसका (लाभकारी) प्रबंधन होता है—जिससे श्रमिक वर्ग अलग-थलग, विभाजित और मूकदर्शक हो जाता है। वह प्रतिक्रिया को ही राजनीति समझने लगता है।

इस परिदृश्य में, हमें ग़ुस्से और भ्रम को स्पष्टता में, स्पष्टता को आशा में, और आशा को सामूहिक कार्रवाई में बदलना होगा। इसके लिए आवश्यक है:

मीडिया साक्षरता- वामपंथ को श्रमिक वर्ग को आभासी स्थानों और तकनीकों की संरचना, उनके उद्देश्य (इच्छित और अनपेक्षित) और उनकी राजनीतिक अर्थव्यवस्था के बारे में शिक्षित करना होगा। इसका मतलब है प्रबंधित भागीदारी और वास्तविक शक्ति के बीच के अंतर को उजागर करना—पोस्ट करने और संगठित होने के बीच का फ़र्क़ दिखाना—और यह सिखाना कि शासक वर्ग कैसे इन आभासी मंचों पर अपने नियंत्रण के ज़रिए सूचना को नियंत्रित करता है, आक्रोश को बढ़ाता है और अलगाव को सामान्य बनाता है। लक्ष्य इन स्थानों से हटना नहीं है, बल्कि लोगों को उन्हें समझने, उपयोग करने और उनकी सीमाओं को पहचानने के उपकरण देना है।

ज़मीनी राजनीति- आभासी मंचों का उपयोग शिक्षा और लामबंदी के लिए करते हुए भी, वामपंथ को ऐसे अवसर बनाने होंगे जहाँ लोग सीधे तौर पर देख सकें कि वर्तमान को बदलकर बेहतर भविष्य कैसे बनाया जा सकता है। इसके लिए ऐसे संगठित अवसर जरूरी हैं जहाँ एल्गोरिदम की मध्यस्थता के बिना लोग मिल सकें, विचारों का आदान-प्रदान कर सकें, संगठित हो सकें, निर्णय ले सकें, सामूहिक कार्य कर सकें और उसके परिणाम देख सकें। उद्देश्य क्षणिक और सीमित रुचियों पर आधारित संपर्क से आगे बढ़कर साझा वर्ग हितों पर आधारित दीर्घकालिक संगठन बनाना है।

प्रति-मूल्य (काउंटर-वैल्यूज़)- वामपंथ को समाजवादी मूल्यों का विकास करना होगा और उन्हें राजनीतिक कार्रवाई के माध्यम से व्यवहार में लाना होगा। इसका अर्थ है एकजुटता, देखभाल, अनुशासन और भाईबंदी (कॉमरेडशिप) को केवल नारे नहीं, बल्कि वास्तविकता बनाना। मूल्य तब विश्वसनीय बनते हैं जब वे हमारे संगठन के तरीक़ों में दिखाई देते हैं—हम एक-दूसरे के साथ कैसे व्यवहार करते हैं, कैसे मिलकर काम करते हैं, मतभेदों को कैसे सुलझाते हैं, और जिन समुदायों की सेवा का दावा करते हैं, उनसे कैसे संबंध रखते हैं। ऐसी संस्कृति में, जो निर्दयी व्यक्तिवाद और निराशावाद को बढ़ावा देती है, समाजवादी मूल्यों को व्यवहार में दिखाना स्वयं भावनाओं की लड़ाई में एक रणनीति बन जाता है। यह एक अलग प्रकार के सामाजिक संबंधों की झलक देता है—और इस प्रकार यह स्पष्ट करता है कि अलग मूल्यों पर आधारित भविष्य का समाज कैसा हो सकता है।

आशा एक प्रैक्सिस के रूप में

यदि भविष्य ‘未来’ (wèilái) है—वह ‘अभी-नहीं’ जो आने वाला है—तो आशा वह संवेदना है जो इस ‘अभी-नहीं’ को खुला रखती है, और वह अभ्यास है जो इसे निराशावाद, तमाशे और समर्पण द्वारा बंद होने से रोकता है। शासक वर्ग ‘wèilái’ को एक क़ैदखाने में बदलने, वर्तमान को शाश्वत बनाने और पूँजीवादी असंतोष को निराशावाद या क्रूरता में बदलने का प्रयास करता है। इसके विपरीत, हमारी परंपरा यह कहती है कि आशा कोई निष्क्रिय आशावाद या सिर्फ़ उम्मीद नहीं है, बल्कि यह दुनिया के अधूरे स्वरूप की ओर एक संघर्षशील दृष्टि है—जो वैश्विक दक्षिण में गरिमा के लिए हुए संघर्षों में गढ़ी गई है। यह इसलिए ख़तरनाक है क्योंकि यह भौतिक है: यह चेतना को ऊँचा उठाती है और लोगों को मात्र सहन करने से कार्रवाई की ओर ले जाती है।

इसी कारण आशा को संरचना, अनुशासन और संगठन की आवश्यकता होती है। जब गतिशील समाज की संस्कृति और विचार पूँजीवादी ‘सामान्य समझ’ के दोहराव में बाधा डालते हैं, तो वे निर्णायक बन सकते हैं—यह भौतिकवाद का खंडन नहीं, बल्कि उसकी द्वंद्वात्मक पूर्णता है। इस अर्थ में, ‘大同’ (dàtóng)—‘सार्वभौमिक समरसता’ से युक्त एक आदर्श स्थिति—सिर्फ एक सजावटी कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसा क्षितिज है जो रणनीति को दिशा देता है। वहीं ‘小康’ (xiǎokāng, ‘मध्यम समृद्ध समाज’) उन ठोस क़दमों को दर्शाता है जो सीमित संसाधनों के भीतर भी गरिमा के साथ विकास को संभव बनाते हैं। आशा तब वास्तविक बनती है जब वह ‘将来’ (jiānglái, ‘भविष्य’), यानी ‘जो आने वाला है’, को एक वादे से बदलकर एक योजना में परिवर्तित कर देती है। कार्य केवल अमूर्त सपने देखना नहीं है, बल्कि एक ठोस यूटोपिया का निर्माण करना है—जो वास्तविक प्रवृत्तियों में निहित हो और अभ्यास के माध्यम से मज़बूत हो—ताकि ‘अभी-नहीं’ एक ठोस भविष्य में बदल सके, जिसे वर्तमान में ही निर्मित किया जा रहा हो।


अल्फोंसो सोतेनो फर्नांदेस (मेटेपेक, मेक्सिको राज्य, मेक्सिको), आर्बोल दे ला विदा (जीवन का वृक्ष), 1975, खुली भट्टी में पकाई गई मिट्टी पर वार्निश युक्त विनाइल रंग, 6 मी.

Notes

1 Tricontinental: Institute for Social Research, The Anti-Feminist Agenda of the Latin American Far Right, dossier no. 98, 3 March 2026, https://dev.thetricontinental.org/dossier-agenda-right-against-women/; Tricontinental: Institute for Social Research, The War on the Poor: Narcotics, Campesinos, and Capitalism, dossier no. 97, 3 February 2026, https://dev.thetricontinental.org/dossier-war-on-the-poor/; Tricontinental: Institute for Social Research, Imperialism Will Inevitably Be Defeated: The Re-Emergence of the Tricontinental Spirit, dossier no. 95, 9 December 2025, https://dev.thetricontinental.org/dossier-tricontinental-conference-60/; Tricontinental: Institute for Social Research, The Environmental Crisis Is a Capitalist Crisis, dossier no. 93, 14 October 2025, https://dev.thetricontinental.org/dossier-environmental-crisis/; Tricontinental: Institute for Social Research, How the World Looks from Tricontinental, dossier no. 90, 15 July 2025, https://dev.thetricontinental.org/dossier-tricontinental-anniversary-global-south-sovereignty/; Tricontinental: Institute for Social Research, Hyper-Imperialism: A Dangerous Decadent New Stage, Contemporary Dilemmas no. 4, 23 January 2024, https://dev.thetricontinental.org/studies-on-contemporary-dilemmas-4-hyper-imperialism/.

2 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, ‘खास किस्म के चरम दक्षिणपंथ पर दस विचार: तैंतीसवाँ न्यूज़लेटर (2024)’, 15 अगस्त 2024, https://dev.thetricontinental.org/hi/newsletterissue/hindi-nl33-daxinpanth-pas-das-vichar/.

3 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, सुबह: मार्क्सवाद और राष्ट्रीय मुक्ति, https://dev.thetricontinental.org/hi/dawn_marxvaad_rashtriya_mukti/.

4 Mark Fisher, Capitalist Realism: Is There No Alternative? (Winchester: Zero Books, 2009).

5 Tricontinental: Institute for Social Research, The Environmental Crisis Is a Capitalist Crisis; Tricontinental: Institute for Social Research, Class Struggle and Climate Catastrophe in the Sahel, dossier no. 99, April 2026, https://dev.thetricontinental.org/dossier-class-struggle-climate-sahel/; Tricontinental: Institute for Social Research, Africa’s Faustian Bargain with the International Monetary Fund, dossier no. 88, 13 May 2025, https://dev.thetricontinental.org/dossier-faustian-bargain-imf-africa/.

6 Ernst Bloch, The Principle of Hope, Volume 1 (Cambridge: MIT Press, 1986) and The Spirit of Utopia (Palo Alto: Stanford University Press, 2000).

7 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, बांडुंग भावना, डोसियर संख्या 87, 8 अप्रैल 2025, https://dev.thetricontinental.org/hi/bandung-bhawna/; Tricontinental: Institute for Social Research, Imperialism Will Inevitably Be Defeated; Tricontinental: Institute for Social Research, The 80th Anniversary of the Victory in the World Anti-Fascist War, Understanding Who Saved Humanity: A Restorationist History, Contemporary Dilemmas no. 5, 12 November 2025, https://dev.thetricontinental.org/the-80th-anniversary-of-the-victory-in-the-world-anti-fascist-war/.

8 Tricontinental: Institute for Social Research, The False Concept of Populism and the Challenges facing the Left: A Conjunctural Analysis of Politics in the North Atlantic, dossier no. 83, 17 December 2024, https://dev.thetricontinental.org/the-false-concept-of-populism-and-the-challenges-facing-the-left-north-atlantic/.

9 Tricontinental: Institute for Social Research, Imperialist War and Feminist Resistance in the Global South, dossier no. 86, 5 March 2025, https://dev.thetricontinental.org/dossier-imperialist-war-and-feminist-resistance-in-the-global-south/; Tricontinental: Institute for Social Research, The Political Organisation of Brazil’s Landless Workers’ Movement (MST), dossier no. 75, 16 April 2024, https://dev.thetricontinental.org/dossier-75-landless-workers-movement-brazil/.

10 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, ‘खास किस्म के चरम दक्षिणपंथ पर दस विचार: तैंतीसवाँ न्यूज़लेटर (2024)’, 15 अगस्त 2024.

11 Tricontinental: Institute for Social Research, Serve the People: The Eradication of Extreme Poverty in China, Studies on Socialist Construction no. 1, https://dev.thetricontinental.org/studies-1-socialist-construction/; Tricontinental: Institute for Social Research, The Art of the Revolution will be Internationalist, dossier no. 15, https://dev.thetricontinental.org/the-art-of-the-revolution-will-be-internationalist/.

12 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, ‘खास किस्म के चरम दक्षिणपंथ पर दस विचार: तैंतीसवाँ न्यूज़लेटर (2024)’, 15 अगस्त 2024.

13 Tricontinental: Institute for Social Research, How Neoliberalism Has Wielded ‘Corruption’ to Privatise Life in Africa, dossier no. 82, 24 November 2024, https://dev.thetricontinental.org/dossier-how-neoliberalism-has-wielded-corruption-to-privatise-africa/.

14 Tricontinental: Institute for Social Research, Life or Debt: The Stranglehold of Neocolonialism and Africa’s Search for Alternatives, dossier no. 63, 9 June 2023, https://dev.thetricontinental.org/pan-africa/dossier-63-african-debt-crisis/.

15 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, वर्ग संघर्ष: बड़ी प्रौद्योगिकी कम्पनियाँ और वर्तमान समय की अन्य चुनौतियाँ, डोसियर संख्या 46, 1 नवंबर 2021, https://dev.thetricontinental.org/hi/varg-sangharsh-badi-pradyogiki-aur-kampniyan/.

16 Tricontinental: Institute for Social Research, The Congolese Fight for Their Own Wealth, dossier no. 77, 25 June 2024, https://dev.thetricontinental.org/dossier-77-the-congolese-fight-for-their-own-wealth/; Tricontinental: Institute for Social Research, The Environmental Crisis Is a Capitalist Crisis.

17 Tricontinental: Institute for Social Research, NATO: The Most Dangerous Organisation on Earth, dossier no. 89, 10 June 2025, https://dev.thetricontinental.org/dossier-nato-the-most-dangerous-organisation/; Tricontinental: Institute for Social Research, Hyper-Imperialism.

18 Karl Marx, Capital: A Critique of Political Economy, Volume 1, trans. Ben Fowkes (London: Penguin Books, 1976).

19 World Bank, ‘Labor force, total’, World Development Indicators, https://data.worldbank.org/indicator/SL.TLF.TOTL.IN; International Labour Organization, ‘Employment in agriculture (% of total employment)’, ‘Employment in industry (% of total employment)’, and ‘Employment in services (% of total employment)’, ILOSTAT modelled estimates, https://data.worldbank.org/indicator/SL.AGR.EMPL.ZS, https://data.worldbank.org/indicator/SL.IND.EMPL.ZS, and https://data.worldbank.org/indicator/SL.SRV.EMPL.ZS; Datta, Namita; Rong, Chen; Singh, Sunamika; Stinshoff, Clara; Iacob, Nadina; Nigatu, Natnael Simachew; Nxumalo, Mpumelelo; and Klimaviciute, Luka, Working Without Borders: The Promise and Peril of Online Gig Work, International Bank for Reconstruction and Development / The World Bank, 2023, https://openknowledge.worldbank.org/entities/publication/ebc4a7e2-85c6-467b-8713-e2d77e954c6c?utm.

20 Tricontinental: Institute for Social Research, The Anti-Feminist Agenda of the Latin American Far Right.

21 Tricontinental: Institute for Social Research, The New Intellectual, dossier no. 12, 11 February 2019, https://dev.thetricontinental.org/the-new-intellectual/.

22 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की खोज, डोसियर संख्या 84, 14 जनवरी 2025, https://dev.thetricontinental.org/hi/vaishvik-dakshin-ke-liye-vikas-ke-naye-siddhant-ki-khoj/.

23 Tricontinental: Institute for Social Research, Imperialism Will Inevitably Be Defeated; Tricontinental: Institute for Social Research, The Bandung Spirit.

24 Tricontinental: Institute for Social Research, The Sahel Seeks Sovereignty, dossier no. 91, 12 August 2025, https://dev.thetricontinental.org/dossier-sahel-alliance-sovereignty/.

25 Ho Chi Minh, ‘Modifying Working Methods’, in Selected Works, vol. 2 (Hanoi: Foreign Languages Publishing House, 1961), 496.

26 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की खोज.

27 Tricontinental: Institute for Social Research, ‘Cabral: A Revolutionary of Double Belonging: The Ninth Pan-Africa Newsletter (2024)’, 27 September 2024, https://dev.thetricontinental.org/pan-africa/newsletterissue-cabral-centenary/.

28 Julian Assange, When Google Met Wikileaks (New York: OR Books, 2014) and Franklin Foer, World Without Mind: The Existential Threat of Big Tech (New York: Penguin Press, 2017).

भारतीय अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल का दौर

इस डोसियर में भारतीय कलाकार गिगी स्कारिया की कलाकृतियाँ प्रस्तुत की गई हैं। उन्होंने चित्रकला, फ़ोटोग्राफ़ी, इंस्टॉलेशन आर्ट, मूर्तिकला और वीडियो के ज़रिए भारत के शहरी और ग्रामीण जीवन के बदलावों तथा देश के विभिन्न सामाजिक समूहों पर पड़ने वाले उनके प्रभावों को अभिव्यक्त किया है। प्रस्तुत मूर्तियाँ और इंस्टॉलेशन भारत के लोगों के जीवंत अनुभवों का स्मारक हैं— विरोधाभासों, बढ़ती असमानताओं और अविकास से जन्मी अधूरी आकांक्षाओं के बीच।


गिगी स्कारिया, व्हील, 2009

भूमिका

दुनिया की आर्थिक व्यवस्था लगातार बदल रही है और भूमंडलीकरण एक लंबे संकट से गुज़र रहा है। नब्बे के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) की अगुआई में पश्चिमी पूंजी ने व्यापार में उदारीकरण और वैश्विक आपूर्ति शृंखला को बढ़ावा दिया, इसने वैश्विक दक्षिण और उत्तर के बीच श्रम की लागत के अंतर का बेजा फ़ायदा उठाया। आज ट्रम्प के नेतृत्व में वर्चस्ववादी यूएस अपनी ही प्रसारित इन प्रक्रियाओं को कमज़ोर कर रहा है ताकि भूमंडलीकरण के अनचाहे परिणामों को पलटा जा सके: ये परिणाम हैं यूएस का आर्थिक पतन और वैश्विक दक्षिण की एक उभरती हुई ताक़त का प्रौद्योगिकी विकास।

हालाँकि दुनिया की आर्थिक व्यवस्था नया आकार ले रही है, लेकिन इसके बीच भारतीय अर्थव्यवस्था उदारीकरण की पैंतीस सालों की जकड़न में क़ैद है। इसकी संरचनात्मक समस्याएँ हैं जिनकी जड़ गहरी असमानताओं में है और जो उदारवादी नीतियों से और भी बढ़ गई हैं। इन समस्याओं ने एक व्यापक, तकनीकी रूप से विकसित घरेलू औद्योगिक ढाँचा तैयार नहीं होने दिया। भारतीय उद्योगों की इस ख़राब हालत के कारण देश के श्रमबल का बड़ा हिस्सा इनसे बाहर है और रोज़ी-रोटी कमाने भर के लिए असुरक्षित, कम आय, कम उत्पादकता वाले काम करने को मजबूर है। नतीजतन देश की ज़्यादातर आबादी ग़रीबी में जीने को मजबूर है, जबकि अधिकारिक दावे किए जा रहे हैं कि इसमें भारी गिरावट आ रही है जो कि जबरन गढ़े गए आँकड़ों के सहारे टिके हैं।1

उद्योगों के निरंतर अल्पविकास, ख़ासतौर से विनिर्माण क्षेत्र में, का कारण भारत के भूमंडलीकरण से रिश्ते में छिपा है। उदारीकरण का वादा था कि वह भारत की छिपी निहित संभवनाओं को आज़ाद कर सकता है, लेकिन इसने एक ऐसा रुझान तैयार किया जिसके केंद्र में विऔद्योगीकरण, संगठित रोज़गार को ख़त्म करना, उत्पादक क्षमता को कमज़ोर करना और सामाजिक असमानताओं को बढ़ाना है।

नरेंद्र मोदी सरकार की हिंदुत्व की राजनीति भारत के ‘विश्वगुरु’ होने का डंका पीट रही है, लेकिन इसके ऊँची विकास दर के दावे विवादास्पद आँकड़ों पर टिके हैं। जब सरकार से इसके बारे में सवाल किए जाएँ तो जवाब में गोलमोल बातें और दूसरों पर आरोप लगा दिए जाते हैं। 2014 में जब से मोदी सत्ता में आए हैं तब से उनकी राजनीतिक रणनीति रही है कि ख़राब हालात के लिए विपक्ष और पिछली सरकारों को दोषी क़रार दिया जाए। और उनके प्रधानमंत्री पद पर रहने के एक दशक बाद भी यही रणनीति जारी है। इसमें कोई दोराय नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा ख़स्ता हालत का कारण हैं नब्बे के दशक की शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा लागू नवउदारवादी नीतियाँ, जिन्हें बाद की सब सरकारों ने भी अपनाया, इनमें मोदी-नीत भाजपा सरकार भी शामिल है जो इन नीतियों की सबसे कट्टर समर्थक है। 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने लंबे शासनकाल में मोदी ने भारतीय और विदेशी पूंजी की नज़र में अपनी नवउदारवादी छवि को और भी चमकाया।

लेकिन वे जिस आक्रामकता से इन्हीं नीतियों के और भी भयानक रूप को लागू कर रहे हैं उनकी वजह से समस्याएँ और बढ़ गई हैं, असमानता की खाई गहरी होती जा रही है और संकट बढ़ता जा रहा है। प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद से उन्होंने कई नई नीतियों की घोषणा की जैसे मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, डिज़ाइन इन इंडिया और डिज़ाइन फ़ॉर द वर्ल्ड। इन नई पहलों का काम था कि ये विश्व बाज़ार के लिए भारत में डिज़ाइन और विनिर्माण के क्षेत्र में विदेशी पूंजी लाएँ, भारतीय स्टार्टअपों को नए तकनीकी क्षेत्रों में काम करने और वैश्विक स्तर के हिसाब से भारतीय श्रमबल के कौशल का विकास करें – ये सब काम भारतीय विनिर्माण में फिर से जान फूँकने के लिए किया जाना था लेकिन पश्चिमी बाज़ारों की ज़रूरतों के हिसाब से। सच्चाई यह है कि ये सब क़दम विनिर्माण को मज़बूत करने या विऔद्योगिकरण को पलटने में असफल रहे हैं। इनमें से अधिकतर सिर्फ़ कॉर्पोरेटों को सब्सिडी और करों में छूट देने का ही काम करते हैं, इस उम्मीद में कि इससे अपने आप ही औद्योगिक विस्तार हो जाएगा, ज़ाहिर है इसके नतीजे काफ़ी ख़राब रहे।

इसी तर्ज़ पर जो एक क़दम उठाया गया था, जिसका काफ़ी प्रचार किया गया, वह है उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना। यह चौदह उद्योगों के लिए बनाई गई जिनमें से इलेक्ट्रॉनिक्स सबसे आगे रहा, इस क्षेत्र की भारतीय और विदेशी कंपनियों को उत्पादन के लिए सरकार ने सबसे ज़्यादा सब्सिडी दी। लेकिन यह योजना मुख्य रूप से आयातित घटकों की असेंबलिंग के लिए ही सब्सिडी देती है, इससे न तो भारत में बहुत अधिक धन आता है है और न ही तकनीकी क्षमता। भारत में बने स्मार्टफ़ोनों जैसे सामान में अधिकतर मूल्य वृद्धि विदेशों में ही होती है जबकि इन सब्सिडियों का बोझ आख़िरकार सार्वजनिक निवेश और सरकार के सामाजिक ख़र्च में कटौती के ज़रिए जनता को ही उठाना पड़ता है। भारतीय अर्थव्यवस्था और उद्योगों के विकास में जो संरचनात्मक रुकावटें हैं उन्हें कॉर्पोरेटों को सब्सिडी देकर या बेतहाशा विदेशी निवेश से हटाया नहीं जा सकता; बल्कि ये नीतियाँ उसी संरचनात्मक बदहाली को फिर से स्थापित करती है जो भारत को आज़ादी के समय विरासत में मिली थी, जो उदारीकरण के बाद कई गुना बढ़ गई।


गहन असमानताएँ: आज़ादी के बाद औद्योगीकरण की रुकावटें

1947 में जब भारत आज़ाद हुआ तो प्रौद्योगिकी और औद्योगिक आत्मनिर्भरता को बेहद अहम माना गया – सिर्फ़ इसलिए नहीं कि राजनीतिक आज़ादी बरक़रार रखी जा सके और पश्चिम के साथ औपनिवेशिक आर्थिक संबंधों को बदला जा सके, इसलिए भी कि बेरोज़गार खेत मज़दूरों को उद्योगों में लाकर उनका जीवन स्तर बढ़ाया जा सके। पंचवर्षीय योजनाओं के ज़रिए भारत ने औद्योगीकरण के एक तेज़ रफ़्तार कार्यक्रम की अपनी यात्रा शुरू की, यह कार्यक्रम सरकारी बड़े उद्योगों के विकास के इर्द-गिर्द चला। इस दौरान निजी पूंजी ने राज्य द्वारा निर्मित इस आधार से उपभोग की वस्तुओं का उत्पादन किया। नतीजतन, आज़ादी के बाद के लगभग पंद्रह साल (लगभग 1947-1962) में सार्वजनिक क्षेत्र के नेतृत्व में अभूतपूर्व औद्योगीकरण का दौर देखा, जिसमें जीडीपी का 7% से 15.9% हिस्सा विनिर्माण का था – इसके बाद औद्योगीकरण का यह स्तर नहीं देखा गया।2 लेकिन जल्दी ही औद्योगीकरण की प्रक्रिया का सामना हुआ भारतीय समाज की गहन कृषि संबंधी और वर्गीय असमानताओं से।

अधिकांश भूमि का स्वामित्व एक छोटे-से ग्रामीण अभिजात वर्ग के पास था जबकि जनता का बड़ा हिस्सा भूमिहीन था और रोज़मर्रा की ज़रूरतों तक के लिए जूझ रहा था। समतामूलक भूमि सुधारों के अभाव में व्यापक ग़रीबी ने घरेलू माँग को कमज़ोर कर एक अंदरूनी रुकावट खड़ी की जिसकी वजह से भारतीय उद्योग निरंतर विकास के लिए ज़रूरी स्तर हासिल नहीं कर पाए। इसी दौर में अभिजात वर्ग के पश्चिमी ढर्रे के उपभोग के आयात केंद्रित तरीक़े ने विदेशी मुद्रा की कमी पैदा कर विकास को विदेशी जकड़न में भी डाल दिया।

भारत ने आयात को कम करने के लिए औद्योगीकरण की जो नीति अपनाई, वह भले ही वह व्यापक और गतिशील औद्योगिक क्षेत्र का निर्माण न कर पाई हो, लेकिन इसने देश के कुछ चुनिंदा बड़े व्यावसायिक घरानों वाले पूंजीपति वर्ग को ज़रूर मज़बूत किया। इन घरानों ने अपनी मौजूदगी को प्रभावी बनाया और राज्य की नीतियों पर असर डालने की अपनी क्षमता बढ़ाई।

एक तरफ़ दबदबे वाले भूस्वामी और पूंजीपति थे और दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता, भूमिहीन मज़दूर और औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वालों का छोटा सा वर्ग, राज्य ने इस दोनों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई। सत्ताधारियों ने ऐसी नीतियों से किनारा किया जो अभिजात वर्ग के हितों के ख़िलाफ़ थीं – जैसे सही अर्थों में कृषि सुधार या संपत्तिधारी वर्गों पर पर्याप्त कर लगाना। इसका नतीजा हुआ कि राज्य द्वारा किया जा रहा औद्योगीकरण, प्रगतिशील कराधान (मोटे तौर पर, आय के आधार पर कर लगाना) की बजाय राजकोषीय घाटे पर निर्भर हो गया। विस्तारवादी राजकोषीय नीति (आर्थिक प्रगति के लिए सरकार द्वारा खर्च में बढ़ोतरी और करों में कटौती) के हर दौर ने ज़्यादा से ज़्यादा अधिशेष बड़े बुर्जुआ तक पहुँचाकर असमानताओं को और बढ़ाया। संचय की उनकी लालसा तो बढ़ती गई लेकिन संकीर्ण घरेलू बाज़ार ने उनकी संचय की संभावना को सीमित रखा। इसलिए भारतीय बुर्जुआ वर्ग के हाथों में पहुँचे निवेश करने योग्य अधिशेष का काफ़ी बड़ा हिस्सा औद्योगिक विस्तार की बजाय अन्य जगहों पर लगाया गया।

नतीजतन, औद्योगीकरण की प्रक्रिया अस्थिर और रुक-रुक कर आगे बढ़ी, कयोंकि राज्य द्वारा समन्वित विस्तार का हर प्रयास जल्दी ही उन्हीं संरचनात्मक बाधाओं से टकराता रहा। ये अनसुलझी बाधाएँ गंभीर भुगतान संतुलन संकट में बदल गईं, इसके साथ भारत ने एक प्रमुख व्यापारिक एवं वित्तीय सहयोगी यानी सोवियत रूस को भी खो दिया (रूबल-रुपए व्यापार ने भारत को वैश्विक मुद्रा में आए झटकों से बचाए रखा था)। अंतत: इस सबके चलते भारत 1991 में नवउदारवादी मोड़ पर निहत्था खड़ा हो गया, एक ऐसी व्यवस्था जो ब्रेटन वुड्ज़ संस्थानों (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक) द्वारा संचालित थी।

उदारीकरण के बाद

1991 में भारत ने औपचारिक तौर पर अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण कर दिया, लेकिन इसने औद्योगिक विकास के सामने खड़ी रुकावटों को दूर करने के कोई ख़ास प्रयास नहीं किए। बल्कि इसने भारतीय बुर्जुआ के लिए पूंजी संचय का काम आसान कर दिया और पहले आयात नियंत्रण के ज़रिए अभिजात वर्ग के उपभोग पर जो कुछ नियंत्रण किया गया था उसे पूरी तरह ख़त्म कर दिया। यह सब एक मजबूत घरेलू विनिर्माण आधार विकसित करने की कठिनाइयों के बिना हासिल किया गया।

भारत की अपनी क्षमता भले ही गिरती गई लेकिन भारतीय अभिजात वर्ग विदेशों में बनी उपभोग की चीज़ों का मज़ा उठाता रहा और एक अल्पविकसित देश में रहते हुए भी दुनिया की बेहतरीन जीवनशैली का लुत्फ़ लेता रहा। इस प्रक्रिया ने भारतीय पूंजी का तेज़ रफ़्तार और अबाधित संचय होने दिया, चाहे वह सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों और प्राकृतिक संसाधनों पर अतिक्रमण के ज़रिए हो, घरेलू बाज़ार के आयात पर ज़ोर देने वाले उत्पादन में विस्तार के माध्यम से या छोटे उत्पादकों, व्यापारियों और लघु उद्योगपतियों को ख़त्म करके।

गिगी स्कारिया, अनटाइटल्ड, 2020

भारतीय नवउदारवाद के चार सिद्धांत

भारत में नवउदारवाद चार सिद्धांतों पर आधारित है, जिनसे सीधे तौर पर भारतीय विनिर्माण कमज़ोर हुआ है: व्यापार बाधाओं को हटाने का सिद्धांत; निजीकरण को बढ़ावा देने और सार्वजनिक क्षेत्र को कमज़ोर करने का सिद्धांत; सार्वजनिक ख़र्च में कटौती का सिद्धांत; और अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी के लिए खोलने का सिद्धांत, जिसके तहत उत्पादक पूंजी (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, या एफडीआई) तथा वित्तीय पूंजी (पोर्टफोलियो निवेश) दोनों के लिए रास्ता बनाया गया। इनसे निकली नीतियों ने मिलकर एक ऐसा पैटर्न रचा है, जहाँ विकास, ऋण और विदेशी वित्तीय प्रवाह पर निर्भर है, न कि औद्योगीकरण और स्वायत्त तकनीकी विकास पर।

व्यापार उदारीकरण

भारत ने अपनी टैरिफ बाधाओं को 1990 के दशक की शुरुआत में हटाना शुरू किया, जिसके कारण साल 1995 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत को सदस्यता मिली। कृषि उत्पादों पर टैरिफ में बड़ी कटौती के चलते, शुरू के सालों में ही गहरा कृषि संकट पैदा हो गया, जिसके ख़िलाफ राजनीतिक विरोध भी बढ़ा।3 इसके कारण 1996 के बाद से कृषि क्षेत्र में टैरिफ कटौती को रोकना पड़ा। लेकिन, विनिर्माण क्षेत्र में उदारीकरण जारी रहा।

साल 2000 के बाद के दौर में, भारत ने आयात-निर्यात पर लगी पाबंदियाँ और तेज़ी से घटानी शुरू कर दीं।4 विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान तंत्र के अनुरूप चलने के लिए, जिस पर अमेरिका और यूरोपीय संघ लगातार दबाव डाल रहे थे, भारत को वे आख़िरी संरक्षात्मक दीवारें भी गिरानी पड़ीं जो देश के छोटे व मझोले उद्योगों को सस्ते विदेशी माल से बचा रही थीं।

‘मुक्त’ व्यापार को औद्योगिक विकास से ऊपर रखने के फ़ैसले ने घरेलू विनिर्माण को नुकसान पहुँचाया, खास तौर पर उन क्षेत्रों में जो मशीनें (पूंजीगत वस्तुएँ) और उत्पादन की बुनियादी सामग्री (मध्यवर्ती वस्तुएँ) बनाते हैं। औसत आयात शुल्क तो कम किए ही गए थे, लेकिन मशीनों और बुनियादी सामग्रियों पर लगने वाला शुल्क, सीधे इस्तेमाल होने वाली तैयार वस्तुओं (उपभोक्ता वस्तुओं) के मुक़ाबले काफ़ी कम था। इसका मतलब यह हुआ कि टैरिफ व्यवस्था ने भारत में उपभोक्ता वस्तुएँ (तैयार सामान) बनाने वाली कंपनियों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से एक सीमित सुरक्षा (‘ढाल’) दी, लेकिन वे भारतीय कंपनियाँ जो वो मशीनें या कच्चा माल बनाती थीं जिनसे ये तैयार सामान बनते हैं, उनके पास कोई ऐसी सुरक्षा नहीं थी। उन्हें सीधे सस्ते आयातों से मुक़ाबला करना पड़ा।

नई टैरिफ व्यवस्था से टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं का निर्माण करने वाली घरेलू और विदेशी फर्मों को लाभ हुआ। ऐतिहासिक रूप से घरेलू बाज़ार के लिए उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करने वाली बड़ी भारतीय कंपनियों ने घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को विकसित करने के बजाय सस्ती मशीनरी और मध्यवर्ती वस्तुओं को आयात करने का रास्ता चुना। विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तो भारत को मुख्य रूप से एक असेंबली बेस के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय विनिर्माण की प्रक्रिया आयातों पर कहीं अधिक निर्भर हो गई।5 उदाहरण के लिए, फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र में, सक्रिय औषधीय घटक (एपीआई) के उत्पादन में भारत काफ़ी हद तक आत्मनिर्भर था। लेकिन उदारीकरण के बाद भारत फार्मास्यूटिकल इंटरमीडिएट्स (दवाएँ बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली रासायनिक सामग्री) के आयात पर निर्भर हो गया। भारतीय फार्मास्यूटिकल उद्योग अब 70% एपीआई चीन से आयात करता है, कुछ दवाएँ, जैसे पेनिसिलिन, पूरी तरह से चीनी आयात पर निर्भर हैं।6

आयात पर भारी निर्भरता ने पूंजीगत और मध्यवर्ती वस्तुओं के घरेलू उत्पादन को कमज़ोर किया।7 घरेलू पूंजीगत वस्तु उद्योग तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देता है, इसके कमज़ोर होने के साथ-साथ भारतीय उद्योग की तकनीकी क्षमताएँ भी सीमित होती गईं। और सीमित तकनीकी क्षमताओं के चलते देश का विनिर्माण क्षेत्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा में लगातार कमज़ोर होता गया।

सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण

1991 के बाद सार्वजनिक क्षेत्र को आक्रामक निजीकरण और लगातार उपेक्षा से व्यवस्थित रूप से कमज़ोर किया गया, जिसका विनिर्माण पर भी असर हुआ। भारत का पूंजीगत वस्तु उद्योग, सार्वजनिक उद्यमों का बड़ा हिस्सा था, विद्युत मशीनरी, मशीन टूल्स, प्रक्रिया संयंत्र उपकरण, अर्थ-मूविंग उपकरण और औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स का उत्पादन करता था। व्यापार उदारीकरण और राज्य की अनदेखी के बीच यह क्षेत्र तबाह हो गया। इन भारी उद्योगों को घटक आपूर्ति करने वाले सहायक छोटे और मंझोले उद्यम भी आयात प्रतिस्पर्धा और संस्थागत समर्थन ख़त्म होने के कारण कमज़ोर होते गए।

आज उद्योग और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्रीय स्थान रखता है। ऐसे में 1990 के दशक में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की दुर्दशा, सार्वजनिक क्षेत्र की अनदेखी और व्यापार उदारीकरण से हुए संयुक्त नुक़सान का एक प्रमाण है।

1970 के दशक में, भारत ने सार्वजनिक कंपनियों के ज़रिए घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर उद्योग बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण क़दम उठाए थे। इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) ने परमाणु और रक्षा अनुप्रयोगों के लिए स्वदेशी नियंत्रण प्रणालियाँ विकसित कीं। अस्सी के दशक में सरकार ने सेमीकंडक्टर कॉम्प्लेक्स लिमिटेड (एससीएल) और हिंदुस्तान कंप्यूटर्स लिमिटेड स्थापित किए ताकि देश सेमीकंडक्टर, एकीकृत सर्किट और कंप्यूटिंग क्षमताएँ विकसित की जाएँ। भारत ने एससीएल की स्थापना 1984 में की थी। ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (TSMC) इसके तीन साल बाद शुरू हुई थी, लेकिन आज वैश्विक सेमीकंडक्टर बाज़ार में उसकी बादशाहत है।

उदारीकरण के बाद सरकार ने अपने इन प्रयासों को त्याग दिया। टैरिफ सुरक्षा हटाने तथा राज्य का समर्थन वापस लेने के साथ ही देश का उभरता इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र तबाह हो गया। भारत ने 1997 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सूचना प्रौद्योगिकी समझौते (आईटीए) पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत कई इलेक्ट्रॉनिक्स वस्तुओं पर टैरिफ हटाए गए और मज़बूत स्थानीय उद्योग खड़े करने के लिए आवश्यक नीतिगत गुंजाइश भी ख़त्म हो गई। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में विनिर्माण क्षमताओं में निवेश करने के बजाय, बाद की सभी सरकारों ने निर्यातोन्मुख मॉडल को बढ़ावा दिया। यानी विनिर्माण (चीज़ें बनाना) के बजाय सिर्फ पश्चिमी कंपनियों के लिए निम्न व मध्यम स्किल वाली आईटी और बैक-ऑफिस सेवाओं के निर्यात पर ज़ोर दिया गया। इस तरह इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में लॉन्ग-टर्म तकनीकी विकास रुक गया, जिसके परिणाम चौंकाने वाले हैं: आज, भारत अपने 80% आईटी हार्डवेयर, 70% इलेक्ट्रॉनिक्स घटक (जिसमें से 62% चीन से) और 90% दूरसंचार उपकरण आयात करता है।8 यहाँ तक कि घरेलू स्तर पर असेंबल किए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स भी आयातित घटकों पर निर्भर हैं, जिनमें स्थानीय मूल्यवर्धन बहुत कम होता है। सार्वजनिक क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के बर्बाद होने के बाद आज भारत काफ़ी हद तक तकनीकी रूप से दूसरों पर निर्भर है।9

इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के साथ जो कुछ किया गया, वही दूसरे क्षेत्रों में दोहराया गया है – सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में पूंजीगत वस्तुओं और भारी उद्योगों की या तो उपेक्षा की है या उन्हें बेच दिया है। इन क्षेत्रों में बड़े भारतीय निवेशक पैसा लगाने से बचते हैं, जबकि तकनीकी विकास के लिए यह बहुत ज़रूरी है।

गिगी स्कारिया, पोस्ट लैंड, 2008

सार्वजनिक ख़र्च में कटौती

नवउदारवादी दौर में अपनाई गई सार्वजनिक ख़र्च में कटौती की नीति विकास की कच्ची नींव से लेकर कमज़ोर उत्पादन तक, भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े संकट का एक प्रमुख कारण है। भारत अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी और उससे जुड़े निवेश प्रवाह के लिए इतना मोहताज हो गया कि सरकारें इस बात से डरने लगीं कि देश में बुनियादी ढाँचे या उद्योगों पर ख़र्च बढ़ाने की स्थिति में विदेशी निवेशक अपना पैसा वापस लेकर चले न जाएं। 2003 में, अंतरराष्ट्रीय वित्त जगत को ख़ुश करने के लिए, भारत ने राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम) लागू किया, जिसके बाद राजकोषीय घाटे (फिस्कल डेफिसिट) की सीमा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3% पर तय कर दी गई।10 हालाँकि इस नियम को अक्सर तोड़ा जाता रहा है, पर फिर भी यह सीमा एक आधार बिंदु बन गई, जिसे घरेलू उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र या कृषि के समर्थन में सार्वजनिक ख़र्च रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। इस दौर में एक के बाद एक सरकार लगातार मुनाफ़ा कमा रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों से अपना हिस्सा निजी कंपनियों को बेचती रही है और अपना निवेश योग्य फंड भी बजट के ख़र्चों को पूरा करने में झोंक रही है। जबकि कॉर्पोरेट मुनाफे पर टैक्स लगातार कम किए गए हैं। इससे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के पास विस्तार और तकनीकी के आधुनिकीकरण के लिए फंड लगतार कम होता गया है। एक तरफ़ भारत की बड़ी प्राइवेट कंपनियों ने लगतार मुनाफ़ा कमाने के बावजूद शोध एवं विकास (आरएंडडी) में निवेश करने में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई है, दूसरी तरफ़ सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को ऐसा करने के साधनों से ही वंचित कर दिया गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत का विनिर्माण क्षेत्र आयातित तकनीकों पर निर्भर है।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई)

1991 में उदारीकरण के बाद से, भारत सरकारों ने उद्योग और वित्त, दोनों क्षेत्रों में विदेशी पूंजी के लिए रुकावटों को लगतार ख़त्म किया है। आज, जुआ, परमाणु ऊर्जा और रेलवे जैसे कुछ क्षेत्रों को छोड़कर – जहाँ भारतीय निजी फ़र्में भी प्रतिबंधित हैं –लगभग हर क्षेत्र में, अक्सर 100% विदेशी स्वामित्व, के साथ एफडीआई हो सकता है। भारत ने पूंजी खाते (कैपिटल अकाउंट) पर प्रतिबंधों को भी ढीला किया है, जिससे अल्पकालिक सट्टा वित्त (स्पेक्युलेटिव फाइनेंस) की आवक बढ़ी है। आधिकारिक आँकड़े दिखाते हैं कि साल 2000 के बाद से कुल विदेशी निवेश प्रवाह में औसतन लगभग 30% अस्थिर विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) के रूप में आया है। यहाँ तक कि जिसे एफडीआई के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, उसमें भी एक बड़ा हिस्सा सट्टा पूंजी का है। क्योंकि भारत में साल 2000 के बाद से एफडीआई की नई परिभाषा में किसी भारतीय कंपनी में 10% से अधिक की इक्विटी हिस्सेदारी वाले पोर्टफोलियो होल्डिंग्स भी शामिल हैं।11

आधिकारिक तौर पर विदेशी निवेश को औद्योगीकरण, तकनीकी उन्नयन और निर्यात वृद्धि तेज़ करने के साधन के रूप में प्रचारित किया गया था, लेकिन ये वादे काफ़ी हद तक अधूरे रहे हैं। व्यवहार में, विदेशी पूंजी ने मुख्य रूप से उदारीकरण के बाद के विकास के आयात-गहन पैटर्न को बढ़ावा दिया है, जिससे घरेलू उद्योग लगतार कमज़ोर हुए।

व्यापार बाधाएँ हटाने की नीति के साथ बहुत कम नियम या दिशा-निर्देश जोड़े गए। उदाहरण के लिए, भारत सरकार ने यह सुनिश्चित नहीं किया कि घरेलू फर्मों में एफडीआई के साथ तकनीकी हस्तांतरण, स्थानीय सोर्सिंग और डाउनस्ट्रीम औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित किया जाए, घरेलू आरएंडडी में निवेश हो, या रॉयल्टी के प्रत्यावर्तन (विदेश भेजने) पर कोई सीमा हो। ऐसे दिशा-निर्देश लागू करने के अधूरे प्रयास भी विदेशी पूंजी के दबाव में ही छोड़ दिए गए।

कुल मिलाकर, एफडीआई ने भारतीय उद्योग में तकनीकी प्रगति में बहुत कम योगदान दिया है, और विदेशी फर्मों ने देश के भीतर बहुत कम आरएंडडी सुविधाएँ स्थापित की हैं। उनका उत्पादन भारी मात्रा में आयात पर निर्भर रहा है। भारत में काम करने वाली विदेशी स्वामित्व वाली फर्मों का आयात उनके निर्यात से अधिक है, जिससे घरेलू औद्योगिक संबंध कमज़ोर हुए हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था में विऔद्योगीकरण (डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन) की प्रक्रिया को बल मिला है।

विदेशी निवेश ने जो लाभ के वादे किए थे, वे तो पूरे नहीं हुए, लेकिन उससे आई विदेशी मुद्रा की बाढ़ ने भारतीय बैंकिंग तंत्र में इतनी नकदी भर दी कि बैंकों पर ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गईं और उन्हें कर्ज़ बाँटने के नए-नए रास्ते तलाशने पड़े। इसका नतीजा यह हुआ कि विकास का एक ऐसा मॉडल बन गया जो कर्ज़ और आयात पर टिका है। अमीर तबक़े द्वारा संचालित खपत से चलने वाले इस मॉडल में पूंजी सिर्फ़ कुछ घरेलू एकाधिकारी समूहों के हाथों में केंद्रित हो गई है। और इस सब का नुक़सान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को उठाना पड़ा है।

साथ ही, विदेशी निवेश ने बाहरी बोझ को लगातार बढ़ाया है। क्योंकि विदेशी फर्मों ने जितना निर्यात किया उससे अधिक आयात किया और रॉयल्टी भुगतान और मुनाफ़ा प्रत्यावर्तन (रिपैट्रिएशन) के ज़रिए बढ़ती रक़म विदेशों में भेजी है। साल 2024 में, हर 100 डॉलर के विदेशी निवेश (एफडीआई और एफपीआई मिलाकर) में से 50 डॉलर विदेशी निवेशक अपना मुनाफ़ा और ब्याज वसूल कर वापस ले गए। जो मुनाफ़ा फिर से भारत में लगाया गया (रिइन्वेस्टमेंट) – जो नई विदेशी मुद्रा नहीं लाता – उसे छोड़ दें तो हालत और भी चौंकाने वाली है: हर 100 डॉलर की शुद्ध आवक पर 66 डॉलर बाहर भेज दिए गए। हाल के वर्षों में, इस तरह के आय आउटफ्लो अक्सर कुल चालू खाता घाटे (करंट अकाउंट डेफिसिट) से ज़्यादा रहे हैं। 2024 में जितनी निवेश आय बाहर भेजी गई, वह भारत के व्यापार घाटे से तीन गुना ज्यादा थी। जैसे-जैसे मुनाफ़ा-ब्याज का विदेश जाना बढ़ेगा, भारत का बाहरी खाता (एक्सटर्नल अकाउंट) और नाजुक होता जाएगा, जो आने वाले वर्षों में भुगतान संतुलन के गहरे संकट की ज़मीन तैयार कर रहा है। ऐसे भविष्य की एक झलक 2023 में देखने को मिली, जब भारत की अर्थव्यवस्था से विदेशी निवेश आवक के हर 100 डॉलर के बदले 116 डॉलर निवेश आय के रूप में बाहर भेजे गए।12

विदेशी पूंजी की आवक से पैदा हुई तरलता (बैंकों में पैसा) ने कर्ज़-आधारित, आयात-केंद्रित विकास और बड़े व्यापार घाटे को हवा दी। इन घाटों ने बदले में और अधिक विदेशी आवक को ज़रूरी बना दिया, जिसने विदेशी मुद्रा के रिसाव को गहरा किया। इस तरह भारत के भुगतान संतुलन को संभालने के लिए बाहरी वित्तीय प्रवाह पर निर्भरता का एक चक्रव्यूह बन गया है जो लगातार गहराता जा रहा है।

एक ऐसा विकास मॉडल, जहाँ औद्योगिक विकास ‘संयोग’ है

भारत की नवउदारवादी दिशा और उसके चार मुख्य सिद्धांतों के कारण, औद्योगिक विकास, विकास मॉडल का केंद्रीय लक्ष्य न होकर एक संयोग बनकर रह गया है। सरकारें कभी भी ठोस औद्योगिक नियोजन पर नहीं चलीं, बल्कि उन्होंने विकास का इंजन बैंक कर्ज़ (और सेवा निर्यात) को बनाया – ताकि मांग बढ़े और औद्योगिक ढाँचे के लिए पैसा मिले। इसके विपरीत, 1947 से 1991 तक, भारत में संस्थागत कर्ज़ ज़्यादातर आर्थिक नियोजन के दायरे में कृषि, उद्योग और व्यापार क्षेत्र में दिया जाता था। उपभोक्ता कर्ज़ की भूमिका बहुत कम थी।

1991 के बाद से, उपभोक्ता कर्ज़ लगातार बढ़ा है। बैंकिंग क्षेत्र, ख़ासकर निजी बैंक, लगातार कर्ज़ देने को होम लोन, वाहन लोन, टिकाऊ उपभोक्ता सामान और क्रेडिट कार्ड्स की ओर मोड़ रहे हैं। बैंक कर्ज़ में व्यक्तिगत ऋण की हिस्सेदारी 1990 में 9.4% से बढ़कर 2005 में 25.2% हो गई थी, और 2024 में यह 32.4% तक पहुँच गई है।13

आज घर और कार ख़रीदने के लिए लिया जाने वाला कर्ज़ विकास का एक बड़ा चालक बन गया है। आवास ऋण के विस्तार से जीडीपी में निर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी भी बढ़ी है।

इसी तरह, ऑटोमोबाइल के लिए बढ़ती कर्ज़ देने की प्रवृत्ति ने विनिर्माण क्षेत्र में कार उद्योग को अतिशय महत्त्व दिया और परिवहन व्यवस्था को गाड़ियों का गुलाम बना दिया, जिससे देश के बुनियादी ढाँचे की मुश्किलें और बढ़ीं हैं।

वाहन ऋण और ऑटोमोबाइल उत्पादन में बड़े पूंजीपतियों की मौजूदगी ने सरकार के रुख को निजी परिवहन और सड़क निर्माण के पक्ष में और झुका दिया। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत का सड़क नेटवर्क दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा नेट्वर्क है, जो जल्द ही अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा।14 भारत का भूभाग चीन के मुकाबले एक-तिहाई है, फिर भी भारत का सड़क नेटवर्क चीन से 20 लाख किलोमीटर ज़्यादा लंबा है। पिछले एक दशक में ख़ासकर हाइवे और एक्सप्रेसवे का निर्माण तेज़ी से हुआ है। पर इस विस्तार की एक बड़ी समस्या है, ज़मीन अधिग्रहण की चुनौतियाँ। जनसंख्या घनत्व अधिक होने और कृषि पर गहरी निर्भरता के कारण ज़मीन अधिग्रहण राजनीतिक रूप से संवेदनशील और सामाजिक रूप से विघटनकारी हो जाता है। किसान, जिनके लिए ज़मीनी संपत्ति ही सब कुछ है, अक्सर विस्थापन का विरोध करते हैं। नतीजतन, ज़मीन अधिग्रहण धीमा, महँगा और अक्सर विवादित रहता है – इससे भारत की सड़क-केंद्रित लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में रुकावटें आती हैं।.

दूसरी ओर, परिवहन व्यवस्था के ऑटोमोबाइल (जिसमें ट्रक भी शामिल हैं) पर निर्भर होने से ईंधन आयात बढ़ गया है। 40% से अधिक पेट्रोलियम उत्पाद सिर्फ परिवहन क्षेत्र द्वारा खपत किए जाते हैं।15 इससे व्यापार घाटा बढ़ा है और औद्योगीकरण में कोई योगदान नहीं मिला है।

ऑटोमोबाइल-सड़क विकास के रास्ते पर चलने से व्यापक विनिर्माण तंत्र कमज़ोर हुआ है। भारत की रसद लागत चीन से दो से तीन गुना अधिक है, जिसकी बड़ी वजह है रेलवे तंत्र में न के बराबर निवेश करने की प्रवृति। रेल परिवहन, जो कि सस्ता है, कम ज़मीन लेता है, ऊर्जा कुशल है और भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त है, को जानबूझकर नज़रंदाज़ कर सड़क परिवहन को तरजीह दी गई है।

रेलवे में कम निवेश का मतलब है रेल परिवहन की गुणवत्ता और गति का गिरना: भारत में पारंपरिक रेलगाड़ियों की औसत गति 43 किमी/घंटा है, जबकि चीन में यह 90 किमी/घंटा है। भारत में हाई-स्पीड रेल 180 किमी/घंटा की रफ्तार पा सकती है, जबकि चीन में हाई-स्पीड ट्रेनें 430 किमी/घंटा तक जाती हैं।

कर्ज़-आधारित, ऑटोमोबाइल-केंद्रित परिवहन प्रणाली से रसद की लागत बढ़ी है और परिवहन समय भी बढ़ा है, जिससे कुल मिलाकर उत्पादन लागत बढ़ी है। इस तरह व्यापार उदारीकरण के बीच भारतीय विनिर्माण की प्रतिस्पर्धा लगातार कमज़ोर हुई है।

गिगी स्कारिया, हेज़िटेंट अटेम्प्ट, 2018

कर्ज़ से चलने वाले निवेश और बैड लोन (NPA)

भारत में नवउदारवादी विकास सिर्फ़ खपत से नहीं चला। 2004 से 2010 के बीच, जब देश में जीडीपी में बड़ी वृद्धि हुई, तब यह विस्तार सिर्फ खपत से ही नहीं, बल्कि बैंक कर्ज़ से चलने वाले निवेश से भी बना रहा, जो कि विदेशी पूंजी के आवक से पैदा हुई अतिरिक्त नकदी (लिक्विडिटी) के चलते संभव हुआ। बैंकिंग प्रणाली में पैसे की बाढ़ आई, तो निजी बैंकों ने रिटेल कर्ज़ (व्यक्तिगत ऋण) बढ़ाए, और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बड़े-बड़े कॉर्पोरेट्स को अचल संपत्ति, बिजली तथा स्टील जैसी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए भारी कर्ज़ दिए।

इससे निवेश-आधारित विकास को बल तो मिला, पर इस व्यवस्था ने एक गंभीर संकट भी पैदा किया। बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में निवेश का रिटर्न तुरंत नहीं मिलता, यानी बैंक ने लंबी अवधि की परियोजनाओं को कर्ज़ दिया, जबकि उन्हें अपने जमाकर्ताओं को कम समय में पैसा लौटाना होता है। इसके साथ ही कॉर्पोरेट को खुली छूट और ख़राब निगरानी ने इस मिसमैच के संकट को विनाशकारी बना दिया। वाणिज्यिक बैंक – जो ऐसी परियोजनाओं के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए तैयार नहीं थे (क्योंकि यह काम विकास बैंकों का होना चाहिए था) – सरकार के इशारे पर निजी स्वामित्व वाली बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को कर्ज़ देने लगे। नतीजा: गैर-निष्पादित आस्तियों (नॉन-परफोर्मिंग ऐसेट्स-एनपीए) का भारी ढेर लग गया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में एनपीए की कुल राशि का मूल्य 82.3 अरब डॉलर तक पहुँच गया। दूसरी ओर, इन कर्ज़ों से बनी भौतिक संपत्तियाँ (जैसे पावर प्लांट, स्टील प्लांट) एनपीए संकट के समाधान के नाम पर भारत के बड़े पूंजीपतियों के हाथों में न्यूनतम क़ीमत पर बेच दी गईं।16

इस अवधि में नवउदारवादी विकास नीति ने यह सुनिश्चित किया कि बाज़ार की अराजकता ही भारतीय विनिर्माण की दिशा और संरचना निर्धारित करे। घरेलू पूंजी हितों, बैंकिंग प्रणाली की कर्ज़ प्राथमिकताओं और अमीर तबके के खपत पैटर्नों के आपसी संबंध, तथा वैश्विक मुक्त व्यापार व अबाधित वित्तीय प्रवाह के माहौल ने भारतीय उद्योग की दिशा तय की है। आप इसे विकास कहेंगे या पतन, आप पर है।

व्यापार घाटा और विऔद्योगीकरण: एक ही सिक्के के दो पहलू

भारत, आयातित सामान, ईंधन और विदेशी धन पर बहुत अधिक निर्भर है। इसी कारण लगभग हर साल देश का चालू खाता घाटे में रहता है। केवल कोविड-19 के समय, जब दुनिया भर में व्यापार अचानक कम हो गया था, यह स्थिति कुछ समय के लिए बदली थी। आम तौर पर चालू खाता घाटा तभी कम होता है जब अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है।
1991 में भारत का वस्तु व्यापार घाटा सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) का 2% था, जो बढ़कर 7% हो गया और 2011 में 10% तक पहुँच गया।17 इस घाटे का लगभग आधा हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों के कारण है। सेवाओं के निर्यात से होने वाली कमाई और विदेशों में काम कर रहे भारतीयों द्वारा भेजे गए पैसे (रेमिटेंस) की वजह से ही चालू खाता घाटा इतना

विऔद्योगीकरण

लंबे समय तक भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर होने वाली चर्चाओं में ‘विऔद्योगीकरण’ शब्द का इस्तेमाल ब्रिटिश शासन के दौरान गैर-कृषि शिल्पों और पारंपरिक उद्योगों के पतन को बताने के लिए किया जाता रहा है। इस प्रक्रिया ने लाखों लोगों को उनके पारंपरिक काम-धंधों से अलग कर दिया और उन्हें ग़रीबी व भूख की ओर धकेल दिया।

स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद यह शब्द एक बार फिर प्रचलन में है—इस बार उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा को बताने के लिए। इसके प्रभाव पिछले एक दशक में साफ़ दिखाई देने लगे हैं। ऋण के सहारे तेज़ आर्थिक वृद्धि के दौर में जो औद्योगिक ह्रास छिपा हुआ था, वह हाल के वर्षों में पूरी तरह सामने आ गया है, ख़ासकर मोदी सरकार के कार्यकाल में।

जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 2008 में 18.9% से घटकर 2023 में 14.3% रह गई, जो भारत के औद्योगीकरण के शुरुआती दौर में, साठ से भी अधिक वर्ष पहले, देखे गए स्तर के बराबर है। नए आधार वर्ष के साथ जारी नई जीडीपी श्रृंखला में विनिर्माण उत्पादन के अधिक आकलन की संभावना को देखते हुए, वास्तविक हिस्सेदारी, आधिकारिक आँकड़ों से भी कम हो सकती है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) इस तस्वीर को और स्पष्ट करता है। आईआईपी के अनुसार, 2011–2012 से 2024–2025 के बीच विनिर्माण उत्पादन की औसत वार्षिक वृद्धि दर केवल 3.3% रही, जबकि 2003–2004 से 2010–2011 के दौरान यह 10.1% थी। लंबे समय के परिप्रेक्ष्य में देखें तो विनिर्माण क्षेत्र में यह मंदी और भी स्पष्ट दिखाई देती है। 1981–1982 से 1989–1990 के बीच आईआईपी के विनिर्माण घटक की औसत वार्षिक वृद्धि दर 7.5% थी, 1991–1992 से 1996–1997 के बीच 8.0%, और 1997–1998 से 2002–2003 के बीच 5.4% रही।18 वास्तव में, 2011 के बाद से विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर पिछले तीन दशकों की किसी भी समान अवधि की तुलना में कम रही है। ऐसे में भारत में आगे और अधिक विऔद्योगीकरण का ख़तरा दिखाई देता है।

सेवा क्षेत्र: उद्योग का कमज़ोर विकल्प

पिछले पंद्रह वर्षों में विनिर्माण क्षेत्र के तुलनात्मक पतन ने भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे संरचनात्मक असंतुलनों को और मज़बूत किया है। आज भारत की जीडीपी का अधिकांश हिस्सा सेवा क्षेत्र से आता है।

1947 के बाद, नवस्वतंत्र भारतीय गणराज्य ने एक ऐसे विकास मॉडल को अपनाया जिसका केंद्र एक मज़बूत औद्योगिक आधार का निर्माण था। 1951 में, पहली पंचवर्षीय योजना की शुरुआत के समय, जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी 12% थी, जबकि सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 36% थी। 1990 तक ये हिस्सेदारियाँ बढ़कर उद्योग के लिए 19% और सेवाओं के लिए 41% हो गईं। 1991 में औद्योगीकरण आधारित विकास मॉडल छोड़ दिया गया, जब भारत सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण—या अधिक सही शब्दों में नवउदारीकरण—करने और उसे अधिक सेवा-उन्मुख बनाने का निर्णय लिया। 1991 के बाद से विनिर्माण की हिस्सेदारी घटकर 14% रह गई, जबकि सेवाओं की हिस्सेदारी 2008 में बढ़कर 48% और 2024 में 55% हो गई। हालाँकि मोदी के नेतृत्व में भाजपा शासन के दौरान भारतीय विनिर्माण की समस्याएँ और गहरी हुईं, लेकिन उसके कमज़ोर होने की शुरुआत 1991 में अपनाए गए नवउदारवादी रास्ते पर चलने वाली एक के बाद एक सरकारों के दौर में ही हो गई थी।

विनिर्माण के विपरीत—जो तकनीकी आधार को मज़बूत करता है और वास्तविक मज़दूरी में वृद्धि को सहारा देता है—सेवा क्षेत्र का विस्तार ज़रूरी नहीं कि ऐसा ही प्रभाव पैदा करे। एक मज़बूत विनिर्माण क्षेत्र परिवहन, दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सेवाओं की क्षमताओं को बढ़ा सकता है। लेकिन जब कमज़ोर औद्योगिक आधार के साथ सेवाएँ हावी हो जाती हैं, तो वे आयातित मशीनरी और विदेशी तकनीकों पर बहुत अधिक निर्भर हो जाती हैं, जैसा कि भारत के मामले में है।

भारत में सेवा क्षेत्र एक व्यापक श्रेणी है, जिसे आसानी से एक जैसा नहीं बताया जा सकता। फिर भी इसमें एक स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है। एक ओर ऐसी कई तरह की सेवाएँ हैं—स्वरूप में भिन्न, लेकिन अनौपचारिकता में समान—जो कम मज़दूरी, असुरक्षित और बड़े पैमाने पर अनियंत्रित रोज़गार प्रदान करती हैं तथा जिनकी उत्पादकता कम होती है। इन गतिविधियों में काम करने वाले श्रमिक अक्सर काम की उपलब्धता के अनुसार गाँव और शहर के बीच, तथा कृषि और सेवा क्षेत्रों के बीच आते-जाते रहते हैं। ये क्षेत्र वास्तव में कृषि से निकलने वाले अतिरिक्त श्रम के लिए शरणस्थल का काम करते हैं—ऐसा श्रम जो कृषि में रोज़गार के ठहराव के कारण बाहर धकेला गया है और जिसे विनिर्माण क्षेत्र, विशेषकर विऔद्योगीकरण की स्थिति में, बढ़ती श्रम शक्ति को समाहित करने में असमर्थ रहने के कारण सेवा क्षेत्र की ओर खींच लिया जाता है। वास्तव में, 2017–2018 के बाद से कुल रोज़गार में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी घटती गई है।

खुदरा व्यापार और परिवहन, ऐसे ही दो क्षेत्र हैं। लेकिन इन क्षेत्रों के भीतर भी रोज़गार का दायरा बहुत व्यापक है। उदाहरण के लिए, खुदरा व्यापार में छोटे दुकानदार, ठेला-पटरी वाले, फेरीवाले, किराना (पड़ोस की) दुकानों के कर्मचारी और थोक मंडियों में काम करने वाले सहायक शामिल होते हैं। वहीं परिवहन क्षेत्र में ऑटो और टैक्सी चालक, ट्रक चालक, बस कंडक्टर तथा माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स से जुड़े कामगार शामिल होते हैं। कुल रोज़गार में खुदरा व्यापार की हिस्सेदारी 12.2% और परिवहन की लगभग 5.6% है, और ये दोनों जीडीपी में लगभग समान योगदान देते हैं।19

इन गतिविधियों को अक्सर ‘सेवा क्षेत्र’ के बजाय ‘असंगठित क्षेत्र’ का हिस्सा कहा जाता है। ‘सेवा क्षेत्र’ शब्द आमतौर पर आईटी, वित्त और अन्य आधुनिक सेवाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो इस विभाजन का दूसरा पक्ष हैं। सेवा अर्थव्यवस्था के ये दोनों हिस्से पिछले साढ़े तीन दशकों में लगातार ऊँची वृद्धि दर दर्ज करते रहे हैं। आईटी और वित्त क्षेत्र, अत्यधिक पूंजी-प्रधान होने और सीमित रोज़गार देने के बावजूद, जीडीपी में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी रखते हैं। 1990 के शुरुआती वर्षों में आईटी क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में योगदान नगण्य था (जीडीपी का लगभग 0.1%), और रोज़गार में इसकी हिस्सेदारी तो इससे भी कम थी। 2024 तक यह मुख्यतः निर्यातोन्मुख उद्योग तेज़ी से फैलकर जीडीपी का 7.5% हो गया, जबकि इसमें कुल श्रम शक्ति का केवल 1% ही कार्यरत है।20 वित्तीय सेवाओं का विकास भी इसी तरह हुआ—जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 1990 में 3% से बढ़कर 2004 में 6% हो गई, जबकि रोज़गार में इसकी हिस्सेदारी 1% से कम ही रही।21

आईटी और वित्तीय सेवा क्षेत्र मिलकर जीडीपी का 13.5% योगदान करते हैं, जो विनिर्माण क्षेत्र के योगदान के बराबर है, लेकिन रोज़गार में इनका योगदान 2% से भी कम है, जबकि विनिर्माण क्षेत्र 11.4% रोज़गार प्रदान करता है।22 ग़ैर-कृषि अर्थव्यवस्था में, विनिर्माण का हिस्सा जीडीपी का 17% और रोज़गार का 20% है, जबकि आईटी और वित्तीय सेवा क्षेत्र (जो दोनों ही अत्यधिक पूंजी-गहन हैं) ग़ैर-कृषि जीडीपी का 16.5% योगदान करते हैं, लेकिन रोज़गार में इनकी हिस्सेदारी केवल 3.5% है। इन दोनों क्षेत्रों द्वारा उत्पन्न उच्च-वेतन वाली नौकरियों की संख्या सीमित है और घरेलू अर्थव्यवस्था में इनके गुणक प्रभाव कमज़ोर हैं, क्योंकि श्रम बल के इस वर्ग की उपभोग प्रवृत्तियाँ आयात-प्रधान हैं।

यह अंतर दिखाता है कि भारत के सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले क्षेत्र—आईटी और वित्त—बहुत कम लोगों को रोज़गार देते हैं। इससे यह भी साफ़ होता है कि जब विनिर्माण को नज़रअंदाज़ करके केवल हाई-टेक सेवा क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाता है, तो उसके नकारात्मक परिणाम होते हैं। भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महत्त्वपूर्ण विनिर्माण क्षेत्र में व्यापार को पूरी तरह खोल दिया है, ताकि आईटी जैसी सेवाएँ, जो ज़्यादातर अमेरिका और पश्चिमी देशों को निर्यात होती हैं, बढ़ सकें। इसका नतीजा यह हुआ कि देश में उद्योग कमज़ोर हुए और आज भी लगभग आधा कार्यबल कृषि पर निर्भर है।

कृषि जीडीपी का केवल 18% योगदान करती है, लेकिन इसमें 46% लोग काम करते हैं। दूसरी ओर, सेवा क्षेत्र जीडीपी के आधे से ज़्यादा हिस्से का योगदान करता है, फिर भी 2023–24 में उसने केवल 30% लोगों को ही रोज़गार दिया। विनिर्माण क्षेत्र, जिसे पहले कृषि से लोगों को बाहर लाने का ज़रिया माना गया था, अब जीडीपी का लगभग 14% ही योगदान करता है और सिर्फ़ 11% लोगों को रोज़गार देता है।23

गिगी स्कारिया, सेटलमेंट, 2010

भारत के नवउदारवादी विकास मॉडल के तहत, पश्चिमी बाज़ारों को कुशल श्रम और सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विनिर्माण क्षेत्र की बलि दी गई है। यह उम्मीद की गई कि इन निर्यातों से होने वाली कमाई बढ़ते आयात की भरपाई कर देगी और एक मज़बूत विनिर्माण क्षेत्र की कमी की क्षतिपूर्ति हो जाएगी। लेकिन इसका अर्थ यह हुआ कि भारत की दीर्घकालिक औद्योगिक और तकनीकी क्षमताओं को विदेशी मुद्रा के अस्थिर और बाहरी रूप से निर्भर स्रोतों के लिए त्याग दिया गया। अंततः इससे देश की आर्थिक और तकनीकी संप्रभुता कमज़ोर हुई, जबकि इसके लिए एक मजबूत विनिर्माण क्षेत्र अत्यंत आवश्यक है।

विऔद्योगीकरण के मानवीय प्रभाव

भारत की आबादी युवा है—जिसे अक्सर ‘जनसांख्यिकीय लाभ’ कहा जाता है—और यही एक आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था के निर्माण तथा तकनीकी प्रगति के लाभों को व्यापक रूप से साझा करने का आधार बन सकता था। युवाओं का जीवन स्तर बेहतर होना चाहिए था और उन्हें सुरक्षित रोज़गार मिलना चाहिए था, ताकि वे काम, आराम और अवकाश के बीच संतुलित जीवन जी सकें। लेकिन भारत को एक बड़ी अर्थव्यवस्था बताने के तमाम दावों के बावजूद, यह अब भी एक अविकसित अर्थव्यवस्था बना हुआ है, जहाँ श्रमिकों की आय का बड़ा हिस्सा भोजन जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर खर्च हो जाता है और जहाँ युवा असुरक्षित नौकरियों में काम कर रहे हैं, जिनका भविष्य अनिश्चित है।

भारत अपने कार्यबल के युवाओं को ठहरे हुए वेतन वाली अस्थायी और समझौता-आधारित नौकरियों में खपा रहा है। कार्यशील आयु की आबादी पर निर्भर लोगों—यानी बच्चों और बुज़ुर्गों—का अनुपात तेज़ी से घटा है: यह 1966 में 83% से घटकर 2024 में 47% हो गया।24 इससे अत्यधिक ग़रीबी में कुछ कमी तो आई, लेकिन इसका प्रभाव सीमित रहा। अब, जब 2041 के बाद इस अनुपात के फिर से बढ़ने की उम्मीद है, तो भारत के संरचनात्मक रूपांतरण की गुंजाइश और सिमटती दिख रही है।25 औद्योगिक विकास—जिसे अतिरिक्त श्रम को समाहित करना था और उत्पादकता व तकनीकी प्रगति को आगे बढ़ाना था—मौजूदा आर्थिक विकास मॉडल के भीतर एक ठहराव के बिंदु पर पहुँचता हुआ लग रहा है।

आगे का रास्ता

यदि भारत को वर्तमान अविकास के जाल से निर्णायक रूप से बाहर निकलना है, तो आर्थिक नीति के केंद्र में औद्योगिकीकरण को लाना अत्यंत आवश्यक है। इस पर बहुत कम मतभेद हैं। औद्योगिकीकरण का महत्त्व और सेवा-आधारित आर्थिक विस्तार की सीमाएँ अब भारत में नवउदारवाद के समर्थकों के भी सामने स्पष्ट होने लगी हैं। यह बात प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के बार-बार उल्लेख में दिखाई देती है, भले ही उनकी सरकार अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में नवउदारवादी सिद्धांतों का कहीं अधिक उत्साह से पालन करती रही हो—जैसे सार्वजनिक क्षेत्र का परिसमापन, विदेशी पूंजी के लिए शेष बाधाओं को हटाना, ऑटोमोबाइल-आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देना, और निवेश को प्रोत्साहित करने के नाम पर कॉर्पोरेट क्षेत्र को उदारतापूर्वक टैक्सों में छूट और सब्सिडी देना।

हालाँकि मोदी सरकार ने कुछ चुनिंदा विनिर्मित वस्तुओं पर सीमा शुल्क में सीमित वृद्धि की है, लेकिन व्यापार उदारीकरण का व्यापक ढाँचा अब भी कायम है। अपेक्षा के अनुरूप, इन उपायों से विनिर्माण के विस्तार के संदर्भ में कोई विशेष परिणाम नहीं निकले हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था का विऔद्योगीकरण मानो अपने तय रास्ते पर ही आगे बढ़ता दिख रहा है।

निस्संदेह भारत के औद्योगिक कार्यक्रम को पुनर्जीवित करने के लिए वर्तमान आर्थिक नीति के बुनियादी तत्त्वों यानी नवउदारवादी सिद्धांतों से निर्णायक रूप से अलग होना आवश्यक है। लेकिन उदारीकरण के लंबे दौर ने ऐसी संरचनात्मक स्थितियाँ पैदा कर दी हैं, जिनके कारण नवउदारवाद से किसी भी तरह का विचलन एक गंभीर राजनीतिक चुनौती बन गया है।

इस दौर ने पहले से मौजूद उन बाधाओं को और मज़बूत कर दिया—जिनकी चर्चा पहले की जा चुकी है—जो उदारीकरण से पहले भी औद्योगिकीकरण को सीमित करती थीं, और साथ ही जिसने विऔद्योगीकरण की प्रक्रिया को और गहरा किया। घरेलू बाज़ार को सीमित करने वाली असमानताएँ कई गुना बढ़ गई हैं, जबकि भारत के बड़े पूंजीपति वर्ग का क़द असाधारण रूप से बढ़ा है—राज्य पर उसका प्रभाव, नीति को आकार देने की उसकी क्षमता और शक्ति सभी में भारी वृद्धि हुई है। यह वर्ग भारतीय स्वतंत्रता के बाद से आज अपने सबसे शक्तिशाली दौर में है। इस अवधि में इसने भारी संपत्ति अर्जित की, जबकि आबादी के बहुसंख्यक हिस्से को केवल सीमित लाभ ही मिल पाए।

ऑटोमोबाइल, पेट्रोकेमिकल्स, ऊर्जा, इस्पात और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में बड़े भारतीय कॉर्पोरेट समूहों के विशाल औद्योगिक परिसरों का निर्माण और संचालन बड़े पैमाने पर आयातित मशीनरी और तकनीक के सहारे किया गया, जिसका लाभ व्यापार उदारीकरण से मिला। इनके विस्तार के लिए सस्ती पूंजी उपलब्ध हुई, जो शेयर बाज़ार में ऊँचे मूल्यांकन के ज़रिये संभव हुई और भारतीय इक्विटी बाज़ारों में पोर्टफोलियो निवेश के बड़े प्रवाह से इसे लगातार सहारा मिला। भारत के बड़े पूंजीपतियों ने विदेशी पूंजी के साथ कामकाजी क़िस्म के संबंध बनाए, अपने तात्कालिक हितों की रक्षा के लिए किसी भी टकराहट को टालने की हरसंभव कोशिश की। ज़रूरत पड़ा तो कभी अड़े, कभी झुक गए। इस दौरान, जहाँ विदेशी कंपनियों ने कई प्रमुख क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र को पीछे धकेला और छोटे घरेलू उत्पादकों को हाशिये पर पहुँचा दिया, वहीं भारत के बड़े कॉर्पोरेट समूहों ने अपनी स्थिति बनाए रखी और उसे और मज़बूत किया। उन्होंने अपने विशाल आकार, वित्तीय शक्ति और राज्य की नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता का उपयोग कर अपने वर्चस्व को और अधिक सुदृढ़ किया।

परिणामस्वरूप, वे दिन बीत गए जब इसने ज़मींदार वर्ग के साथ एक समान भागीदार के रूप में सौदेबाजी की। यद्यपि पूर्व जमींदार वर्ग आज ग्रामीण और शहरी, कृषि और ग़ैर-कृषि क्षेत्रों में बरक़रार है, फिर भी वह भारतीय अभिजात वर्ग का हिस्सा बना हुआ है और उसका भी वर्गीय हित वही है, जो बड़े पूंजीपतियों का है। राज्य की नीतियों की बागडोर अब शक्तिशाली पारिवारिक व्यापारिक घरानों से बने भारतीय बड़े पूंजीपति वर्ग के हाथों में कहीं अधिक मज़बूती से है, हालांकि मोदी सरकार के कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ किसान और ज़मींदार वर्गों के सफल विरोध जैसी छिटपुट घटनाएं भी हुई हैं।

आज, बड़े पूंजीपतियों का वर्ग ज़मींदार वर्ग के साथ कम और विदेशी पूंजी के साथ अधिक जुड़ा हुआ है। भारतीय पूंजीपति वर्ग और विदेशी – मुख्य रूप से पश्चिमी – पूंजी के गठजोड़ ने भारत की आर्थिक स्वतंत्रता के क्षरण को तेज़ कर दिया है और निवेश तथा राजनीतिक गठबंधन दोनों के लिए पश्चिम पर इसकी निर्भरता को गहरा कर दिया है।

अनुसंधान एवं विकास पर स्थानीय निवेश के माध्यम से प्रौद्योगिकी विकसित करने में रुचि न रखने वाले ये व्यापारिक घराने विनिर्माण के नए क्षेत्रों में अपना विस्तार करने के लिए पश्चिमी देशों – विशेष रूप से अमेरिका – की पूंजी के साथ साझेदारी की तलाश कर रहे हैं। वे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन से दूर करने के अमेरिकी सरकार के दृढ़ संकल्प से उत्पन्न अवसरों का लाभ उठाने की उम्मीद कर रहे हैं।

भारत के व्यापारिक घराने रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स और भुगतान प्रणालियों जैसे क्षेत्रों में पश्चिमी कंपनियों के साथ सहयोग करने का प्रयास कर रहे हैं।

इन योजनाओं के बावजूद, इस वर्ग के हित भारत के औद्योगीकरण के प्रतिकूल हैं। ट्रंप के शासनकाल में भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं के दौरान हुए घटनाक्रम ने औद्योगिक विकास के लिए पश्चिम के साथ सहयोग पर निर्भरता की सीमाओं को उजागर कर दिया। भले ही अमेरिका के साथ कोई अनुकूल व्यापार समझौता हो जाए, परिणाम में शायद ही कोई बदलाव आएगा: यदि नवउदारवाद का पहला चरण विफल रहा है, तो इसका दूसरा चरण – ‘नवउदारवाद 2.0’ – भी उतना ही असफल होने की संभावना है। उदारीकरण से पहले के दौर में औद्योगीकरण को बाधित करने वाले कारणों – गहरी असमानता और जन क्रय शक्ति की कमी – की वजह से यह रणनीति सफल होने की संभावना नहीं है। उदारीकरण के बाद यह समस्या और भी गंभीर हो गई है, और अब तो यह कई गुना अधिक व्यापक रूप से सामने आ रही है। आज असमानता इतनी चरम सीमा पर पहुँच गई है कि राष्ट्रीय औसत आय अर्जित करने के लिए किसी व्यक्ति का भारत के शीर्ष 11% आय वर्ग में होना आवश्यक है। दूसरे शब्दों में, 89% वयस्क इस राष्ट्रीय औसत से कम कमाते हैं। धन की असमानता और भी अधिक स्पष्ट है: शीर्ष 1% लोगों के पास कुल धन का 40.1% हिस्सा है – जो विश्व स्तर पर सबसे अधिक है। इस समूह के भीतर की असमानता और भी अधिक है, क्योंकि 2022 में केवल 162 व्यक्तियों के पास देश की 24.6% संपत्ति थी।26

वो दिन बीत गए जब कृषि सुधार मात्र से ही व्यापक जनसमुदाय के हाथों में क्रय शक्ति देकर एक विशाल बाजार का निर्माण किया जा सकता था। हालांकि भूमि स्वामित्व में गंभीर असमानता आज भी एक वास्तविकता है, लेकिन जनसंख्या की भारी वृद्धि और भूमि के व्यापक विखंडन का अर्थ यह है कि कृषि सुधार में अभी भी गुंजाइश है, लेकिन यह अब भारत के श्रमशक्ति के हाथों में पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं करा सकता।

स्वतंत्रता के बाद का वह दौर बीत चुका है, जब भारतीय पूंजीपति वर्ग, श्रमिक वर्ग तथा किसान वर्ग राज्य-नेतृत्व वाले औद्योगिक एवं तकनीकी विकास में समान हित साझा करते थे। अब कोई साझा आधार नहीं बचा है। भारतीय पूंजीपति वर्ग, जो कभी अंतरराष्ट्रीय पूंजी से सावधान रहता था, अब उसके साथ साझेदारी की ओर बढ़ रहा है।

इसलिए, नवउदारवादी विचारधारा से हटकर भारतीय बाज़ार का विस्तार करने और असमानता को कम करने की दिशा में कोई भी बदलाव तभी संभव है जब मेहनतकश वर्ग देश के बड़े पूंजीपति वर्ग और उसके सहयोगियों के साथ, चाहे यह गठबंधन किसी भी रूप में हो, आमने-सामने हो। हालांकि, वर्तमान में अति-धार्मिकता के भ्रम और फासीवादी धार्मिक राजनीति की गिरफ्त में (जिसे वही बड़ा पूंजीपति वर्ग वित्तपोषित कर रहा है) भारतीय जनता को इस शक्तिशाली वर्ग का सामना करने से पहले लंबा रास्ता तय करना है।

फिर भी, वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में वर्तमान उथल-पुथल और इससे भारतीय पूंजी के लिए उत्पन्न अनिश्चितताएं, भारत में वामपंथियों के लिए अपनी राजनीतिक उपस्थिति को पुनर्जीवित करने और आर्थिक नीतिगत चर्चा को स्वायत्त राष्ट्रीय विकास की ओर मोड़ने के अवसर पैदा करती हैं।


गिगी स्कारिया, ह्यूमन पुल, 2018.

Notes

1 Misra, ‘ExplainSpeaking: The truth about poverty in India’.

2 a. अलग से उल्लिखित आँकड़ों को छोड़कर इस दस्तावेज़ में दिए गए सभी GDP आँकड़े—जिसमें क्षेत्रवार हिस्सेदारी भी शामिल है—लेखकों द्वारा भारत की राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी (NAS) 2011–2012 श्रृंखला (वर्तमान कीमतों पर) और उससे संबंधित पिछली श्रृंखलाओं के आधार पर तैयार किए गए हैं। ये आँकड़े भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) से लिए गए हैं, जिन्हें 2 दिसंबर 2025 को https://esankhyiki.mospi.gov.in/catalogue-main/catalogue?page=0&product=NAS से प्राप्त किया गया।

3 1990 और 1996 के बीच, कृषि उत्पादों पर औसत टैरिफ 82% से घटकर 39% हो गया, जबकि विनिर्माण वस्तुओं पर टैरिफ 51% से घटकर 40% हो गया। S. Ramachandran Pillai, ‘Agrarian Crisis and the Way Out’, The Marxist 23, no. 3 (July–September 2007); Venkatesh Athreya, ‘The Current Agrarian Crisis in India: An Overview’, The Marxist 29, no. 3 (July–September 2013); and P. Sainath, Everybody Loves a Good Drought (New Delhi: Penguin, 1996).

4 सरकार ने विनिर्माण वस्तुओं पर टैरिफ 2000 में 33.2% से घटाकर 2008 में 9% कर दिया। Kumar, Ramaa Arun,, and Biswajit Dhar, Trade Liberalisation and Export Competitiveness of Indian Manufacturing Industries, Working Paper 230, Institute for Studies in Industrial Development (ISID), October 2020.

5 उदाहरण के लिए, भारत के विनिर्माण निर्यात में आयात की तीव्रता 1993-1994 में 12.89% से बढ़कर 2003-2004 में 24.04% और 2013-2014 में 51% हो गई। Paul, Mahua, and Ramaa Arun Kumar, Import Intensity of India’s Manufactured Exports: An Industry-Level Analysis, Working Paper 220, Institute for Studies in Industrial Development (ISID), February 2020.

6 ANI, ‘India to Boost Drug Ingredient Output’.

7 यह क्षरण औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) में पूंजीगत वस्तुओं और मध्यवर्ती वस्तुओं के योगदान में आई गिरावट के रूप में दिखता है, जो 1993-1994 में 35.5% से घटकर 2011-2012 में 29.63% हो गया। Reserve Bank of India, Handbook of Statistics on the Indian Economy 2024–25 (Mumbai: Reserve Bank of India, 29 August 2025), Table 29: ‘Index Numbers of Industrial Production – Use-Based Classification’, https://www.rbi.org.in/Scripts/PublicationsView.aspx?id=23203.

8 IANS, ‘Centre Aims to Meet 70% of India’s IT Hardware Demand’; Mallick and Aryan, ‘India’s Electronic Industry Poised for Transformation’; Barik, ‘China Dominates Supply of Electronic Components’; Surajeet, ‘Over 90% of Telecom Gear in India’s Rs 50,000-Cr Market Is Imported’.

9 आज, भारतीय आईटी उद्योग की कुल आय का 79% हिस्सा निर्यात से आता है, जबकि यह क्षेत्र हार्डवेयर के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। Government of India, Ministry of Commerce and Industry, Department of Commerce, ‘Commerce and Industry Minister Holds Discussions with CEOs of Indian IT Companies; Urges Them to Explore New Markets, Government to Support Global Growth of India’s IT Industry: Piyush Goyal’, press release, New Delhi, 1 August 2019, https://www.commerce.gov.in/press-releases/commerce-industry-minister-holds-discussions-with-ceos-of-indian-it-companies-urges-them-to-explore-new-markets-government-to-support-global-growth-of-indias-it-industry-piyush-goyal/.

10 P. Chakraborty and L. Chakraborty, ‘New FRBM Framework’.

11 भारत द्वारा 10% मताधार अधिकार सीमा को अपनाने और इसके परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो निवेश के बीच आए धुंधलेपन पर, देखें Rao and Dhar, India’s FDI Inflows: Trends and Concepts; for the current official definition of FDI, see Government of India, ‘FAQs related to FDI Policy Section’.

12 Reserve Bank of India, Database on Indian Economy; authors’ calculations based on balance of payments data.

13 Mujumdar, ‘Transformation of the Banking System’; ANI, ‘Personal Loans and Services Sector Key Drivers of Credit Growth’.

14 IANS, ‘India’s National Highways Record 60% Growth in Last 10 Years’.

15 Government of India, ‘Diesel and Petrol Consumed by Transport Sector’.

16 Economic Times Bureau, ‘NPAs of 26 Banks Rise’.

17 Reserve Bank of India, Database on Indian Economy.

18 Reserve Bank of India, Handbook of Statistics on Indian Economy, 2024–25; Mazumdar, ‘Industrial Development in India under Liberalisation’.

19 Government of India, Periodic Labour Force Survey, July 2023–June 2024, 15–16.

20 India Brand Equity Foundation, Electronic and Computer Software Industry.

21 बैंकिंग और बीमा क्षेत्र में 20 लाख कर्मचारियों के ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’ के आकलन को वित्तीय क्षेत्र के लिए प्रॉक्सी (अनुमानित आधार) के रूप में इस्तेमाल कर, एक उदार ऊपरी समायोजन के बाद भी, वित्तीय क्षेत्र में कुल रोजगार का आँकड़ा भारत के कार्यबल के 1% से काफी नीचे ही रहता है।  Krishna Kant, ‘BFSI on Hiring Sprint, IT Sector Stumbles in Headcount Marathon in FY24’, Business Standard, 4 September 2024, https://www.business-standard.com/industry/news/bfsi-on-hiring-sprint-it-sector-stumbles-in-headcount-marathon-in-fy24-124090401152_1.html.

22 रोज़गार हिस्सेदारी के आंकड़े लेखिका की स्वयं की गणना पर आधारित हैं, जो भारत सरकार के Periodic Labour Force Survey, July 2023–June 2024 तथा ‘Number of employees in IT’ से प्राप्त क्षेत्रीय आंकड़ों पर निर्भर हैं।

23 Government of India, Annual Report, Periodic Labour Force Survey, July 2023–June 2024, 15–16; Government of India, Provisional Estimates of Annual National Income, 2024–25 and Quarterly GDP, Q4 2024–25; Government of India, Provisional Estimates of Annual GDP for 2024-25 and Quarterly Estimates of GDP, Q4 2024–25.

24 World Bank, ‘Age dependency ratio – India’.

25 Kapil, ‘India’s Growing and Aging Populations’.

26 Bharti, Chancel, Piketty, and Somanchi, Income and Wealth Inequality in India, 1922–2023, 1, 3, 44, 77.

Bibliography

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केरल का सहकारिता आंदोलन

Tricontinental: Insitute for Social Research logo

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान और यूएल ऊरालुंगल लेबर कॉन्ट्रैक्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी रिसर्च सेंटर का साझा अध्ययन

इस अध्ययन के चित्र यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स (YSA) के सदस्यों द्वारा बनाए गए हैं। 2020 से यह समूह पूरे भारत के कलाकारों और सांस्कृतिक कर्मियों को एकजुट कर रहा है जो अपनेअपने क्षेत्रों में सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय हैं। इस अध्ययन के लिए चित्र बनाने वाले YSA के अधिकांश सदस्य केरल से हैं और वहीं रहते हैं, जहाँ ये सहकारी समितियाँ/संस्थाएँ दैनिक के जीवन का हिस्सा हैं। ये चित्र इस अध्ययन के शोधकर्ताओं द्वारा अपने क्षेत्र भ्रमण के दौरान ली गई तस्वीरों पर आधारित हैं।

आशिक़ अली तुप्पिलिक्काट SAFAR फ़ाउंडेशन के सहसंस्थापक और निदेशक हैं, यह पश्चिम बंगाल स्थित एक क्रियात्मक अनुसंधान केंद्र है। वे दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्र आंदोलन में सक्रिय रहे, जहाँ से उन्होंने राजनीति विज्ञान में एमफिल के दौरान सहकारी समितियों या संस्थाओं पर शोध किया। फ़िलहाल वे कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटो से पीएचडी कर रहे हैं और STREET Lab में शोधकार्य कर रहे हैं। उनका शोध प्रतिरोध की सामाजिकप्रौद्योगिकी डिज़ाइन पर केंद्रित है, जिसके अंतर्गत वे प्रौद्योगिकी और श्रमिक/सामाजिक आंदोलनों के आपसी जुड़ाव का अध्ययन कर रहे हैं।

अश्वथी रेबेका असोक एक विकास अर्थशास्त्री और क़ानून स्नातक हैं, अंतःविषयक, प्रमाण आधारित और नीतिगत रिसर्च में इनकी विशेषज्ञता है। पिछले नौ वर्षों में अश्वथी ने केरल की विकास यात्रा का गहन अध्ययन किया है जिसमें आर्थिक समावेशन, ग़रीबी, जेंडर, प्रवासन, श्रम और विकेंद्रीकरण जैसे कई विषय शामिल हैं। वे भारत के कई विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति में सक्रिय रही हैं।

नजीब वीआर कोझिकोड स्थित यूएल रिसर्च सेंटर में समाज वैज्ञानिक और शोध संयोजक हैं। यहाँ वे सहकारी विकास, सामाजिक परिवर्तन और ज्ञान प्रणालियों के अंत:विषयक विचारों का एकीकरण करते हैं। वे केरल राज्य योजना बोर्ड के 14वीं पंचवर्षीय योजना के उपसमूह के सदस्य भी हैं और शैक्षणिक प्रसार, पाठ्यक्रम विकास और जन छात्रवृत्ति में सक्रिय योगदान देते हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है और केरल काउन्सिल फ़ॉर हिस्टॉरिकल रीसर्च की रिवाइज़ पीएचडी फेलोशिप भी हासिल की है।

विजू कृष्णन अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) के महासचिव और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य हैं। एआईकेएस के नेता के तौर पर उन्होंने 2021-2022 तक दिल्ली में चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता बनने से पहले वे बंगलुरु स्थित सेंट जोसेफ़ कॉलेज के राजनीति विज्ञान विभाग के प्राध्यापक रहे। 1998-1999 में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए। विजू एक फ़ोटोग्राफ़र भी हैं जो श्रमिक वर्ग के दैनिक जीवन के चित्र कैमरे में क़ैद करते हैं।

निधीश जे विल्लाट अखिल भारतीय किसान सभा की केंद्रीय किसान कमेटी के सदस्य हैं और पी सुंदरैया ट्रस्ट के शोध संयोजक, जो एक शोध संस्थान है जो कृषि संबंधी विषयों और आंदोलनों पर केंद्रित अध्ययन करता है। निधीश मज़दूरकिसान एकता का अध्ययन करने और उसे मज़बूत बनाने के लिए समर्पित हैं, विशेष रूप से उसकी राजनीतिक अर्थव्यवस्था और दर्शन को ध्यान में रखकर। वे कृषक और औद्योगिक वर्ग संघर्षों, पूंजीवाद के तहत ‘प्रतिस्पर्धा’, राजनीतिक पारिस्थितिकी और हिंदुत्व जैसे विषयों पर लिखते रहे हैं।

नीतीश नारायणन आंदोलनों के शोधकर्ता और लेखक हैं, जो ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के साथ जुड़े हैं। वे सहकारी संस्थाओं सहित श्रमिक वर्ग के आंदोलनों के इतिहास का अध्ययन करते हैं। इससे पूर्व वे स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के उपाध्यक्ष रहे हैं तथा इसकी पत्रिका स्टूडेंट स्ट्रगल के सम्पादक भी। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। उन्होंने अंग्रेज़ी और मलयालम में कई किताबें लिखीं हैं, जिनमें शामिल है The 1921 Rebellion in Malabar. A Collection of Communist Writings, (संपादनः विजय प्रसाद) और If Humanity Is A Country: Cuban Days.

सर्गा टी.के. अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्रोफेसर हैं। उनका शोध शहरी गतिशीलता, श्रम प्रवासन और निर्माण सहकारी समितियों जैसे विषयों से जुड़ा है, जिसमें यह अध्ययन किया जाता है कि काम और आवागमन किस प्रकार शहरी परिदृश्य को आकार देते हैं। इससे पहले वे केरल के कन्नूर विश्वविद्यालय में पढ़ाती थीं।

सुबिन डेन्निस एक अर्थशास्त्री और ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान में एक शोधकर्ता हैं। इससे पहले वे न्यूज़क्लिक ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल में संवाददाता के तौर पर कार्यरत थे। वे छात्र आंदोलन में सक्रिय रहे और स्टूडेंट फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया की दिल्ली इकाई के उपाध्यक्ष भी रहे। अर्थव्यवस्था और राजनीतिक विषयों पर लिखे सुबिन के अंग्रेज़ी और मलयालम लेख कई पत्रिकाओं और वेबसाइटों में छपते रहते हैं। वर्तमान में वे केरल में रह रहे हैं।


विजय प्रशाद ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के निदेशक हैं। उन्होंने चालीस से ज़्यादा किताबें लिखी हैं, जिनमें शामिल हैः The Darker Nations: A People’s History of the Third World, The Poorer Nations: A Possible History of Global South, और How the International Monetary Fund Suffocates Africa(Grieve Chelwa के साथ)। विजय LeftWord Books (नई दिल्ली), Inkani Books (जोहैनेस्बर्ग) और La Trocha (सैंटीआगो) में संपादक हैं।

भूमिका: साम्यवाद के भीतर छिपी संभावनाएँ

लेकिन श्रम की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की, संपत्ति की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर एक और भारी जीत अभी बाक़ी थी। हम बात कर रहे हैं सहकारी आंदोलन की, ख़ासतौर से सहकारी कारख़ानों की जो कुछ साहसी ‘मज़दूरों’ ने अपने बलबूते स्थापित किए थे। इन महान सामाजिक प्रयोगों बारे में जितना कहा जाए कम है। इन्होंने हमें कोरे तर्कों से नहीं बल्कि कार्यों से दिखाया है कि मालिकों के वर्ग द्वारा कामगारों के वर्ग को काम पर लगाए बिना भी आधुनिक विज्ञान के आधार पर विशाल स्तर पर उत्पादन किया जा सकता है; कि सफलता के लिए ज़रूरी नहीं कि श्रम के साधनों पर एकाधिकार स्थापित कर उन्हें श्रमिक पर प्रभुत्व और जबरन वसूली का साधन बनाया जाए; दास श्रम की तरह, किसानबंधुआ श्रम की तरह, मज़दूरी पर आधारित श्रम भी केवल एक अस्थायी और निम्न अवस्था है, जो अंततः मिलकर किए जाने वाले श्रम के सामने समाप्त हो जाने के लिए अभिशप्त है—एक ऐसा श्रम जो स्वेच्छा से, तत्पर बुद्धि से और प्रसन्न हृदय से अपना काम करता है।i

अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ का अध्यक्षीय भाषण, 1864, कार्ल मार्क्स

दुख इस दुनिया को घेरता जा रहा है। करोड़ों लोग ग़रीबी की ग़र्त में जीने को मजबूर हैं। पूंजीवादी विस्तारवाद से पैदा हुआ जलवायु संकट धरती पर जीवन की संभावना के सामने प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा है। दुनियाभर में युद्धों की वीभत्सता के कई रूप दिखाई दे रहे हैं, जिनमें शामिल है इज़राइल द्वारा ग़ज़ा में फ़िलिस्तीनियों का जनसंहार। इंसान की लिप्सा के कारण फैली भुखमरी ने पूरी आबादी को अपनी चपेट में लिया हुआ है। मानो प्रलय के ज्ञात रूप काफ़ी नहीं थे इसलिए वह नया रूप धरकर इंसानी जीवन की सभी संभावनाओं को कुचलने के लिए आया है।

यह सब मिलकर इस भावना को जन्म देता है कि इस भयावहता के अलावा कुछ भी संभव नहीं है, कि कोई विकल्प सोचा ही नहीं जा सकता। जब मज़बूत और जुझारू लोग, जैसा कि वे अनिवार्य रूप से करते हैं, एक बेहतर भविष्य के बारे में सोचने का साहस करते हैं, तो सत्ता में बैठे लोग उनका उपहास करते हैं और उन्हें कुचल देने की कोशिश करते हैं। शक्तिशाली और संपन्न वर्ग के लिए यही बेहतर है कि किसी भी विकल्प को पनपने ही न दिया जाए। क्योंकि उम्मीद की एक चिंगारी ही इस खोखले दावे को भस्म कर देने लिए काफ़ी है कि इतिहास का अंत हो चुका है।

ऐसी ही एक चिंगारी है केरल (साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाला राज्य) जिसका समाजवादी संरचना का ख़ूबसूरत इतिहास है। 1947 में भारत की आज़ादी के दस साल बाद भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने केरल के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की। शुरू से ही केरल की वामपंथी सरकार ने प्राचीन सामाजिक ऊँचनीच और रिवाजों को ख़त्म करने का एजेंडा अपनाया और सामाजिक संसाधनों (गुणवत्तापूर्व सरकारी स्कूल, स्वास्थ्य व्यवस्था और यातायात आदि सहित) को आम जनता की पहुँच के दायरे में लाने की कोशिश की तथा साथ ही मज़दूरों के यूनियन और सहकारी संस्थाएँ बनाने के अधिकारों की रक्षा करके श्रमिकवर्ग तथा किसानों की ताक़त की नींव तैयार की। हालाँकि दिल्ली में बैठी भारत सरकार ने असंवैधानिक रूप से 1959 में केरल की सरकार को बरख़ास्त कर दिया, लेकिन इस सरकार का तैयार किया गया एजेंडा कमोबेश जारी रहा। इसके बाद कुछकुछ अंतराल पर वाम सरकार की केरल में वापसी होती रही (1967–1969, 1969–1977, 1980–1982, 1987–1991, 1996–2001, 2006–2011और 2016–अब तक), हर बार इसने विकेंद्रीकरण के एजेंडे का विस्तार किया, जनता की सक्रियता को प्रोत्साहित किया और सामाजिक लोकतांत्रिक राज्य संस्थानों के आधार का निर्माण किया।ii बीचबीच में जब दक्षिणपंथ सत्ता में आया तब भी वाम सरकारों द्वारा शुरू की गई गतिशीलता को रोक नहीं पाया। इसी पृष्ठभूमि में केरल में सहकारी आंदोलन का विकास हुआ।

पूंजीवादी व्यवस्था के आलोचक अमूमन इसके उन विकल्पों की भी आलोचना करते हैं जो इसी व्यवस्था के दायरों में तैयार किए जाते हैं क्योंकि उनका मानना है कि ये संस्थान पूंजीवादी ताक़त में क़ैद रहते हैं। लेकिन यह सहकारी संस्थाओं का ग़लत विश्लेषण है। ये संस्थाएँ तो दरअसल जीवन और काम के तमाम विचारों को पनपने का मौक़ा देती हैं और प्रेरणा तथा उम्मीद की एक किरण हैं, ये हमें एक झलक देती हैं कि जब पूंजीवाद ख़त्म हो जाएगा तो मानवता क्या कुछ कर सकती है। सहकारी संस्थाएँ श्रमिक वर्ग और किसानों के लिए स्कूल बनाती हैं, जहाँ वे सीख पाते हैं कि विभिन्न आर्थिक आधारों पर सामाजिक संबंध कैसे स्थापित किए जाते हैं। कैपिटल के तीसरे खंड में मार्क्स लिखते हैं:

श्रमिकों के सहकारी कारख़ाने पुराने पेड़ों पर नयी कोपलों का प्रतीक हैं, यद्यपि वे स्वाभाविक तौर पर, और अनिवार्यत:, अपने वास्तविक संगठन में प्रचलित व्यवस्था की ख़ामियों को दोहराते हैं। लेकिन पूंजी और श्रम के बीच का विरोध इनके भीतर दूर हो जाता है—यदि शुरुआत में केवल इस रूप में ही सही कि संयुक्त श्रमिक स्वयं अपने ‘पूंजीपति’ बन जाते हैं, अर्थात् वे उत्पादन के साधनों का उपयोग अपने ही श्रम के रोज़गार के लिए करने में सक्षम हो जाते हैं। ये इस बात को दिखाती हैं कि जब उत्पादन की भौतिक शक्तियों और उससे मेल खाती सामाजिक उत्पादन की रूपरेखाएँ एक निश्चित स्तर तक विकसित हो जाती हैं, तो किस प्रकार एक नई उत्पादनपद्धति स्वाभाविक रूप से पुरानी पद्धति से उभरती है।iii

यहाँ मार्क्स ने जो विछिपी संभावनाएँ</h2>चार प्रस्तुत किए हैं वे बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। सहकारी संस्थाएँ या समितियाँ न तो मूल्य के पूंजीवादी नियम से अनिवार्य तौर से बंधी हैं और न ही इससे पूरी तरह आज़ाद। जैसा कि वे लिखते हैं कि ये एक वैकल्पिक प्रणाली की ‘कोपलें’ हैं जिसके ज़रिए श्रमिक वर्ग यह सीख पाता है कि पूंजीवादी प्रबंधन के निरस्त होने पर चीज़ें कैसे चलाई जाएँ। 1871 के पेरिस कम्यून के दौरान मज़दूरों के यूटोपिया का निर्माण होते देख मार्क्स बहुत गर्व महसूस कर रहे थे, उन्होंने देखा कि कम्यून वालों ने श्रमिकों की सहकारी संस्थाएँ या समितियाँ बनाईं और साथ ही एक नया समाज गढ़ने के अन्य साधन भी, और यह सब लुई नेपोलियन तृतीय के दूसरे साम्राज्य (1852-1870) के तख़्तापलट की ख़ुशी के बीच हुआ।iv मार्क्स लिखते हैं कि फ़्रांस के दूसरे गृह युद्ध में भविष्य में बनने वाले मज़दूरों के राज्य के ‘स्वरूप के तौर पर’ कम्यून ‘की खोज अंतत:’ हुई। इसी लेख में मार्क्स ने सहकारी संस्थाओं या समितियों के बारे में लिखा था:

अगर हम चाहते हैं कि सहकारी उत्पादन केवल एक ढोंग और जंजाल बनकर न रह जाए; अगर इसे पूंजीवादी प्रणाली को हटाना है; अगर हम चाहते हैं कि सहकारी समितियाँ एक साझा कार्यक्रम के आधार पर राष्ट्रीय उत्पादन को विनियमित करें, ताकि वे इसे अपने नियंत्रण में लें और निरंतर जारी अराजकता तथा समयसमय पर आने वाले उतारचढ़ाव जैसे पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली द्वारा पनपी घातक स्थितियों को समाप्त कर दें – तो यह कम्युनिज़म नहीं तो क्या है, एक ऐसा कम्युनिज़म जो ‘मुमकिन’ है।v

केरल के सहकारी आंदोलन पर यह दस्तावेज़ ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की समाजवादी संरचनाओं पर शोध की एक श्रृंखला का हिस्सा है। यह एक ऐसे कम्युनिज़म के बारे में है जो मुमकिन है, हमारे दौर में ही दिखाई दे रही एक आने वाले समाज की संभावनाओं के बारे में। केरल के सहकारी संस्थानों पर यह शोध एक शानदार उद्यम का ईमानदार मूल्यांकन है जो दिखाता है कि ये छोटे विशिष्ट समूहों के तौर पर ही सफल नहीं हुए बल्कि ऐसे बड़े उपक्रम में तब्दील हुए जो स्थानीय सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग बन गए। आज केरल में पंजीकृत 16,429 सहकारी समितियाँ हैं (इनमें से 12,278 सक्रिय हैं, 3,354 निष्क्रिय और 797 परिसमापन प्रक्रिया में हैं)vi सहकारी समितियाँ कई क्षेत्रों में काम करती हैं, इसमें वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन और वितरण से लेकर कृषि उत्पादन और भवन निर्माण आदि भी शामिल है। कुडुम्बश्री सबसे बड़ी सहकारी समिति है (हालाँकि यह पूर्णत: एक सहकारी समिति के रूप में पंजीकृत नहीं)। इसके 48 लाख सदस्य हैं और सभी महिलाएँ हैं। केरल की चार में से एक महिला इस सहकारी समिति की सदस्य है। कई सहकारी समितियाँ या संस्थाएँ लोकोपकारी संस्थाओं और ट्रस्ट के रूप में भी पंजीकृत हैं जैसे ब्रह्मगिरी डेवलपमेंट सोसाइटी जो कृषि विकास का काम करती है और जनता चेरिटबल सोसाइटी, जो दूध उत्पादन करने वाली एक प्रमुख संस्था है। अधिकतर सक्रिय सहकारी संस्थाओं की राज्य के अन्य भागों में भी शाखाएँ हैं।

ज़ाहिर है कि इनकी कुछ चुनौतियाँ और विरोधाभास हैं जिन पर स्पष्टता से बात की गई है: सहकारी समितियों की संभावनाओं को बढ़ाचढ़ाकर नहीं बताया गया है, क्योंकि वे भी एक ऐसी दुनिया में बचे रहने का संघर्ष कर रही हैं जहाँ मूल्य का पूंजीवादी नियम ही सर्वोपरि है। साथ ही केरल की जनता के भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में इन संस्थाओं के अहम योगदान को कम करके भी नहीं आंका गया है। ये सहकारी समितियाँ सिर्फ़ आशा की किरण नहीं हैं: बल्कि ये एक ख़ाका है कि दुनियाभर में पूंजीवादी व्यवस्था के दायरों में भी एक न्यायसंगत भविष्य की नींव कैसे तैयार की जा सकती है।

केरल की सहकारी समितियाँ/संस्थाएँ

1943 में अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) का सातवाँ अधिवेशन पंजाब के भकना कलाँ में हुआ, इसमें शामिल प्रतिनिधियों ने कई मुद्दे उठाए जिनमें सहकारी समितियों की चर्चा भी शामिल थी। यहाँ पारित प्रस्तावों में से एक में एआईकेएस ने यह मत दिया कि सहकारी समितियाँ किसानों को पूंजीवाद और साम्राज्यवादी कृषि प्रणाली के ‘संकट और अपमान’ के विरुद्ध उनकी लड़ाई में मदद कर सकती हैं, और साथ ही उन्हें आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय स्वतंत्रता’ हासिल करने में भी सहायता दे सकती हैं। अधिवेशन में चर्चा के दौरान कम्युनिस्ट नेता ईएमएस नंबूदिरिप्पाड (1909-1998), जिन्हें ईएमएस भी कहा जाता है, ने ‘संगठन – मशीन नहीं’ नाम से एक नोट लिखा। इस नोट में ईएमएस ने इस बात की ओर इशारा किया कि ‘अमूर्त राजनीति’ से परे जाने वाले एक जुझारू संगठन के बिना इन प्रस्तावों का कोई मतलब नहीं होगा। किसानों और खेत मज़दूरों को सहकारी समितियों का निर्माण करना होगा जिससे कि लोकतांत्रिक क्रांति का विस्तार हो और ग्रामीण मज़दूरों में आत्मविश्वास पैदा हो।vii

अक्टूबर 1956 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने केरल के त्रिसूर में एक मीटिंग की, जिसमें मुख्यतः सहकारी समितियों पर चर्चा की गई। इस मीटिंग की अध्यक्षता प्रोफ़ेसर जोसेफ़ मुंडस्सेरी ने की जो आगे चलकर केरल में ईएमएस सरकार (1957-1959) में पहले शिक्षा और सहकारिता मंत्री बने। इस मीटिंग में फ़ैसला लिया गया कि सहकारी समितियों को सामंती वर्ग का ‘बहीखाता’ नहीं बनने दिया जाएगा, बल्कि श्रमिक वर्ग ख़ुद इन्हें बनाएगा और लोकतंत्र तथा समाजवाद के निर्माण में इन सहकारी समितियों व संस्थाओं की भूमिका के विषय पर राजनीतिक शिक्षा भी दी जाएगी। पार्टी के नेताओं ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कम्युनिस्टों और मज़दूरों द्वारा नियंत्रित सफल ग्रामीण ऋण संस्थाओं और सहकारी बैंकों की बहुत ज़रूरत है जिससे कि महाजनों के शिकंजे को तोड़ा जा सके, कृषि उत्पादन को बेहतर किया जा सके और किसानों तथा खेत मज़दूरों के जीवन में सुधार लाया जा सके। इसी वैचारिक स्पष्टता के साथ केरल की सहकारी समितियाँ दुनिया भर के लोकतांत्रिक श्रमिकों के नेतृत्व वाली सहकारी संरचना के लिए उम्मीद की किरण के रूप में उभरी हैं।

इस शोध में केरल की सहकारी समितियों या संस्थाओं के संक्षिप्त ब्यौरे वाले लेख दिए गए हैं। इन्हें लिखा है उन विशेषज्ञों और नेताओं ने जिन्होंने इन सहकारी समितियों के साथ क़रीबी से काम किया है ताकि वे इन्हें समझा पाएँ और इनका विश्लेषण भी कर पाएँ। इन लेखों में जो आँकड़ें दिए गए हैं वे सहकारी समितियों/संस्थाओं और सरकारी दस्तावेज़ों से जुटाए गए हैं। इस काम में हमारी मदद करने के लिए हम यूएल रिसर्च सेंटर का आभार व्यक्त करते हैं।

इन लेखों में कुछ ज़रूरी तथ्य सामने आए हैं:

  1. केरल में सहकारी क्षेत्र इतना विकसित इसलिए हो पाया क्योंकि यहाँ सामाजिक सुधार का लंबा इतिहास है जिसने सहयोग के लिए ज़रूरी सामाजिक आधार का निर्माण किया। जब सोवियत संघ की ख़बरें केरल तक पहुँची तो सामाजिक सुधार और जाति विरोधी आंदोलनों में शामिल जनता ने वहाँ सामाजिक और आर्थिक संबंधों के पुनर्निर्माण की कोशिशों के प्रति उत्सुकता ज़ाहिर की। इसी उत्सुकता ने सोवियत संघ की सहकारी समितियों/संस्थाओं के अध्ययन को बढ़ावा दिया और ये अध्ययन उस दौर के सामाजिक सुधार तथा जाति विरोधी आंदोलनों की जनसभाओं में प्रस्तुत किए गए।

  2. केरल में सहकारी क्षेत्र के विकास के पीछे का मुख्य कारण यहाँ के वर्ग संघर्ष की जीवंतता है। यहाँ संगठित किसानों और मज़दूरों ने समाज सुधार आंदोलन को मजबूर किया कि वह जाति व्यवस्था, ज़मींदारी प्रथा और उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ संघर्षों को एकजुट करे। इन्हीं संघर्षों में किसान आंदोलन ने – मुख्यतः उत्तर केरल में – अत्यंत ग़रीब किसानों की मदद के लिए किसानों की सहकारी समितियाँ बनाने का काम शुरू किया। इन सहकारी समितियों की शुरुआत से ज़मींदारी प्रथा का शिकंजा कुछ ढीला पड़ा क्योंकि अब वे न तो किसानों को मनमाने ब्याज पर ऋण दे सकते थे और न ही उनकी ज़रूरत की चीज़ों के इकलौते विक्रेता रह गए थे। उनकी आँखों के सामने किसानों की सहकारी समितियों ने जनता का मनोबल बढ़ाने का काम किया। किसानों की सहकारी समितियों की सफलता ने राज्य के दूसरे भागों में भी ऐसी ही समितियों को जन्म दिया और यहाँ भी वे जन आंदोलनों के संगठनों के बलबूते खड़ी हुईं।

  3. केरल की पहली कम्युनिस्ट सरकार (1957-1959) को समाज सुधार आंदोलनों से भारी समर्थन मिला और यह पिछले दशकों के वर्ग संघर्ष तथा सहकारी आंदोलन की सफलता की नींव पर खड़ी थी। इसलिए इस कम्युनिस्ट सरकार ने केरल की सामाजिक संपदा का इस्तेमाल राज्यभर में और भी सहकारी समितियों/संस्थाओं के विकास के लिए किया। सरकार ने नारियल के छिलके, हथकरघा और ताड़ी के लिए सहकारी समितियों की स्थापना की जिससे अर्थव्यवस्था के इन क्षेत्रों का विकास हो सके और मज़दूरों के काम की परिस्थितियाँ तथा मज़दूरी बेहतर हो सके।

  4. सहकारी समितियों/संस्थाओं की स्थापना पर इसलिए भी ज़ोर दिया गया ताकि व्यापक स्तर पर रोज़गार और उच्च वेतन सुनिश्चित किया जा सके, साथहीसाथ तमाम उद्यमों की बढ़ती कार्यकुशलता तथा उत्पादकता का मतलब था कि ये सहकारी समितियाँ निजी क्षेत्र से भी मुक़ाबला कर सकती थीं।

  5. शोषित जातियों के नेताओं को सहकारी प्रणाली ने काफ़ी आकर्षित किया, उन्होंने इसे अपनी आज़ादी और मुक्ति को साकार करने के एक ज़रिए के तौर पर देखा। उदाहरण के लिए, दिसंबर 1929 में चेरमार समाजम सम्मेलन में संगठन के अध्यक्ष चाजन ने वहाँ मौजूद पुलया समुदाय के दो हज़ार सदस्यों से कहा कि ये सहकारी समितियाँ और इनके शैक्षणिक कार्यक्रम तथा शराबविरोधी अभियान उनके अपने संघर्ष के लिए बेहद अहम हैं।viii

  6. सहकारी समितियों में दी जाने वाली राजनीतिक शिक्षा ने इसके सदस्यों को यह समझने में मदद की कि वे किस चीज़ (समाजवाद) का निर्माण कर रहे हैं और यह किस तरह उस सब से अलग – और बेहतर – है जिसका निर्माण निजी क्षेत्र ने किया है (पूंजीवाद)

  7. सहकारी वित्तीय संस्थाओं के फैले हुई जाल के बिना यह पूरा क्षेत्र ही वित्तीय संसाधनों के लिए तरसता रह जाता। यह व्यवस्था भी समयसमय पर वामपंथ के सत्ता में आने पर निर्भर थी जिसने केरल के ऋण बाज़ार में बड़े पैमाने पर निजीकरण को रोका।

  8. सहकारी समितियों के लोकतांत्रिक ढाँचे और इनके सदस्यों के नवाचार ने इन्हें अपने काम में विविधता लाने और बदलते समय के अनुरूप ढलने का मौक़ा दिया। उदाहरण के लिए, जब तंबाकू सेवन की आदतों में बदलाव आने लगे तो दिनेश बीड़ी वर्कर्स सेंट्रल कोऑपरेटिव सोसाइटी ने खाद्य उत्पादन का काम करना शुरू कर दिया।

  9. केरल के सहकारी आंदोलन का एक प्रमुख तत्त्व यह है कि यह सामाजिक बदलाव के लिए प्रतिबद्ध है, यह इस बात पर ज़ोर देता है कि सहकारी संरचना का इस्तेमाल करके पितृसत्ता (महिलाओं की सहकारी समितियों के ज़रिए), जातिगत ऊँचनीच (शोषित जातियों की सहकारी समितियों के ज़रिए), आदिवासियों समुदायों के साथ होने वाले भेदभाव (अनुसूचित जनजातियों की सहकारी समितियों के ज़रिए) तथा ट्रांसजेंडर समुदायों के साथ होने वाले भेदभाव (ट्रांसजेंडर समुदाय की सहकारी समितियों के ज़रिए) से उबरा जा सकता है। साथ ही विकलांग जनता के लिए समानता के भाव को प्रोत्साहित किया जा सकता है।

यह शोध दिखाता है कि ये सहकारी संस्थाएँ कैसे एक ऐसी आर्थिक प्रणाली के सामाजिक स्वरूप को बढ़ावा देने में सफल हुईं हैं जो पूंजीवादी दबावों का एक विकल्प देती है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा के उस प्रतिगामी स्वरूप में मज़दूरों की आजीविका की ही सबसे पहले बलि चढ़ती है जबकि मुनाफ़े को ईश्वर की जगह स्थापित कर दिया जाता है। केरल की सहकारी समितियों ने इस विचार को उलट दिया है, इसके केंद्र में श्रमिक वर्ग की ज़रूरतें और गरिमा है।

वंशिका बब्बर (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), ऊरालुंगल कोऑपरेटिव के कर्मचारी, 2025.

सह्या चाय सहकारी संस्था

निधीश जे विल्लाट और विजू कृष्णन

दिसंबर 2022 में हुए अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) के 35वें सम्मेलन में भाग लेने वाले हर प्रतिनिधि के हाथ में सह्या चाय के एक पैकेट के साथ केरल के मशहूर मसाले इत्यादि थे। इसके महीनों बाद सम्मेलन में लिए गए फ़ैसलों के बारे में रिपोर्ट देने के लिए असम दौरे पर एक प्रतिनिधि ने चाय के ब्रांड पर गौर किया। स्थानीय प्रतिनिधियों ने इसके बारे में पूछा और दावा किया कि यह तो दुनिया भर में मशहूर असम की चाय से भी बेहतर है। उनके इस सवाल ने हमें इस ब्रांड और इसके पीछे के एकजुट प्रयास के बारे में और जानने के लिए प्रेरित किया।

5 मई 1875 को विल्हेम ब्रेक के नाम एक ख़त में कार्ल मार्क्स लिखते हैं, ‘वास्तविक प्रयास का हर एक क़दम दर्जनों कार्यक्रमों से ज़्यादा ज़रूरी है’।ix केरल के इडुक्की ज़िले के थंकमणि की पहाड़ियों में स्थित सह्या चाय सहकारी कारख़ाने की कहानी बताती है कि समाजवाद की ‘वास्तविक प्रक्रिया’ का क्या महत्त्व है। 2017 में शुरू हुए इस कारख़ाने की स्थापना थंकमणि सेवा सहकारी बैंक लिमिटेड (स्थापना 1966) द्वारा की गई। यह सहकारी बैंक कामाक्षी ग्राम पंचायत में है, यहाँ अधिकतर लघु चाय उत्पादक रहते हैं, इस बैंक के 15,000 सदस्य हैं, जिनमें से ज़्यादातर छोटे किसान और मज़दूर हैं। थंकमणि सहकारी चाय कारख़ाने में ज़्यादातर काली, हरी और कई मिश्रित चायपत्तियों का उत्पादन होता है।

सहकारी बैंक और चायपत्ती कारख़ाने को केरल के कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले सहकारी आंदोलन के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखासमझा जाना चाहिए।x रूस में 1917 में हुई अक्टूबर क्रांति का केरल के प्रगतिशील आंदोलनों पर बहुत प्रभाव पड़ा और राष्ट्रीय आंदोलन में इनकी दिशा को इसने काफ़ी प्रभावित किया। 1934 में इन आंदोलनों के सबसे मज़बूत हिस्सों ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया। पाँच साल बाद इस पार्टी की केरल इकाई ने ख़ुद को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की केरल इकाई में बदल लिया, इसी ने आगे चलकर इस क्षेत्र में एआईकेएस और अन्य कई मज़दूर संगठन बनाए। इसी पृष्ठभूमि के साथ इस दौर में एआईकेएस और अन्य प्रगतिशील ताक़तें सहकारी आंदोलन में दाखिल हुईं तथा 1930 और 1940 के दशक में जो वर्ग संघर्ष उफ़ान पर था उससे सहकारी आंदोलन को अलग रखने की ब्रिटिश रणनीति का सामना किया। मसलन, ईएमएस बताते हैं कि पीपल्स वॉर (1941-1945) [फ़ासीवादी जर्मनी और सैन्यवादी जापान के विरुद्ध जनयुद्ध] के दौरान कम्युनिस्टों ने साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार को मजबूर किया कि वह ज़मींदारों से अनाज ले और राशन की दुकानों के ज़रिए जनता में बाँटे, यही प्रणाली आगे चलकर उत्पादकों और उपभोक्ताओं की सहकारी समितियों के रूप में विकसित हुईं।xi केरल में कम्युनिस्टों ने सहकारी समितियों को वर्ग संघर्ष के विस्तार के रूप में देखा, यह रोचडेल आदर्शोंxii से निकले सहकारी समितियों के परोपकारी उपनिवेशवादी विचार से अलग था जो 1844 से सहकारी समितियों के प्राथमिक दिशानिर्देश के तौर पर स्थापित था।xiii

1943 में एआईकेएस के सातवें अधिवेशन में पारित सहकारी समितियों से जुड़े प्रस्ताव से ही तय हो चुका था कि साम्राज्यवाद का विरोध करने वाले एक मज़बूत श्रमिक वर्ग का संगठन तैयार करने और सहकारी समितियों के निर्माण में द्वंद्वात्मक संबंध है। इस प्रस्ताव में एआईकेएस के काडर का आह्वान किया गया कि वे किसानों के आर्थिक और सामाजिक दमन से लड़ने की रणनीति के तौर पर सहकारिता की दिशा में कदम उठाएँ। इस प्रस्ताव में पेश विचारों में और ख़ासतौर से ईएमएस का ‘संगठन – मशीन नहीं’ शीर्षक वाले नोट में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि सहकारी समितियाँ कहीं ‘अमूर्त राजनीति’ में फँस न जाएँ इसलिए एक सशक्त वर्गीय संगठन की ज़रूरत है। इसके साथ ही इन दस्तावेज़ों ने सहकारी समितियों के निर्माण के विषय में होने वाली आगामी चर्चाओं के लिए महत्त्वपूर्ण ख़ाका भी प्रदान किया।

जब तक कम्युनिस्ट और सहकारी आंदोलन के नेता अक्टूबर 1956 में त्रिस्सूर में इकट्ठा हुए तब तक ध्यान 1943 में रखी गई सैद्धांतिक नींव से केरल में इस नींव को अमल में लाने की व्यावहारिक चुनौतियों पर जा चुका था।xiv मीटिंग में शामिल लोगों ने केरल में सहकारी समितियों की गतिविधियों का जायज़ा लिया और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बुर्जुआ जमींदारी व्यवस्था के भ्रम की आलोचना की, जिसका मानना था कि सिर्फ सहकारी समितियों की स्थापना से ही समाजवाद आ जाएगा। मीटिंग में मौजूद लोगों ने कहा कि कम्युनिस्टों को सहकारी समितियों के गठन के काम में सचेत होकर शामिल होना होगा और इनमें तथा अन्य जन संगठनों में बड़ी संख्या में कामकाजी लोगों को जोड़ना होगा ताकि इस प्रक्रिया में उन्हें राजनीतिक शिक्षा देना सुनिश्चित किया जा सके। सफल सहकारी ग्रामीण ऋण समितियों और बैंकों का उल्लेख किया गया जिन्होंने महाजनों के शिकंजे को तोड़ा था और कृषि उत्पादन को बेहतर करके किसानों और खेत मज़दूरों की आय बढ़ाई थी। इन सहकारी समितियों को असफल समितियों से अलग करने वाली बात यह थी कि कम्युनिस्टों ने यह सुनिश्चित किया कि ये उन प्रतिक्रियावादियों द्वारा हथिया न ली जाएँ जो ग्रामीण सत्ता के पुराने रूपों को बनाए रखने की कोशिश करते थे।

छोटे चाय बागान मालिकों का उदय

1990 के दशक के अंत में चाय उद्योग में एकाधिकार पूंजी (मोनोपोली कैपिटल) के लाभ के जुनून से प्रेरित एक व्यापक पुनर्गठन हुआ जिसके तहत विलय और अधिग्रहण किए गए और ब्रांड निर्माण पर आक्रामक रूप से ज़ोर दिया गया। यूनिलीवर और टाटा जैसी बड़ी कंपनियों—जिन्हें बिग टी के नाम से जाना जाता है—ने कृषि उत्पादन से सीधे संबंध तोड़ लिए और चाय एस्टेट के स्वामित्व और प्रबंधन से अपना निवेश हटा लिया। उदाहरण के लिए, मार्च 2000 में टाटा ने टेटली ग्रुप, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी चाय निर्माता और वितरक कंपनी, को £271 मिलियन में अधिग्रहित कर लिया।xv टाटा और यूनिलीवर दोनों, जो दुनिया की सबसे बड़ी चाय कंपनी है, ने विभिन्न स्वाद और मूल्य सीमा वाली नई ब्रांडेड चाय—जिसमें क्रश, टियर एंड कर्ल (CTC) के साथसाथ मिश्रित चाय उत्पाद भी शामिल हैं—बनाने और उनकी मार्केटिंग करना शुरू किया।

यह परिवर्तन चाय उगाने और प्रॉसेस करने वाले चाय एस्टेटों में वित्तीय संकट के साथ आया था, जिनका प्रबंधन काफी हद तक गैरएकाधिकार पूंजी द्वारा किया जाता है। अधिकांश एस्टेट छोटी फर्मों को बेच दिए गए, लेकिन एकाधिकार कंपनियों ने अनुबंधात्मक खंडों के माध्यम से अपनी आपूर्ति सुरक्षित कर ली जिससे उन तक पर्याप्त अनप्रासेस्ड चाय पहुँचने की गारंटी बनी रही। जैसा कि प्रोफेसर नताली लैंगफोर्ड ने देखा, उद्योग ऊर्ध्वाधर एकीकरणसे मूल्य श्रृंखलाओं की ओर शिफ़्ट हो गया, जिसमें फर्मों ने कम मूल्य वर्धन करने वाली गतिविधियों को आउटसोर्स करके अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को बढ़ाने की कोशिश की।xvi व्यवहार में बिग टी ने कृषि उत्पादन और एस्टेट प्रबंधन को श्रृंखला की सबसे परेशानी वाली कड़ी माना क्योंकि वे श्रम और पर्यावरण कानून द्वारा भारी रूप से विनियमित थे, और वर्ग संघर्ष से बचने के लिए कंपनियों ने इन क्षेत्रों से अपने आप को दूर रखना चाहा। इसके बजाय उन्होंने उच्च मूल्य वर्धित गतिविधियों जैसे मिश्रण, पैकिंग, ब्रांडिंग, वितरण और बिक्री पर नियंत्रण मज़बूत किया। इस बीच छोटे चाय बागान मालिक चाय पत्तियों के मुख्य उत्पादक के रूप में उभरे: उनकी भागीदारी 1991 में 7% से बढ़कर 2022 में 52% हो गई और अनुमान है कि 2030 तक यह 70% तक पहुँच जाएगी।

सह्या चाय सहकारी संस्था फ़ैक्ट्री के गठन से पहले इडुक्की क्षेत्र के लगभग 3,500 छोटे चाय बागान मालिक टाटा और एवीटी बेवरेजेज (दक्षिण भारत की एक प्रमुख चाय कंपनी) जैसी एकाधिकार फर्मों द्वारा चलाए जा रहे एक तंत्र के चंगुल में फँसकर काम कर रहे थे। ये बड़ी कंपनियाँ किसानों और एजेंटों‘ (बिचौलिये जो अक्सर फ़ैक्ट्रियों की ओर से ख़रीदार के रूप में काम करते हैं, आमतौर पर छोटे किसानों से चाय की पत्तियाँ तोड़ने पर कमीशन लेते हैं) दोनों से एक मनमानी दर और अपमानजनक नियमों व शर्तोंपर ग्रीन लीफ (ताज़ी तोड़ी गई अनप्रासेस्ड चाय पत्तियां) खरीदती थीं, ऐसा किसानों के एक समूह ने हमें बताया। कई किसानों ने हमारे साथ ऐसी कहानियाँ साझा कीं कि अगर वे उचित मूल्य के लिए मोलभाव करते तो कंपनियाँ बहाने बनाकर उनकी ग्रीन लीफ लेने से मना कर देतीं, और किसानों को जो पत्तियाँ दूर से लेकर आते थे, उन्हें फेंकने या खाद के रूप में उपयोग करने के लिए मजबूर कर दिया। निराश किसानों के अपने ठुकराए हुए माल के साथ ट्रैक्टर पर घर लौटने के दृश्य आम थे। सुनियोजित तरीक़े से माल लेने से मना करने का यह तरीक़ा इसलिए अपनाया गया कि एक आज्ञाकारी किसान वर्ग बनाया जा सके जो कम क़ीमत पर अपनी फसलें कंपनियों को बेचने का आदी हो जाए। पूरा तंत्र बड़ी कंपनियों के लिए अत्यंत अनुकूल था।

सफल सहकारी कार्रवाई की अनुपस्थिति में व्यापारिक एजेंट आमतौर पर पूरे भारत में छोटे बागान मालिकों से ग्रीन लीफ के प्रति किलो 15%–20% का कमीशन वसूलते हैं। इसका एक बड़ा हिस्सा बॉट लीफ टी फ़ैक्ट्रियों को बेचा जाता है जो ख़ुद की उगाई पत्तियों के बजाय ख़रीदी गई पत्तियों से चाय प्रॉसेस करती हैं। एक और हिस्सा कभीकभी बड़े बागानों के स्वामित्व वाली चाय एस्टेट फ़ैक्ट्रियों को बेचा जाता है। व्यापारिक एजेंट पत्तियों की गुणवत्ता और मूल्य का मूल्यांकन उनकी फाइन लीफ काउंट‘ (नई, कोमल पत्तियों और कलियों का अनुपात, जो चाय की समग्र गुणवत्ता निर्धारित करता है) के आधार पर बहुत व्यक्तिपरक तरीके से करते हैं, जिससे छोटे किसानों के हितों से समझौता होता है।xvii

बॉट लीफ टी फैक्ट्रियाँ आमतौर पर अपनी प्रासेस्ड चाय नीलामी करके बेचती हैं। चूंकि प्रक्रिया बिग टी कंपनियों (प्राथमिक खरीदार) द्वारा नियंत्रित होती है, चाय कम कीमतों पर बेची जाती है।xviii भारत में पूरी नीलामी व्यवस्था इस तरह से बनाई गई है कि नवशास्त्रीय अर्थशास्त्र की मूल अभिधारणा कि आपूर्ति और मांग की अंत:क्रिया कीमतों को निर्धारित करती है एक मज़ाक प्रतीत होती है। दूसरी ओर एस्टेट फैक्ट्रियाँ आम तौर पर अपनी प्रासेस्ड चाय का केवल आधा हिस्सा नीलामी में बेचती हैं, जैसा कि 1983 के टी मार्केटिंग कंट्रोल ऑर्डर (जो स्वयं 1953 के टी एक्ट के तहत है) में दिए गए नियमों के तहत अनिवार्य है, और दूसरा आधा हिस्सा अधिक लाभदायक निजी चैनलों के माध्यम से बेचती हैं।

नीलामी में भाग लेने वालों में प्रमुख चाय पैकिंग कंपनियाँ, व्यापारिक एजेंट और अन्य अग्रणी पैकेट चाय ब्रांड शामिल होते हैं। चूंकि ये कंपनियाँ फिर चाय को मिश्रित करने, छाँटने, श्रेणीबद्ध करने और पैक करने जैसी मूल्य वर्धित प्रक्रियाएं करती हैं, इससे पहले कि इसे उपभोक्ताओं को वितरित किया जाए, छोटे चाय बागान मालिक, जो मूल्य श्रृंखला के निचले सिरे पर हैं, चाय पर उपभोक्ता ख़र्च का एक असंगत रूप से कम हिस्सा प्राप्त करते हैं लगभग 15%। दूसरी ओर, चाय पैकिंग कंपनियाँ, जो ज़्यादातर बड़ी एकाधिकार कंपनियाँ हैं, चाय पर उपभोक्ता ख़र्च का 50% प्राप्त करती हैं। इसीलिए छोटे चाय बागान मालिकों के लिए मूल्य श्रृंखला में ऊपर चढ़ना और बेहतर कीमतें पाने के लिए सीधे बाज़ार तक पहुँच प्राप्त करना अनिवार्य है।xix इसीलिए सह्या चाय सहकारी संस्था बिग टी के क्षेत्र में प्रवेश करने का साहसिक क़दम उठाने की कोशिश कर रही है।

सहकारी चाय

किसानों के सामने आने वाली कठिन परिस्थितियों ने ही एआईकेएस सदस्यों को 2017 में सह्या चाय सहकारी संस्था का गठन करने के लिए प्रेरित किया। प्रतिदिन 15,000 किलो ग्रीन लीफ प्रासेस करने के लिए डिज़ाइन की गई, सह्या चाय सहकारी संस्था 150 से अधिक श्रमिकों के लिए रोज़गार पैदा करती है, जिनमें से अधिकांश कृषि श्रमिक वर्ग और किसान वर्ग से हैं, साथ ही यह छोटे चाय बागान मालिकों से किसानों के हितों की रक्षा भी करती है। जब हमने सितंबर 2023 में सहकारी फ़ैक्ट्री और उसके कैचमेंट क्षेत्र का दौरा किया, तो हमारा ध्यान छोटे चाय बागान मालिकों में दिखने वाले आत्मविश्वास ने खींचा।

इस सहकारी संस्था के पहले तीन वर्ष, 2017 से 2020, चुनौतीपूर्ण थे: न केवल उसे 12% ब्याज पर लिए गए बड़े ऋण का भुगतान शुरू करना था, बल्कि इसने कई चुनौतियाँ भी सही, जैसे 2018 की केरल बाढ़ और कोविड-19 महामारी (2020–2023)। इन सभी वित्तीय चुनौतियों के बावजूद यह सहकारी संस्था ग्रीन लीफ की ख़रीद करने और किसानों को 12 रुपये प्रति किलो (कॉर्पोरेट दर 7 रुपये प्रति किलो से कहीं अधिक) का भुगतान करने में सक्षम थी। सहकारी संस्था द्वारा दी जाने वाली स्थिर क़ीमतों ने कॉर्पोरेट चाय आपूर्तिकर्ताओं को मजबूर किया कि वे छोटे चाय बागान मालिकों को ऊँची दरें दें।

सहकारी संस्था के नेतृत्व ने अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार के तरीक़ों पर विचारविमर्श करने के लिए किसानों और श्रमिकों को इकट्ठा किया। चूंकि बिग टी कंपनियाँ अपने पैकेज्ड चाय उत्पादों के साथ बाज़ार पर हावी थीं, उन्होंने अपनी मार्केटिंग रणनीति में सुधार करने और बाज़ार में पैठ बनाने का अभियान शुरू करने का फैसला किया। केएस चित्रा, एक लोकप्रिय गायिका जिन्हें केरल की कोकिलाके नाम से जाना जाता है, सह्या चाय सहकारी संस्था की ब्रांड एम्बेसडर बनीं और अपने काम के लिए कोई भुगतान लेने से इनकार करते हुए इसके ब्रांड को लोकप्रिय बनाने में मदद की। बाज़ार में अपनी उपस्थिति मज़बूत करने के लिए सहकारी संस्था ने केरल की सार्वजनिक वितरण प्रणाली, जैसे सप्लाईको (केरल राज्य नागरिक आपूर्ति निगम) और कंज्यूमरफेड (केरल राज्य सहकारी उपभोक्ता महासंघ), के साथसाथ पुलिस कैंटीन को सामान उपलब्ध कराने वाली प्रणाली का भी उपयोग किया।

इस सहकारी चाय संस्था को राज्य से अन्य प्रकार का समर्थन भी प्राप्त हुआ, जैसे 2020–2021 में जब केरल की राज्य सरकार ने महामारी के दौरान वितरित खाद्य किट के लिए सह्या चाय ख़रीदी। इन रचनात्मक मार्केटिंग तंत्रों और राज्य सहायता के परिणामस्वरूप, इस सहकारी संस्था ने अपने चौथे वर्ष (2020–2021) में लाभ कमाया और ग्रीन लीफ के लिए 18 रुपये प्रति किलो का भुगतान करना शुरू किया और कमाए मुनाफ़े को पत्तियाँ देने वाले किसानों को प्रोत्साहन के रूप में वितरित किया। इसने एक ऐतिहासिक मिसाल कायम की: पहली बार, किसानों को उनके योगदान का न्यायसंगत पारिश्रमिक मिला।

वंशिका बब्बर (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), उदयपुरम कोऑपरेटिव के कर्मचारी, 2025.

ऊरालुंगल लेबर कॉन्ट्रैक्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी

नजीब वीआर

1925 में, दक्षिणपश्चिम भारत में साम्यवादी आंदोलन के मज़बूत होने से पहले, समाज सुधारक वयलेरी कुन्हिकन्नन गुरुक्कल, जिन्हें श्री वाग्भडानंद गुरु (1885–1939) के नाम से भी जाना जाता है, के अनुयायियों ने निर्माण श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए ऊरालुंगल लेबर कॉन्ट्रैक्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी (यूएलसीसीएस) की स्थापना की। आज, यूएलसीसीएस एशिया की सबसे बड़ी श्रमिक सहकारी संस्था है। 2021 की वर्ल्ड कोऑपरेटिव मॉनिटर सूची में उद्योग और बुनियादी सेवाओं से जुड़े सहकारी संस्थानों में इसे दूसरे स्थान पर रखा गया। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की भारत में रेज़िडेंट कोऑर्डिनेटर लिसे ग्रांडे, इसे एक मॉडल सहकारी संस्थान कहती हैं, जिसकी सफलता ‘दुनिया के लिए प्रेरणादायक है’।xx मज़दूरों के एक समूह से उत्पन्न होकर, उत्तरी केरल के मालाबार के ग्रामीण क्षेत्र में स्थित यूएलसीसीएस आज सड़कों, पुलों, इमारतों और सॉफ़्टवेयर प्रणालियों का निर्माण करती है। सामाजिक सद्भाव और समावेशन के साथसाथ श्रमिकों के बीच सहयोग के प्रति इसकी प्रतिबद्धता ने इसे सामाजिक सेवाओं के उन क्षेत्रों में सफल बनाया है जो अक्सर सहकारी संस्थाओं के लिए चुनौतीपूर्ण होती हैं।

यूएलसीसीएस की स्थापना उस समय हुई, जब रोज़ीरोज़गार पाना बहुत कठिन था और जाति तथा वर्ग के भेदभाव पहले से भी अधिक कठोर थे। 1917 में श्री वाग्भडानंद गुरु के अनुयायियों ने ‘आत्म विद्या संघम’ की स्थापना की। इसके सदस्यों ने 1922 में यूनाइटेड क्रेडिट कोऑपरेटिव की स्थापना की, ताकि यदि उनमें से किसी को ऋण बाज़ार में — जो प्रभावशाली जातियों द्वारा नियंत्रित था — भेदभाव के कारण आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़े, तो वे एकदूसरे की सहायता कर सकें। उन्होंने अपने बच्चों के लिए एक विद्यालय स्थापित किया, जिन्हें क्षेत्र की प्रमुख जातियों द्वारा शिक्षा से वंचित किया गया था। वाग्भडानंद की सलाह पर उन्होंने 1924 में दैनिक वेतनभोगी मज़दूरों की सहायता के लिए एक संगठन बनाने का निर्णय लिया, ताकि उच्च जातियों द्वारा लगाए गए उन श्रम प्रतिबंधों को दरकिनार किया जा सके, जो जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ उनकी लड़ाई को रोकने के लिए लगाए गए थे।

इसके बाद, 13 फरवरी 1925 को मज़दूरों ने ‘ऊरालुंगल लेबरर्स म्यूचुअल ऐड एंड कॉपरेटिव सोसाइटी (अब यूएलसीसीएस) की स्थापना की। धीरेधीरे, अधिक से अधिक मज़दूर यूएलसीसीएस से जुड़ते गए, और आज यह केरल के कोनेकोने में फैल चुकी है।

अपने शुरुआती वर्षों में, यूएलसीसीएस शायद ही कभी ठेके हासिल कर पाती थी, और जब ठेके मिलते भी थे, तो टेंडर की राशि बहुत ही कम तय की जाती थी। प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए, यूएलसीसीएस निजी ठेकेदारों की तुलना में 27.5% कम बोली लगाती थी। इससे कुछ ठेके तो मिल जाते थे, लेकिन लाभ बहुत ही कम होता था। सड़क निर्माण और बड़े प्रोजेक्ट्स के अनुभव की कमी के कारण कई समस्याएँ भी आईं। फिर भी इस सहकारी संस्था ने छोटे स्थानीय सरकारी ठेकों और अपने अपेक्षाकृत संपन्न सदस्यों से प्राप्त अल्पकालिक ऋणों के बूते ख़ुद को संभाले रखा। यूएलसीसीएस को ग्रामीण मालाबार में प्रचलित माइक्रोफाइनेंस के परंपरागत तरीक़ों जैसे ‘पयट्ट’ और ‘कुरिक्कल्याणम’xxi से भी आर्थिक सहायता मिली।

समय के साथ, यूएलसीसीएस के मज़दूरों ने अपने कौशल में सुधार किया और व्यापार में दक्षता हासिल की। दक्षता और काम की गुणवत्ता बढ़ने से बड़े और लाभदायक ठेके मिलने लगे। उनके कामकाज की नैतिकता ने केरल के निर्माण उद्योग में उत्कृष्टता की एक नई संस्कृति विकसित की। 1940 के दशक तक, यूएलसीसीएस को मालाबार कोऑपरेटिव सेंट्रल बैंक से धन मिलने लगा और जनता द्वारा यूएलसीसीएस योजनाओं में फिक्स्ड डिपॉज़िट भी जमा किए जाने लगे।

पिछली एक सदी में, यूएलसीसीएस एक ऐसे समूह से विकसित हुई, जिसकी प्रारंभिक पूंजी केवल 0.37 रुपये (1925 में 0.13 डॉलर) थी, और 2023 में इसकी वार्षिक आय 25 अरब रुपये (30 करोड़ डॉलर) पहुँच गई। इसमें 18,000 मजदूर हैं, जिनमें 1,000 से अधिक इंजीनियर और 1,200 तकनीशियन शामिल हैं। यह सहकारी संस्था न केवल अपने श्रमिकों और समुदाय के कल्याण को आगे बढ़ाती है — और संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों में से 13 को पूरा करती है — बल्कि उचित लागत पर उच्च गुणवत्ता और समय पर काम पूरा करना भी सुनिश्चित करती है। इन कारकों, और यूएलसीसीएस की आधुनिक निर्माण तकनीकों के साथ, यह निजी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा कर पाती है और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय तथा केरल सरकार के बड़े ठेके हासिल करती है। अब तक यूएलसीसीएस 7,500 से अधिक प्रमुख परियोजनाएँ पूरी कर चुकी है और वर्तमान में 6.5 अरब रुपये मूल्य की 500 परियोजनाओं पर कार्य कर रही है। सहकारी मॉडल के कारण, यह अपने श्रमिकों को निजी और सरकारी क्षेत्रों से भी बेहतर वेतन देती है।

श्रमिकों की आकांक्षाओं के अनुसार आगे बढ़ने की अपनी प्रतिबद्धता के तहत, यूएलसीसीएस ज्ञानआधारित अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में भी प्रवेश कर चुकी है, जैसे सॉफ्टवेयर विकास। अब यह निर्माण श्रमिकों का सहकारी समूह ही नहीं रह गई है, बल्कि आगे बढ़कर शहरों और कार्यक्षेत्रों की चुनौतियों को पूरा करने वाले कई क्षेत्रों में काम कर रही है। इसने इन क्षेत्रों में क़दम बढ़ाए हैं:

  1. यूएल साइबरपार्क, कोझिकोड— भारत के सहकारी क्षेत्र का पहला साइबरपार्क, और केंद्र सरकार के तटीय आर्थिक क्षेत्रों का हिस्सा।

  2. यूएल टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस— यूएल साइबरपार्क में स्थित एक नेक्स्ट जेनरेशन डिजिटल सॉल्यूशन कंपनी।

  3. इंरीगल में कला और शिल्प ग्राम सर्गालया; केरल कला एवं शिल्प ग्राम(कोवलम)। ये कला और शिल्प गाँव यूएलसीसीएस द्वारा केरल सरकार की ओर से संचालित किए जाते हैं और घरेलू व अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों के लिए हस्तशिल्प उत्पादन में कारीगरों की सहायता करते हैं।

  4. यूएल हाउसिंग— सहकारी संस्था की निर्माण विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए यूएलस्पेसयूएस ब्रांड के तहत आवासीय परियोजनाएँ। पहली इमारत ‘वन एंथम’ यूएल साइबरपार्क में स्थित है।

  5. मैटर लैब— उच्चतकनीकी मैटर मटेरियल टेस्टिंग एंड रिसर्च लेबोरेटरी, जिसकी स्थापना 2021 में टिकाऊ निर्माण सामग्री विकसित और परीक्षण करने के लिए की गई।

  6. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफ्रास्ट्रक्चर एंड कंस्ट्रक्शन— यूएलसीसीएस केरल सरकार की ओर से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सहयोग से इसका प्रबंधन करती है।

  7. यूएल एजुकेशन— विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से छात्रों के कौशल का विकास:

    1. मदप्पल्ली अकादमिक प्रोजेक्ट

    2. वाग्भडानंद शिक्षा परियोजना

    3. छात्रों के लिए स्कॉलास्टिक एक्सीलेंस प्रोग्राम

    4. यूएस स्पेस क्लब (नवोदित अंतरिक्ष यात्रियों के लिए)

    5. यूएलसीसीएस सेंचुरी एल स्कूल — मुट्टुंगल में स्थित निम्न प्राथमिक विद्यालय जो केजी से 4वीं कक्षा तक की शिक्षा प्रदान करता है।

  8. यूएलसीसीएस चैरिटेबल एंड वेलफेयर फाउंडेशन (यूएल केयर) — इसकी तीन प्रमुख पहलकदमियाँ हैं:

    1. स्पेशल चाइल्ड के लिए प्रशांति स्कूल

    2. बौद्धिक रूप से दिव्यांग वयस्कों के लिए नायनार सदनम व्यावसायिक प्रशिक्षण व प्लेसमेंट संस्थान

    3. मडित्तट्टु जेरिएट्रिक (वृद्धावस्था संबंधी चिकित्सा) सेंटर

  9. यूएल इनसाइट — एक प्रबंधन सलाहकार फर्म, जिसे इंसाइट एडवाइजरी एंड कंसल्टिंग इंडिया के साथ मिलकर चलाया जाता है।

एक श्रमिक सहकारी संस्था होने के नाते, यूएलसीसीएस ग़ैरश्रमिकों को सदस्य बनने की अनुमति नहीं देती। इसका बोर्ड — जिसे श्रमिकों द्वारा चुना जाता है और जो उनका प्रतिनिधित्व करता है — तेरह निदेशकों से बना है। प्रत्येक निदेशक के पास निर्माण उद्योग के विभिन्न क्षेत्रों में तीस से पैंतीस वर्षों का अनुभव है। प्रत्येक कार्यस्थल, जिसमें परियोजना प्रबंधन भी शामिल है, की निगरानी एक बोर्ड सदस्य द्वारा की जाती है, जो प्रत्येक दिन के अंत में कार्य का मूल्यांकन करते हैं।

नवीन एस. (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), दिनेश कोऑपरेटिव के दर्ज़ी, 2025.

केरल में सहकारी ऋण संस्थाएँ

अश्वथी रेबेका असोक

सहकारी ऋण संस्थाएँ— जिनमें सदस्यों का समान स्वामित्व होता है और जो ग्रामीण तथा हाशिए के लोगों को सस्ता ऋण व वित्तीय सेवाएँ प्रदान करती हैं — केरल में 1956 में राज्य के गठन से पहले ही स्थापित हो चुकी थीं। ये मुख्य रूप से छोटे किसानों और श्रमिकों की मदद करती हैं, ख़ासकर वहाँ जहाँ निजी वाणिज्यिक बैंक मौजूद नहीं होते या अपर्याप्त होते हैं। केरल में, इन संस्थाओं ने भूमि सुधार के लाभार्थियों को सहारा देने और भूमि स्वामित्व को फिर से जड़ जमाने से रोकने में ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उदाहरण के लिए, तिरुवनंतपुरम सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक की स्थापना 1915 में उस इलाक़े में उभर रहे सहकारी क्षेत्र को वित्त उपलब्ध कराने के लिए की गई थी। बाद में, उत्तरी मालाबार क्षेत्र और कोचीन में भी इसी तरह की सहकारी ऋण संस्थाएँ स्थापित की गईं। 1956 में, तिरुवनंतपुरम सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक को केरल स्टेट कोऑपरेटिव बैंक में बदल दिया गया, जिसने नए राज्य की सहकारी ऋण संस्थाओं को आधार प्रदान किया। आज, केरल में 4,146 सहकारी ऋण संस्थाएँ हैं, जो राज्य की कुल क़र्ज़ देने वाली संस्थाओं का एकतिहाई से भी अधिक हिस्सा हैं।xxii इन संस्थाओं ने विशेष रूप से ग्रामीण केरल में लोगों को आर्थिक रूप से आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।

उदाहरण के लिए, जब कम्युनिस्ट मंत्रालय ने 1957 में भूमि सुधार शुरू किए, तो भूमि प्राप्त करने वाले छोटे किसानों को खेती शुरू करने के लिए पूंजी की आवश्यकता थी, लेकिन निजी क्षेत्र से पर्याप्त मात्रा में ऋण उपलब्ध नहीं था। सहकारी ऋण संस्थाओं ने आगे आकर आवश्यक पूंजी प्रदान की, जिससे किसानों को साहूकारों और सामंती वर्ग से उधार लेने की ज़रूरत नहीं पड़ी। यदि ये संस्थाएँ मौजूद न होतीं, तो केरल में वितरित की गई भूमि का एक बड़ा हिस्सा बंधक के रूप में पुनः सामंती वर्ग और साहूकारों के पास चला गया होता।

हालाँकि ग्रामीण केरल में निजी वाणिज्यिक बैंकिंग का विस्तार हुआ है, फिर भी सहकारी ऋण संस्थाएँ एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वाणिज्यिक बैंक शाखाओं की कवरेज के मामले में केरल भारत का पाँचवाँ सर्वश्रेष्ठ राज्य है, फिर भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच इन शाखाओं के फैलाव में बड़ा अंतर है। भारतीय रिज़र्व बैंक के 2024 के आँकड़ों के अनुसार केवल 5.3% शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं, जबकि 22.5% शहरी क्षेत्रों में और 72.2% अर्धशहरी क्षेत्रों में हैं।xxiii यदि सहकारी ऋण संस्थानों को भी शामिल कर लिया जाए, तो राज्य में 25% बैंक शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।

सहकारी ऋण संस्थाओं की संरचना

केरल का सहकारी ऋण क्षेत्र दो समानांतर प्रणालियों पर आधारित है:

  1. अल्पकालिक सहकारी संस्थाएँ, जो कृषि के लिए मौसमी कार्यशील पूंजी ऋण प्रदान करती हैं।

  2. दीर्घकालिक सहकारी संस्थाएँ, जो ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर और कृषि विकास के लिए निवेश ऋण प्रदान करती हैं।

प्रत्येक प्रणाली की अपनी संस्थागत संरचना है, जिसमें गाँव, ज़िला और राज्य स्तर पर बैंक शामिल हैं।

अल्पकालिक सहकारी संस्थाएँ काफ़ी पुराने समय से तीनस्तरीय संरचना के माध्यम से संचालित होती रही हैं—गाँव स्तर पर प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ (पीएसीएस), ज़िला स्तर पर ज़िला सहकारी बैंक, और राज्य स्तर पर केरल स्टेट कोऑपरेटिव बैंक। 2019 में, इस संरचना को सरल बनाने के मक़सद से इसे द्विस्तरीय रूप दिया गया और ज़िला व राज्य स्तरीय बैंकों को मिलाकर एक इकाई के रूप में केरल बैंक बना दिया गया। इस सरल संरचना से पूरी प्रणाली का एकीकरण बढ़ा और अल्पकालिक सहकारिता की कार्यक्षमता में वृद्धि हुई। इस तरह एक पिरामिड तैयार हुआआधार के रूप में पीएसीएस और शीर्ष पर केरल बैंक।

दीर्घकालिक सहकारी संस्थाओं की एक अलग संरचना है, जिसकी अगुआई राज्य स्तर पर केरल स्टेट कोऑपरेटिव एग्रीकल्चरल एंड रूरल डेवलपमेंट बैंक करता है, तथा ज़िला और ब्लॉक स्तरों पर प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक इसका सहयोग करते हैं।

पीएसीएस, अल्पकालिक सहकारी संस्थाओं की बुनियाद हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘सोसाइटी’ कहा जाता है। केरल के हर गाँव में कम से कम एक पीएसीएस होती है। ये ग्रामीण क्षेत्रों की सबसे सुलभ और सुपरिचित वित्तीय संस्थाएँ हैं। ये राज्य के व्यापक सहकारिता आंदोलन की आधारशिला हैं। 2022 में 3.03 करोड़ सदस्यों के साथ, केरल की पीएसीएस पूरे भारत में सबसे अधिक सदस्यता रखती हैं — पश्चिम बंगाल की तुलना में दोगुने से भी अधिक।xxiv

यह विशाल सदस्यता आधार पीएसीएस को 1.217 अरब रुपये की जमा राशि जुटाने में सक्षम बनाता है, जो पूरे भारत की पीएसीएस की कुल जमा राशि का दोतिहाई से अधिक है।xxv वाणिज्यिक बैंकों से ऋण न ले पाने वाले ग़रीब और हाशिए के लोगों को वित्तीय मदद पहुँचाने में पीएसीएस की अहम भूमिका को, केरल में हुए कई ज़मीनी अध्ययनों ने भी रेखांकित किया है।xxvi इन अध्ययनों से पता चलता है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूह पीएसीएस को अपनी ‘मित्रवत पड़ोसी संस्था’ मानते हैं और वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में इन्हें अधिक सुलभ पाते हैं। ग्रामीण केरल के 50% निम्नआय वाले परिवार सहकारी क्षेत्र से ऋण लेते हैं, जबकि केवल 25% वाणिज्यिक बैंकों से उधार लेते हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अत्यंत ग़रीब परिवारों की पीएसीएस पर निर्भरता अन्य सामाजिकआर्थिक श्रेणियों के लोगों की तुलना में अधिक पाई गई है। अध्ययनों में इन ग़रीबों और वाणिज्यिक बैंकों के बीच मौजूद अनेक बाधाओं की भी चर्चा की गई है।

इन वित्तीय सहकारी समितियों की कुछ विशिष्टताएँ इन्हें हाशिए पर रहने वाली आबादी के लिए आसानी से सुलभ बनाती हैं जैसे ग्राहकों, कर्मचारियों और निदेशक मंडल के सदस्यों का आपसी परिचय तथा स्थानीय क्षेत्र में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को सदस्यता प्राप्त करने का अधिकार। दूसरी तरफ़ जटिल फॉर्म, पेचीदा प्रक्रियाएँ, और यहाँ तक कि वाणिज्यिक बैंक कर्मचारियों का पहनावा और उनका परिष्कृत व्यवहार अक्सर ग़रीबों में वाणिज्यिक बैंकों के प्रति ‘परायेपन’ की भावना पैदा करता है।

केरल में सहकारी ऋण समितियों की वह क्षमता, जिसके माध्यम से वे सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को साहूकारों के चंगुल और शोषण से मुक्त कर सकती हैं, पलक्कड़ जिले में स्थित मन्नारक्काड ग्रामीण सेवा सहकारी बैंक लिमिटेड की कहानी से ज़ाहिर होती है।

मन्नारक्काड ग्रामीण सेवा सहकारी बैंक लिमिटेड (एमआरएससीबी)

एमआरएससीबी ने 1989 में केवल 305 सदस्यों और 30,000 रुपये की अंश पूंजी (शेयर कैपिटल) के साथ शुरुआत की। पिछले तीन दशकों में इसने ज़बरदस्त प्रगति की और आज इसमें 16,000 से अधिक सदस्य हैं, 4 करोड़ रुपये की अंश पूंजी है, और 7.5 अरब रुपये का वार्षिक कारोबार है। 1994 से अब तक इसने कुल 2.7 अरब रुपये की जमा पूंजी जुटाई है, 2.5 अरब क़र्ज़ प्रदान किया और लगातार लाभ कमा रहा है। यह अपने सदस्यों को 25% लाभांश देता है, जो केरल कोऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट द्वारा स्वीकृत अधिकतम दर है।

2018 में, बैंक ने मुट्टुत्ते मुल्ला (आपके आँगन में चमेली) नामक एक माइक्रोफाइनेंस योजना शुरू की, जो बैंक के पास रहने वाले ग़रीब ग्रामीणों के लिए बनाई गई थी, ताकि उन्हें अवैध साहूकारों और निजी माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से बचाया जा सके, जो अत्यधिक ब्याज दरें वसूलती हैं। इस योजना के तहत, व्यक्ति को रियायती दर पर बैंक से ऋण मिलता है, जिससे वह साहूकारों से लिए पुराने क़र्ज़ों को चुकता कर सकता है। इस योजना को कुडुम्बश्री नेबरहुड समूहों के सहयोग से लागू किया गया है, जिन्हें ज़रूरतमंदों की पहचान करने, ऋण वितरित करने, और उधारकर्ताओं से उनके घरघर जाकर साप्ताहिक किस्तें एकत्र करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। इस योजना की सफलता को देखते हुए, केरल सरकार ने इसे राज्य स्तर पर अपनाया और पीएसीएस के माध्यम से पूरे राज्य में लागू करने का निर्णय लिया।

पल्लियाक्कल सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड (पीएससीबी)

पल्लियाक्कल सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड (पीएससीबी) की स्थापना 1943 में एर्नाकुलम ज़िले के एझिक्करा ग्राम पंचायत में की गई थी। मुख्यतः एक कृषि प्रधान गाँव, एझिक्करा अपनी पोक्कालि चावल (इसकी खेती खारे पानी में होती है) की खेती और मत्स्य पालन के लिए जाना जाता है, जो स्थानीय समुदाय के आय के प्रमुख स्रोत हैं। अपने शुरुआती दशकों में, पीएससीबी ने पारंपरिक बैंकिंग गतिविधियाँ, जैसे ऋण देना और जमा स्वीकार करना, चलाईं। हालांकि, समय के साथ इसका वित्तीय प्रदर्शन बहुत ख़राब रहा और ऋण वसूली दर अत्यंत कम थी।

साल 2000 में, इसके निदेशक मंडल ने बैंक के कामकाज का गहन विश्लेषण किया और पाया कि इस इलाक़े के कृषि क्षेत्र में कम लाभप्रदता और रोज़गार के अवसरों में कमी, उधारकर्ताओं द्वारा कम पुनर्भुगतान के प्रमुख कारण थे। बैंक ने यह महसूस किया कि अपनी वित्तीय स्थिरता में सुधार के लिए स्थानीय समुदाय की आय बढ़ाना आवश्यक है।

इस बात को ध्यान में रखते हुए पीएससीबी ने अपने क्षेत्र के किसानों के सामने मौजूद कृषि संकट का समाधान करने का निर्णय लिया। बैंक ने अपने सदस्यों और स्थानीय समुदाय से परामर्श किया और खाद्य उत्पादन में स्थानीय आत्मनिर्भरता प्राप्त करने, स्थानीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा स्थानीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए एक रणनीतिक योजना तैयार की

पीएससीबी के तहत सात क्षेत्रों में पारस्परिक सहायता समूह (म्युचुअल ऐड ग्रुप्स) बनाए गए। ये क्षेत्र थे:

पोक्कालि चावल की खेती, बागवानी, पुष्पकृषि, दुग्ध उत्पादन, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन और औषधीय पौधों की खेती। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए पीएससीबी ने इन सामुदायिक किसान समूहों को नियमित रूप से प्रशिक्षण, सुलभ ऋण (कम ब्याज या आसानी से उपलब्ध होने वाला ऋण) उपलब्ध कराया। इसके साथ ही उसने खेती के लिए बीजखाद जैसी आवश्यक वस्तुओं के आपूर्तिकर्ताओं और उत्पादों को बेचने के लिए बाज़ार से किसानों को जोड़ने का काम किया।

बैंक ने किसानों को अपने कृषि अधिकारी के माध्यम से लगातार कृषि परामर्श, वित्तीय सहायता और नई कृषि तकनीकें भी प्रदान कीं। इसके अलावा, बैंक ने उत्पादों की ख़रीद और विपणन की सुविधाएँ उपलब्ध कराईं और जैविक बीज, जैविक खाद और कृषि उपकरण के लिए अपना ख़ुद का वितरण केंद्र स्थापित किया। पीएससीबी ने कृषि मज़दूरों को संगठित करके ‘ग्रीन आर्मी’ नाम की एक सेवा शुरू की, जिसके माध्यम से किसानों को पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध कराए जाते थे। बैंक ने पोक्कालि उत्पादों के प्रसंस्करण में सुधार के लिए एक पोक्कालि राइस मिल भी स्थापित की। इसके साथ ही, बैंक ने ऐसे बाज़ार लगाए जहाँ किसानों से ख़रीदे गए फल, सब्ज़ियाँ, दूध और अंडे केरल में मिलने वाली सबसे ऊँची कीमतों पर बेचे जाते थे।

क्षेत्र के भूस्वामियों ने बैंक को खेती के लिए अपनी ज़मीन उपलब्ध कराकर इन पहलक़दमियों को बढ़ावा दिया। वर्तमान में, स्थानीय क्षेत्र के हज़ार से अधिक परिवार बैंक द्वारा शुरू की गई गतिविधियों में शामिल हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में बैंक के समन्वित प्रयास और उपलब्धियाँ व्यापक रूप से सराही जा रही हैं।

पिछले कुछ वर्षों में, बैंक ने सहकारी क्षेत्र में अपने प्रदर्शन के लिए कई पुरस्कार जीते हैं। राज्य के 2020 के बजट में, उस समय के केरल के वित्त मंत्री डॉ. टी. एम. थॉमस आइज़क ने ‘वर्चुअल केरल फ़ूड प्लैटफ़ॉर्म’ बनाने की घोषणा की, जो किसानों से सीधे कृषि उत्पाद ख़रीदकर उन्हें उपभोक्ताओं तक पहुँचाता है। इससे न केवल स्वास्थ्यवर्धक खाद्य उत्पाद उपलब्ध होते हैं, बल्कि बिचौलियों के हटने से किसानों को बेहतर लाभ मिलता है। क्षेत्र में पीएससीबी के हस्तक्षेप को मान्यता देते हुए, इस कार्यक्रम को लागू करने के लिए बैंक का चयन किया गया।

सहकारिता का विकास

केरल के व्यापक सहकारी ऋण नेटवर्क को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास को बढ़ावा देने में अपनी उपलब्धियों के लिए अंतरराष्ट्रीय सराहना प्राप्त हुई है। व्यावसायिक बैंकों की कठोर और जटिल प्रक्रियाओं से मुक्त, ये ‘जनता के बैंक’ कई सरकारी कार्यक्रमों को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे कार्यक्रमों में ‘केयर होम परियोजना’ शामिल है, जिसके तहत 2018 की बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित परिवारों के लिए सुरक्षित और बेहतर घर बनाए गए, साथ ही विभिन्न सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाएँ भी शामिल हैं।

इसके अलावा, ये ज़मीनी स्तर की ऋण संस्थाएँ 2018 की भीषण बाढ़ और कोविड-19 महामारी से राज्य को उबारने में अहम साबित हुईं, क्योंकि इन्होंने केरल के लोगों को वित्तीय सहायता प्रदान की। विकास की लंबी अवधि की प्रक्रिया और अल्पकालिक राहत की आवश्यकता — इन दोनों के बीच, इन संस्थाओं ने स्वयं को केरल की प्रगति के लिए अपरिहार्य साबित किया है।

कादम्बरी (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), दिनेश बीड़ी मज़दूरों के रीड-अलाउड प्रोग्राम, 2025.

केरल दिनेश बीड़ी के मज़दूरों की केंद्रीय सहकारी समिति

नीतीश नारायणन
आशिक़ अली तुप्पिलिक्काट

केरल दिनेश बीड़ी के मज़दूरों की केंद्रीय सहकारी समिति (दिनेश बीड़ी) का पंजीकरण राज्य सहकारी संस्थाओं के रजिस्ट्रार के यहाँ 15 फ़रवरी 1969 को किया गया था। शुरुआत में इस सहकारी संस्था ने एक केंद्रीय सोसाइटी और बीड़ी बनाने वाली बीस प्राथमिक उत्पादन इकाइयाँ स्थापित कीं। यह सहकारी संस्था मज़दूरों के लंबे संघर्षों के बाद बनी थी। इन मज़दूरों के काम के हालात में सुधार की माँगों के लिए कम्युनिस्ट नेताओं ने भी संघर्ष किया था। कम्युनिस्ट नेता ए.के. गोपालन के प्रयासों से भारतीय संसद ने बीड़ी और सिगार मज़दूर (रोज़गार की शर्तें) अधिनियम 1966 में पारित किया। इस अधिनियम ने बीड़ी मज़दूरों के लिए उचित मज़दूरी तथा सामाजिक सुरक्षा जैसे प्रावधान करके बीड़ी मज़दूरों के कल्याण को कुछ हद तक सुनिश्चित किया। इसके क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ी गई। मज़दूर आंदोलन और इस कानून के पारित होने से मिली प्रेरणा ने तीन साल बाद दिनेश बीड़ी के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1967 में केरल के विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्टों को भारी बहुमत प्राप्त हुआ। नवनियुक्त मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नंबूदिरिप्पाड ने बीड़ी और सिगार मज़दूर अधिनियम को लागू किया। निजी बीड़ी फ़ैक्ट्री मालिकों ने इस फ़ैसले का कड़ा विरोध किया। गणेश बीड़ी जैसी कुछ फ़ैक्ट्रियों के मालिकों ने तो अपनी फ़ैक्ट्रियों पर अचानक ताला लगा दिया। उन्होंने मज़दूरों से बातचीत के रास्ते बंद कर दिए क्योंकि वो चाहते थे कि सरकार अपने फ़ैसले को वापस ले। जब उत्तरी केरल के कन्नूर और कासरगोड ज़िलों में फ़ैक्ट्रियों की बंदी के सामाजिक प्रभाव की मार मज़दूरों पर पड़ने लगी तो ट्रेड यूनियनें और कम्युनिस्ट एकजुट होकर मज़दूरों के समर्थन में आए। कुछ समय बाद दिनेश बीड़ी के अध्यक्ष बनने वाले (1969–1996) जी.के. पणिक्कर ने लिखा, मज़दूरों को बीड़ी बनाने के अलावा कुछ नहीं आता था, और इतनी बड़ी संख्या में लोगों के लिए रोज़गार खोजना एक दुष्कर काम था। उन्होंने आगे लिखा, ‘पूरे ज़िले की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी।’xxvii इस चुनौती भरे दौर में संगठित मज़दूरों ने बीड़ी उत्पादन के लिए एक सहकारी संस्था बनाने का निर्णय लिया।

मज़दूरों की सहकारी संस्था का गठन न केवल फ़ैक्ट्री बंद होने से पैदा हुए संकट का समाधान बना और पूंजी के पलायन का जवाब सिद्ध हुआ, बल्कि यह श्रम की गरिमा और सामूहिक कार्रवाई की भावना का भी प्रतीक था। संयुक्त मोर्चे का नेतृत्व करने वाले और सहकारी संस्था की स्थापना में अहम भूमिका निभाने वाले के.पी. सहदेवन कहते हैं: ‘दिनेश बीड़ी का उद्भव उतना आसान नहीं था जितना लोगों को लगता है। यह मज़दूर वर्ग के अनवरत संघर्ष और उस दौर की व्यापक लड़ाकू भावना का परिणाम था।’xxviii दिनेश बीड़ी बनाने का विचार भारतीय कॉफ़ी मज़दूरों की सहकारी समिति ( इंडियन कॉफी वर्कर्स कोऑपरेटिव सोसाइटी से प्रेरित था, जिसे 1958 में ए.के. गोपालन की पहल पर स्थापित किया गया था। भारतीय कॉफ़ी मज़दूरों की सहकारी समिति की स्थापना मज़दूरचालित योजनाओं की सफलता की एक मिसाल बनी। मज़दूरचालित योजनाओं की सफलता में यह विश्वास—और केरल की कम्युनिस्ट सरकार के समर्थन—ने लगभग एक दशक बाद बीड़ी मज़दूरों के इस विचार को हक़ीक़त में बदल दिया।

दिनेश बीड़ी के लिए पूंजी मज़दूरों से जुटाई गई। 1969 में इसके एक शेयर का मूल्य 20 रुपये रखा गया, लेकिन उस समय दैनिक मज़दूरी 3 रुपये से भी कम होने के कारण अधिकतर मज़दूर यह राशि दे पाने में असमर्थ थे। इस समस्या को हल करने के लिए राज्य सरकार ने प्रत्येक संभावित मज़दूरस्वामी को 19 रुपये का ऋण प्रदान किया। मज़दूरों ने यह ऋण अपनी मज़दूरी से किस्तों में चुकाया। हालाँकि बेरोज़गार हुए सभी 12,000 मज़दूरों को शुरूआत में इस परियोजना के तहत रोज़गार नहीं दिया जा सका। पहलेपहल 3,000 मज़दूरों को, और एक महीने के भीतर ही अन्य 1,000 मज़दूरों को इसमें शामिल किया गया। कुल एकतिहाई बेरोज़गार बीड़ी मज़दूर सहकारी संस्था में शामिल हुए। उत्तरी मालाबार के वर्गसचेत बीड़ी मज़दूरों ने स्पष्ट कर दिया कि सहकारी संस्था में मज़दूरस्वामी के रूप में शामिल होने वालों और दूसरे मज़दूरों के बीच किसी प्रकार का विभाजन स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने सभी मज़दूरों—चाहे सहकारी संस्था में कार्यरत हों या नहीं—को सहकारी संस्था के संचालन और उसके सिद्धांतों के बारे में शिक्षित किया।

दिनेश बीड़ी की राह स्थापना के बाद से ही चुनौतियों से भरी रही। उदाहरण के लिए, उसे पुराने निजी ब्रांडों के प्रति निष्ठावान ग्राहकों के बीच अपनी पहचान बनानी थी। शुरुआती दिनों में पर्याप्त मात्रा में बिक्री न हो पाने के कारण दिनेश बीड़ी के पास बीड़ी के पैकेटों का अंबार लग गया। ऐसा लगने लगा था कि मज़दूरों द्वारा उच्च गुणवत्ता वाली बीड़ी बनाने के प्रयासों के बावजूद यह नया उपक्रम डूब जाएगा। इस स्थिति में मज़दूरों ने आपस में विचारविमर्श करके एक व्यापक जनअभियान चलाने और हर दुकान पर जाकर दिनेश बीड़ी को बेचने का अनुरोध करने का निर्णय लिया। यह अभियान रंग लाया और समय के साथ दिनेश बीड़ी केरल के मज़दूरों और किसानों का पसंदीदा ब्रांड बन गई। कुछ ही सालों में दिनेश बीड़ी भारत के सबसे लोकप्रिय बीड़ी ब्रांडों में से एक और दक्षिण भारत की सबसे बड़ी निर्माता बन गई। 1969 में 3,000 मज़दूरों के साथ शुरू हुई यह सहकारी संस्था 1980 के दशक तक 42,000 मज़दूरों को रोजगार देने लगी, और एशिया की सबसे बड़ी मज़दूर सहकारी संस्थाओं की सूची में शामिल हो गई। इसके परिणामस्वरूप, यह निजी क्षेत्र की तुलना में अपने लिए बेहतर मज़दूरी और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम हो पाई।

हालाँकि, एक सहकारी संस्था का उद्देश्य केवल पूंजीवादी व्यवस्था में टिके रहना नहीं होता है। अपनी लोकतांत्रिक संरचना के ज़रिए मज़दूरों के सामाजिक नज़रिये का विस्तार करना भी इसका एक जरूरी उद्देश्य होता है। दिनेश बीड़ी के मज़दूरस्वामियों ने एक गरिमापूर्ण कार्यसंस्कृति का विकास किया और निजी ठेका प्रणाली को समाप्त किया। निजी ठेका प्रणाली द्वारा स्थापित मज़दूर अधिकारों का उल्लंघन करना 1950 और 1960 के दशकों के आंदोलनों का एक प्रमुख मुद्दा था। दिनेश बीड़ी अपने मज़दूरों को सवैतनिक अवकाश, बोनस और शोकअवकाश जैसे लाभ प्रदान करने वाली शुरुआती संस्थाओं में से एक थी। दिनेश बीड़ी ने कार्यस्थल पर ट्रेड यूनियनवाद और राजनीतिक चर्चा को प्रोत्साहित किया। इसके साथ ही रचना पाठ के आयोजन किए जिसमें कोई मज़दूर किसी साहित्यिक कृति के कुछ अंश या समसामयिक विषय के आलेख पढ़ता था और बाक़ी मज़दूर सुनते थे। इसने गाँवों में कला और खेल क्लब भी स्थापित किए ताकि मज़दूरों, उनके परिवारों और सारे समुदाय के लिए आवश्यक अवकाश और सहभागिता के अवसर उपलब्ध हो सकें। इन सुधारों का बीड़ी उद्योग पर गहरा प्रभाव पड़ा, और कुछ सुधारों को तो निजी कंपनियों ने भी अपनाया। दिनेश बीड़ी मज़दूर एकता, प्रतिरोध और गरिमा का प्रतीक बन गई।

1990 के दशक में बीड़ी उद्योग में आए संकट ने दिनेश बीड़ी के अस्तित्व को ही ख़तरे में डाल दिया। यह संकट कई कारणों से पैदा हुआ था—निजी क्षेत्र में नए बीड़ी निर्माता प्रवेश कर रहे थे जो मज़दूरों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी से कम मेहनताना देते थे और दुकानदारों को ज़्यादा मुनाफ़ा देते थे; युवा उपभोक्ताओं का रुझान बीड़ी से सिगरेट की तरफ बढ़ रहा था; और सरकार की तंबाकूविरोधी मुहिम तेज़ हो गई थी। तंबाकू के स्वास्थ्यसंबंधी ख़तरों के प्रति जनता की बढ़ती जागरूकता के कारण सरकार के तंबाकूविरोधी अभियान प्रभावी होते गए और दिनेश बीड़ी ने इन सरकारी अभियानों का समर्थन किया। बीड़ी की माँग में सालदरसाल गिरावट आने लगी। इन बदलावों की वजह से इस सहकारी संस्था ने 1993 के बाद नए मज़दूर रखना बंद कर दिया। दिनेश बीड़ी के मज़दूरों के काम के घंटे कम कर दिए गए, और बहुत सारे मज़दूर सहकारी संस्था छोड़कर दूसरे रोज़गारों की तलाश में निकल पड़े।

इस परिस्थिति में, दिनेश बीड़ी के मज़दूरमालिकों ने सहकारी संस्था को बचाने के लिए उत्पादन में विविधता लाने पर विचारविमर्श शुरू किया। इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए केरल की उद्योग मंत्री—और कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रमुख हस्ती—सुशीला गोपालन ने 30 अगस्त 1996 को एक राज्यस्तरीय कार्यशाला आयोजित की जिसमें कई वैज्ञानिकों ने सहकारी संस्था के मज़दूरमालिकों को अपने सुझाव दिए। इसके फलस्वरूप दिनेश बीड़ी ने नारियल दूध (1997) और करी पाउडर (1998) जैसे नए उत्पादों को बनाना शुरू किया। 1990 के दशक के अंत में दिनेश बीड़ी ने पाँच नए उपक्रमों की शुरुआत की:

  1. दिनेश फूड्सः यह मसाला पाउडर, नारियल का दूध, वर्जिन नारियल तेल, नारियल दूध आइसक्रीम, फ्रूट स्क्वैश, फ्रूट जैम, शरबत और अचार का निर्माण और खुदरा बिक्री करता है। इनमें अधिकतर पदों पर पूर्व बीड़ी श्रमिकों को रोज़गार दिया जाता है। कन्नूर ज़िले में इसकी चार विनिर्माण इकाइयाँ हैं, जो अपने श्रमिकों का सालभर रोजगार सुनिश्चित करती हैं।

  2. कैफ़े दिनेशः यह कन्नूर, पय्यनूर, पिनारायि और तलशेरि में सहकारी रेस्तरां और कैटरिंग सेवाएँ संचालित करता है। दिनेश फूड्स के उत्पाद इन आउटलेट्स पर उपलब्ध हैं।

  3. दिनेश इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी सिस्टम्स (डीआईटीएस) इसकी स्थापना 1999 में हुई। यह केरल के सहकारी क्षेत्र, विशेष रूप से सहकारी बैंकिंग क्षेत्र को आईटी सहायता प्रदान करता है। 2001 में, इसने कन्नूर में दिनेश सॉफ़्टवेयर पार्क की स्थापना की।

  4. दिनेश ऑडिटोरियमः कन्नूर में स्थित, 1,000 लोगों की क्षमता वाले एक बड़े हॉल को किराए पर उपलब्ध कराया जाता है, जिसका उपयोग सम्मेलन और विवाह समारोहों के लिए किया जा सकता है।

  5. दिनेश अपैरलः इसकी स्थापना 2007 में कन्नूर और कासरगोड में हुई। यह स्थानीय और निर्यात बाज़ारों के लिए कपड़े बनाता है यह 400 से अधिक लोगों को रोज़गार प्रदान करता है।

केरल दिनेश (जिस नाम से यह 2000 के दशक की शुरुआत में मशहूर हुआ) ने अपने कामों में विविधता लाकर तरक्की की और एक हानिकारक उत्पाद पर निर्भरता कम की। लोकतांत्रिक तरीक़े से फ़ैसले लेने और श्रमिकों के हितों को महत्त्व देने से एक ऐसा सहकारी तंत्र बना, जो आज भी दुनिया भर के श्रमिकों को प्रेरित करता है।

वंशिका बब्बर (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), दिनेश फ़ूड्स, 2025.

एक छोटेसे गाँव ने बनाया मज़दूरों का अपना सहकारी संगठन

सर्गा टी. के.

केरल के उत्तरी कासरगोड ज़िले के एक दूरदराज़ हिस्से में स्थित कोडोम बेलूर ग्राम पंचायत लंबे समय तक सामंती ज़मींदारी व्यवस्था से उपजी गहरी सामाजिक–आर्थिक विषमताओं से प्रभावित रही। 1956 में केरल राज्य के गठन के बाद लागू की गई भूमि सुधार नीतियों और खाड़ी देशों में मज़दूरी करने गए प्रवासी मज़दूरों की आमदनी से पैदा हुए नव संपन्न वर्ग ने इस क्षेत्र की भौतिक परिस्थितियों का तानाबाना रचा। इसके बाद भी इस क्षेत्र की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भूमि सुधार के लाभ और प्रवासी रोज़गार से मिलने वाली आमदनी से महरूम रहा। इनको बेरोज़गारी, सामाजिक हाशियाकरण, और सार्वजनिक परियोजनाओं में फैला भ्रष्टाचार ही नसीब हुआ। निर्माण मज़दूरों को अक्सर उनका उचित मेहनताना नहीं दिया जाता था, जबकि ठेकेदार बिना काम पूरा किए सार्वजनिक धन हड़प लेते थे।

निर्माण सेक्टर पूरी तरह माँग आधारित होता है। बुनियादी ढांचे की ज़रूरत आर्थिक विकास के स्तर पर निर्भर करती है। भौतिक ढांचे की गुणवत्ता में भी क्षेत्रीय असमानता पाई जाती है। यह जरूरी नहीं कि जहाँ मज़दूर मौजूद हों वहीं निर्माण कार्य की ज़रूरत पड़ेगी। निर्माण कार्य में आवश्यक मज़दूरों की मात्रा भी बदलती रहती है। मज़दूर निर्माण कार्य की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। आवश्यक श्रम तथा पूंजी की मात्रा भी प्रत्येक परियोजना की आकार और लागत पर निर्भर करती है।

निर्माण की हर अवस्था में अलग प्रकार के कौशल की आवश्यकता होती है और इसी के अनुसार नए मज़दूर बुलाए जाते हैं, जिससे पूरी निर्माण प्रक्रिया के दौरान पूंजी निवेशकों का पलड़ा भारी रहता है। बड़ी परियोजनाओं में उपठेकों की अनेक परतें मज़दूरों के लिए शोषणकारी अवस्था पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाती है। कुल मिलाकर, निर्माण सेक्टर की संरचनात्मक प्रकृति मज़दूरों के शोषण के लिए उर्वर परिस्थितियाँ तैयार करती है।

1996 में केरल की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार ने विकेंद्रीकृत नियोजन (Decentralised Planning) के लिए जन अभियान की शुरुआत की। इसके माध्यम से राज्य के लोगों की समस्याओं और विकास की अव्यक्त संभावनाओं पर चर्चा में बड़ी संख्या में लोगों को शामिल किया गया। इन प्रयासों से प्रेरित होकर कोडोम बेलूर के लोगों ने शोषणकारी निर्माण कंपनियों के ख़िलाफ़ संगठित होना शुरू किया और अपने इलाक़े में निजी ठेकेदारों द्वारा कराए जा रहे सार्वजनिक कार्यों का बहिष्कार कर दिया। उन्होंने सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं को स्वतंत्र रूप से संभालने के लिए एक कारवाई दल का गठन किया। लेकिन तकनीकी पिछड़ापन, सीमित पूंजी, निजी बिल्डरों के दबाव और भ्रष्ट अधिकारियों—विशेषकर लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों—की वजह से इन परियोजनाओं के ऊपर जनता का नियंत्रण स्थापित करने के उनके प्रयासों को गहरा धक्का लगा।

1997 में कोडोम बेलूर के एक स्थानीय निर्वाचित नेता और पंचायत स्थायी समिति के अध्यक्ष ए.सी. मैथ्यू ने इस कारवाई दल के सदस्यों को संगठित होकर होसदुर्ग श्रम अनुबंध सहकारी समिति (Hosdurg Labour Contract Cooperative Society) बनाने के लिए प्रेरित किया। इस समिति का उद्देश्य अपने सदस्यों की कुशल श्रमशक्ति को एकबद्ध करना और उनकी निजी बचत से पूंजी जुटाकर सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए बोली लगाना था। 2004 में इस समिति का नाम बदलकर उदयपुरम श्रम अनुबंध सहकारी समिति कर दिया गया। 221 सदस्यों के साथ शुरू हुई इस संस्था में वर्तमान में 2,981 सदस्य हैं। इसमें 235 स्थाई ‘क्लास ए’ सदस्य हैं जिनको दीर्घकालिक भागीदारी और पूर्ण मतदान का अधिकार मिला हुआ है। करीब एकचौथाई ‘क्लास ए’ सदस्य अनुसूचित जनजाति समुदाय से हैं। उदयपुरम समिति को केरल लोक निर्माण विभाग, स्थानीय स्वशासी संस्थाओं और अन्य सरकारी विभागों से निर्माण कार्यों के ठेके मिलते हैं। यह संस्था अपने सदस्यों द्वारा चलाई जाती है और वही इसके मालिक हैं। इसे राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम, ज़िला सहकारी बैंकों (अब केरल बैंक), तथा केरल वित्तीय निगम से वित्तीय सहायता मिलती है।

सहकारी संस्था का मॉडल पारस्परिक सहयोग की भावना पर आधारित होता है और अपने सदस्यों के जीवनस्तर को बेहतर बनाना इसका मुख्य उद्देश्य होता है। उदयपुरम समिति के गठन से पहले ज्यादातर निर्माण कार्य निजी बिल्डरों द्वारा किया जाता था। उदयपुरम समिति मज़दूरों के लिए वेतन शोषण और निजी ठेकेदारों पर निर्भरता से मुक्ति का रास्ता बनी।

उदयपुरम समिति को मिलने वाले काम में इज़ाफ़ा होने के साथ सदस्यों की सामाजिक–आर्थिक परिस्थितियों में धीरेधीरे सुधार आना शुरू हुआ। 2011 के बाद से समिति ने बड़े स्तर की निर्माण परियोजनाओं को लेना शुरू कर दिया। इसके साथ ही इसने कृषि तथा अन्य उद्योगों में भी कदम रखा ताकि विकास को स्थिर किया जा सके और उपलब्ध मानव संसाधनों का प्रभावी उपयोग किया जा सके। उत्पादक रोज़गार के अवसर पैदा करके यह समिति क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में विकास का एक प्रमुख इंजन बन गई है।

जुनैना मोहम्मद (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), कुडुम्बश्री, 2025.

कुडुम्बश्री

सुबिन डेन्निस

कुडुम्बश्री का विशाल आकार उसकी सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक है। केरल की लगभग एकतिहाई वयस्क महिलाएँ (कुल 48 लाख महिलाएँ) कुडुम्बश्री की सदस्य हैं। xxix कुडुम्बश्री (मलयालम में कुडुम्बश्री का अर्थ है ‘परिवार की समृद्धि’) की शुरुआत मई 1998 में महिलाओं में ग़रीबी उन्मूलन के लिए एक राजकीय पहल के रूप में हुई थी। समय के साथ अब यह केरल के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में एक रूपांतरकारी शक्ति का रूप ले चुकी है। वी.के. रामाचंद्रन के के अनुसार, यह ‘एक आंदोलन भी है और एक सरकारी कार्यक्रम भी है।’ आज कुडुम्बश्री छोटे स्तर के वित्त (Microfinance) और सामूहिक खेती से लेकर परिधान निर्माण और रेस्टोरेंट चलाने जैसी विविध गतिविधियों में संलग्न है। केरल के समाज में इसकी उपस्थिति सर्वव्यापी हो चुकी है।

केरल में सहकारी संस्थाओं को नियंत्रित करने वाले कानूनों के दायरे में नहीं आने के बाद भी यह सहकारिता की भावना से ओतप्रोत है। कुडुम्बश्री समुदाय नेटवर्क की मूल इकाइयाँ उसके सदस्यों द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चलाई और नियंत्रित की जाती हैं, और यह ‘एक सदस्य, एक वोट’ के सिद्धांत पर आधारित होता है।xxx इस सामुदायिक नेटवर्क की संरचना तीन स्तरों वाली है:

  1. पहला स्तर है पड़ोस समूह या Neighbourhood Group (NHG) (मलयालम में अयलक्कूट्टम), जिसमें दस से बीस सदस्य शामिल होते हैं। पड़ोस की सभी वयस्क महिलाएँ सदस्यता की पात्र होती हैं। आर्थिक तथा सामाजिक रूप से वंचित तबक़ों की महिलाओं को कुडुम्बश्री में शामिल करने पर विशेष बल दिया जाता है।

  2. दूसरा स्तर है क्षेत्रीय विकास समित या Area Development Society (ADS), जो संबंधित स्थानीय स्वशासी संस्था (LSGI—पंचायत या नगर पालिका जैसी स्थानीय सरकार) के एक वार्ड में मौजूद सभी NHG को संघबद्ध करके बनाई जाती है।

  3. तीसरा स्तर है सामुदायिक विकास समिति (Area Development Society, CDS), जो स्थानीय स्वशासी संस्था में मौजूद सभी ADS को संघबद्ध करके गठित की जाती है।

कुडुम्बश्री के इस सामुदायिक नेटवर्क को एक सरकारी संरचना—कुडुम्बश्री मिशन (औपचारिक नाम: राज्य ग़रीबी उन्मूलन मिशन)—का सहयोग प्राप्त है। मिशन का संचालन एक अधिशासी निकाय (governing body) द्वारा किया जाता है जिसकी अध्यक्षता राज्य के स्थानीय स्वशासन मंत्री करते हैं; इसकी कार्यकारी समिति की अध्यक्षता स्थानीय स्वशासन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव करते हैं; और एक सरकारी अधिकारी इसके कार्यकारी निदेशक के रूप में काम करता है। केरल के प्रत्येक ज़िले के लिए एक कुडुम्बश्री मिशन है। राज्य मिशन के अंतर्गत केरल में कुल चौदह ज़िला कुडुम्बश्री मिशन कार्यरत हैं।

उद्भव

पहले किए गए समुदायआधारित विकास के स्थानीय प्रयोगों ने कुडुम्बश्री के लिए आधारशिला का काम किया।xxxi ऐसा ही एक प्रयोग 1991 में आलप्पुझा नगर में संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) द्वारा शुरू किया गया सामुदायिक पोषण कार्यक्रम (Community-Based Nutrition Programme) था। इसका उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य तथा पोषण की स्थिति में सुधार लाना था। इस कार्यक्रम के तहत तीन स्तरों पर महिलाओं की सामुदायिक विकास समितियाँ बनाई गईं: NHG, ADS और CDS। इसी प्रकार की एक और परियोजना 1994 से मलप्पुरम ज़िले में लागू की गई थी। यह शुरू में पाँचस्तरीय संरचना (NHG, ADS, CDS, ब्लॉकस्तरीय CDS और ज़िलास्तरीय CDS) पर आधारित थी, जिसे बाद में आलप्पुझा की तरह तीनस्तरीय संरचना में बदल दिया गया। ग़रीब महिला सदस्यों की बचतों को इकट्ठा करके उनको ऋण प्रदान करने वाली ऋण और बचत समितियाँ इस सामुदायिक संगठन का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गईं।

1990 के दशक के शुरुआती दौर में केरल शास्त्र साहित्य परिषद (Kerala Forum for Science Literature, या KSSP, केरल का सबसे बड़ा जन विज्ञान आंदोलन) स्थानीय विकास के लिए नियोजन के सहभागी मॉडल पर नए प्रयोग कर रहा था। इन प्रयोगों का एक हिस्सा था पड़ोस समूह (NHG) का निर्माण, जिनकी भागीदारी स्थानीय स्तर पर संसाधन के चिह्नीकरण और योजनाओं के निर्माण में होती थी। इनमें से सबसे उल्लेखनीय प्रयास 1993 में कन्नूर ज़िले के कल्लियाशेरि ग्राम पंचायत में हुआ, जहाँ KSSP ने लगभग दो सौ पड़ोस समूह (NHG) गठित किए।

1996 में केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सत्ता में आया और उसी वर्ष विकेंद्रीकृत योजना के लिए जन अभियान की शुरुआत की। इस अभियान के तहत स्थानीय सरकारों को अधिक वित्तीय संसाधन और अधिकार सौंपे गए, और विकेंद्रीकृत योजना प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए NHG का गठन किया गया।xxxii इस अभियान के तहत राज्य सरकार ने स्थानीय सरकारों के लिए अपनी वार्षिक योजना निधि का कम से कम 10% हिस्सा महिलाओं के सामाजिक उन्नयन से संबंधित परियोजनाओं के लिए अलग रखना अनिवार्य कर दिया।

इन सभी प्रक्रियाओं और प्रयोगों ने मिलकर कुडुम्बश्री को गढ़ा।

1997 में एक विशेष सरकारी टास्क फ़ोर्स ने राज्य ग़रीबी उन्मूलन मिशन (कुडुम्बश्री मिशन) के गठन की अनुशंसा की। 1997–1998 के केरल राज्य बजट में इसकी घोषणा की गई। 17 मई 1998 को इसका विधिवत उद्घाटन किया गया। इसका उद्देश्य स्थानीय सरकारों के नेतृत्व में संगठित सामुदायिक कार्रवाई के माध्यम से ग़रीबी का उन्मूलन करना था।xxxiii

आज के समय में कुडुम्बश्री के प्रमुख कामों में छोटे स्तर का ऋृण, आमदनी प्रदान करने वाली कृषि और सूक्ष्म उद्यमों जैसी आर्थिक गतिविधियाँ, तथा स्थानीय सरकारों की विभिन्न कल्याण और विकास कार्यक्रमों की ज़िम्मेदारी शामिल है।

कुडुम्बश्री की सभी सदस्याएँ इसकी बचत और ऋण कार्यक्रम (thrift and credit programme) का हिस्सा होती हैं। कुडुम्बश्री के पड़ोस समूह (NHG) सप्ताह में एक बार मिलते हैं और छोटीछोटी रकम बचत के रूप में जमा करते हैं। इसी जमापूंजी का उपयोग बाद में ज़रूरतमंद सदस्याओं को छोटे ऋण देने के लिए किया जाता है। अधिकांश पड़ोस समूह बैंकों से भी जुड़े होते हैं। बैंक इन समूहों को ऋण प्रदान करते हैं। समूह इन राशियों का इस्तेमाल सामूहिक खेती या छोटे उद्यम जैसी अपनी आजीविका चलाने वाली गतिविधियों में करते हैं।xxxiv

सामूहिक खेती

कुडुम्बश्री की सबसे उल्लेखनीय पहलों में से एक है सामूहिक खेती।xxxv खेती में रुचि रखने वाली चार से दस NHG सदस्याओं को मिलाकर संयुक्त देयता समूह (Joint Liability Groups) बनाए जाते हैं, जिन्हें संघ कृषि (सामूहिक खेती) समूह कहा जाता है। ये समूह अपने गाँव और आसपास के क्षेत्रों में खेती के लिए उपयुक्त भूमि (अक्सर परती पड़ी ज़मीन) की पहचान करते हैं। पंचायत और कुडुम्बश्री ज़िला मिशन की सहायता से भूमि मालिकों से यह जमीन पट्टे पर लेकर खेती की जाती है। समूह की सदस्याएँ अपनी निजी ज़मीनों पर भी सामूहिक खेती करती हैं। सक्रिय संघ कृषि समूह बैंकों से जुड़े होते हैं, जो उन्हें ब्याज पर सब्सिडी के साथ ऋण देते हैं। कुडुम्बश्री मिशन भी इन समूहों को कृषि मशीनरी, बीज, उर्वरक और कीटनाशक रियायती दरों पर मुहैया कराता है। राज्य का कृषि विभाग समयसमय पर प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता प्रदान करता है। केंद्र सरकार की कई योजनाओं का धन भी सामूहिक खेती की सहायता करने के लिए दिया जाता है। संघ कृषि समूहों की दस हज़ार कुशल महिला किसानों को मास्टर फ़ार्मर के रूप में नामित किया गया है। ये विशेषज्ञ के रूप में कार्य करती हैं और अन्य महिला किसानों को प्रशिक्षण देती हैं।

केरल में कुडुम्बश्री कृषि संघ समूहों से जुड़ी महिला किसानों की संख्या 30 जून 2025 तक 4,39,255 पहुँच गई है। कुल 96,177 कृषि संघ समूह हैं जो 21,457 हेक्टेयर भूमि पर खेती कर रहे हैं।xxxvi ये मुख्यतः धान, सब्जियाँ, केले और कंदीय फसलें उगाते हैं। इन फसलों का पहले महिला किसानों के परिवारों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपयोग किया जाता है, और बचा हुआ हिस्सा गाँव के बाज़ारों में बेचा जाता है। कुडुम्बश्री की सामूहिक खेती से सदस्य परिवारों की खाद्यसुरक्षा बेहतर हुई है, और उनकी आमदनी तथा जीवनस्तर में उल्लेखनीय सुधार आया है।

स्थानीय सरकारें

केरल में विकेंद्रीकृत योजना के अंतर्गत स्थानीय सरकारों की विकास पहलों में कुडुम्बश्री की सामुदायिक नेटवर्क संरचना अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जहाँ स्थानीय सरकारें आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, और ग़रीबी उन्मूलन से जुड़ी योजनाओं को बनाने और उन्हें लागू करने के लिए ज़िम्मेदार होती हैं, वहीं कुडुम्बश्री का मूल मिशन भी ग़रीबी उन्मूलन ही है।xxxvii एक साझा लक्ष्य होने की वजह से शुरू से ही कुडुम्बश्री के NHG, ADS और CDS स्थानीय सरकारों के साथ मिलकर काम करते रहे हैं।

कुडुम्बश्री राज्य सरकार की कई ग़रीबी उन्मूलन योजनाओं और विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की प्रमुख एजेंसी है। उदाहरण के लिए, राज्य में अत्यधिक ग़रीबी को समाप्त करने के उद्देश्य से शुरू किए गए बेसहारा मुक्त केरल‘(Destitute-Free Kerala) कार्यक्रम का क्रियान्वयन कुडुम्बश्री द्वारा किया जाता है। इस कार्यक्रम के लाभार्थियों की पहचान कुडुम्बश्री की सदस्याएँ ही करती हैं। यह कार्यक्रम चिह्नित बेसहारा लोगों को भोजन, चिकित्साउपचार, कपड़े, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, स्कूली शिक्षा, ज़मीन, और आवास उपलब्ध कराता है।xxxviii

नियोजन प्रक्रिया के अंतर्गत केरल की स्थानीय सरकारें स्वास्थ्य, शिक्षा, ग़रीबी उन्मूलन, महिला एवं बाल विकास, और सामाजिक सुरक्षा जैसे प्रमुख सेक्टरों के लिए कार्यकारी समूह (working group) बनाती हैं और हर कार्यकारी समूह में कम से कम एक कुडुम्बश्री CDS सदस्य को शामिल किया जाना अनिवार्य होता है।xxxix इन कार्यकारी समूहों का काम मौजूदा संसाधनों का सर्वेक्षण करना, स्थानीय परिस्थितियों का विश्लेषण करना, विकास के अवसरों को खोजना, और लोगों की ज़रूरतों की पहचान करना होता है। इसके अलावा, लोगों की विकाससंबंधी आवश्यकताओं का मूल्यांकन वार्डस्तरीय बैठकों—ग्राम पंचायतों में ग्राम सभा और नगर क्षेत्रों में वार्ड सभा—में किया जाता है। इन सभाओं में कुडुम्बश्री सदस्याएँ सबसे ज्यादा सक्रिय होती हैं और सभाओं को जीवंत बनाए रखने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है।

केरल की वामपंथी सरकार ने फरवरी 2020 में घोषणा की कि राज्य सरकार कुडुम्बश्री द्वारा संचालित एक हज़ार रेस्टोरेंट खोलेगी जहाँ रियायती दर पर भोजन उपलब्ध कराया जाएगा।xl उसी साल कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान कुडुम्बश्री ने इन रेस्टोरेंटों की स्थापना शुरू की और इन्हें ‘जनता का रेस्टोरेंट’ नाम दिया। लॉकडाउन के दौरान कुडुम्बश्री ने स्थानीय सरकारों और कर्मचारी यूनियनों के साथ मिलकर राज्य भर में सामुदायिक रसोई चलाई। एक मार्च 2025 तक केरल में कुल 1,198 जनता के रेस्टोरेंट सक्रिय थे, जिन्हें 5,104 कुडुम्बश्री सदस्याएँ चला रही थीं।xli

सूक्ष्म उद्यम (Microenterprises)

कुडुम्बश्री इकाइयों द्वारा स्थापित सूक्ष्म उद्यम विविध सेक्टरों में काम कर रहे हैं। इनमें पैकेज्ड खाद्य पदार्थ, कपड़े, सैनिटरी नैपकिन, छतरी, थैले, मिट्टी के बर्तन, फ़र्श की चटाई, साबुन और अन्य घरेलू उपयोग की चीजों का उत्पादन शामिल है। कुडुम्बश्री राज्य के विभिन्न ज़िलों के आदिवासी किसानों द्वारा उगाए गए कृषि उत्पादों की ब्रांडिंग और उन्हें बाज़ार में लाने का काम भी करती है ताकि उन्हें बेहतर क़ीमत मिल सके। इसके अलावा, होम शॉप नेटवर्क, जो कुडुम्बश्री के सूक्ष्म उद्यमों के उत्पादों को सीधा घरों तक पहुँचाता है, राज्य के सभी चौदह ज़िलों में स्थापित हो चुका है। कुडुम्बश्री की कई सारी इकाइयाँ पशुपालन, मुर्गी पालन और मछली पालन जैसी गतिविधियों में भी संलग्न हैं।

कुडुम्बश्री की इकाइयाँ राज्य भर में रेस्टोरेंट और कैंटीन चलाती हैं; रेलवे स्टेशनों पर पार्किंग का प्रबंधन करती हैं; नारियल तेल, काजू और इमली का प्रसंस्करण करती हैं; तथा खानेपीने का सामान, अचार और पप्पडम (दाल से बनी पतली और कुरकुरी खाद्य सामग्री) बनाती हैं। इनके अलावा ये इकाइयाँ फ़िटनेस सेंटर, महिला छात्रावास, बच्चों के लिए डेकेयर केंद्र, ड्राइविंग स्कूल, नारियल के रेशा की इकाइयाँ, किताब बाइंडिंग इकाइयाँ, प्रिंटिंग सेंटर, मेडिकल लैब, सिलाई इकाइयाँ, और सुपरमार्केट भी संचालित करती हैं। कुछ इकाइयाँ LED बल्ब और इलेक्ट्रॉनिक सामानों का उत्पादन भी करती हैं।

कुडुम्बश्री में निर्माण सेक्टर में काम करने वाली महिलाओं की टीमें भी हैं। इनमें पर्यवेक्षक, राजमिस्त्री, प्लंबर और बिजली मिस्त्री जैसे सारे पेशे महिलाएँ संभालती हैं। इन सभी को कुडुम्बश्री मिशन ने विभिन्न एजेंसियों के सहयोग से प्रशिक्षण प्रदान किया है। इसके अलावा कुडुम्बश्री हरित कर्म सेना (Green Task Force) भी चलाती है, जो घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से प्लास्टिक कचरा एकत्रित करती है, उसे पुनर्चक्रण करने वाली इकाइयों तक पहुँचाती है, और घरेलू जैव अपशिष्ट के निदान में सहायता प्रदान करती है। अमृतम न्यूट्रीमिक्स—जो छह महीने से तीन वर्ष तक के बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्रों में दिया जाने वाला अनाजआधारित पौष्टिक मिश्रण है—का उत्पादन भी राज्य में 241 कुडुम्बश्री इकाइयों द्वारा किया जाता है।xlii

1 मार्च 2025 तक केरल में कुल 157,097 कुडुम्बश्री सूक्ष्म उद्यम सक्रिय थे, जिन्हें 318,265 कुडुम्बश्री सदस्याएँ चला रही थीं।xliii इनमें से 69,484 उद्यम उत्पादन सेक्टर में, 49,381 सेवा क्षेत्र में, और 35,646 व्यापार क्षेत्र में संचालित हो रहे थे।xliv

प्रभाव

कुडुम्बश्री की वजह से उसकी सदस्याओं के जीवन में भारी परिवर्तन आया है। इसने महिलाओं को अपने जीवनस्तर को सुधारने, घर के बाहर निकलकर आमदनी वाले काम करने, आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बढ़ाने, तथा सार्वजनिक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मज़बूत करने में मदद की है। स्थानीय सरकारों की गतिविधियों और नेतृत्व संरचनाओं में भी कुडुम्बश्री सदस्याओं की सक्रिय भागीदारी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

लॉरी बेकर सेंटर फ़ॉर हैबिटैट स्टडीज़, तिरुवनंतपुरम, (LBC सर्वेक्षण) द्वारा 2015 में केरल में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 54.1 प्रतिशत कुडुम्बश्री सदस्याएँ किसी न किसी प्रकार की आमदनी प्रदान करने वाली आर्थिक गतिविधि में लगी हुई थीं।xlv यह अनुपात राज्य की वयस्क महिलाओं की कार्यभागीदारी दर (26.3%) से लगभग दोगुना था। सर्वे में यह भी पाया गया कि कुडुम्बश्री से जुड़ने से पहले 66.1% महिलाएँ केवल घरेलू कार्यों में लगी थीं और घर के बाहर न तो किसी आमदनी देने वाली गतिविधि में संलग्न थीं और न ही पढ़ाई कर रही थीं। कुडुम्बश्री से जुड़ने के बाद ऐसी महिलाओं का अनुपात घटकर 37% रह गया।xlvi

केरल विश्वविद्यालय की पीएचडी शोधार्धी अंबिका देवी आर. द्वारा 2008–2009 में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि कुडुम्बश्री ने लगभग 50% सदस्याओं को आमदनी प्रदान करने वाली गतिविधियों में शामिल होने में मदद की।xlvii इस सर्वेक्षण में सदस्याओं से पूछा गया कि उनकी आमदनी पर उनका नियंत्रण किस हद तक है—‘बहुत अधिक’, ‘कुछ हद तक’, या ‘कोई नियंत्रण नहीं’। 88.8% महिलाओं ने बताया कि कुडुम्बश्री से जुड़ने के बाद अपनी आमदनी पर उनका नियंत्रण ‘बहुत अधिक’ है। कुडुम्बश्री से नहीं जुड़ी महिलाओं में केवल 66.7% ने जवाब दिया कि अपनी आमदनी पर उनका नियंत्रण ‘बहुत अधिक’ है।xlviii तारामोल के.जी. ने अपने पीएचडी शोध के लिए एर्नाकुलम ज़िला में 2016 में एक सर्वेक्षण किया था। इस सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि कुडुम्बश्री से जुड़ने के बाद सदस्याओं की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।xlix

बेहतर आमदनी होने की वजह से कुडुम्बश्री सदस्याओं वाले परिवारों ने उपभोक्ता वस्तुओं और घरेलू संपत्तियों के अधिग्रहण में वृद्धि रिपोर्ट की है। 2015 के LBC सर्वेक्षण के अनुसार कुडुम्बश्री से जुड़ने से पहले जहाँ 22.9% प्रतिशत महिलाओं का परिवार कच्चे मकानों में रहता था, वहीं कुडुम्बश्री से जुड़ने के बाद यह अनुपात गिरकर मात्र 6.7% रह गया।l इस सर्वेक्षण में कुडुम्बश्री की सदस्याओं ने बताया कि बढ़ी हुई आमदनी ने उन्हें अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने, और अपने घरों की मरम्मत या नए घरों के निर्माण में मदद की।

कुडुम्बश्री से जुड़ी महिलाओं के एक बड़े हिस्से—अंबिका देवी के अध्ययन के अनुसार 27.4% और LBC सर्वे के अनुसार 36%—ने बताया कि कुडुम्बश्री से जुड़ने के बाद उनकी सार्वजनिक रूप से बोलने की क्षमता में सुधार हुआ है। LBC सर्वे में 38.4% महिलाओं ने बताया कि उनमें सरकारी कार्यालयों में जाकर सेवाएँ या सुविधाएँ माँगने की काबिलियत और आत्मविश्वास में निखार आया है।li कुडुम्बश्री से जुड़ने की वजह से सदस्याओं में बैठकों में भाग लेने, अपनी बात रखने, और स्थानीय शासन की गतिविधियों में शामिल होने का आत्मविश्वास भी बढ़ा है। कुडुम्बश्री की सामूहिक गतिविधियों ने पारस्परिक सहयोग की भावना को मजबूत किया है और इसे व्यवहारिकता में उतारने में मदद की है।lii

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, केरल की स्थानीय सरकारों की गतिविधियों में कुडुम्बश्री सदस्याएँ एक सक्रिय भूमिका निभाती हैं। इसका सीधा असर स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में उनके प्रतिनिधित्व पर भी पड़ा है। 2020 के स्थानीय निकाय चुनावों में निर्वाचित 21,854 सदस्यों में से 7,058 सक्रिय कुडुम्बश्री सदस्याएँ थीं।liii

कुडुम्बश्री केरल के सामाजिक और राजनीतिक जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। इसने महिलाओं—विशेषकर आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित तबक़े से आने वाली महिलाओं—को अपने जीवनस्तर में सुधार लाने में मदद की है। कुडुम्बश्री ने परिवार के भीतर उनकी हैसियत को सुदृढ़ किया है और उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र, विशेषकर राजनीति में, अधिक प्रभावी ढंग से भाग लेने में सक्षम बनाया है। इन्हीं सब कारणों से इसे विश्व के ‘सबसे महत्वपूर्ण लैंगिक न्याय और ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में से एक’ बताया गया है।liv

संदर्भ

iKarl Marx, ‘Inaugural Address of the Working Men’s International Association’, London, 21 October 1864, https://www.marxists.org/archive/marx/works/1864/10/27.htm.

ii1964 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी दो राजनीतिक दलों में बँट गयी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या सीपीआई(एम) तथा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई)। केरल की सरकार का नेतृत्व सीपीआई(एम) ने किया है और इसमें सीपीआई तथा अन्य लोकतांत्रिक दल शामिल रहे हैं इन सरकारों के कार्यकाल कुछ इस प्रकार हैं: 1967–1969, 1980–1982, 1996–2001, 2006–2011 और 2016–वर्तमान। 1969 से 1977 के दौरान सीपीआई और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सरकार के मुख्य घटक दल थे; सीपीआई(एम) प्रतिपक्ष में थी।

iiiKarl Marx, Capital. A Critique of Political Economy, vol. 3 (New Delhi: LeftWord Books, 2010), 440.

ivपेरिस कम्यून पर और जानकारी के लिए देखें: Tricontinental: Institute of Social Research, Paris Commune 150, (New Delhi: LeftWord, 2021), https://dev.thetricontinental.org/text-paris-commune/.

vKarl Marx, ‘The Civil War in France’, in Collected Works, vol. 22 (Progress Publishers, 1986), 335.

vi‘Number Statement 2025’, Department of Cooperation, Government of Kerala, 31 March 2025, https://cooperation.kerala.gov.in/wp-content/uploads/2019/04/Number-statement-2025.pdf.

viiAshique Ali Thuppilikkat, ‘A Short History of the Cooperative Movement in Northern Malabar, Kerala’, Economic and Political Weekly 59, no. 30, 3 August 2024.

viiiMalayala Manorama, 29 December 1929.

ixKarl Marx, ‘Letter to Wilhelm Bracke’, in Marx/Engels Selected Works, vol. 3 (Moscow: Progress Publishers, 1970), 11.

xPyaralal Raghavan, ‘Growth and Performance of Cooperatives in Kerala: A Preliminary Analysis’, AK Gopalan Centre for Cooperative Enterprises and Alternative Politics, Kannur University, Kerala, 2019, https://papers.ssrn.com/sol3/papers.cfm?abstract_id=4031735.

xiEMS Namboodiripad, With the Ploughshare and the Sickle: Kisan Sabha in the Campaign for More Food (Bombay: People’s Publishing House, 1943).

xiiरोचडेल इंग्लैंड का एक ऐतिहासिक शहर है। इसे सहकारी आंदोलन का जन्मस्थान माना जाता है। 1844 में कपड़ा उद्योग से जुड़े मज़दूरों ने मिलकर रोचडेल सोसाइटी ऑफ इक्विटेबल पायनियर्स के नाम से एक सहकारी संस्था की स्थापना की थी।

xiiiCamila Piñeiro Harnecker, Cooperatives and Socialism: A View from Cuba (New York: Springer, 2012).

xivE Gopalakrishna Menon, Cooperatives Movements and Communists (Ernakulam: Prabhat Book House, 1956).

xvFinancial Staff, ‘Tata Tea Pays £271m for Tetley’, The Guardian, 28 February 2000, https://www.theguardian.com/business/2000/feb/28/2.

xviNatalie J Langford, ‘From Global to Local Tea Markets: The Changing Political Economy of Tea Production within India’s Domestic Value Chain’, Development and Change 52, no. 6 (2021): 11.

xviiPolicy Report to Support Development of Small Tea Growers in India, Solidaridad Network Asia Limited, February 2023.

xviiiKingshuk Sarkar, ‘Trends and Price Formation Mechanism in Indian Tea Auctions’, NRPPD Discussion Paper 23 (2013), https://cds.edu/wp-content/uploads/2021/02/NRPPD23.pdf.

xixRoopak Goswami, ‘Small Tea Growers Report Looks at Farming Issues in India, Better Pricing Models, the Future of Tea’, World Tea News, 7 June 2023, https://www.worldteanews.com/origins/small-tea-growers-report-looks-farming-issues-india-better-pricing-models-future-tea.

xx‘Kozhikode ULCCS a Role Model for Labour Cooperatives, Says UN Official’, The Hindu, 19 September 2013, https://www.thehindu.com/news/cities/kozhikode/kozhikode-ulccs-a-role-model-for-labour-cooperatives-says-un-official/article5144802.ece.

xxiपयट्ट और कुरिक्कल्याणम मालाबार के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित ऐसी विधियाँ हैं जिनके माध्यम से लोग घर बनाने, शादियों के खर्च पूरे करने, अपने पुत्रों को खाड़ी देशों में रोज़गार के लिए भेजने, तथा अन्य वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करने के लिए धन इकट्ठा करते हैं। जिस व्यक्ति को धन की आवश्यकता होती है वह एक कार्यक्रम आयोजित करता है जिसमें चाय और नाश्ता परोसा जाता है। इस कार्यक्रम में पधारने वाले सभी लोग आर्थिक योगदान देते हैं। बाद में इस कार्यक्रम का आयोजक दूसरे लोगों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में आर्थिक योगदान देता है। इस तरह पारस्परिक सहयोग से समुदाय के भीतर लोग अपनी वित्तीय ज़रूरतें पूरी करते हैं।

xxiiKerala State Planning Board, Economic Review 2024, Volume 2 (Thiruvananthapuram: Government of Kerala, January 2025), http://www.niyamasabha.org/codes/15kla/session_13/Economic%20Review/Economic%20Review_2024%20Eng_Vol%202.pdf.

xxiii‘Quarterly Statistics on Deposits and Credits of Scheduled Commercial Banks’, Reserve Bank of India, March 2024.

xxiv‘Performance of Primary Agricultural Credit Societies (April 1, 2022 to March 31, 2023)’, National Federation of State Cooperative Banks Ltd, 2023, https://nafscob.org/master/basic/images/fb749ee5ab92865a06a82bc450403466_1.pdf.

xxv‘Performance of Primary Agricultural Credit Societies (April 1, 2022 to March 31, 2023)’.

xxviSee: KK George et. al. and KUB Rao et. al., How the Poor Manage Their Finances: A Study of the Portfolio Choices of the Poor Households in Ernakulam District, Kerala (Reserve Bank of India and Centre for Socio-economic and Environmental Studies, 2013); Aswathi Rebecca Asok et. al., Indebtedness Among the Rural Poor in Kerala (Kochi: Centre for Socio-economic and Environmental Studies, 2020).

xxviiKerala Dinesh Beedi Golden Jubilee Souvenir, 2019, Kannur, Editor: Narayanan Kavubayi.

xxviiiKerala Dinesh Beedi Golden Jubilee Souvenir, 2019, Kannur, Editor: Narayanan Kavubayi.

xxix‘Data on Kudumbashree’, Kudumbashree, accessed 1 September 2025, https://kudumbashree.org/pages/518 (See the IBCB-Organisation tab); Technical Group on Population Projections, Census of India 2011: Population Projections for India and States, 2011–2036 (New Delhi: National Commission on Population, Ministry of Health and Family Welfare, July 2020).

xxx कुडुम्बश्री राज्य द्वारा शुरू किया गया एक कार्यक्रम है। समुदायआधारित नेटवर्क इसकी मूल संरचना में निहित है। यह सामुदायिक नेटवर्क, जिसे प्रायः ‘कुडुम्बश्री’ कहा जाता है, ‘एक सदस्य, एक वोट’ के सिद्धांत पर अपने सदस्यों द्वारा ही संचालित होता है। इसके विपरीत, निजी क्षेत्र की कंपनियों में शेयरधारकों के मतदान अधिकार उनके पास मौजूद शेयरों की संख्या के अनुपात में होते हैं। सहकारी संस्थाएँ निजीक्षेत्र के मॉडल से हटकर ‘एक सदस्य, एक वोट’ के सिद्धांत को अपनाती हैं। अंतरराष्ट्रीय सहकारी संघ (International Cooperative Alliance) के अनुसार, ‘सहकारी संस्थाएँ लोगों को लोकतांत्रिक और समान रूप से एक साथ लाती हैं। चाहे सदस्य ग्राहक हों, कर्मचारी हों, उपभोक्ता हों या निवासी हों, सहकारी संस्थाओं का संचालन “एक सदस्य, एक वोट” के नियम के अनुसार लोकतांत्रिक ढंग से किया जाता है। संस्था में लगाया गया पूंजी निवेश चाहे जितना भी हो, प्रत्येक सदस्य को समान मतदान अधिकार प्राप्त होता है।’ (‘What is a cooperative?’, International Cooperative Alliance, https://ica.coop/en/cooperatives/what-is-a-cooperative)

xxxi‘History and Evolution’, Kudumbashree, accessed 25 October 2022, https://kudumbashree.org/pages/178; Paloli Mohammed Kutty, ‘Kudumbashree: Sthree Shaaktheekaranathil Oru Nishabda Viplavam’ [Kudumbashree: A Silent Revolution in Women’s Empowerment], interview by K. P. Jayendran, Chintha Weekly, 15 July 2022.

xxxii1950 में भारत सरकार ने देश के विकास हेतु आर्थिक नियोजन की प्रक्रिया की अगुई करने के लिए योजना आयोग की स्थापना की थी। नवउदारवादी सुधारों के एजेंडे के तहत 2014 में केंद्र सरकार ने इसे भंग कर दिया। केरल का राज्य योजना आयोग आज भी सक्रिय है जो राज्यस्तर पर विकास की योजनाएँ तैयार करता है। विकेंद्रीकृत योजना के लिए जन योजना अभियान (People’s Plan Campaign) की शुरुआत के साथ राज्य सरकार से स्थानीय स्वशासी संस्थाओं को पर्याप्त वित्तीय संसाधन और अधिकार मिले, ताकि स्थानीय स्तर पर वो अपनी आवश्यकताओं के आधार पर खुद की विकास योजनाएँ बना सकें।

xxxiii‘Overview’, Kudumbashree, accessed 25 October 2022, https://www.kudumbashree.org/pages/7 (See the tab ‘The Mission Setting Up’).

xxxivKP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability: A Study of the Impact of Kerala’s Kudumbashree System on Its Members and Their Families (Thiruvananthapuram: Laurie Baker Centre for Habitat Studies, October 2017), 5, 57.

xxxvBenny Kuruvilla, ‘Kerala’s Web of Cooperatives: Advancing the Solidarity Economy’, in Public Finance for the Future We Want, eds. Lavinia Steinfort and Satoko Kishimoto (Amsterdam: Transnational Institute, The Democracy Collaborative, Change Finance, Focus on the Global South, New Economics Foundation, Fairfin, MOBA Housing Network, and Tellus Institute, June 2019), https://longreads.tni.org/public-finance-chapter-4.

xxxvi‘Data on Kudumbashree’.

xxxviiManu Sankar (Programme Manager of Kudumbashree National Resource Organisation in Trivandrum), interviewed by Subin Dennis, 22 August 2022.

xxxviiiManu Sankar, interviewed by Subin Dennis.

xxxixManu Sankar, interviewed by Subin Dennis.

xlAzhar Moideen, ‘People’s Restaurants in Kerala Step in to Feed the Hungry’, NewsClick, 21 October 2021, https://www.newsclick.in/People-Restaurants-Kerala-Step-Feed-Hungry.

xli‘Data on Kudumbashree’, Kudumbashree, https://kudumbashree.org/pages/518 (See the NFL-ME tab and scroll down to find ‘Janakeeya Hotels’ [People’s Restaurants]). For further reading on Kerala’s response to the Covid-19 pandemic, see: Tricontinental: Institute for Social Research, CoronaShock and Socialism, Studies on CoronaShock, 8 July 2020, https://dev.thetricontinental.org/studies-3-coronashock-and-socialism/.

xlii‘Data on Kudumbashree’ (See the NFL-ME tab in the web page).

xliii‘Data on Kudumbashree’ (See the NFL-ME tab in the web page).

xliv‘Data on Kudumbashree’ (See the NFL-ME tab in the web page).

xlvKP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability, 99.

xlviKP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability, 99.

xlviiAmbika Devi R, ‘A Study on Women Empowerment with Special Reference to Kudumbashree’ (PhD Thesis, Department of Commerce, University of Kerala, Thiruvananthapuram, 2010), 143.

xlviiiAmbika Devi R, ‘A Study on Women Empowerment with Special Reference to Kudumbashree’, 132.

xlixTaramol KG, ‘The Impact of Kudumbashree Projects in Ernakulam District with Special Reference to Their Role in the Eradication of Poverty and Unemployment’ (PhD Thesis, Research and Development Centre, Bharathiar University, Coimbatore, 2018), 178.

lKP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability,175.

liAmbika Devi R, ‘A Study on Women Empowerment with Special Reference to Kudumbashree’, 201; KP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability, 195–196.

liiKP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability, 206.

liii‘One-Third of Women Elected in Kerala Local Body Polls Are Active Kudumbashree Members’, NewsClick, 23 December 2020, https://www.newsclick.in/one-third-women-elected-kerala-local-body-polls-active-kudumbashree-members.

livP Sainath, ‘Kerala’s Women Farmers Rise above the Flood’, People’s Archive of Rural India, 24 September 2018, https://ruralindiaonline.org/en/articles/keralas-women-farmers-rise-above-the-flood/.

बांडुंग भावना

इस डोसियर में प्रयुक्त चित्र बांडुंग सम्मेलन को समर्पित हैं, जहाँ विविध लोग, राष्ट्र और राजनीतिक परियोजनाएँ—जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट रास्ता या धुरी थी—एक साझा संघर्ष के इर्द-गिर्द जुटे, उपनिवेशवाद से परे एक दुनिया के निर्माण के लिए। उपनिवेशवाद विरोधी नेताओं और राष्ट्रों को बांडुंग भावना एक साथ लाई जिसे इस डोसियर में पीली धारियों द्वारा दर्शाया गया है। राष्ट्रीय मुक्ति के उस दौर की आकांक्षाओं से आज वैश्विक दक्षिण में नए सूत्र, नई दिशाएँ और एक नया मिज़ाज उभर रहा है।


सात दशक पहले 1955 में अफ्रीका और एशिया के उनत्तीस देशों की सरकारों के प्रमुख और साथ ही उन उपनिवेशों, जो तब तक आज़ाद नहीं हुए थे, के प्रतिनिधि इंडोनेशिया के बांडुंग में एशिया-अफ्रीका सम्मेलन के लिए एकत्रित हुए। यह विऔपनिवेशीकरण (उपनिवेशवाद के ख़त्म होने) की प्रक्रिया का चरम बिंदु था। यह एक ऐतिहासिक क्षण था क्योंकि पहली बार तीसरी दुनिया के लाखों लोगों के प्रतिनिधि विऔपनिवेशीकरण की विशाल प्रक्रिया और इसके प्रभावों का आकलन करने के लिए एक जगह इकट्ठा हुए था। इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णो (1901-1970) ने इस सम्मेलन का आयोजन किया था और उद्घाटन भाषण भी दिया था जिसमें यह सम्मेलन आयोजित करने वालों की आकांक्षाएँ झलकती थीं। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि यह सम्मेलन ‘मानवता का मार्गदर्शन करे’ और यह मार्ग ‘मानवता को सुरक्षा और शांति प्राप्त करने की ओर ले चले’। वे तमाम राष्ट्र प्रमुख वहाँ केवल भारत की आज़ादी (1947), चीनी क्रांति (1949) और गोल्ड कोस्ट में सत्ता के हस्तांतरण (1951) जिससे अंतत: घाना को आज़ादी मिली (1957) का जश्न मानने ही इकट्ठा नहीं हुए थे; बल्कि वे साबित करना चाहते थे कि एक नए एशिया और नए अफ्रीका का जन्म हो चुका है।1

सुकर्णो के साथी रुसलान अब्दुलगनी (1914-2005) बांडुंग सम्मेलन के प्रधान सचिव थे। सम्मेलन के दौरान और बाद में वे एक ‘बांडुंग भावना’ के बारे में चर्चा करते रहे। इसकी व्याख्या उन्होंने ‘शांतिप्रिय, हिंसा विरोधी, भेदभाव विरोधी और सबके विकास की भावना’ के रूप में की ‘जो एक दूसरे के मामलों में ग़लत ढंग से हस्तक्षेप नहीं करती बल्कि एक दूसरे के लिए अत्यंत आदर’ रखती है।2 यह ‘बांडुंग भावना’ आदर्शवादी नहीं थी; इसकी जड़ें उपनिवेशों की जनता के स्वतंत्रता आंदोलनों में थीं, इन आंदोलनों को पाँच साल बाद संयुक्त राष्ट्र आमसभा ने उपनिवेशों और उनकी जनता द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करने की घोषणा में ‘मुक्ति की प्रक्रिया’ कहा जो ‘अप्रतिरोध्य और अपरिवर्तनीय’ है।3

यह ‘बांडुंग भावना’ आदर्शवादी नहीं थी; इसकी जड़ें उपनिवेशों की जनता के स्वतंत्रता आंदोलनों में थीं, इन आंदोलनों को पाँच साल बाद संयुक्त राष्ट्र आमसभा ने उपनिवेशों और उनकी जनता द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करने की घोषणा में ‘मुक्ति की प्रक्रिया’ कहा जो ‘अप्रतिरोध्य और अपरिवर्तनीय’ है।4 बांडुंग भावना उन लाखों करोड़ों लोगों की आवाज़ थी जो उपनिवेशवादी शासन में रह रहे थे और जो उपनिवेशवाद की भयावहता के ख़िलाफ़ तथा एक नई दुनिया की अपनी उम्मीद के लिए लड़ रहे थे।

बांडुंग भावना के विलुप्त हो जाने की कई वजहें रहीं। एक तो यह कि औपचारिक रूप से तो औपनिवेशिक शासन ख़त्म हो गए थे लेकिन नवउदारवादी ढाँचे का दबाव फिर भी बरक़रार था। इस भावना की अब केवल याद रह गई है। औपनिवेशिक शासन के बाद पैदा हुई पीढ़ियों ने उपनिवेशवाद विरोधी लंबे और कठिन संघर्षों की विरासत को संजोकर नहीं रखा। राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अजेंडा नवउदारवादी ढाँचे के सामने कमज़ोर पड़ गया; उत्तर-औपनिवेशिक दौर में किसानों और मज़दूरों ने अपने देश के शासक वर्ग को तो समस्या के रूप में देखा लेकिन इस दुस्साध्य ढाँचे को अपने शत्रु के रूप में नहीं पहचाना। बांडुंग सम्मेलन के सत्तर साल बाद यह सवाल करना ज़रूरी है कि क्या यह भावना अब भी कहीं मौजूद है, भले ही वैश्विक दक्षिण में कहीं भूली-बिसरी याद के रूप में ही। इस डोसियर का यही उद्देश्य है, इसे एक लंबा निबंध भी कहा जा सकता है जो किसी लंबे शोध के निष्कर्षों को पेश करने की बजाय कुछ विचारोत्तेजक प्रश्न उठाना चाहता है।5 हमें आशा है कि इन प्रश्नों से आपसी बातचीत और बहस का दौर शुरू होगा।


भाग 1: बांडुंग भावना का अर्थ क्या था

पूर्वी दुनिया में घुसपैठिए

5 अक्टूबर 1953 को संयुक्त राज्य अमेरिका (अमेरिका) के उपराष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन एशिया के लंबे दौरे पर निकले, वे (जापान से ईरान तक) यहाँ के चौदह देशों की यात्रा करने वाले थे और इससे लगे दो देशों (ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड) की भी। निक्सन कुछ ज़रूरी उद्देश्यों के साथ एशिया आए थे: जुलाई में कोरियाई प्रायद्वीप में हुए युद्धविराम को लेकर अमेरिका के सहयोगी राष्ट्रों को आश्वस्त करने के लिए; इंडोचाइना में अमेरिका की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए, यहाँ पर अधिकांश सैन्य वित्तपोषण अमेरिका ने फ्रांस से हथिया लिया था और फिर मई 1954 में डिएन बिएन फु में फ्रांस की हार के बाद समस्त सैन्य भूमिका अमेरिका के हाथ में आ गई; तथा एशिया में चीनी क्रांति की नई भूमिका को समझने के लिए। दो दशक बाद अपने संस्मरण में निक्सन ने इस यात्रा के बारे में लिखा ‘वॉशिंगटन और दूसरे पश्चिमी देशों की राजधानियों में जब स्वप्नजीवी लोग कह रहे थे कि एशिया में कम्युनिस्ट चीन कोई ख़तरा नहीं बन सकता क्योंकि यह पिछड़ा और अल्पविकसित है’ तब उन्होंने ‘ख़ुद महसूस किया कि इसका प्रभाव इस पूरे क्षेत्र में फैलना शुरू हो चुका था’। निक्सन ने लिखा कि ‘हमारी ही तरह पूर्वी दुनिया में हस्तक्षेप करने वाले’ सोवियत संघ के उलट ‘चीन के कम्युनिस्टों ने स्टूडेंट एक्स्चेंज कार्यक्रम शुरू कर दिए थे और बड़ी संख्या में छात्रों को लाल चीन में कॉलेजों में मुफ़्त पढ़ाई के लिए भेजा जा रहा था’।6 निक्सन ने अपनी सरकार को रिपोर्ट दी कि अमेरिका को एशिया में चीनी क्रांति की वजह से हो रही इन नई गतिविधियों का ज़ोरदार जवाब देना होगा।

सितंबर 1954 में मनीला पैक्ट नाम से एक साझा सैन्य संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद आठ देशों ने दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संगठन (SEATO) का गठन किया। इनमें सिर्फ़ तीन देश एशिया के थे (पाकिस्तान, फ़िलीपीन्स और थाईलैंड) जबकि दो यूरोपीय देश थे (फ्रांस और यूके)। इसके तीन अन्य सदस्य राष्ट्रों ने 1951 में एक अन्य सैन्य समझौता किया था जिसका नाम था ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और यूनाइटेड स्टेट्स सिक्योरिटी (ANZUS) संधि। इस संधि और SEATO के साथ ही एशिया के प्रशांत क्षेत्र में तीन अन्य प्रमुख संधियाँ भी हुईं: 1951 में जापान और मित्र राष्ट्रों के बीच हुई सैन फ्रांसिस्को शांति संधि, 1953 में दक्षिण कोरिया और अमेरिका के बीच हुई म्यूचूअल डिफ़ेंस संधि और 1954 में चीन गणराज्य (तब फ़ोर्मोसा अब ताइवान) और अमेरिका के बीच हुई म्यूचूअल डिफ़ेंस संधि।7 1951 में जॉन फोस्टर डलेस , जो 1953 में अमेरिका के विदेश मंत्री बने, ने सुझाव दिया कि अमेरिका को जापान से मलय प्रायद्वीप (यह म्यांमर, थाईलैंड, मलेशिया और सिंगापुर के कुछ हिस्से से बना है) तक नौसैनिक अड्डों के टापुओं की एक शृंखला का निर्माण करने की ज़रूरत है ताकि सोवियत संघ और चीनी जनवादी गणराज्य (पीआरसी) को घेरा जा सके। इन पाँच संधियों ने जापान से थाईलैंड तक इस शृंखला के निर्माण की नींव रखी।8 1956 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी को ब्रिटिश ज्ञापन मिला जो ‘SEATO सैन्य योजना के बारे में था जो मानकर चल रहा था कि परमाणु और ग़ैर-परमाणु हथियारों का प्रयोग इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिए किया जाएगा… जो भी भविष्य की योजना परमाणु हथियारों को ध्यान में रखकर नहीं की जाएगी वह ज़ाहिर है अव्यवहारिक और अनुपयोगी होगी’।9 दूसरे शब्दों में जिन पाँच संधियों ने चीन को घेरा उन्होंने एशिया के मुहानों पर परमाणु हथियारों की तैनाती को बढ़ावा दिया और ज़रूरत पड़ने पर इनके प्रयोग की अनुमति भी दी।

यह याद रखना ज़रूरी है कि यह सब सिर्फ़ काग़ज़ों पर नहीं हो रहा था। अमेरिका 1945 में ही जापान पर एटम बम गिरा चुका था और 1951 के अंत तक कोरिया के उत्तरी हिस्से में हर तरह के बुनियादी ढांचे को बम से उड़ा चुका था (बमबारी हालाँकि 1953 तक चली थी)।10 अमेरिकी वायु सेना ने कोरिया पर बमबारी की थी उसके कमांडर मेजर जेनरल एमेट ओ’डॉनल ने जून 1951 में अमेरिकी सीनेट को बताया ‘सब तबाह किया जा चुका है। अब वहाँ नाममात्र के लिए भी कुछ नहीं बचा है’। ओ’डॉनल ने यह भी कहा कि जब नवंबर 1950 में चीनी सेनाओं ने उत्तर कोरिया की सरहद पर यालू नदी पार की तो अमेरिकी वायु सेना ने अपने बम से लैस जहाज़ ज़मीन पर ही रखे क्योंकि ‘कोरिया में और कोई निशाने नहीं बचे थे’।11 दिसंबर 1953 में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ने विन्स्टन चर्चिल को सुझाव दिया कि अगर चीन कोरिया में हुए युद्धविराम का उल्लंघन करता है तो अमेरिका चीन पर एटम बम गिरा देगा। इसके कुछ ही समय बाद मार्च 1955 में अमेरिका की सरकार ने पीआरसी (चीन) को स्पष्ट कर दिया कि अगर पीपल्स लिबरेशन आर्मी फ़ोर्मोसा (अब ताइवान) में दाखिल होती है तो अमेरिका परमाणु हथियार इस्तेमाल कर सकता है।12

शांतिपूर्ण सहअस्तित्व

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ख़ुद को पुराने साम्राज्यवादी धड़े के नेता के रूप में स्थापित करने लगा ख़ासतौर से इसलिए क्योंकि बर्बाद हो चुके यूरोप के मुक़ाबले इसके पास विशाल सैन्य और आर्थिक शक्ति थी। उसी दौरान, ब्रिटेन मलय प्रायद्वीप में विद्रोह (1948-1960 का मलय आपातकाल) दबाने का एक हिंसक अभियान चला रहा था, और फ्रांस इंडोचाइना में एक हारता हुआ युद्ध लड़ रहा था (1949 तक इंडोनेशिया में डच को पहले ही हराया जा चुका था)। एशिया की धरती ख़ून से भीग रही थी और यही ख़ून उन उपनिवेशवाद विरोधी नेताओं की आँखों में उतर आया था जो बांडुंग में इकट्ठा हुए थे। इसीलिए इस सम्मेलन में चर्चा का मुख्य विषय शांति और नस्लभेद ही रहे: यहाँ आए उपनिवेशवाद विरोधी नेताओं को डर था कि मानवता के अंतर्राष्ट्रीय बँटवारे की पुरानी उपनिवेशवादी मानसिकता कहीं उत्तर-औपनिवेशिक दौर में भी बरकरार न रहे, और साथ ही वह हिंसा भी जो उपनिवेशवादियों के विरोधियों पर बरपाई जाती थी। बांडुंग सम्मेलन के दस शील (दस आदर्श) ने 1954 में चीन और भारत द्वारा प्रस्तुत पंचशील को आगे बढ़ाया जिसके आधार पर वे आपसी मतभेदों के बावजूद मिलकर काम कर सकें। ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ के यह आदर्श एशिया में सैन्य संधियाँ करने और महाद्वीप के इर्द-गिर्द सैन्य अड्डे स्थापित करने तथा राष्ट्रों को परमाणु हमलों से डराने के सख़्त ख़िलाफ़ हैं।

तुर्की के नाटो में शामिल होने के चार साल बाद 1956 में, तुर्की के एक कम्युनिस्ट शायर, नाज़िम हिक़मत ने हिरोशिमा की सात साल की एक बच्ची के लिए एक शोकगीत लिखा। गीत का शीर्षक था ‘हिरोशिमा चाइल्ड’ (हिरोशिमा की बच्ची) जो अपने ‘मारे हुए बच्चे, फिर से उगते नहीं’ वाक्य के लिए मशहूर है:

शांति के लिए मुझे सिर्फ़ इतना चाहिए
तुम आज लड़ो, तुम लड़ो आज
ताकि दुनिया के बच्चे
ज़िंदा रह सकें, बड़े हो सकें और हँस सकें, खेल सकें।

यही बांडुंग भावना का सार है। यह बिल्कुल सरल और स्पष्ट था। यही भावना उस दस आदर्शों में व्याप्त है जो 24 अप्रैल 1955 को सम्मेलन की अंतिम प्रेस विज्ञप्ति में जारी किए गए थे:

1. मौलिक मनवाधिकारों और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के उद्देश्यों और आदर्शों का सम्मान।
2. सभी राष्ट्रों की संप्रभुता और क्षेत्रीय सीमाओं का सम्मान।
3. सभी नस्लों की बराबरी और छोटे-बड़े सभी राष्ट्रों की समानता को मान्यता।
4. किसी भी राष्ट्र के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप या दख़ल देने से बचना।
5. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुरूप किसी भी राष्ट्र के, अकेले या दूसरों के साथ मिलकर, अपनी रक्षा के अधिकार का सम्मान।
6. (क) किसी बड़ी ताक़त के विशेष हितों के लिए एकजुट सैन्य समझौतों के प्रयोग से बचना।
(ख) किसी एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र पर दबाव डालने से बचना।
7. किसी भी राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलफ उग्रता या बलप्रयोग करने या धमकी देने से बचना।
8. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुरूप, सभी अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण तरीकों से निपटारा, जैसे कि बातचीत, समझौता, मध्यस्थता, या न्यायिक समाधान, साथ ही पक्षों की अपनी पसंद के अन्य शांतिपूर्ण तरीकों से।
9. पारस्परिक हितों और सहयोग को बढ़ावा देना।
10. न्याय और अंतर्राष्ट्रीय बाध्यताओं का सम्मान।13

प्रभावी रूप से इन आदर्शों ने एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की अवधारणा रखी, जिसका आधार संयुक्त राष्ट्र का चार्टर (1945) था न कि ऐसी व्यवस्था जो सैन्य गुटों और सैन्य शक्ति के प्रयोग से दुनिया को आकार देना तथा संप्रभुता को कमज़ोर करना चाहे। अब्दुलग़नी ने बांडुंग सम्मेलन पर अपने विचार रखते हुए बताया कि यह ‘मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मानक और प्रक्रियाएँ तय करने’ का एक फ़ोरम था और यह सर्वनाश की जगह सहअस्तित्व के विचार का समर्थक था।14 1955 तक छिहत्तर देश संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर हस्ताक्षर कर चुके थे जिसमें इस पर हस्ताक्षर करने वालों के लिए संधि निभाने के दायित्व थे; अफ्रीका महाद्वीप के अधिकांश हिस्से और प्रशांत द्वीपों के बहुत बड़े हिस्से सहित लगभग अस्सी देश अब भी औपनिवेशिक शासन झेल रहे थे। तब और अब भी संयुक्त राष्ट्र का चार्टर दुनिया में सहमति का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है; 50 और 60 के दशक में जैसे-जैसे देशों ने आज़ादी हासिल की वे संयुक्त राष्ट्र के पूर्ण सदस्य बनते चले गए।

बांडुंग भावना बहुत तेज़ी से दुनिया में फैलने लगी। 1957-1958 में काहिरा में हुए एफ़्रो-एशियाई जनवादी एकजुटता सम्मेलन, फिर 1958 में अक्रा में आयोजित अखिल अफ्रीकी जनवादी सम्मेलन, और इसके बाद 1960 में ट्यूनिस में दूसरे अखिल अफ्रीकी जनवादी सम्मेलन, 1961 में बेलग्रेड में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का शिखर सम्मेलन, और अंततः 1966 में हवाना में त्रि-महाद्वीपीय सम्मेलन तक इसकी यात्रा जारी रही। इन प्रत्येक सम्मेलनों ने संस्थागत ढांचे गढ़े: अफ़्रो-एशियाई जनवादी एकजुटता संगठन, गुटनिरपेक्ष आंदोलन और अफ्रीका, एशिया व लैटिन अमेरिका की जनता के साथ एकजुटता संगठन। इनकी मूल भावना साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष थी – परमाणु खतरे एवं निरस्त्रीकरण पर केंद्रित और इस विचार पर कि हथियारों पर कीमती सामाजिक संपदा की बर्बादी का मतलब था विकास का अजेंडा भुला दिया जाएगा। इन सम्मेलनों के विचार-विमर्श का केंद्रीय बिंदु था बंदूक़ बनाम रोटी। 1963 की सीमित परीक्षण प्रतिबंध संधि जैसे हथियार नियंत्रण के जो भी तंत्र इस दौर में सामने आए, वे सब इन गुटनिरपेक्ष तीसरी दुनिया के देशों के कार्यक्रमों के दबाव में हुए समझौतों का नतीजा थे।15

विकासात्मक सहयोग

संप्रभुता और शांति के आह्वान के अतिरिक्त बांडुंग दौर के भीतर एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का बीज भी था। बांडुंग में दक्षिण-दक्षिण सहयोग का नारा दिया गया था। इसकी अंतिम प्रेस विज्ञप्ति का पहला भाग पूरी तरह से आर्थिक सहयोग को समर्पित था और इसमें आर्थिक विकास तथा तकनीकी सहायता की आकांक्षा की रूपरेखा पेश की गई थी। यह माँग भी उठाई गयी थी कि संयुक्त राष्ट्र आर्थिक विकास विशेष कोष की स्थापना की जाए ताकि इन देशों में निवेश के लिए धन मुहैया करवाया जा सके। चूँकि साम्राज्यवाद ने उपनिवेशों में उतना ही विकास करना ठीक समझा जितना कच्चे माल के उत्पादन के लिए ज़रूरी था इसलिए ज़्यादा ध्यान वस्तुओं के दामों को स्थिर रखने और निर्यात से पहले इस माल को प्रॉसेस करने की घरेलू क्षमताओं पर ही दिया गया।

बांडुंग सम्मेलन का दीर्घकालिक प्रभाव यह था कि इसने बहुपक्षीय संस्थानों और प्रक्रियाओं के आकार को काफ़ी प्रभावित किया। ये संस्थान और प्रक्रियाएँ आज भी बरकरार हैं, हालाँकि इनका स्वरूप या तो कमज़ोर कर दिया गया या इन्हें क़ब्ज़ा लिया गया है।16 इनमें 1958 में संयुक्त राष्ट्र आर्थिक विकास विशेष कोष की स्थापना शामिल है, जो 1965 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम बन गया। 1964 में संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन की स्थापना हुई और इसके नए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था प्रस्तावों को 1974 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्वीकार कर लिया। 2024 में UNCTAD की साठवीं वर्षगांठ पर उप महासचिव पेड्रो मैनुअल मोरेनो ने घोषणा की: ‘ऐसी ही भावना [बांडुंग सम्मेलन जैसी] के साथ ही नौ वर्ष बाद संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) का जन्म हुआ’।17

तख़्तापलट का संसार

अप्रैल 1955 में बांडुंग सम्मेलन के आयोजन से कुछ हफ़्ते पहले अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन फ़ोस्टर डलेस ने अमेरिका में ब्रिटेन के राजदूत सर रॉजर मकिंस के साथ एक मुलाक़ात की। डलेस ने मकिंस को बताया कि वे ‘एशिया के हालात’ की वजह से ‘काफ़ी अवसाद’ में हैं। यह ‘हालात’ आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 31 मार्च 1955 को भारतीय सांसद में दिए गए भाषण से स्पष्ट होते हैं। यह भाषण बांडुंग सम्मेलन से कुछ ही पहले दिया गया था और इसमें उन्होंने जिन चीज़ों के ख़िलाफ़ बोला उनमें शामिल थीं – SEATO जिसे उन्होंने एक शत्रुतापूर्ण समझौता कहा, नाटो क्योंकि इसने गोवा में पुर्तगाल को समर्थन दिया, दक्षिण अफ्रीका में चल रहे नस्लभेद और साथ ही पश्चिमी देश क्योंकि वे पश्चिमी एशिया में ‘दखलंदजी’ कर रहे थे। डलेस ने कहा कि नेहरू का भाषण ‘का मूल विचार यही था कि पश्चिमी सभ्यता परास्त हो चुकी है और इसकी जगह अब एक नई सभ्यता को लाना ज़रूरी है’। डलेस के भीतर इसी बात से अवसाद पैदा हो रहा था और वे चाहते थे कि बांडुंग सम्मेलन असफल हो जाए क्योंकि उनके मुताबिक़ इसका ‘मूल स्वरूप और विचार ही पश्चिम विरोधी है’।18

ईरान (1953) और ग्वाटेमाला (1954) में हुए तख़्तापलटों के माध्यम से पश्चिम ने घोषणा कर दी कि वह एक नयी तरह की दुनिया का निर्माण नहीं होने देगा। इसके बाद अफ्रीका (1961 में कांगो और 1966 में घाना की जनता के विरुद्ध), दक्षिण अफ्रीका (1964 में ब्राज़ील के लोगों के ख़िलाफ़) और एशिया (1965 में इंडोनेशिया की जनता के विरुद्ध) में तख़्तापलटों की एक झड़ी लग गई। ये चारों तख़्तापलट सांप्रदायिक ताक़तों की प्रतिक्रियाओं के केंद्र बने, इन देशों पर थोपी गई नए सैन्य शासनों अपने महाद्वीपों में किसी भी तरह के प्रगतिशील विकास के प्रयासों का दम घोंटने में भूमिका निभाई। इंडोनेशिया के तख़्तापलट में लाखों कम्युनिस्टों की हत्या कर दी गई, मानो बांडुंग सम्मेलन का बदला लिया गया हो।19

भाग 2: आज बांडुंग भावना ग़ायब क्यों है?

स्मृतियों में सराबोर

अप्रैल 1965 में सुकर्णो की संकटग्रस्त सरकार ने इस सम्मेलन की दसवीं वर्षगाँठ मनाई जिसमें तीस देशों के प्रतिनिधियों पहुँचे। फिर भी यह पहले सम्मेलन के सामने फीका था: जनवरी में इंडोनेशिया ने अपनी संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता निलंबित कर दी थी और आने वाले अक्टूबर में देश की सेना अपने बैरक से निकलकर सुकर्णो का तख़्तापलट करने वाली थी। 1965 में अल्जीरिया की राजधानी अल्जीयर्स में दूसरा ऐफ़्रो-एशियाई सम्मेलन आयोजित करने की कोशिश हुई लेकिन इसे रद्द करना पड़ा जिसकी वजहें थीं- जून 1965 में बेन बेला का तख़्तापलट कर दिया गया; चीन-सोवियत विवाद; और नव स्वतंत्र अफ्रीकी देशों के आपसी मतभेद, कासाब्लांका समूह मज़बूती से अफ्रीकावाद के पक्ष में खड़ा था जबकि ब्राज़ाविल समूह चाहता था कि पुराने औपनिवेशिक शासकों से क़रीबी रिश्ते बने रहें। चूँकि बांडुंग सम्मेलन से निकले कई संस्थान बरक़रार रहे और दशकों तक दुनिया पर अपना प्रभाव डालते रहे इसलिए दूसरा सम्मेलन नहीं करवा पाने से कोई ख़ास असर पड़ा हो ऐसा नहीं लगता। बांडुंग भावना को जिस चीज़ ने तबाह किया वह था तीसरी दुनिया का ऋण संकट जिसने विकासशील देशों को ऋण और जन कल्याण कार्यक्रमों पर सरकारी ख़र्च में कटौती की स्थाई स्थिति में फँसा दिया तथा उनकी विकास से जुड़ी आकांक्षाओं को कुचल दिया। बांडुंग भावना के मिट जाने की यह वजह थी।

तीसरी दुनिया में जो ऋण का संकट खड़ा हुआ वह अपने आप में दर्शाता है कि इतने कम समय में बांडुंग भावना नवउपनिवेशवादी श्रम विभाजन के भौतिक आधार से जीत नहीं पाई। सहयोग और आदान-प्रदान की आत्मनिष्ठ परिस्थितियाँ तो मौजूद थीं लेकिन वस्तुनिष्ठ परिस्थितियाँ नहीं। नए-नए आज़ाद हुए देशों में जितना भी इंफ़्रास्ट्रक्चर मौजूद था वह साम्राज्यवाद की देन था, और हाशिए के देशों से शक्तिशाली देशों तक लूट पहुँचाने के लिए बना था। 1963 में विकासशील देशों का 70% से ज़्यादा निर्यात विकसित देशों में ही जाता था।20 अब जिसे वैश्विक दक्षिण कहा जाता है उसके पारस्परिक प्राचीन व्यापारिक रिश्ते उपनिवेशवाद ने बर्बाद कर दिए और उन्हें फिर से बनाना कोई आसान काम नहीं था। इसके ऊपर ये नए स्वतंत्र हुए देश, दुनिया की अधिकांश आबादी का घर होने के बावजूद वैश्विक व्यापार का एक बहुत छोटा सा भाग थे। इनका निम्न स्तरीय तकनीकी विकास भी तकनीक विशेषज्ञताएं एक-दूसरे के साथ सुचारू रूप से साझा करने में रुकावट था।

बांडुंग प्रक्रिया में साथ आए इन नए-नए आज़ाद देशों में से हरेक का पूँजी सृजन और अंदरूनी वर्ग संरचना का विशिष्ट चरित्र था और सब तब भी साम्राज्यवाद द्वारा निर्धारित अंतर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन के खाँचों में सीमित थे।21xvii औपनिवेशिक दौर के अल्पविकास और साम्राज्यवादी तख़्तापलट तथा विद्रोह-दमन के हमलों से बच न पाने के कारण तीसरी दुनिया के ऋण संकट ने सहयोग की भावना की जगह प्रतियोगिता के नियम को स्थापित कर दिया। इस संकट ने हाशिए के देशों को आपस में बाँटा और इस प्रकार अनुशासित किया कि वे बहुराष्ट्रीय पूँजी की शर्तों पर फिर से वैश्विक बाज़ार का हिस्सा बना दिए गए।22

2005 में अफ्रीका और एशिया के लगभग सभी यानी 177 में से 106 देशों ने बांडुंग में एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन की पचासवीं वर्षगाँठ में शिरकत की (इज़राइल को न्यौता नहीं दिया गया था, न ही ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड को, लेकिन अधिकांश प्रशांत सागर के द्वीप राष्ट्र और फ़िलिस्तीन इसमें शामिल हुए थे), और साथ ही कई लैटिन अमेरिकी देश प्रेक्षक के रूप में मौजूद रहे। तमाम देशों की सरकारों के मुखिया सवोय होमन होटल से निकले और एशियन-अफ्रीकन स्ट्रीट (पहले सम्मेलन की याद में सड़क का नाम रखा गया था) पर चलते हुए कार्यक्रम के स्थान तक पहुँचे, बिलकुल वैसे ही जैसे पचास साल पहले उनके पूर्ववर्ती नेताओं ने किया था। यह सम्मेलन नॉस्टैल्जिया (बीते समय की स्मृतियों) में डूबा हुआ था, लेकिन इसमें यह भाव भी निहित था कि दुनिया एक संक्रमण काल से गुज़र रही थी – और यह सम्मेलन उस समय हो रहा था जब ‘वॉर ऑन टेरर’ (आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध) का क्रूर दौर जारी था जिसने पहले ही अफ़ग़ानिस्तान और इराक को तबाह कर दिया था और जल्द ही कई अन्य देशों में भी तबाही लाने वाला था (इनमें इंडोनेशिया भी शामिल है जहाँ अक्टूबर 2002 में बाली में हुए बम विस्फोटों ने इस युद्ध को दक्षिणपूर्व एशिया तक पहुँचा दिया)। इस सम्मेलन की घोषणा, एक नई एशियाई-अफ्रीकी रणनीतिक साझेदारी, तुलनात्मक लाभ और विकास के लक्ष्यों जैसी नवउदारवादी अवधारणाओं से ग्रस्त थी और प्रथम घोषणा के साम्राज्यवाद विरोधी तर्क से भटकी हुई थी। बांडुंग भावना बिसराई जा चुकी थी और कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। इसलिए इसके मुर्दा शरीर की चिंता न कर बांडुंग की सच्ची भावना को एक बार फिर खोजने की ज़रूरत थी।

वैश्विक दक्षिण का नया मिज़ाज

जब तक तीसरी महामंदी (2007-2008) नहीं आई तब तक यह अहम समझ नहीं बन पाई थी कि पश्चिम न तो वैश्विक दक्षिण को प्रगति करने देगा और न ही उसे सक्षम बनाएगा। 2009 में, इसी समझ ने ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) की प्रक्रिया को जन्म दिया, जिसमें 2025 में पाँच अन्य देश (मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात) और तेरह साझीदार देश शामिल हो चुके हैं।23 शुरुआती ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों में दक्षिण-दक्षिण के पारस्परिक सहयोग या वैश्विक दक्षिण में व्यापार और निवेश पर ध्यान केंद्रित किया गया, लेकिन बाद के शिखर सम्मेलनों ने वैश्विक उत्तर से आर्थिक स्वतंत्रता और अमेरिका-प्रेरित एकध्रुवीय दुनिया के बजाय बहुपक्षवाद के विचार को फिर से स्थापित किया। ब्रिक्स प्रोजेक्ट के पूर्ण मूल्यांकन के लिए सोलह साल का समय पर्याप्त नहीं है। इन वर्षों में भी, इसने अपने सदस्य देशों (जैसे चीन और भारत) के बीच राजनीतिक मतभेदों और उनके नेताओं के बदलते स्वरूप को देखा (जैसे ब्राज़ील में दिल्मा रूसेफ़ के उदारवादी-वामपंथी सरकार की जगह जायर बोल्सोनारो की नव-फ़ासिस्ट सरकार आना और फिर लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा के नेतृत्व में मध्यम-वामपंथ की वापसी)। ब्रिक्स प्रक्रिया और अन्य दक्षिण-दक्षिण संरचनाओं के लिए उत्साह तब पैदा हुआ जब एशिया के बड़े देशों (विशेष रूप से चीन, वियतनाम, भारत, बांग्लादेश और इंडोनेशिया) में आर्थिक विकास हुआ। जनवरी 2025 में, बांडुंग सम्मेलन की सत्रहवीं वर्षगांठ के साल में इंडोनेशिया ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य बन गया।

विश्व अर्थव्यवस्था का केंद्र एशिया की ओर सरक जाने से वैश्विक दक्षिण में एक नया आत्मविश्वास या ‘नया मिज़ाज’ पैदा हुआ, क्योंकि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों को अब वित्तीय सहायता और तकनीकी विकास के लिए वैश्विक उत्तर की संस्थाओं की ज़्यादा ज़रूरत नहीं रह गई थी। 2013 में तीसरी महामंदी के जवाब में चीन ने जो बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) की वह इस संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण क़दम थी, क्योंकि इसने दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए वे वस्तुपरक परिस्थितियाँ पैदा कीं जो बांडुंग सम्मेलन के समय मौजूद नहीं थीं। पूर्वी अफ्रीका में रेलवे के निर्माण और पेरू में एक नए बंदरगाह के खुलने जैसे क़दमों ने वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच आंतरिक व्यापार के लिए आधार खड़ा किया है। 2023 तक चीन का 46.6% व्यापार BRI नेटवर्क के देशों के साथ होने लगा।24 हालांकि यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि ‘विच्छेदन’ (डीलिंकिंग) जैसा कुछ हो चुका है, लेकिन यह स्पष्ट है कि एक बड़ा बदलाव हो रहा है क्योंकि चीन अब 120 से अधिक देशों का प्रमुख व्यापारिक साझीदार है।25 इस बीच BRI को भी कई उतार-चढ़ाव देखने पड़े हैं और ज़रूरी है कि इसके सदस्य देश अपनी राष्ट्रीय विकास परियोजनाओं को इसकी चर्चाओं में शामिल करें।

ट्राईकॉन्टिनेंटल के कई दस्तावेज़ों में मौजूदा माहौल को परिभाषित करने के लिए ‘नया मिज़ाज’ शब्दों का इस्तेमाल किया है। ‘वैश्विक दक्षिण के नए मिज़ाज’ के प्रमुख उद्देश्य दो अवधारणाओं में निहित हैं – क्षेत्रवाद और बहुपक्षवाद, दोनों आर्थिक और राजनीतिक रूप से विश्व व्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाने की इच्छा से प्रेरित हैं। शंघाई सहयोग संगठन से लेकर दक्षिणी आम बाजार (मर्कोसुर) तक, यह क्षेत्रवाद पहले से ही विकसित हो रहा है और स्थानीय मुद्रा-आधारित व्यापार में वृद्धि से मजबूत हुआ है, जिससे ‘आर्थिक आत्मनिर्णय’ और ‘क्षेत्रीय संपूरकता’ को प्राप्त करना भौतिक रूप से संभव हो गया है, जैसा कि क्यूबा के विदेश मंत्रालय की इंदिरा लोपेज़ अर्गुएल्स ने कहा है।26 इस क्षेत्रवाद से जुड़ा है बहुपक्षवाद के विचार का विस्तार, यह विश्वास कि वैश्विक संस्थान (जैसे संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन) वैश्विक उत्तर के हाथ की कठपुतलियाँ नहीं होने चाहिए बल्कि उन्हें वह अजेंडा अपनाना चाहिए जिसे उनके सभी सदस्य देशों ने आकार दिया हो।

आज बांडुंग भावना मौजूद नहीं है

1950 और 1960 के दशक में, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों का एक जनाधार था (अक्सर इन आंदोलनों को उनकी अधिकांश आबादी का समर्थन रहा)। अधिकांश मामलों में इनका नेतृत्व छोटे बुर्जुआ और ज़मींदार अभिजात वर्ग के कुछ हिस्सों ने किया लेकिन राष्ट्रीय मुक्ति के प्रति इन आंदोलनों की प्रतिबद्धता ने उन्हें एक समाजवादी रास्ते पर चलते हुए नव-उपनिवेशवाद की संरचनाओं की सीमाओं में ही सरकारें बनाने को मजबूर किया और अपने संगठित जनाधार को जवाब देने के लिए भी। ये ‘समाजवाद’ अलग-अलग विचारों के साथ आए चाहे वह भारत की दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-1961) का ‘समाज का समाजवादी रास्ता’ हो, (तंजानिया के जूलियस न्येरेरे द्वारा 1967 में लिखित) अरुषा घोषणा का अफ्रीकी समाजवाद हो या लैटिन अमेरिका में पोपुलिज़्म के तमाम प्रकारों की राजनीति हो जैसे अर्जेंटीना का पेरोनिज़्म (¡Ni yanquis, ni marxistas!, ¡peronistas!, या ‘यैंकी नहीं, मार्क्सवादी नहीं, पेरोनिस्ट!’)। इन प्रवृत्तियों के नेतृत्व के वर्गीय रुझान और उनके अपने संकीर्ण दृष्टिकोण के बावजूद सक्रिय जनता ने उन्हें राष्ट्रीय मुक्ति के व्यापक लक्ष्य से भटकने की अनुमति नहीं दी। इसीलिए हम ज़मीनी स्तर से ऊपर की ओर एक बांडुंग [भावना] की बात कर सकते हैं।

आज जन आंदोलनों की स्थिति बहुत कमज़ोर है। वैश्विक दक्षिण के केवल कुछ ही देशों में वे समाज का नेतृत्व करते हैं। हमारे समय की प्रगतिशील सरकारों में विभिन्न वर्गों के गठबंधन हैं – जिसमें एक छोटा बुर्जुआ और उदार बुर्जुआ भी शामिल है जो नवउदारवाद के अत्याचारों को बर्दाश्त तो नहीं कर पा रहा लेकिन आसानी से उसकी रूढ़ियों से छूटेगा भी नहीं। जबकि, उदाहरण के लिए, लैटिन अमेरिका में दूसरी गुलाबी लहर (पिंक टाइड) और सेनेगल और श्रीलंका जैसे देशों में प्रगतिशील सरकारों का उदय नवउदारवाद के पतन की प्रतिक्रिया और दक्षिणपंथी भय का जवाब हैं, वे संगठित जन आंदोलनों की पीठ पर सवार नहीं हैं और न ही वे नवउदारवाद से टूटने के विचार के इर्द-गिर्द एकजुट हैं।27 अफ्रीका के साहेल क्षेत्र – नाइजर, माली और बुर्किना फासो में – साम्राज्यवाद-विरोधी सैन्य तख़्तापलटों को सामाजिक आंदोलनों की एक नई लहर का समर्थन प्राप्त है जो अभी भी संप्रभुता और विकास के लिए एक व्यापक परियोजना तैयार करने की प्रक्रिया में हैं। ये विकास एक नए मिज़ाज को जन्म देने में सक्षम हैं – उदाहरण के लिए, एक ‘ब्रिक्स भावना’ – लेकिन यह अभी तक बांडुंग भावना जैसी नहीं हैं। यह घोषणा कर देना जल्दबाज़ी या फिर आदर्शवादी तक कहा जा सकता है कि हमारे समय में ज़मीन से एक बांडुंग भावना जैसी कोई नई भावना सिर उठा रही है जो इतिहास की वास्तविक गति देने वाली एक सक्षम, एक जन परिघटना है।

इस नए मिज़ाज को आकार देने वाला मूलभूत संदर्भ और बांडुंग भावना को फिर से जगाने की ज़रूरत के पीछे एक बड़ा खतरा है, जिसका नाम है अति-साम्राज्यवाद।28  ट्राईकॉन्टिनेंटल में अपने शोध द्वारा हमने प्रस्तावित किया है कि दुनिया में केवल एक ही राजनीतिक-आर्थिक-सैन्य गुट है: अमेरिका के नेतृत्व वाला नाटो और इज़राइल का गठबंधन। घटती आर्थिक और तकनीकी शक्ति के बावजूद यह गुट अद्वितीय सैन्य शक्ति रखता है और वैश्विक सूचना तंत्र पर ज़बरदस्त नियंत्रण बनाए हुए है। छद्म युद्ध रणनीतियों का उपयोग और यहाँ तक कि मामूली संप्रभुता चाहने वाले राष्ट्रों के खिलाफ हिंसा की धमकी या उपयोग का जवाब वैश्विक दक्षिण मिलकर देना होगा जिसका स्वरूप शायद बांडुंग भावना का फिर से उभरना हो सकता है।

हालाँकि, कुछ ऐसे कारक हैं जो वैश्विक दक्षिण में एक नए बांडुंग युग के उदय में रुकावट पैदा करते हैं:

  1. पश्चिमी देशों के नेतृत्व की कई विफलताओं, पतन और ख़तरे के बावजूद इससे डर और इसकी लालसा दोनों बरकरार हैं। यह तर्कसंगत है कि वैश्विक दक्षिण के देश हर तरह के युद्ध की आशंका से डरते हैं (इनमें एकतरफ़ा बलपूर्वक उपाय से लेकर हवाई बमबारी तक सब शामिल है), क्योंकि यह सिर्फ़ एक सैद्धांतिक धारणा नहीं बल्कि एक वास्तविक तथ्य है।29 इसके साथ ही पश्चिमी वर्चस्व वाली अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के अवशेषों की वजह से उनके नेतृत्व की अनिवार्यता का मनमोहक भाव भी बना हुआ है।
  2. वैश्विक दक्षिण में एशिया में हुई प्रगति के बारे में अभी इतना प्रचार नहीं हुआ है विशेष रूप से चीन द्वारा की गई प्रगति के बारे में। गुणात्मक रूप से नई उत्पादक शक्तियों के संदर्भ में ख़ासतौर से अन्य देश इस तमाम विकास को आसानी से दोहराने योग्य नहीं मान रहे हैं, जिससे वैश्विक दक्षिण की सामूहिक शक्ति की संभावना को कम आंका जाता है। इसके अलावा और वास्तविक हालात को झुठलाते हुए वैश्विक उत्तर द्वारा यह धारणा फैलाई जा रही है कि वैश्विक दक्षिण में विकास को गति दे रहे देशों की प्रगति ग़रीब देशों के लिए ख़तरनाक होगी। यह बताया जा रहा है कि सैकड़ों वर्षों से वैश्विक उत्तर का जो ख़तरा दुनिया ने देखा है उसके मुकाबले ख़ासतौर से एशियाई देशों की प्रगति ज़्यादा ख़तरनाक है।
  3. डिजिटल, मीडिया और वित्तीय क्षेत्रों में पश्चिम के नियंत्रण की वास्तविकता के आगे घुटने टेक दिए गए हैं, जिसे अजेय मान लिया गया है।
  4. वैश्विक दक्षिण के सत्तारूढ़ आर्थिक अभिजात वर्ग का एक बड़ा हिस्सा वैश्विक वित्तीय पूंजी के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। यह विशेष रूप से निवेश के लिए एक सुरक्षित आश्रय के तौर पर अमेरिकी डॉलर पर उसकी निर्भरता और वैश्विक उत्तर के रियल एस्टेट और वित्तीय बाजारों में निवेश करने के लिए अपने ही देशों से धन निकालने में उसकी भागीदारी में प्रकट होता है। इन वर्गीय हितों को बौद्धिकों और नीति निर्माताओं द्वारा आसानी से समर्थन दिया जाता है जो नवक्लासिकल अर्थशास्त्र और वाशिंगटन कंसेंसस के सिद्धांतों से आगे नहीं देख सकते।30 इसीलिए हम ट्राईकॉन्टिनेंटल में वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की वकालत करते हैं।31
  5. हमारे कई सामाजिक आंदोलन मानकर चलते हैं कि वाम को वर्ग राजनीति की वास्तविकताओं का स्थायी रूप से विरोध करना चाहिए, हम इन परिस्थितियों में सत्ता नहीं जीत सकते। सत्ता लेने और अपने अजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए वास्तविकता के साथ किसी भी तरह का समझौता हमारे अंतिम लक्ष्यों से भटकाव के रूप में देखा जाता है। जीत पाने में विफलता की लुभावनी भावना राष्ट्रीय मुक्ति के दौर में मौजूद नहीं थी, जब राज्यसत्ता हासिल करना ही तात्कालिक और अटल लक्ष्य था। एक ऐसा दृष्टिकोण भी है जो कहता है कि वाम आंदोलनों को दक्षिणपंथ से लड़ना चाहिए, नवउदारवाद के ख़िलाफ़ सक्रिय होना चाहिए और राज्य की सत्ता की माँग या उस पर क़ाबिज़ होने की बजाय मध्यम-वामपंथ को सत्ता हासिल करने में मदद देनी चाहिए। और सबसे ख़राब नज़रिया है राज्य सत्ता हासिल करने की कोशिश ही नहीं करनी चाहिए।

जब तक वैश्विक दक्षिण की जनता इनमें से कुछ (और इनसे भी ज़्यादा) चुनौतियों पर काबू नहीं कर पाती तब तक बांडुंग भावना के इतिहास की मुख्यधारा का हिस्सा बनने की संभावना नहीं है। हम इतिहास के एक समाप्त युग, साम्राज्यवाद के युग से धीरे-धीरे बाहर निकल रहे हैं। लेकिन हम अभी तक एक नए युग में प्रवेश नहीं कर पाए हैं, जो साम्राज्यवाद से परे हो – वह ढांचा जिससे बाहर निकलना सबसे कठिन है।


Notes

1 Sukarno, ‘Opening address given by Sukarno (Bandung, 18 April 1955)’, Asia-Africa Speak from Bandung (Djakarta: Ministry of Foreign Affairs, Republic of Indonesia, 1955), 19–29.

2 Roeslan Abdulgani, Bandung Spirit: Moving on the Tide of History (Djakarta: Prapantja, 1964) and The Bandung Connection: The Asia-Africa Conference in Bandung in 1955 (Singapore: Gunung Aguna, 1981), 89.

3 The poetic resolution was formally placed before the UN General Assembly by the Soviet diplomat Vasily Kuznetsov. See United Nations General Assembly, Declaration on the Granting of Independence to Colonial Countries and Peoples (A/RES/1514), December 14, 1960. The president of the General Assembly at that time was the Irish diplomat Frederick Boland. Boland’s daughter Eavan became a famous poet and in 1998 published ‘Witness’, which contains these lines:
What is a colony
if not the brutal truth
that when we speak
the graves open.
And the dead walk?

4 Abdulgani, The Bandung Connection, 11.

5 The overall narrative in this dossier draws heavily from Vijay Prashad, The Darker Nations: A People’s History of the Third World (New York: The New Press, 2007) and The Poorer Nations: A Possible History of the Global South (New Delhi: LeftWord, 2013). It will form part of the basis for The Brighter Nations (2026).

6 Richard Nixon, RN: The Memoirs of Richard Nixon (New York: Grosset and Dunlap, 1978), 136. Also see Richard Nixon, ‘Asia After Viet Nam’, Foreign Affairs, 1 October 1967, https://www.foreignaffairs.com/articles/united-states/1967-10-01/asia-after-viet-nam.

7 For more on the San Francisco Treaty, see Tricontinental: Institute for Social Research, The New Cold War Is Sending Tremors through Northeast Asia, dossier no. 76, 21 May 2024, https://dev.thetricontinental.org/dossier-76-new-cold-war-northeast-asia/.

8 For a full sense of the argument, see John Foster Dulles, Policy for the Far East (Washington: US Government Publishing Office, 1958).

9 ‘Memorandum of a Conversation Between the Counsellor of the Department of State (MacArthur) and the British Ambassador (Makins), Department of State, Washington, February 29, 1956’, US Department of State, Conference Files: Lot 62 D 181, CF 656, Secret; John P. Glennon, Edward C. Keefer, and David W. Mabon, eds., Foreign Relations of the United States, 1955–1957, East Asian Security; Cambodia; Laos, Volume XXI, (Washington: United States Government Printing Office, 1990), 180–181.

10 Su-kyoung Hwang, Korea’s Grievous War (Philadelphia: University of Pennsylvania Press, 2016).

11 I. F. Stone, The Hidden History of the Korean War, 1950–1951 (New York: Little Brown, 1969), 312.

12 At a press conference on 15 March 1955, John Foster Dulles explained the doctrine of ‘less-than-massive retaliation’. If China crossed into Formosa, Dulles said, the US would use tactical nuclear weapons against the Chinese forces. See Elie Abel, ‘Dulles Says US Pins Retaliation on Small A-Bomb’, New York Times, 16 March 1955, https://www.nytimes.com/1955/03/16/archives/dulles-says-us-pins-retaliation-on-small-abomb-lessthanmassive.html.
When Eisenhower was asked to confirm Dulles’ statement the next day, he said that tactical nuclear weapons should not be used ‘just exactly as you would use a bullet or anything else. I believe that the great question about these things comes when you begin to get into those areas where you cannot make sure that you are operating merely against military targets. But with that one qualification, I would say, yes, of course they would be used’. See William Klingaman, David S. Patterson, and Ilana Stern, eds., Foreign Relations of the United States, 1955–1957, National Security Policy, Volume XIX (Washington: United States Government Printing Office, 1990), 61. For Churchill’s diary notes, see John Colville, The Fringes of Power: Downing Street Diaries, 1939–1955 (London: Hodder and Stoughton, 1985), 687. On the broader question of nuclear retaliation, see Matthew Jones, ‘Targeting China: US Nuclear Planning the “Massive Retaliation” in East Asia, 1953–1955’, Journal of Cold War Studies 10, no. 4 (Fall 2008): 37–65.

13 Asia-Africa Speak from Bandung, 161–169.

14 Abdulgani, Bandung Spirit, 72.

15 For example, L. C. N. Obi of Nigeria was a key, but now forgotten, figure in the debate around the 1968 Nuclear Non-Proliferation Treaty while Ismael Moreno Pino of Mexico was the central negotiator for the 1967 Treaty for the Prohibition of Nuclear Weapons in Latin America and the Caribbean, known as the Tlatelolco Treaty, the first to establish a nuclear weapons free zone.

16 Gilbert Rist, The History of Development: From Western Origins to Global Faith (London: Zed Books, 2008).

17 Pedro Manuel Moreno, 60 years of UNCTAD: Charting a New Development Course in a Changing World, UN Trade and Development, 14 May 2024, https://unctad.org/osgstatement/60-years-unctad-charting-new-development-course-changing-world-session-1.

18 John P., Harriet D. Schwar, and Louis J. Smith, eds., ‘Memorandum of a Conversation, Department of State, Washington, April 7, 1955’, in Foreign Relations of the United States, 1955–1957, China, Volume II (Washington: United States Government Printing Office, 1986), 454.

19 Alan Burns, the governor of the Gold Coast and Nigeria from 1941 to 1947, was appointed to be the United Kingdom’s permanent representative at the UN Trusteeship Council from 1947 to 1956. Soon after leaving the UN, Burns published a book that went after Bandung and argued that it represented ‘the resentment of the darker peoples against the past domination of the world by European nations’. See Alan Burns, In Defence of Colonies (London: George Allen and Unwin, 1957), 5. For more on the coup in Indonesia, see Tricontinental: Institute for Social Research, The Legacy of Lekra: Organising Revolutionary Culture in Indonesia, dossier no. 35, December 2020, https://dev.thetricontinental.org/wp-content/uploads/2020/12/20210127_Dossier-35_EN_Web.pdf.

20 Bela Balassa, Trends in Developing Country Exports, 1963–88, Policy, Research, and External Affairs working papers no. WPS 634, World Bank World Development Report, 31 March 1991, http://documents.worldbank.org/curated/en/561401468766799448/Trends-in-developing-country-exports-1963-88.

21 Aijaz Ahmad, In Theory: Classes, Nations, Literatures (London: Verso, 1992), 16.

22 S. B. D. de Silva, The Political Economy of Underdevelopment (London: Routledge, 1982), 506.

23 For more on the Third Great Depression, see Tricontinental: Institute for Social Research, The World in Economic Depression: A Marxist Analysis of Crisis, notebook no. 4, 10 October 2023, https://dev.thetricontinental.org/dossier-notebook-4-economic-crisis/.

24 The State Council Information Office, ‘China’s Trade with BRI Countries Booms in 2023, press release, 12 January 2024, http://english.scio.gov.cn/m/pressroom/2024-01/12/content_116937407.htm#:~:text=China’s%20trade%20with%20countries%20participating,2022%2C%20customs%20data%20showed%20Friday.

25 Alessandro Nicita and Carlos Razo, ‘China: The Rise of a Trade Titan’, UN Conference on Trade and Development, 27 April 2021, https://unctad.org/news/china-rise-trade-titan. For more on delinking, see Tricontinental: Institute for Social Research, Globalisation and Its Alternative: An Interview with Samir Amin, notebook no. 1, 29 October 2018, https://dev.thetricontinental.org/globalisation-and-its-alternative/.

26 For more on regionalism, see Tricontinental: Institute for Social Research, Sovereignty, Dignity, and Regionalism in the New International Order, dossier no. 62, 14 March 2023, https://dev.thetricontinental.org/dossier-regionalism-new-international-order/.

27 For more on the second pink tide in Latin America, see Tricontinental: Institute for Social Research, To Confront Rising Neofascism, the Latin American Left Must Rediscover Itself, dossier no. 79, 13 August 2024, https://dev.thetricontinental.org/dossier-neofascism-latin-america/.

28 Tricontinental: Institute for Social Research, Hyper-Imperialism: A Dangerous Decadent New Stage, Contemporary Dilemmas no. 4, 23 January 2024, https://dev.thetricontinental.org/studies-on-contemporary-dilemmas-4-hyper-imperialism/; Tricontinental: Institute for Social Research, The Churning of the Global Order, dossier no. 72, 23 January 2024, https://dev.thetricontinental.org/dossier-72-the-churning-of-the-global-order/.

29 For more on unilateral coercive measures, see Tricontinental: Institute for Social Research, Imperialist War and Feminist Resistance in the Global South, dossier no. 86, 5 March 2025 https://dev.thetricontinental.org/dossier-imperialism-feminist-resistance.

30 For more on the role of intellectuals on both sides of the class struggle, see Tricontinental: Institute for Social Research, The New Intellectual, dossier no. 12, 11 February 2019, https://dev.thetricontinental.org/the-new-intellectual/.

31 Tricontinental: Institute for Social Research, Towards a New Development Theory for the Global South, dossier no. 84, 14 January 2025, https://dev.thetricontinental.org/towards-a-new-development-theory-for-the-global-south/.

पढ़ना, एक बेहतर इंसान बनना है

Tricontinental: Insitute for Social Research logo

इस डोसियर में शामिल चित्र रेड बुक्स डे 2025 के उपलक्ष्य पर जारी किए गए कैलेंडर से लिए गए हैं। इंटरनेशनल यूनियन ऑफ लेफ्ट पब्लिशर्स के सहयोग से तैयार किए गए ये बारह चित्र दुनिया के अलग-अलग हिस्से की किसी क्रांतिकारी किताब से प्रेरित है। रेड बुक्स डे क्रांतिकारी किताबों, उनके लेखकों और जन आंदोलनों का जश्न मनाने का दिन है, जिसे हम 21 फ़रवरी को मनाते हैं, क्योंकि साल 1848 में इसी दिन कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र प्रकाशित किया था। इस उत्सव के साथ हम दुनिया से कहना चाहते हैं कि पढ़ना, एक बेहतर इंसान बनना है।


पूरा रूस पढ़ना सीख रहा था और पढ़ रहा था – राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास – क्योंकि लोग जानना चाहते थे… हर शहर में, अधिकतर क़स्बों में, मोर्चे के साथ चलते हुए, हर राजनीतिक संगठन का अपना एक अख़बार था – [और] कहीं-कहीं एक से ज़्यादा भी। हज़ारों संगठनों द्वारा लाखों पर्चे बांटे जा रहे थे जो क्रांतिकारियों की फ़ौजों से लेकर गांवों, कारख़ानों, सड़कों तक पहुँच रहे थे। शिक्षा की भूख, जो लंबे समय से दबी पड़ी थी, क्रांति के साथ अभिव्यक्ति के उन्माद में बदल गई। अकेले स्मोल्नी इंस्टीट्यूट से ही पहले छह महीनों के भीतर, हर दिन हज़ार किलो साहित्य निकल रहा था, जो कारों और ट्रेनों में लद कर देश भर में जाता। रूस पढ़ने की चीज़ों को ऐसे पी रहा था जैसे अतृप्त गर्म रेत पानी पीती है। और लोग दंतकथाएँ, मिथ्या इतिहास, सस्ती धार्मिक व्याख्याएँ या भ्रष्ट करने वाला पल्प फ़िक्शन नहीं पढ़ रहे थे – वे पढ़ रहे थे सामाजिक और आर्थिक सिद्धांत, दर्शन, टॉल्स्टॉय, गोगोल और गोर्की की रचनाएँ…

जॉन रीड, टेन डेज़ दैट शुक द वर्ल्ड, 19191

आम मेहनतकश लोगों की क्रांतियों ने समाज की बेड़ियाँ तोड़कर नई दुनिया बनाने पर ज़ोर दिया। ऐसी हर क्रांति, चाहे वह सीधे तौर पर समाजवादी हो या राष्ट्रीय मुक्ति से प्रेरित रही हो, समाज के पुराने तौर-तरीक़ों को हटा कर आपसी मेलजोल पर आधारित समतावादी समाज के निर्माण की आकांक्षा को दर्शाती है। बीसवीं सदी की ज़्यादातर क्रांतियाँ (मेक्सिको, 1910; चीन, 1911; ईरान, 1905-1911; रूस और मध्य एशिया, 1917) किसानों और मज़दूरों के नेतृत्व में हुई थीं, इसलिए यहां अक्सर ज़मींदारी के कठोर ढाँचे को बदलने का सवाल केंद्र में दिखाई देता है। जमींदारों की सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए केवल अधिशेष भूमि वितरण जैसे भूमि सुधार के उपाय करना काफ़ी नहीं था; ज़मींदारों की ताक़त की जड़ें सामाजिक ढाँचे में जमी थीं, जिसे भगवान के नियम की तरह माना जाता था। किसानों का उत्पीड़न भूमि अभिलेखों, बही खातों, साहूकारों और पुजारियों के दस्तावेज़ों में दर्ज समझ में न आने वाली लिखाई के ज़रिए किया जाता था। किसानों को पढ़ने की क्षमता से वंचित रख कर उन्हें शक्तिहीन बनाया गया। लेकिन दुनिया के तमाम पिछड़े इलाक़ों में हुई क्रांतियाँ इस बात की गवाह हैं कि किसानों ने यह शक्ति हासिल कर समाज में बदलाव किए।

उन्नीसवीं सदी में इन देशों में व्याप्त बुर्जुआ संस्कृति में पढ़ना-लिखना व्यक्ति के वर्ग से जुड़ा हुआ था। हालाँकि व्यावसायिक प्रकाशन शुरू होने के साथ किताबों और समाचार पत्रों की उपलब्धता बढ़ी, लेकिन ये सब मुख्य रूप से पूंजीपति वर्ग और – कहीं कहीं – पेटी बुर्जुआ वर्ग में ही पढ़े जाते थे। मेक्सिको में राष्ट्रपति बेनिटो जुआरेज़ (1858-1872) ने स्कूली शिक्षा और प्रकाशन उद्योग का विस्तार तो किया लेकिन एक समाचार पत्र की लागत मज़दूरों (या किसानों) की औसत दैनिक आय से कहीं ज़्यादा थी।2 मेक्सिको व रूस जैसे देशों में तथा भारत व अफ्रीकी महाद्वीप जैसे उपनिवेशों में ज़मींदारों के शासन के चलते, मज़दूरों और किसानों के लिए साक्षर होने के बहुत कम अवसर मौजूद थे। इन देशों में ट्रेड यूनियन और कम्युनिस्ट आंदोलन शुरू होने के साथ उनके संगठनों से छपने वाले समाचार पत्र और पर्चे जब कार्यकर्ताओं द्वारा श्रमिकों और किसानों के बीच उपलब्ध कराए जाने लगे तब जाकर उन्होंने कुछ पढ़ना शुरू किया। सामूहिक शिक्षा का यह रूप साक्षरता का शुरुआती ज़रिया बना।

यह डोसियर, ‘पढ़ना, एक बेहतर इंसान बनना है’ ऐसे ही प्रयासों से प्रेरित है तथा मेक्सिको से लेकर भारत व चीन में चले लोकप्रिय साक्षरता अभियानों के उदाहरण पेश करता है। डोसियर का अंतिम भाग रेड बुक्स डे के बारे में है। इस कार्यक्रम की शुरुआत सबसे पहले भारत में हुई थी और अब इंटरनेशनल यूनियन ऑफ लेफ्ट पब्लिशर्स की पहल के ज़रिए यह कार्यक्रम पूरी दुनिया में आयोजित होता है।


वेलेंटिना एगुइरे (वेनेज़ुएला/यूटोपिक्स) द्वारा बनाया गया चित्र।

मेक्सिको रीड्स

1910 की मेक्सिकन क्रांति के समय, देश की 1.51 करोड़ आबादी में से केवल 22% लोग ही साक्षर थे।3 इसके बाद मेक्सिको में अशांति का एक दशक लंबा दौर चला। 1920 में अल्वारो ओब्रेगॉन ने राष्ट्रपति पद जीतने के बाद सुधार प्रक्रिया शुरू की, जिसमें कई सामूहिक सांस्कृतिक गतिविधियाँ शामिल थीं, जैसे ग्रामीण स्कूल खोले गए, शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया, सार्वजनिक पुस्तकालय तथा कला विद्यालय बनाए गए और नव-साक्षरों के लिए पर्चे व किताबें प्रकाशित की जाने लगीं। 1921 में, जोस वास्कोनसेलोस सार्वजनिक शिक्षा मंत्रालय के पहले सचिव बने और राष्ट्रपति ओब्रेगॉन ने उन्हें मेक्सिकन संस्कृति को लोकतांत्रिक बनाने का काम सौंपा।4 इसके लिए सरकार ने हज़ारों ग्रामीण विद्यालय और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान बनाए और ग्रामीण शिक्षकों का वेतन एक पेसो से बढ़ाकर तीन पेसो प्रतिदिन कर दिया।5 मुख्य प्रशिक्षण संस्थान चलाने की ज़िम्मेदारी वास्कोनसेलोस ने मेक्सिको की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य एलेना टोरेस क्यूएलर को सौंपी , जिन्होंने इस सांस्कृतिक मिशन का विस्तार देश भर में किया और एक दशक के भीतर चार हज़ार से ज़्यादा शिक्षकों को प्रशिक्षित किया। टोरेस ने देश के हज़ारों बच्चों का पोषण सुनिश्चित करने के लिए 1921 में स्कूलों में निःशुल्क आहार की योजना शुरू की।6

वास्कोनसेलोस के नेतृत्व में सार्वजनिक शिक्षा मंत्रालय ने ग्रामीण इलाक़ों में गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास पर जोर दिया। इस दिशा में मंत्रालय ने पुस्तकालयों के निर्माण के लिए धन वितरित करने के साथ ग्रामीण पुस्तकालयों के लिए पचास पुस्तकों का सेट और शहरी पुस्तकालयों के लिए हज़ार किताबों का सेट तैयार किया। इन किताबों को मंत्रालय द्वारा प्रकाशित कर हर पुस्तकालय में पहुँचाया गया ताकि किसानों तक इनकी पहुँच बढ़े और उनके सांस्कृतिक जीवन व रोज़मर्रा के व्यावहारिक व किसानी से संबंधित ज्ञान में इज़ाफ़ा हो। ग्रीक के बेहतरीन साहित्य से लेकर मेक्सिको के इतिहास और घरेलू प्रबंधन तथा कृषि विज्ञान से संबंधित किताबें इन सेट्स में शामिल थीं।7 मंत्रालय ने शिक्षकों के लिए एक पत्रिका ‘एल मेस्ट्रो’ (शिक्षक), का प्रकाशन भी शुरू किया। इस पत्रिका में शिक्षण शैली और शिक्षा क्षेत्र में उठ रहे नए विचारों पर जानकारी के साथ पुस्तक समीक्षाएँ शामिल होती थीं। इस सरकारी पहल के अलावा 1934 में समाजशास्त्री व अर्थशास्त्री डैनियल कोसियो विलेगास ने नेशनल स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (जिसे अब नेशनल ऑटोनॉमस यूनिवर्सिटी ऑफ मेक्सिको के स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के रूप में जाना जाता है) में आर्थिक संस्कृति कोष की स्थापना की। इसका उद्देश्य था अर्थशास्त्र के छात्रों को किताबें वितरित करना। पर आगे चल कर इस कोष के ज़रिए पूरे लैटिन अमेरिका में विस्तृत विषयों पर कई किताबें पहुँचाई गईं।

मेक्सिकन क्रांति ज्यो-ज्यों संस्थागत रूप लेती गई वहाँ का वर्ग चरित्र बदलने लगा। इसी के साथ संस्कृति को लोकतांत्रिक बनाने पर से ध्यान हटता गया। साक्षरता दर बढ़ी तो थी, लेकिन 70% के आसपास आकर रुक गई। सरकार की शैक्षिक व सार्वजनिक पुस्तकालय प्रणाली साक्षरता की गुणवत्ता में सुधार नहीं कर पा रही थी। दूसरी तरफ़ वित्तीय संकट बढ़ रहा था, जो कि 1982 में मेक्सिकन ऋण संकट के रूप में सामने आया। इस लगातार बढ़ते संकट के चलते शिक्षा और सार्वजनिक पुस्तकालयों की अनदेखी होने लगी थी। मेक्सिको के नीति निर्माता नवउदारवाद की आदतों में ढल रहे थे और समाज के भीतर मौजूद प्रगतिकामी धाराएँ साक्षरता की अनदेखी को रोकने का संघर्ष कर रही थीं। 1986 में पुस्तकालयों के महानिदेशालय ने लाइब्रेरी में ‘मेरी गर्मियों की छुट्टियां’ (मिस वैकेशनेस एन ला बिब्लियोटेका) नामक एक कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम के माध्यम से दस लाख बच्चों व युवाओं ने सार्वजनिक पुस्तकालयों द्वारा आयोजित विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में भाग लिया।8 मेक्सिको के लाइब्रेरी सिस्टम ने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया और संस्कृति, संगीत और कथा-वाचन के कई उत्सव आयोजित किए। 1993 में पाठ्यक्रम में बदलाव के ज़रिए हुए शैक्षिक सुधारों की रोशनी में 1995 में सार्वजनिक शिक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय पठन कार्यक्रम (प्रोग्रामा नैशनल पैरा ला लेक्टुरा) शुरू किया। साल 2000 में इसका नाम बदल कर ‘पाठकों का देश बनाने की मुहिम’ (हैसिया अन पैस डे लेक्टोरेस) कर दिया गया। इस कार्यक्रम की एक ख़ासियत यह थी कि हर साल पचहत्तर किताबें चुनकर उनका प्रकाशन किया जाता और देश भर के स्कूल-पुस्तकालयों में उन्हें पहुँचाया जाता।

2008 में मेक्सिको के राष्ट्रीय पठन एवं पुस्तक संवर्धन कार्यक्रम (प्रोग्रामा डे फ़ोमेंटो पैरा एल लिब्रो वाई ला लेक्टुरा) ने साक्षरता को सामाजिक असमानता कम करने और ज्ञान तक पहुँच बढ़ाने के साधन के रूप में उपयोग करने के उद्देश्य से मेक्सिको रीड्स (मेक्सिको ली) परियोजना की स्थापना की। यह परियोजना मेक्सिको के साक्षरता अभियानों के अपने इतिहास और क्यूबाई क्रांति के वयस्क साक्षरता पाठ्यक्रम “यो, सी पुएदो (हाँ, मैं कर सकता हूँ)” से प्रेरित थी। क्यूबा में 1961 के साक्षरता कार्यक्रम से मिली सीख के आधार पर “यो, सी पुएदो” पाठ्यक्रम को 2001 में तैयार किया गया था और यह पाठ्यक्रम पूरे लैटिन अमेरिका के साक्षरता अभियानों में काफ़ी प्रभावशाली रहा है। 2009 में मेक्सिको के आर्थिक संस्कृति कोष के तत्कालीन निदेशक पाको इग्नासियो ताइबो-द्वितीय और लेखिका पालोमा सैज़ तेजेरो ने मिलकर एक ब्रिगेड (ब्रिगेड पैरा लीयर एन लिबर्टाड) की स्थापना की। इस ब्रिगेड का उद्देश्य था ऐसी किताबें प्रकाशित करना जिन्हें जनता निःशुल्क डाउनलोड कर सके या पुस्तक मेलों व सांस्कृतिक उत्सवों से बिना ख़र्च ले सके। ब्रिगेड का मिशन है पढ़ने के आनंद को सब के बीच पहुँचाना। इस विषय में पालोमा सैज़ तेजेरो कहती हैं:

पढ़ने से नए सपने और ज्ञान के नए स्रोत खुलते हैं, जो आम तौर पर किसी के पास पहले नहीं होते; पढ़ना आपमें आलोचनात्मक नज़रिया विकसित करता है और आपको अपने जीवन में हर दिन खुद का बचाव करने के लिए हथियार देता है; पढ़ना आपको पहले से ज़्यादा सुंदर या अमीर नहीं बनाएगा; वे किताबें जो आपको बताती हैं कि अगर आप उन्हें पढ़ेंगे तो ऐसी चीजें होंगी, वे सफ़ेद झूठ हैं, ऐसा नहीं होता, आप पहले से अधिक बुद्धिमान भी नहीं बन जाएँगे; लेकिन पढ़ना आपको यह तय करने की स्पष्टता देता है कि आप क्या करना चाहते हैं और क्या नहीं करना चाहते हैं।9

ओथमान घाल्मी (मोरक्को/वर्कर्स डेमोक्रेटिक वे) द्वारा बनाया गया चित्र।

किताबों से मिला चीनियों को हौसला

1911 में किंग राजवंश के पतन से पहले चीन की अधिकांश आबादी – विशेष रूप से महिलाएँ – निरक्षर थी। 1900 में अनुमानित साक्षरता दर केवल 10-15% थी।10 समाज में व्याप्त उथल-पुथल के बीच किंग राजवंश के बाद भी साक्षरता में बहुत सुधार नहीं हुआ। 1949 की चीनी क्रांति के बाद यह तस्वीर बदली। 1950 के दशक में ही साक्षरता दर में बड़ी वृद्धि दिखाई देने लगी। 1959 आते तक 57% आबादी साक्षर हो गई थी।11 और 2021 आते तक, चीन में वयस्क साक्षरता दर बढ़कर 97% पर पहुँच गई। इस आँकड़े में चीन आज दुनिया में सबसे आगे है। पिछले सात दशकों में चीन ने साक्षरता में जिस तरह क़दम बढ़ाया है, उसे ‘शायद मानव इतिहास में सबसे बड़ा शैक्षिक प्रयास’ कहा गया।12

यह उपलब्धि 1949 की क्रांति के तुरंत बाद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) द्वारा लागू की गई परियोजनाओं का परिणाम है। इन परियोजनाओं के प्रेरणास्रोत थे- दक्षिण-पूर्वी और उत्तर-मध्य चीन में क्रमशः जियांग्शी सोवियत (1931-1934) और यान’आन सोवियत (1936-1948) जैसे प्रयासों के तहत ग्रामीणों और वयस्कों के बीच साक्षरता बढ़ाने के लिए चले विभिन्न साक्षरता अभियान। ये अभियान सोवियत संघ के “लिकबेज़” व अन्य साक्षरता कार्यक्रमों पर आधारित थे। लिकबेज़ एक निरक्षरता उन्मूलन कार्यक्रम था, जिसके तहत प्रौढ़ साक्षरता कार्यक्रमों से जुड़े ज्ञान व समझ को व्यवस्थित किया गया और जिससे सभी सोवियत गणराज्यों में साक्षरता के क्षेत्र में उल्लेखनीय लाभ मिला था।13 1921 में वी. आई. लेनिन ने आर्थिक नीति पर आयोजित एक सम्मेलन में घोषणा की थी कि यदि निरक्षरता बरक़रार रही तो कोई प्रगति नहीं होगी। लेनिन ने कहा कि ‘साक्षरता के बिना कोई राजनीति नहीं हो सकती; इसके बिना अफ़वाहें, गप, परीकथाएँ और पूर्वाग्रह ही चल सकते हैं, राजनीति नहीं’।14

हालाँकि, नए चीन के साक्षरता अभियान से जुड़ी सभी गतिविधियों को यहाँ प्रस्तुत करना असंभव है, लेकिन उनमें से तीन गतिविधियों के बारे में जानना बहुत ज़रूरी है:

  1. निरक्षरता को चीनी भाषा में 文盲 लिखा जाता है, जिसका मतलब है ‘टेक्स्ट ब्लाइंड’, यानी जो लिपि ना पढ़ सके, क्योंकि साक्षर माने जाने के लिए चीनी भाषा के अक्षरों को जानना ऐतिहासिक रूप से पहली शर्त माना गया है। एक लाख से भी ज़्यादा ऐसे अक्षरों से बनी चीनी भाषा समाज में पूर्ण साक्षरता प्राप्त करने की दिशा में बाधाएँ पैदा करती रही। 1955 में, क्रांतिकारी सरकार ने साक्षरता को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने के लिए ‘चीनी लिखित भाषा सुधार समिति’ का गठन किया। इसके तहत साक्षरता का न्यूनतम मापदंड नए सिरे से तय किया गया, और ग्रामीण निवासियों के लिए 1500 अक्षरों तथा शहरी निवासियों व ग्रामीण नेताओं के लिए 2,000 अक्षरों की सूची तैयार की गई।15 इसके अलावा 1958 में, प्राथमिक विद्यालयों में पिनयिन लिपि (चीनी अक्षरों का रोमानीकरण) का इस्तेमाल शुरू कर चीनी अक्षरों के उपयोग को सरल बनाया गया।
  2. मेक्सिको और रूस की तरह चीनी क्रांति ने ग्रामीण साक्षरता और वयस्क साक्षरता दोनों के महत्त्व पर ज़ोर दिया: यदि अभिभावक लिखने-पढ़ने में दिलचस्पी नहीं लेंगे तो बच्चे भी पढ़ने के आनंद से वंचित रहेंगे। लिन हांडा, जो चीन के निरक्षरता-विरोधी अभियान के प्रमुख नेताओं में से एक थे, ने 1955 में कहा था कि साक्षरता केवल अक्षरों की पहचान भर नहीं है; साक्षरता के अभियान का अंतिम लक्ष्य यह होना चाहिए कि किसान अपने जीवन को समृद्ध बना सकें और अपनी उत्पादकता बढ़ा सकें। इसके अगले वर्ष जारी की गई निरक्षरता-विरोधी उद्घोषणा के अनुसार ग्रामीण वयस्क साक्षरता मुहिम के दो सिद्धांत थे: ज्ञान को ‘व्यवहार में जोड़ना’ (लियानक्सी शिजी) और ‘लागू करने के उद्देश्य से सीखना’ (ज़ुए यी ज़ी योंग)।16
  3. चीनी क्रांति ने अपने साक्षरता कार्यक्रमों में सार्वजनिक पुस्तकालयों की भूमिका पर ज़ोर डाला। 1949 में चीन में केवल पचपन सार्वजनिक पुस्तकालय थे। लोकतंत्र के प्रसार के लिए, नए चीन ने किसानों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालयों और श्रमिकों के लिए कारख़ाना पुस्तकालयों का निर्माण किया। 1956 आते तक, चीन के गाँवों में 1,82,960 वाचनालय बन चुके थे, जहां विस्तृत विषयों पर पठन सामग्री उपलब्ध थी।17

इस तरह की परियोजनाओं ने चीनी समाज को निरक्षरता से उबरने में मदद की। आज चीन नई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे कि युवाओं में स्क्रीन और वीडियो गेम की लत। इस मामले में 2021 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने घोषणा की थी कि उनकी सरकार युवाओं के बीच ऑनलाइन वीडियो गेम के उपयोग को प्रति सप्ताह तीन घंटे तक सीमित करने का क़दम उठाएगी, जिसे वीडियो गेम उद्योग और अभिभावक दोनों नियंत्रित करेंगे। 2022 में राष्ट्रपति शी ने पठन-पाठन पर आयोजित पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में पढ़ने को ज्ञान प्राप्त करने के साधन के अलावा, ज्ञान का विस्तार करने और सद्गुण सीखने का ज़रिया बताते हुए कहा कि:

प्राचीन काल से चीनी लोगों ने पढ़ने की वकालत की है और चीज़ों की प्रकृति का अध्ययन करके ज्ञान प्राप्त करने और विवेक का इस्तेमाल करते हुए व्यक्तित्व में सुधार करने पर जोर दिया है। पढ़ने की आदत चीनी लोगों में संयम की पारंपरिक भावना को मज़बूती देने, उनमें आत्मविश्वास पैदा करने तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है।

मैं पार्टी के सदस्यों और पदाधिकारियों से पठन-पाठन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हुए, सद्गुण व आदर्श का रास्ता अपनाने और अपनी क्षमताओं में सुधार करने का आह्वान करता हूँ। मुझे उम्मीद है कि हमारे सभी बच्चों को पढ़ने की आदत लगेगी, उन्हें पढ़ने में आनंद आएगा और वे स्वस्थ रूप में बड़े होंगे। मैं चाहता हूं कि हमारी जनता पढ़ने में रूचि ले और ऐसा माहौल बनाने में योगदान करे जहां हर कोई पढ़ना पसंद करता हो, सबके पास पढ़ने के लिए अच्छी किताबें हों और सबको पढ़कर कुछ सीखना आता हो।18

उसी साल शंघाई लाइब्रेरी की पूर्वी शाखा को जनता के लिए खोल दिया गया था। पुडोंग जिले में स्थित सेंचुरी पार्क के ठीक सामने इस लाइब्रेरी में हर दिन चहल-पहल रहती है, लेकिन रविवार की शाम देखने लायक होती है। ग्लोबल दक्षिण के कई ग़रीब देशों में उस समय बच्चों को सड़क पर खेलते हुए देखा जा सकता है। ग्लोबल उत्तर में शायद उस समय बच्चे घर के अंदर स्क्रीन के सामने चिपके होते होंगे। लेकिन शंघाई में बच्चे किताबों के ढेर उठाकर, अपने पापा-मम्मी, या दादा-दादी की गोद में बैठकर, उन्हें एक-एक कर उत्साह से पढ़ते हैं।

लाइब्रेरी के एक छोटे पर महत्त्वपूर्ण हिस्से में मार्क्सवादी साहित्य रखा है। इस हिस्से में रखी किताबें लेखकों के आधार पर लगाई गई हैं: कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स, माओ ज़ेडोंग, डेंग शियाओपिंग तथा शी जिनपिंग। लाइब्रेरी का सबसे प्यारा हिस्सा बच्चों का सेक्शन है, जिसमें रंग-बिरंगी किताबों की क़तारें लगी हुई हैं, और पास के सोफे, टेबल आप में बैठकर पढ़ने की जिज्ञासा पैदा करते हैं। मानवाधिकारों पर 1948 की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 26 के अनुसार हर इंसान को पढ़ने का अधिकार प्राप्त है। यह पुस्कालय वो जगह है जहाँ लोग -चाहे वयस्क हों या बच्चे– अपने पढ़ने के अधिकार का प्रयोग करने आते हैं। इस परंपरा में पठन-पाठन एक सामाजिक गतिविधि है जो इंसानों में, और ख़ासकर युवाओं में सहानुभूति और संज्ञानात्मक क्षमता विकसित करने में मदद करती है और लोगों को उनके इतिहास, संस्कृति, भाषा और पूर्वजों से जोड़ती है।

जुनैना मुहम्मद (भारत/यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स) द्वारा बनाया गया चित्र।

केरल में किताबों की भीनी महक

लगभग 3.34 करोड़ की आबादी वाले केरल राज्य में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे की सरकार है, जिसमें मुख्य पार्टी भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) है।19 आप केरल के किसी भी क़स्बे या शहर में जाइए, आपको निश्चित रूप से वहाँ सार्वजनिक पुस्तकालय दिखाई देंगे, जिनमें लोग साथ लेकर जाने के लिए किताबें ढूँढ़ रहे होंगे या टेबल पर बैठकर किताबें पढ़ रहे होंगे। केरल में नौ हज़ार से ज़्यादा सार्वजनिक पुस्तकालय हैं। यहाँ कम्युनिस्ट आंदोलन की सक्रिय उपस्थिति के कारण पढ़ने की एक स्थायी परंपरा रही है।

1920 के दशक में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ जारी आंदोलन के दौरान साक्षरता का मुद्दा उपनिवेशवाद-विरोधी भारतीय राष्ट्रवाद के एजेंडे का हिस्सा था। सार्वजनिक पुस्तकालयों को साक्षरता अभियान का महत्त्वपूर्ण साधन माना जाता था। पुस्तकालय भारत के उन राज्यों में विकास एजेंडे का अहम हिस्सा पहले से ही बन चुके थे जो उदार शासक के अधीन थे (जैसे बड़ौदा, जिसे अब वडोदरा के नाम से जाना जाता है)। भारत के लाइब्रेरी आंदोलन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसकी शुरुआत अधिकतर जगहों पर दोस्तों के किसी समूह द्वारा अपनी पुस्तकों और समाचार पत्रों को इकट्ठा कर अपने गाँव-क़स्बे में छोटा सा पुस्तकालय शुरू करने के साथ हुई थी। उदाहरण के लिए के.एन. पणिक्कर – जिन्हें केरल के लाइब्रेरी आंदोलन का जनक माना जाता है- बताते हैं कि समाचार पत्रों तक केवल अमीर लोगों की पहुँच थी। पर जब वह ख़ुद किसी तरह से एक समाचार पत्र की सदस्यता लेने में सफल हो गए, तो उनके घर पर आठ-दस लोग इकट्ठा होने लगे जो उनसे समाचार पढ़ कर सुनाने का आग्रह करते। उन्होंने कहा, ‘जब कभी अख़बार नहीं आता था, तो मैं उन्हें महान नायकों की जीवनियाँ पढ़कर सुनाता था’। वह आगे कहते हैं कि ‘मेरे एक दोस्त ने दो समाचार पत्र और लगवा लिए थे और उसके पास कुछ पुस्तकें भी थीं। इन पुस्तकों और समाचार पत्रों को एक छोटे से बिना किराए वाले कमरे में इकट्ठा कर हमने एक छोटा पुस्तकालय शुरू किया था’।20 इस तरह लाइब्रेरी शुरू करने से जुड़ी हज़ारों कहानियाँ हैं। ऐसे कई पुस्तकालयों को बाद में राज्य पुस्तकालय प्रणाली में शामिल कर लिया गया जिससे उन पुस्तकालयों को संसाधन मिले और उनका दायरा भी बढ़ा। इसी तरह के छोटे-छोटे पुस्तकालयों के साथ केरल में पुस्तकालय आंदोलन की शुरुआत हुई थी। भारत के अन्य राज्यों में भी लाइब्रेरी आंदोलन चले पर आज भी इसका केंद्र केरल ही है। और आज भी ऐसे छोटे पुस्तकालय इस आंदोलन की जान हैं।

इसका बेहतरीन उदाहरण हैं कन्नूर ज़िले के पुस्तकालय। केरल में सबसे ज़्यादा पुस्तकालय कन्नूर में हैं। लगभग 29,000 लोगों की आबादी वाले गाँव मायिल की ग्राम पंचायत, कन्नूर ज़िले की 93 स्थानीय सरकारों में से एक है। इस इलाक़े में केरल राज्य पुस्तकालय परिषद से संबद्ध 34 पुस्तकालय हैं। इसका मतलब है कि हर वर्ग किलोमीटर में लगभग एक पुस्तकालय है, जिनमें से प्रत्येक पुस्तकालय लगभग 872 लोगों को सेवा प्रदान करने में सक्षम है। दुनिया के किसी भी हिस्से में पुस्तकालयों का इस कदर असाधारण घनत्व देखने को नहीं मिलेगा। ये सभी पुस्तकालय राज्य सरकार द्वारा वित्त-पोषित हैं और सभी में कंप्यूटर व एकीकृत कैटलॉग की सुविधा के साथ-साथ प्रशिक्षित लाइब्रेरियन हैं, जो आसपास के समुदाय के लिए बेहतरीन संसाधन की तरह हैं।

इनमें से हरेक पुस्तकालय की अपनी कहानी है, और कई पुस्तकालयों का नाम तो किसी राष्ट्रवादी या कम्युनिस्ट नेता के नाम पर रखा गया है। कन्नूर में मौजूद कुछ पुस्तकालयों के बारे में जानें:

  • मायिल में स्थित वेलम पब्लिक रीडिंग रूम हॉल (वेलम पोथुजना वायनशाला):21 1934 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य ईश्वरन नंबूथिरी ग्रामीणों के बीच हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए मायिल पंचायत (ग्राम परिषद) आए थे। उन्होंने अपने स्कूल के लिए एक छोटा सा शेड बनवाया, जो बाद में एक पुस्तकालय बन गया और जिसमें आज 18,000 पुस्तकें हैं।
  • थालास्सेरी में स्थित पराल पब्लिक रीडिंग रूम हॉल (पराल पोथुजना वायनशाला पब्लिक लाइब्रेरी): 1934 में कौमुदी नाम की एक सोलह वर्षीय लड़की ने ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासन के ख़िलाफ़ जारी स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान करने के लिए गांधी जी को अपने सोने के आभूषण दे दिए थे। सोने से मिले पैसे का इस्तेमाल लाइब्रेरी के निर्माण के लिए किया गया, जिसमें अब ज़िले के इतिहास का अभिलेखागार भी शामिल है।
  • कंदक्कई में स्थित एस.जे.एम. रीडिंग रूम हॉल एवं देशीय राष्ट्रीय पुस्तकालय (एस.जे.एम. वायनशाला और देशीय ग्रंथालयम): केरल में उन्नीसवीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलनों के दौरान श्री जथावेद गुरु नामक एक व्यक्ति कंदक्कई पहुँचे। उन्होंने वहाँ के ग्रामीणों को जातिगत पदानुक्रम और भेदभाव से लड़ने के लिए प्रेरित किया। इस संघर्ष को गति देने के लिए गुरु ने एक छोटी सी लाइब्रेरी की स्थापना की, जहां आज दस हज़ार से अधिक पुस्तकें मौजूद हैं।
  • पिनाराई में स्थित सी. माधवन मेमोरियल रीडिंग रूम हॉल (सी. माधवन स्मारक वायनशाला): भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का पहला सम्मेलन 1939 में केरल के पिनाराई में गुप्त रूप से आयोजित किया गया था। उसके दो दशक बाद प्रगतिशील युवा संगठन श्री श्री नारायण आश्रिता युवाजन संघम ने एक सामाजिक कार्यकर्ता के नाम पर सी. माधवन मेमोरियल लाइब्रेरी शुरू की। इस पुस्तकालय में स्थानीय स्तर पर डोनेशन सिस्टम के ज़रिए हर साल हज़ारों किताबें इकट्ठी की जाती हैं। सामुदायिक भावना का विस्तार इस कदर हुआ है कि आज जब भी इस क्षेत्र में नया घर बनता है, तो लाइब्रेरी के नाम पर उसके पास कोई फलदार पेड़ लगाया जाता है।
  • एज़होम स्थित कुलप्पुरम रीडिंग रूम हॉल और लाइब्रेरी (कुलप्पुरम वायनशाला और ग्रंथालयम): 1950 के दशक में एज़होम गाँव के बुनकरों ने यंग मेन्स क्लब के नाम से एक रीडिंग रूम शुरू किया। वह रीडिंग रूम अब तीन मंज़िल का जलवायु-नियंत्रित पुस्तकालय बन चुका है, जिसमें सार्वजनिक आयोजनों के लिए जगह है और एक बड़ा खेल का मैदान तथा शाक वाटिका (वेजिटेबल गार्डेन) भी है। यह पुस्तकालय कई तरह की सामाजिक सेवाएँ भी प्रदान करता है, जैसे पुस्तक वितरण और महिलाओं के लिए मोटरसाइकिल ड्राइविंग का कोर्स। इस कोर्स से अब तक सौ से अधिक महिलाएँ ड्राइविंग सीख कर लाइसेंस प्राप्त करने में सफल रही हैं। 2008 में, पुस्तकालय ने कन्नूर ज़िले के परियारम में स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के स्वास्थ्य-कर्मियों के साथ मिलकर गांव के 700 घरों का दौरा किया था। डॉक्टरों व पुस्तकालयकर्मियों ने पूरे गाँव से स्वास्थ्य संबंधी जानकारी इकट्ठा की और नगरपालिका की विभिन्न सेवाओं के बारे में ग्रामीण जनता को जानकारी दी।
  • नेशनल होमलैंड अपलिफ्टमेंट रीडिंग रूम हॉल और पब्लिक लाइब्रेरी (देशोद्धारना वायनशाला एवं पब्लिक लाइब्रेरी) तथा चला स्थित देशोद्धारना वायनशाला: खजूर के बाग के किनारे स्थित इस छोटे पुस्तकालय की स्थापना 1960 के दशक में किसानों ने की थी। ये किसान बीड़ी बनाने, बुनकरी जैसे दिहाड़ी मज़दूरी के काम करते थे। किसानों ने अपने पैसे जमा करके पठन-पाठन व चिंतन के लिए एक जगह बनाई। आज, इस लाइब्रेरी में क़रीब 9,000 किताबें हैं।
  • कावुम्बई में स्थित थलियान रमन नंबियार मेमोरियल पब्लिक रीडिंग रूम हॉल (थलियान रमन नंबियार मेमोरियल पब्लिक लाइब्रेरी स्मारक पोथुजना वायनशाला): किसान नेता थलियान रमन को 1946 में कावुम्बई के किसान विद्रोह के दौरान गिरफ़्तार किया गया था और चार साल बाद सलेम जेल में पुलिस द्वारा किए गए नरसंहार में उनकी हत्या हो गई। 1962 में स्थानीय किसानों ने उनके सम्मान में यह लाइब्रेरी बनवाई।
  • करिवेल्लूर स्थित एवन-वन लाइब्रेरी: एवन-वन क्लब के रूप में शुरू हुई इस लाइब्रेरी को 1973 के बाद से एवन लाइब्रेरी के नाम से जाना जाता है। इस लाइब्रेरी में आज 17,574 किताबें हैं और 619 सदस्य हैं। यह लाइब्रेरी बच्चों के लिए रीडिंग की गतिविधियाँ आयोजित करती है, समय-समय पर फिल्म स्क्रीनिंग आयोजित करती है और बुजुर्गों को उनके घरों तक किताबें पहुँचाती है। लाइब्रेरी के स्थानीय इतिहास समूह के साथ जुड़-कर दो स्थानीय शोधकर्ताओं ने इतिहास पर अपने शोध-ग्रंथ तैयार किए हैं।

महामारी के दौरान पुस्तकालय आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने देख-रेख कार्य में और छात्रों के लिए शिक्षा जारी रखने में महत्त्वपूर्ण मदद पहुँचाई। इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण नेटवर्क परियोजना है, जो कन्नूर ज़िले के आदिवासी क्षेत्रों में सामाजिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू हुई थी। इस परियोजना की शुरुआत सीपीआई (एम) नेता और राज्यसभा सदस्य डॉ. वी. शिवदासन ने की थी और जल्द ही यह परियोजना पीपुल्स मिशन फॉर सोशल डेवलपमेंट (पीएमएसडी) ट्रस्ट का एक अभिन्न अंग बन गई। यह ट्रस्ट कन्नूर ज़िला पुस्तकालय परिषद के तहत काम करती है, और केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन इसके मुख्य संरक्षक हैं तथा शिवदासन अध्यक्ष हैं। पीएमएसडी का संकल्प है हर वार्ड में एक पुस्तकालय स्थापित करने में सहयोग करना। इसी के साथ पीएमएसडी ने कन्नूर विश्वविद्यालय और केरल की लाइब्रेरी काउंसिल के साथ मिलकर जनवरी 2023 में पहली भारतीय लाइब्रेरी कांग्रेस की मेजबानी की, जिसमें पाँच लाख लोगों ने भाग लिया था। कांग्रेस की तैयारी के लिए आयोजकों ने विभिन्न विषयों पर 1,500 सेमिनार आयोजित किए। भाग लेने वालों में 3,000 लाइब्रेरियन के अलावा स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के कर्मचारी, सरकारी अधिकारी, सहकारी कार्यकर्ता, छात्र, शिक्षक और अन्य लोग शामिल थे।

भारतीय लाइब्रेरी कांग्रेस विभिन्न राज्यों में आयोजित होने वाला एक वार्षिक कार्यक्रम बन चुका है। इसका उद्देश्य निम्नलिखित विचारों को बढ़ावा देना है:

  1.  अधिक से अधिक स्थानों पर पुस्तकालय शुरू किए जाने चाहिए, जहां पुस्तकों के भंडार के साथ यथासंभव उन्नत तकनीक भी उपलब्ध हो।
  2. पुस्तकालय केवल शहरी क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि ग्रामीण और दूरदराज के इलाक़ों में भी स्थापित किए जाने चाहिए, जैसे पूर्वोत्तर केरल में वायनाड के पहाड़ी इलाके में।
  3. लोगों के लिए पुस्तकालय महत्त्वपूर्ण और सक्रिय सार्वजनिक स्थान बनें, जहां सांस्कृतिक विकास के पर्याप्त मौक़े मिलने के साथ फिल्म स्क्रीनिंग, खेल, कला मेले और व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसी गतिविधियों के आयोजन हो। पुस्तकालयों के आसपास स्वास्थ्य केंद्र और विज्ञान कक्षाएं स्थापित की जानी चाहिए।22

लाइब्रेरी आंदोलन कामकाजी लोगों की मेहनत से चलता है। इनमें से एक हैं पय्यन्नूर अन्नूर के राजन वी.पी., जो छठी कक्षा तक पढ़े थे और एक बीड़ी मजदूर थे। जब राजन ने छोटी उम्र में एक बीड़ी फैक्ट्री में काम करना शुरू किया तो वे वहाँ के मज़दूरों की पढ़ने की आदत से खूब प्रभावित हुए। लंच ब्रेक से पहले मज़दूर एक-दूसरे को दैनिक समाचार पढ़कर सुनाते और लंच के बाद में कोई उपन्यास। ऐसा क्यूबा की सिगार फैक्टरियों में भी देखा जा सकता है। इस तरह रोज़ अख़बार और उपन्यास पढ़ते हुए राजन को आगे पढ़ने की प्रेरणा मिली, जिससे उन्हें अपने घर के पास स्थित एक सहकारी बैंक में क्लर्क के रूप में नई नौकरी मिल गई। 2008 तक वे बैंक के प्रबंधक रहे। उस वर्ष, राजन ने पीपुल्स लाइब्रेरी और रीडिंग रूम की स्थापना की, जो अब शहर में सांस्कृतिक जीवन का केंद्र बन गया है।

लाइब्रेरी आंदोलन की एक और अनूठी नेता हैं साठ साल की राधा वी.पी.। उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की है और एक बीड़ी मजदूर हैं। छोटी उम्र से ही उन्हें अपने घर के कामकाज की ज़िम्मेदारी उठानी पढ़ी। उन्होंने बचपन में ही सीपीआई (एम) की साप्ताहिक पत्रिका देशाभिमानी को पढ़ना शुरू कर दिया था। वह पत्रिका में शामिल कहानियों व कविताओं पर टिप्पणी करते हुए संपादकों को पत्र भी लिखतीं। 2002 में राधा ‘जवाहर मूविंग लाइब्रेरी’ से जुड़ीं। यह लाइब्रेरी 2001 में शुरू हुई थी, और पाठकों, ख़ास तौर पर महिलाओं और बुज़ुर्गों के घरों तक किताबें पहुँचाती है। काम के बाद राधा एक हाथ में लाइब्रेरी रजिस्टर और कंधे पर किताबों से भरा बैग लेकर घर-घर किताबें देने जाने लगीं। जल्द ही उन्हें इस रूप में आते देखना स्थानीय लोगों के लिए ख़ुशी का सबब बन गया। 2018 में उन्होंने दसवीं कक्षा पूरी की और उच्च शिक्षा के लिए ज़रूरी राज्य परीक्षा पास की। अपनी पढ़ाई और काम के बीच भी लाइब्रेरी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता कभी कम नहीं हुई। वो कहती हैं कि, ‘मुझे यह काम करना अच्छा लगता है। मुझे कभी भी अपना बैग भारी नहीं लगा, क्योंकि किताबों की भीनी महक से मुझे हमेशा बहुत ख़ुशी मिलती रही।’23

राजन और राधा जैसे कामकाजी लोग ही केरल के लाइब्रेरी आंदोलन को सुचारू रूप से चलाने में लगने वाली इंसानी मेहनत का प्रतीक हैं।

साल्वाटोर कार्लियो (इटली/पोटेरे अल पोपोलो!) द्वारा बनाया गया चित्र।

जापान से चाँद तक मनाएँगे रेड बुक्स डे

21 फरवरी 2019 को सीपीआई(एम) से जुड़े प्रकाशकों के समूह ‘इंडियन सोसाइटी फॉर लेफ्ट पब्लिशर्स’ ने एक अभियान शुरू किया था, जिसे अब रेड बुक्स डे के नाम से जाना जाने लगा है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन की 171वीं वर्षगांठ और अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य था धर्मनिरपेक्ष, सांस्कृतिक और समाजवादी सिद्धांतों के अनुरूप सामूहिक जीवन का विकास। दुनिया भर के प्रकाशकों का ध्यान रेड बुक्स डे की तरफ़ गया। और इसके अगले साल, 2020 में दक्षिण कोरिया से क्यूबा तक 30,000 से अधिक लोगों ने इसे मनाया।24 2024 में रेड बुक्स डे के तहत इंडोनेशिया से लेकर चिली तक आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में दस लाख से अधिक लोगों ने शिरकत की। अकेले केरल में ही विभिन्न शहरों, ज़िलों में आयोजित गतिविधियों में पाँच लाख लोग शामिल रहे थे।25

2020 में पहली बार यह उत्सव भारत से बाहर मनाया गया था। उस दिन तमिलनाडु में किसान संगठनों और ट्रेड यूनियनों के सदस्यों ने अपने-अपने गाँवों की सड़कों पर प्लास्टिक की कुर्सियों का घेरा बनाकर कम्युनिस्ट घोषणापत्र पर चर्चा की। ब्राज़ील के भूमिहीन श्रमिक आंदोलन (एमएसटी) की बस्तियों में कार्निवल उत्सव के दौरान आंदोलन के सदस्य एक साथ बैठे और बारी-बारी से इसे जोर-जोर से पढ़ा। नेपाल के पहाड़ों में कृषि श्रमिक संघ ने अपने संगठन द्वारा प्रकाशित क्रांतिकारी किताबों पर चर्चा की। तंजानिया में भूमिहीन किसानों ने इकट्ठे होकर साक्षरता के महत्त्व के बारे में बात की।

2024 में क्यूबा में दस दिवसीय हवाना पुस्तक मेले के दौरान 21 फरवरी को रेड बुक्स डे के उपलक्ष्य में विशेष गतिविधियाँ आयोजित की गईं। केरल में, चेम्म पार्वती ने रेड बुक्स डे का एक वीडियो जारी किया, जिसमें वह त्रिवेंद्रम के बाज़ारों और कारख़ानों में ‘इंटरनैशनल’ के फ्रेंच संस्करण पर नृत्य करती हुई दिखाई देती हैं। वीडियो के अंत में चेम्म पार्वती समंदर के किनारे खड़ी दिखती हैं, उनके हाथ में लाल झंडा है और उनके पीछे क्षितिज पर लाल सूरज। इस वीडियो के साथ दुनिया भर से कलाकारों ने अपने पोस्टर जारी किए थे, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग अपने शहर-क़स्बे-गाँव में इस दिन को मनाने के लिए रीडिंग सेशन या अन्य गतिविधियाँ आयोजित करने की प्रेरणा ले सकें।

2020 में रेड बुक्स डे के पहले अंतर्राष्ट्रीय उत्सव की तैयारी के लिए इंडियन सोसाइटी ऑफ़ लेफ्ट पब्लिशर्स ने दुनिया भर के प्रकाशकों के साथ बैठकें की। इन बैठकों के परिणामस्वरूप इंटरनेशनल यूनियन ऑफ़ लेफ्ट पब्लिशर्स (आईयूएलपी) का गठन हुआ, जिसमें अब पैंतालीस प्रकाशक शामिल हैं।26 आईयूएलपी का गठन केवल रेड बुक्स डे मनाने के लिए नहीं हुआ था, बल्कि वामपंथी प्रकाशकों को दक्षिणपंथी हमलों से बचाने और तर्कसंगत व समाजवादी विचारों को आगे बढ़ाने के मक़सद से एक मंच प्रदान करने हेतु किया गया था। आईयूएलपी ने रेड बुक्स डे के ही दिन कई भाषाओं में संयुक्त पुस्तकें जारी की हैं। इनमें चे ग्वेरा के लेखों का संकलन और पैरिस कम्यून आदि किताबें शामिल हैं, जिन्हें रोमानियाई से लेकर इंडोनेशियाई भाषा में एक ही दिन प्रकाशित किया गया। इसके साथ ही लेखकों या प्रकाशकों पर जब हमले हुए तो आईयूएलपी ने उनके बचाव में संयुक्त बयान जारी किए हैं।27

लाइब्रेरी आंदोलन द्वारा केरल के विभिन्न सार्वजनिक पुस्तकालयों में हर साल रेड बुक्स डे कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। गीत व नाटक इन कार्यक्रमों का अहम हिस्सा हैं, जिनसे लाखों लोग तर्कसंगतता और समाजवाद के रास्ते पर चलने की नई ऊर्जा हासिल करते हैं।

रेड बुक्स डे, क्रांतिकारी किताबों के लेखन-प्रकाशन और पढ़ने के अधिकार की रक्षा के लिए तथा तर्क पर हमला करने वाले मौजूदा रूढ़िवादी विचारों से लड़ने के लिए एक व्यापक सांस्कृतिक संघर्ष का हिस्सा है। उम्मीद है कि यह दिन आईयूएलपी ही नहीं बल्कि दुनिया भर की प्रगतिशील ताक़तों के कैलेंडर में एक अहम तारीख़ बनेगा। रेड बुक्स डे की पहचान बढ़ने और प्रगतिशील ताक़तों के कैलेंडर पर इसे जगह मिलने के साथ हम देख रहे हैं कि आईयूएलपी और वामपंथी धाराओं के दायरे से बाहर के लोग व संगठन भी रेड बुक्स डे को अपना रहे हैं। हमें उम्मीद है कि इस दशक के अंत तक दुनिया भर में एक करोड़ से भी ज़्यादा लोग रेड बुक्स डे में हिस्सा लेंगे।


1930 के दशक में उत्तरी काकेशस में स्थित जॉर्जीवस्की के सामूहिक खेतों से महिलाओं ने सोवियत सरकार को एक पत्र लिखा था। उन्होंने लिखा था, ‘हमें बड़े खेतों को ठीक से चलाने के लिए ज़रूर पढ़ाई करनी चाहिए। हम पूरी सर्दी पढ़ाई करना चाहती हैं; पढ़ना-लिखना सीखना चाहती हैं; राजनीतिक ज्ञान और वैज्ञानिक कृषि के मूल सिद्धांतों का अध्ययन करना चाहती हैं। हमें और किताबें व नोटबुक दीजिए, क्योंकि महिलाओं में पढ़ाई की इच्छा बहुत ज़्यादा है।’ इन महिलाओं में से एक, फ़ेकला गोलोवचेंको (जो लगभग पचास साल की थीं) ने लिखा था, ‘अगर मैं पर्याप्त रूप से शिक्षित नहीं हुई, तो मैं अपनी ब्रिगेड को संभाल नहीं पाऊँगी।’ महिलाओं ने लिखा, ‘शिक्षा अब विलास की चीज़ नहीं है। अब यह एक अहम ज़रूरत है, जैसे प्यासे आदमी के लिए पानी ज़रूरी होता है’।28

जॉर्जीवस्की की महिलाओं के शब्द मेक्सिको की ब्रिगेड (ब्रिगेड पैरा लीयर एन लिबर्टाड) की संस्थापक पालोमा सैज़ तेजेरो के शब्दों से मिलते हैं, जिन्होंने कहा था:

पढ़ने वाले लोगों का नज़रिया आलोचनात्मक होता है, वे महान आदर्शों की हिमायत करते हैं। अपने इतिहास को जानने वाले और उसे अपनी विरासत मानने वाले निश्चय ही अपनी जड़ों पर गर्व करेंगे। पढ़ना हमें सामाजिक बनाता है; हमारे अनुभवों और सूचनाओं को समृद्ध करता है। किताबें हमें ख़ुद को और हमारे इतिहास को समझने की दृष्टि देती हैं; किताबें हमारी चेतना को हमारे अतीत और वर्तमान की समझ से आगे बढ़ाती हैं। पढ़ना हमें बेहतर नागरिक बनाता है। किताबों की ही बदौलत हम असंभव पर विश्वास करना, प्रत्यक्ष पर अविश्वास करना, नागरिक के रूप में अपने अधिकारों की मांग करना, और अपने कर्त्तव्यों को पूरा करना सीखते हैं। पढ़ना इंसान के व्यक्तिगत और सामाजिक विकास को प्रभावित करता है; इसके बिना, कोई भी समाज प्रगति नहीं कर सकता।


इंग्रिड नेवेस (ब्राजील/ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान) द्वारा बनाया गया चित्र।

Notes

1 John Reed, Ten Days That Shook the World (New Delhi: LeftWord Books, 2017), 53.

2 Omar Martínez Legorreta, Modernisation and Revolution in Mexico: A Comparative Approach (Tokyo: United Nations University, 1989), 71.

3 James Presley, ‘Mexican Views on Rural Education 1900–1910’, The Americas 20, no. 1 (July 1963): 64–71.

4 Jacqueline Paola Ayala Zamora, La obra educativa de José Vasconcelos [The Educational Work of José Vasconcelos] (Mexico City: Universidad Pedagógica Nacional, 2005).

5 José Vasconcelos, ‘Education in Mexico: Present Day Tendencies’, Bulletin of the Pan American Union 56, no. 3 (January–June 1923): 230–245.

6 Patience Alexandra Schell, Church and State Education in Revolutionary Mexico City (Tuscon: University of Arizona Press, 2003); Lloyd Hughes, Las misiones culturales mexicanas y su programa [Mexican Cultural Missions and their Programme] (Paris: UNESCO, 1950); Martha Eva Rocha Islas, Los rostros de la rebeldía. Veteranas de la Revolución Mexicana, 1910-1939 [The Faces of Rebellion: Women Veterans of the Mexican Revolution, (1910–1939)] (Mexico City: Secretaría de Cultura, 2016); Paco Ignacio Taibo, Bolcheviques: historia narrativa de los orígenes del comunismo en México 1919–1925 [The Bolsheviks: A Narrative History of the Origins of Communism in Mexico 1919–1925] (Mexico City: Joaquín Mortiz, 1986).

7 Louise Schoenhals, ‘Mexico Experiments in Rural and Primary Education, 1921–1930’, Hispanic American Historical Review 44, no. 1 (1 February 1964): 22–43.

8 Elsa Margarita Ramírez Leyva, ‘Mexico Reads: National Program for the Promotion of Reading and the Book’ (paper presented at the World Library and Information Congress: 77th IFLA General Conference and Assembly, San Juan, Puerto Rico, 13–14 August 2011).

9 Ángel Vargas, ‘“Leer te hace mucho más crítico y te da armas para defenderte todos los días”: Paloma Saiz’ [‘Reading Makes You Much More Critical and Gives You Weapons to Defend Yourself Every Day’: Paloma Saiz], La Jornada, 18 July 2024, https://www.jornada.com.mx/2024/07/18/cultura/a04n2cul.

10 ‘“The Single Greatest Educational Effort in Human History”’, Language Magazine (blog), 8 November 2024, https://www.languagemagazine.com/the-single-greatest-educational-effort-in-human-history/.

11 Wang Yianwei and Li Jiyuan, Reform in Literacy Education in China (Geneva: UNESCO, International Bureau of Education, 1990).

12 Glen Peterson, The Power of Words: Literacy and Revolution in South China, 1949–1995 (Vancouver: University of British Columbia Press, 1997), 3.

13इस डोसियर में हमने सोवियत संघ के साक्षरता अभियानों पर विस्तार से चर्चा नहीं की है, हालांकि उनकी उपलब्धि अपने आप में उल्लेखनीय रही थी। सोवियत संघ के साक्षरता के आँकड़े पूरी कहानी नहीं बता सकते, उनसे केवल यह पता चलता है कि सोवियत संघ निरक्षरता को किस तेज़ी से हराने में सक्षम रहा था। सोवियत संघ ने ज़ार साम्राज्य के पुराने ग्रामीण इलाकों में झोपड़ियाँ (इज़बी-चिटल’नी) और खुले मैदानों में टेंट (युर्ट) लगाए, जहां चिकित्सा कर्मियों के साथ साथ और साक्षरता कर्मी नियुक्त किए गए। यह कहानी यहाँ पूरी तरह से बताई नहीं गई है।

14 V. I. Lenin, ‘The New Economic Policy’, Lenin Collected Works, vol. 33, (Moscow: Progress Publishers, 1965), 78.

15 Heidi Ross, with contributions from Jingjing Lou, Lijing Yang, Olga Rybakova, and Phoebe Wakhunga, China Country Study, background paper commissioned for the Education for All Global Monitoring Report 2006: Literacy for Life (2005), UNESCO, 2006/ED/EFA/MRT/PI/85.

16 Peterson, The Power of Words, 85.

17 Priscilla C. Yu, ‘Leaning to One Side: The Impact of the Cold War on Chinese Library Collections’, Libraries and Culture 36, no. 1 (2001): 256; Zhixian Yi, ‘History of Library Developments in China’ (paper presented at the ‘Future Libraries: Infinite Possibilities’, session 164, Library History Special Interest Group, International Federation of Library Associations and Institutions Conference, Singapore, 15–23 August 2013), https://library.ifla.org/id/eprint/143/1/164-yi-en.pdf.

18 Xi Jinping, ‘Full Text of Xi Jinping’s Congratulatory Letter to the First National Conference on Reading’, China Daily, 23 April 2022, https://www.chinadaily.com.cn/a/202204/23/WS6263ad99a310fd2b29e58dbf.html.

19 State Planning Board, Government of Kerala, ‘Population and the Macro Economy’, in Economic Review 2017 (Thiruvananthapuram: Government of Kerala, January 2018), accessed 12 January 2025, https://spb.kerala.gov.in/economic-review/ER2017/web_e/ch11.php?id=1&ch=11.

20 Lawrence Liang and Aditya Gupta, The Public Library Movement in India: Bedrock of Democracy and Freedom (Public Resource, 2024), 54–55.

21मलयालम भाषा में ग्रंथालयम का अर्थ है पुस्तकालय, जबकि वायनशाला का अर्थ है वाचनालय, एक ऐसा स्थान जहाँ लोग बैठकर पढ़ सकते हैं। कुछ वायनशालाएँ छोटे कमरे के बराबर हैं, जहां कुछ अख़बार और पत्रिकाएँ हैं लेकिन बहुत कम किताबें हैं। हालाँकि, कभी-कभी वायनशाला का उपयोग पुस्तकालय के संदर्भ में भी किया जाता है। इस सूची में शामिल सभी लाइब्रेरियों में पुस्तकों के साथ बैठ कर पढ़ने की भी जगह है, जैसा कि केरल के अधिकांश पुस्तकालयों में पाया जाता है। ब्रैकिट में दिए गए नाम पुस्तकालयों के आधिकारिक नाम हैं।

22 P. Mohandas and Manu M. R., eds., People Own Spaces: Emergence of Libraries in Kerala (Kannur: Indian Library Congress, 2024).

23 M. A. Rajeev Kumar, ‘Bag Full of Joy and Wisdom’, The New Sunday Express, 26 June 2022.

24 ‘Red Books Day Celebrated on Each Continent’, Tricontinental: Institute for Social Research, 30 April 2020, https://dev.thetricontinental.org/booklet-red-books-day/.

25 Nitheesh Narayanan, Sudhanva Deshpande, and Vijay Prashad, ‘Red Books Day 2024’, Peoples Democracy, 3 March 2024, https://peoplesdemocracy.in/2024/0303_pd/red-books-day-2024.

26 International Union of Left Publishers, ‘Who We Are’, https://iulp.org/about.

27 For a full list, see ‘Books’, Tricontinental: Institute for Social Research, https://dev.thetricontinental.org/books/.

28 Georgii Nikolaevich Serebrennikov, The Position of Women in the USSR (London: Victor Gollancz, 1937), 81.

वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की खोज

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Tricontinental: Insitute for Social Research logo

दुनिया भर में प्रगतिशील सरकारें ज़रूर सत्ता में आई हैं, लेकिन अब तक उनके पास अपने समाजों को नवउदारवाद के चरमराते ढाँचे से निकालकर उनका नवनिर्माण करने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है। होंडुरास, सेनेगल और श्रीलंका जैसे देश अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की क़र्ज़ और ख़र्चों में कटौती पर आधारित प्रणाली की अपनी आलोचना में बहुत स्पष्ट हैं, मगर इनके पास इससे आगे बढ़ने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है। नवउदारवाद से अलग एक नीति बनाने में असफल होने की वजह इनमें से कई सरकारें वापस नवउदारवादी दलदल में फँस जाती हैं।

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थान भी एक वैकल्पिक व्यवस्था पेश करने में असफल रहे हैं। लेकिन 2000 में एक ऐसी कोशिश हुई थी, जब यूएन ने ग़रीबी और शिक्षा जैसे क्षेत्रों पर ज़ोर देने के लिए आठ मिलेनियम डेवेलप्मेंट गोल्स (एमडीजी) निर्धारित करते हुए विकास के परिणाम आधारित लक्ष्यों को केंद्र में लाने की प्रक्रिया शुरू की।1 एमडीजी के बाद 2015 में सत्रह सतत विकास लक्ष्य (सस्टेनेबल डेवेलप्मेंट गोल्स, एसडीजी) आए जिन्हें 2030 तक पूरा किया जाना है। लेकिन एमडीजी की ही तरह एसडीजी भी बिना किसी सिद्धांत या कार्यक्रम के बहुत सारे लक्ष्यों की एक कोरी रूपरेखा ही प्रदान करते हैं।

इसलिए हैरानी की बात नहीं है कि यूएन की 2023 की रिपोर्ट में लिखा गया कि कई एसडीजी ‘अपने लक्ष्य से काफ़ी हद तक या बहुत ज़्यादा भटक गए’ हैं। रिपोर्ट में इस असफलता की वजह तीसरी आर्थिक महामंदी (2006-2007), कोविड-19 महामारी, यूक्रेन युद्ध और फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार को बताया गया है। 140 लक्ष्यों में से महज़ 12% ही सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं जबकि 50% अपने लक्ष्य से काफ़ी हद तक या बहुत ज़्यादा भटक चुके हैं और 30% में काम उसी जगह रुका हुआ है या पिछड़ गया है।2

वे लोग जो एसडीजी की कार्यप्रणाली के पक्ष में बोलते हैं उनका कहना है कि स्थिति बेहतर करने के लिए फंड में इज़ाफ़ा करना होगा। लेकिन यह सोच इस सच्चाई को नज़रंदाज़ करती है कि पश्चिम के वर्चस्व वाली वित्तीय व्यवस्था की तरफ़ से फंड मिल ही नहीं रहा। मौजूदा स्थिति यह है कि 2030 तक एसडीजी के लक्ष्य पूरा करने के लिए ज़रूरी सालाना धन में हर वर्ष 4 लाख करोड़ डॉलर की कमी रह रही है।3 1970 में वैश्विक उत्तर के देशों ने वादा किया था कि वे अपनी सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) का 0.7% ऑफ़िशियल डेवेलप्मेंट असिस्टेंस (यानी विदेशों की सहायता) के लिए खर्च करेंगे। इस लिहाज़ से यह एसडीजी कार्यक्रमों के लिए दिया जाना चाहिए, लेकिन यह खर्च नहीं किया गया: 2023 में संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) ने अपनी जीएनआई का सिर्फ़ 0.24% विकास सहायता के लिए खर्च किया, फ़्रांस ने महज़ 0.5% और यूनाइटेड किंगडम ने 0.58% (दूसरी तरफ़ 2014 में उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन ने सदस्यों ने वादा किया कि वे अपने सकल घरेलू उत्पाद का 2% युद्धों पर खर्च करेंगे)।4 और तो और, वैश्विक दक्षिण के जो देश अपनी विकास योजनाओं को एसडीजी के मुताबिक़ तैयार करते हैं उन्हें अंतर्राष्ट्रीय सहायता, क़र्ज़, विकास कार्यक्रमों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से क़र्ज़ मिलने में आसानी होनी चाहिए। इसके बावजूद क़र्ज़ मिलना अधिकतर इस बात पर निर्भर करता है कि वे देश ‘मुक्त बाज़ार सुधारों’ को कितना अपनाते हैं (जिसमें खर्चों में कटौती की नीतियाँ, अविनियमन और सरकारी कर्मचारियों की संख्या घटाना शामिल है)। इस तरह ग़रीब देशों को एसडीजी लक्ष्य पूरा करने और विकास कार्यों के लिए निवेश लाने के लिए ‘प्रोत्साहित’ (असल में, मजबूर) किया जाता है कि वे और क़र्ज़ लें या अपनी अर्थव्यवस्थाएं पश्चिमी निवेशकों के लिए खोल दें। और चूँकि एसडीजी के पीछे कोई ठोस सिद्धांत नहीं है और इनकी प्रगति के लिए सिर्फ़ क़र्ज़ लेना ही एकमात्र उपाय है, इसलिए एसडीजी को छलावा की तरह ज़्यादा और असलियत की तरह कम इस्तेमाल किया जाता है। यह वास्तविकता एसडीजी 17.4 के विपरीत है, जो ‘ऋण वित्तपोषण, ऋण राहत और ऋण पुनर्गठन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से समन्वित नीतियों के माध्यम से विकासशील देशों को दीर्घकालिक ऋण स्थिरता प्राप्त करने में सहायता करना’ है।5 दूसरे शब्दों में कहें तो एसडीजी के काम सिर्फ़ धन की कमी की वजह से ही नहीं रुके हुए हैं, जैसा कि इसके विरोधियों का कहना है। बल्कि ये एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था और विकास के कार्यक्रम की वजह से भी रुके हैं जो [वैश्विक] दक्षिण को अविकसित देखना चाहती है और साथ ही इस अवस्था से उबरने के लिए वैश्विक दक्षिण के पास एक वैकल्पिक विकास सिद्धांत और कार्यक्रम भी नहीं है।

एसडीजी की रूपरेखा तैयार होने और यूएन के सभी सदस्यों के इसे अपना लेने के तीन साल बाद 2018 में ही आईएमएफ के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर ताओ चांग ने लिखा कि 40% कम आय वाले देशों पर क़र्ज़ से जुड़ा भारी संकट है – 2015 में एसडीजी पारित होने के समय यह आँकड़ा 26% था – इसलिए वे ऋण नहीं चुका पा रहे हैं।6 यूएन के सतत विकास के लिए वित्तपोषण रिपोर्ट 2024 में दिखाया गया कि सबसे ग़रीब विकासशील देशों पर औसत ऋण का बोझ 2023 में बढ़कर 12% हो गया, ‘जोकि सन् 2000 के बाद का उच्चतम स्तर है’।7

वैश्विक दक्षिण के लिए विकास का एक नया सिद्धांत गढ़े जाने की सख़्त ज़रूरत है। एक ऐसा सिद्धांत जो एसडीजी जैसे प्रयासों के महत्वाकांक्षी उद्देश्यों या आईएमएफ और इसके ऋण-मितव्ययिता के राज के असफल तरीक़ों से आगे जाए। विकास के एक वैज्ञानिक सिद्धांत के बिना कोई भी विकास कार्यक्रम बन ही नहीं सकता।8 यह डोसियर ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान और ग्लोबल साउथ इन्साइट्स ने मिलकर तैयार किया है। यह नवउदारवाद के विकास के असफल सिद्धांतों और वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के नए सिद्धांत को विकसित करने की ज़रूरत से जुड़ी बहस को सामने रखता है। इसके साथ यह वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की शुरुआती रूपरेखा भी पेश करता है। अगले कुछ सालों में विकास के नए सिद्धांत पर इसी तरह के और दस्तावेज़ निकाले जाएंगे जो ख़ास देशों और क्षेत्रों के अध्ययन पर और व्यापक सम्भावनाओं पर आधारित होंगे।


अल्पविकास के सिद्धांत

इससे पहले कि हम विकास के नए सिद्धांत के ख़ास बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा करें यह ज़रूरी है कि हम विकास के दूसरे नज़रियों पर निगाह डालें, जैसे आधुनिकता का सिद्धांत (जो डब्ल्यू. डब्ल्यू. रोस्तोव के विचारों से प्रचलित हुआ), वॉशिंगटन कॅन्सेंसस और निर्भरता के सिद्धांत जैसे अन्य परिवर्तनकामी सिद्धांत तथा इनकी वजह से वामपंथ में उभरे विमर्श।

आधुनिकता का सिद्धांत

अमेरिका के दो राष्ट्रपतियों, लिंडन जॉनसन और जॉन एफ़. केनेडी के समाजवाद और राष्ट्रीय स्वतंत्रता विरोधी अभियानों में सलाहकार रहे अमेरिकी अर्थशास्त्री डब्ल्यू. डब्ल्यू. रोस्तोव ने 1960 में द स्टेजेस ऑफ़ इकोनॉमिक ग्रोथ: ए नॉन-कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो (आर्थिक विकास के चरण: एक ग़ैर–कम्युनिस्ट घोषणापत्र) नामक एक किताब लिखी। इसके शीर्षक से ही इसकी मंशा ज़ाहिर हो जाती है। रोस्तोव वैचारिक रूप से पक्के कम्युनिस्ट विरोधी और शीत युद्ध समर्थक थे। उन्होंने विकास का एक सार्वभौमिक और एकरेखीय प्रक्रिया का सिद्धांत पेश किया जो तथाकथित ‘पारम्परिक समाज’ को ‘उड़ान की पूर्वावस्था’ (preconditions for take-off) तक ले जाए, वहाँ से ‘उड़ान की अवस्था’ (take-off) तक, फिर ‘परिपक्वता की ओर अग्रसर अवस्था’ (drive to maturity) तक और अंतत: ‘जन उपभोग की अवस्था’ (age of mass consumption) तक।9 उनका मत था कि धर्मनिरपेक्ष शिक्षा एक ऐसे उद्यमी वर्ग को जन्म देगी जो तर्कशून्य परम्पराओं की बजाय ‘तर्कसंगत’ आर्थिक प्रोत्साहनों को तरजीह देगा। उनका मत था कि इससे निवेश की दरें ऊँची होंगी तथा आर्थिक विविधता बढ़ेगी जिसकी परिणति काफ़ी हद तक एक ऐसे उपभोक्तावादी समाज में होगी जिसे वैश्विक उत्तर में पहले ही हासिल किया जा चुका है।

रोस्तोव का सिद्धांत द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की आधुनिकता के विचारों का एक मिलाजुला नमूना था जो सेंट लशिया के अर्थशास्त्री डब्ल्यू. आर्थर लुईस जैसे लोगों का अनुसरण करता है। यह सिद्धांत कहता है कि आर्थिक विकास तभी होगा जब बेशी श्रम/श्रमिक ग्रामीण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से हटकर मुख्यतः शहरी और औद्योगिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में आ जाएँगे।10 रोस्तोव और आधुनिकता के अन्य सिद्धांतकारों ने विकास को पूँजीवाद की ओर बढ़ने की प्रक्रिया के रूप में देखा। उन्होंने यह भारी ग़लती अपने अनैतिहासिक सोच की वजह से की जो यह मानकर चलती है कि पाँच सौ वर्षों के उपनिवेशवादी शासन के बाद वैश्विक दक्षिण उसी बिंदु से शुरुआत कर रहा था जहाँ औद्योगिक क्रांति से पहले का यूरोप खड़ा था। उन्होंने अल्पविकास को एक मौलिक घटना समझ लिया। जबकि असल में वैश्विक दक्षिण में कोई ‘पारम्परिक समाज’ जैसी चीज़ थी ही नहीं। बल्कि वहाँ एक सर्वथा नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था थी जो उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ने जबरन और हिंसक तरीक़े से लागू की थी। और तो और, औद्योगिक क्रांति से पहले के यूरोप से उलट वैश्विक दक्षिण एक ऐसी दुनिया में जी रहा था जहाँ वैश्विक उत्तर का तकनीक, व्यापार और वित्तीय व्यवस्था पर एकाधिकार था। इस दुनिया में एक नवउपनिवेशवादी आर्थिक और राजनीतिक ढाँचा भी पहले से ही काम कर रहा था।

रोस्तोव की यह सोच उनके पिछले शोध जैसे ऐन अमेरिकन पॉलिटिक्स इन एशिया (1955, सहलेखक रिचर्ड डब्ल्यू. हैच) पर आधारित है जिसमें शीत युद्ध के संदर्भ में आधुनिकता शीत युद्ध के संदर्भ पर ज़्यादा खुलकर चर्चा मिलती है। ऐन अमेरिकन पॉलिटिक्स में रोस्तोव लिखते हैं कि ‘संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर से छेड़े गए सम्पूर्ण युद्ध का विकल्प शांति नहीं है। जब तक मॉस्को और पेकिंग [sic] में एक अलग भावना और अलग नीति नहीं लागू होगी तब तक अमेरिका के सामने सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक रणनीतियों का प्रयोग करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।’11 दूसरे शब्दों में कहें तो अमेरिका के लिए ज़रूरी है कि वह ‘सम्पूर्ण युद्ध’ (जिसमें विजय के लिए हर सम्भव प्रयास और बलिदान दे दिया जाए) सहित अपनी पूरी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल सोवियत यूनियन और चीन के जनवादी गणराज्य से कम्युनिज़्म को उखाड़ फेंकने के लिए करे। रोस्तोव जैसे सिद्धांतकारों के लिए साम्यवाद के ख़िलाफ़ युद्ध पैदा करना ज़्यादा ज़रूरी था बनिस्बत यह समझना कि इससे बहुमूल्य मानव श्रम ज़ाया होगा। कोई हैरानी नहीं कि 60 के दशक में राजनीति वैज्ञानिक सैम्यूअल हंटिंगटन ने ‘सैन्य आधुनिकता’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इसमें तहत दो बातें कही गईं, पहली कि तीसरी दुनिया के देशों में ‘सामाजिक आधुनिकता’ हासिल करने का सबसे अच्छा तरीक़ा होगा इन देशों का सैन्यीकरण किया जाना, और दूसरी, इसका नतीजा यह हुआ कि कम्युनिज़्म से लड़ने और अमेरिका जैसे ‘आधुनिक समाज’ के निर्माण के लिए सैन्य शासन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।12

50 और 60 के दशकों में आईएमएफ और विश्व बैंक के लिए विकास के आदर्श की परिभाषा आधुनिकता का सिद्धांत बन गया। जब यह सिद्धांत तीसरी दुनिया को ‘उड़ान की अवस्था’ में पहुँचाने में असफल हो गया तब भी सत्ता के गलियारों में इसकी साख कम नहीं हुई। यूएस डॉलर के स्थिर और अपेक्षाकृत कम ब्याज दर पर निर्भर देशों पर जब तीसरी दुनिया के ऋण संकट की मार पड़ी तब इसका प्रभाव कम हुआ। जब 1979 में यूएस फ़ेडरल रिज़र्व ने जल्दी-जल्दी ब्याज दर बढ़ाई तो विकासशील देशों को ऋण मिलने में मुश्किल हुई और इससे कई ख़तरनाक आर्थिक परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं (इसमें 1982 में मेक्सिको का दिवालिया हो जाना भी शामिल है)।13 आधुनिकता का सिद्धांत पेसो (मेक्सिको की मुद्रा) के साथ ढह गया और आईएमएफ तथा विश्व बैंक का काम आगे बढ़ाने के लिए एक नए सिद्धांत का जन्म हुआ।

द वॉशिंगटन कॅन्सेंसस

नब्बे के दशक में एक ब्रिटिश अर्थशास्त्री और पीटर्सन इन्स्टिट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में सीनियर फ़ेलो जॉन विल्यम्सन ने सरकारी उद्यमों (state-owned enterprises, SOE) के निजीकरण, सार्वजनिक उत्पादों को कॅमोडिटी में बदलने और पूंजी अकाउंट तथा व्यापार के उदारीकरण को परिभाषित करने के लिए वॉशिंगटन कॅन्सेंसस शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल किया।14 अमेरिकी ट्रेज़री के हिसाब से IMF और विश्व बैंक की इस नीति को अपना सैद्धांतिक आधार नवशास्त्रीय अर्थशास्त्र और फ़्रीड्रिक हाइक जैसे विचारकों तथा नवउदारवादी मांट पेलेरीं सोसाइटी से जुड़े हुए लोगों में मिला।15 वॉशिंगटन कॅन्सेंसस शायद सबसे ज़्यादा तथाकथित संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम (Structural Adjustment Programmes, SAP) में अपनी भूमिका के लिए मशहूर है जिसकी वजह से अफ्रीकी महाद्वीप ने अपना एक दशक खो दिया।16

पिछले कई दशकों से आईएमएफ उपनिवेशवाद के चंगुल से आज़ाद हुए देशों पर मितव्ययिता (जिसे वे ‘संतुलित बजट’ एजेंडा कहते हैं), निजीकरण और व्यापार के उदारीकरण की नीतियों को थोपता आ रहा है। इसने वैश्विक दक्षिण के देशों से उनकी अपनी विकास प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और अपेक्षाकृत नए उद्योगों को बचाने की क्षमता छीन ली। इसकी वजह से जो असंतुलन पैदा हुआ उससे निपटने के लिए आईएमएफ ने लगातार विकासशील देशों को निजी पूंजी बाज़ारों से ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित किया जिससे वे क़र्ज़ के जाल में फँसते चले गए। इस बीच वैश्विक दक्षिण के लिए विश्व बैंक के एजेंडे में बड़े स्तर पर औद्योगीकरण किए जाने का सुझाव कभी आया ही नहीं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के शुरुआती दौर में यही बात स्पष्ट दिखती है जब विश्व बैंक ने इन देशों को कच्चा माल निर्यात करने के अपने ‘तुलनात्मक सुलाभ’ (Comparative Advantage) काम से ही जुड़े रहने की सलाह दी। 90 के दशक तक आते-आते विश्व बैंक ‘वित्तीय गहनता’ को बढ़ावा देने लगा, यह और कुछ नहीं बल्कि विकास के लिए संसाधन जुटाने के रामबाण के रूप में वित्तीय विनियमन को बढ़ावा देना है।17 हाल के समय में विश्व बैंक ने अपना ध्यान सेवा क्षेत्र में विकास और लघु तथा मध्यम उद्योगों (SMEs) में निवेश को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित कर दिया है, दोनों का ही मतलब है कि राष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर ऋण का जाल कसता जाएगा। सेवा क्षेत्र में अधिकतर बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशनों (MNCs) का वर्चस्व होता है जिनकी आधारभूत संरचना ही इजारेदारी पर टिकी होती है। इसकी वजह से जो राष्ट्र अपने विकास का आधार सेवा क्षेत्र को बनाएँगे वे हमेशा ही वैश्विक उत्तर के बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशनों के भरोसे रह जाएँगे। SMEs के पास बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशनों का मुक़ाबला करने लायक संसाधन (इसमें सरकारी सब्सिडी भी शामिल है) नहीं होते और न ही वे बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशनों जितने बड़े होते हैं। इस कारण प्रभुत्वशाली बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशन उनको निगल जाते हैं। वित्तीय उदारीकरण और SMEs को बढ़ावा देने की वजह से देश ऐसी स्थिति में फँस जाते हैं जिसे समीर अमीन ने सामान्यीकृत इजारेदारी पूँजी (generalised monopoly capital) का नाम दिया, जो ऊपर की ओर जाने वाले (कच्चा माल, तकनीक और पूँजी) तथा नीचे की ओर जाने वाले (वितरण, मार्केटिंग और उपभोक्ता तक पहुँच) दोनों नेटवर्कों पर नियंत्रण रखती है।18

वॉशिंगटन कॅन्सेंसस का एक प्रमुख नतीजा यह रहा कि आर्थिक प्रगति और संरचनात्मक परिवर्तन के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की ताक़त पर आँख मूँदकर भरोसा किया जाने लगा। FDI से जुड़ी इस सोच ने वैश्विक दक्षिण के देशों को एक संकीर्ण उद्देश्य तक सीमित कर दिया जिसमें उन्होंने अपने श्रम और प्राकृतिक संसाधनों के बाज़ार को पश्चिमी इजारेदारों के लिए खोल दिया, जिसकी वजह से उन्होंने अपने एजेंडे को अपने लोगों की विकास की आकांक्षाओं से जोड़ने की बजाय क़र्ज़ देने वालों की ब्याज़खोर ज़रूरतों से जोड़ दिया। जबकि इस बात के प्रमाण कम ही हैं कि FDI के आने से बहुत बदलाव आते हैं: इस तरह के निवेश से ऐसा सम्पूर्ण विकास नहीं होता जो क़र्ज़ मुक्ति और राष्ट्रीय संप्रभुता के रास्ते खोल सके, बल्कि यह अर्थव्यवस्था के निरर्थक क्षेत्रों को बढ़ावा देता है। FDI के निम्न विशेषताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए:

  1. FDI प्रवाह में गिरावट आ रही है। 2007 में FDI अपने चरम पर पहुँचा। इसी साल प्रमुख पूँजीवादी देशों को तीसरी आर्थिक महामंदी ने अपने चंगुल में ले लिया और तब से FDI में लगातार गिरावट आई है।19 संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) के मुताबिक़ FDI और योजनाओं के लिए वित्तीय निवेश (दीर्घकालिक इन्फ़्रास्ट्रक्चर या उद्योगों के लिए निवेश) दोनों में निरंतर गिरावट आई है। मसलन 2022 से 2023 के बीच विकासशील देशों में FDI में 7% की गिरावट आई।20
  2. FDI का प्रवाह अनुत्पादक रहा है। पिछले कुछ सालों में UNCTAD के सालाना निवेश आँकड़ों में FDI के चरित्र में आए बदलाव दिखायी देते हैं। पहले यह मैन्युफ़ैक्चरिंग और औद्योगिक क्षेत्र में केंद्रित होता था और साथ ही साथ प्राकृतिक संसाधनों के खनन पर भी। लेकिन अब FDI काफ़ी हद तक वित्तीय और सेवा क्षेत्र में जा रहा है जहाँ यह ऐसे सम्पूर्ण या बदलाव लाने वाले विकास को जन्म नहीं देता जो उपनिवेशवादी काल के अल्पविकास से उबार पाए।
  3. FDI प्रगति या निवेश को बढ़ावा नहीं देता। UNCTAD की 1999 की रिपोर्ट के मुताबिक़ 90 के दशक में विकासशील देशों में बड़े स्तर पर हुए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ने निवेश के पैटर्न पर बहुत कम प्रभाव डाला।21 UNCTAD के हाल के अध्ययनों में साफ़ दिखता है कि तीसरे आर्थिक महाअवसाद के बाद से FDI प्रवाह और GDP संवृद्धि अलग-अलग रास्ते अपना रहे हैं।22 इसका मतलब है कि आर्थिक विकास FDI पर निर्भर नहीं करता है।

वॉशिंगटन कॅन्सेंसस ने उपनिवेशवादी दौर के अल्पविकास के पैटर्न को ही फिर से लागू कर दिया है जिसकी वजह से क़र्ज़ का बोझ इतना बढ़ गया है जो चुकाया नहीं जा पा रहा। निवेशक क़र्ज़ लेने वाले देशों की आर्थिक दशा को नज़रंदाज़ करते हुए बकाया और ब्याज वसूली पर आमादा हैं। क़र्ज़ का यह कुचक्र वह सारी आय निगल जाता है जो स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा और उत्पादक उद्योगों तथा इन्फ़्रास्ट्रक्चर के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था। देश बस क़र्ज़ लेते हैं और उसमें डूबते चले जाते हैं। जब वो मौजूदा क़र्ज़ चुका नहीं पाते तो इसे चुकाने के लिए और क़र्ज़ लेते हैं और इस तरह एक कुचक्र चलता रहता है।23 2003 से 2007 तक आईएमएफ के प्रमुख अर्थशास्त्री रहे रघुराम राजन ने अपनी किताब फॉल्ट लाइन्स (2010) में लिखा, आईएमएफ की नीतियाँ ‘वित्तीय उपनिवेशवाद का एक नया रूप’ है।24

निर्भरता सिद्धांत

निर्भरता सिद्धांत आधुनिकता सिद्धांत के विरोध में विकसित हुआ और इसका एक लम्बा तथा प्रभुत्वशाली इतिहास है। इसकी जड़ें लैटिन अमेरिका के संरचनावाद और राउल प्रीबिश जैसे दिग्गजों तथा अन्य निर्भरता सिद्धांतकारों (dependencistas) के काम में देखी जा सकती हैं, जिनका मत था कि दुनिया की पूँजीवादी व्यवस्था दो स्तरों से बनी है: पहला, उन देशों का छोटा सघन समूह जिनका दुनिया की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर वर्चस्व है, तथा दूसरा स्तर, हाशिए के देशों का बड़ा समूह जो इस सत्ता से छूट पाने में असमर्थ हैं। जैसा कि निर्भरता सिद्धांतकारों ने दिखाया, औद्योगिक क्षमता वाले देशों के छोटे समूह और हाशिए पर धकेल दिए गए वे देश जो औद्योगिक रूप से सक्षम नहीं हैं, इनके बीच व्यापार की ख़राब शर्तों की वजह से हाशिए के देशों में अल्पविकास और अस्थिरता पैदा हुई।25 हाशिए के देश ज़्यादातर ऐसी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं जो प्रासेस्ड नहीं होतीं, जिन्हें कम दामों पर ख़रीदा जाता है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ज़रिए औद्योगिक रूप से विकसित देशों को बेचा जाता है, जो अपनी औद्योगिक क्षमता से इसे पक्के माल में तब्दील करते हैं, फिर यही महँगी वस्तुएँ वापस हाशिए के देशों में बेची जाती हैं। इस छोटे विकसित समूह और हाशिए के देशों के बीच जिन शर्तों पर व्यापार होता है उसने इस विकसित देशों के समूह में पूँजीवादी संचय का होना संभव बनाया। इसका इस्तेमाल नए उत्पादों और तकनीक के आविष्कार के लिए किया गया। इसी वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के सहारे औद्योगिक क्षमता वाले देशों के गुट पूरी व्यवस्था पर नियंत्रण बनाए रखते हैं। इसे आंद्रे गंडर फ़्रैंक ने ‘अल्पविकास का विकास’ कहा है, एक निराशाजनक वास्तविकता का नकारात्मक विश्लेषण।26

निर्भरता सिद्धांत ने बिलकुल साफ़ कर दिया कि यह निराशाजनक वास्तविकता तीसरी दुनिया की संस्कृतियों से नहीं उपजी है बल्कि उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी दौर में जो नवउपनिवेशवादी व्यवस्था स्थापित हुई उससे निकली है। इसीलिए 1972 में प्रकाशित वॉल्टर रॉड्नी की क्लासिक किताब का शीर्षक है हाऊ यूरोप अंडरडेवल्पड अफ्रीका [यूरोप ने कैसे अफ़्रीका को अल्पविकसित बनाया], जिसमें यूरोपीय उपनिवेशवाद पर ख़ास ध्यान दिया गया।27 जैसा कि गंडर फ़्रैंक ने समझाया ‘अल्पविकास कोई मौलिक परिस्थिति नहीं है, यह विकसित महानगरीय पूँजीवाद द्वारा पिछड़े क्षेत्रों पर आर्थिक क़ब्ज़े और नियंत्रण से पैदा होती है’।28

इस सिद्धांत से निकली नकारात्मक्ता से ही समीर अमीन के इस मत को विकसित किया कि हाशिए के देशों को औद्योगिक रूप से विकसित देशों के समूह से ‘अलग’ होना होगा। अमीन ने 1987 में लिखा कि इस अलग होने का मतलब ‘राष्ट्रीय विकास की रणनीति को “भूमंडलीकरण” की अनिवार्यताओं के आगे समर्पित कर देने की अस्वीकृति’ है।29 चूँकि इस ‘अस्वीकृति’ की जड़ें राजनीतिक ताक़त में हैं और आर्थिक नीति में उतनी नहीं इसलिए विकासशील दुनिया के देशों के पास इतनी राजनीतिक शक्ति होनी चाहिए कि वे अपनी राष्ट्रीय विकास रणनीति ख़ुद तैयार कर सकें और वैश्विक मूल्य चेन (जिसे बेंजामिन सेल्वन ने ‘वैश्विक ग़रीबी चेन’ का सटीक नाम दिया) की दासता से मुक्त हो सकें या ‘अलग’ हो सकें।30

निर्भरता सिद्धांत की आलोचनाएँ

निर्भरता सिद्धांत विकास के एक नए सिद्धांत की ज़रूरत का तो बहुत सटीक विश्लेषण करता है लेकिन ख़ुद ऐसा कोई नया सिद्धांत पेश नहीं करता। दूसरे शब्दों में निर्भरता सिद्धांत सिर्फ़ नवउपनिवेशवादी व्यवस्था की आलोचना और राष्ट्रीय विकास रणनीति के लिए ज़मीन तैयार करने के लिए अलग होने की ज़रूरत तक ही ख़ुद को सीमित कर लेता है, लेकिन विचार की यह परंपरा – जो कि हमारी परंपरा भी है – कोई ऐसी रणनीति या योजना सामने नहीं रखती जो ये बदलाव ला सके।31

प्रगतिशील और मार्क्सवादी आर्थिक सोच रखने वालों के बीच निर्भरता सिद्धांत की आलोचना तीन प्रमुख विचारों पर देखी जा सकती है।

पहला, कुछ परिवर्तकामी अर्थशास्त्रियों का मानना था कि एशियन टाइगर्स कहे जाने वाले चार एशियाई देशों (हांगकांग, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और ताइवान) के उत्थान ने निर्भरता सिद्धांत के औचित्य को ही नकार दिया है और यह दावा भी किया कि व्यावहारिक मिश्रित अर्थव्यवस्था के साथ राज्य के समन्वित हस्तक्षेप द्वारा पूँजीवादी अल्पविकास की जड़ता से उबरा जा सकता है। एशियन टाइगर्स की परिघटना में दिलचस्पी ने विकासात्मक राज्य और औद्योगिक नीति पर एक नए विचार के पूरे साहित्य की ही शुरुआत कर दी। इस संदर्भ में बुनियादी किताबें हैं जॉनसन कामर की MITI and the Japanese Miracle (1982) और ऐलिस ऐम्स्डन की Asia’s Next Giant (1989)।32 विश्व बैंक ने भी इससे जुड़ी The East Asian Miracle (1993) नाम से एक लंबी रिपोर्ट निकाली, हालाँकि इसके विश्लेषण में राज्य की भूमिका को कमतर करके दिखाए जाने का प्रयास किया गया।33 इसमें कोई शक़ नहीं कि हा-जून छांग और मारीयाना मज़्ज़ुकटो जैसे हस्तियों ने भी वैश्विक दक्षिण में सेंटर-लेफ़्ट सरकारों के लिए लोगों को प्रभावित किया है।34 फिर भी इनके विचार पुराने उदाहरणों पर आधारित एक शासन चलने की एक रणनीति भर का प्रस्ताव देते हैं और विकास का एक नया सिद्धांत या पूरे वैश्विक दक्षिण की विभिन्न वास्तविकताओं को अपने विश्लेषण में जगह देने में असफल रहे। जहाँ चार एशियन टाइगर्स शीत युद्ध के दौरान अमेरिका की सुरक्षा में विकसित हुए, वहीं अफ़्रीकी, लैटिन अमेरिकी या अन्य एशियाई देशों को नवउदारवादी हस्तक्षेपों या साम्राज्यवादी और पूँजीवादी दायरों में अपना विकास करना पड़ा।35

दूसरा, ब्रिटिश विचारक बिल वॉरन जैसे कुछ मार्क्सवादी सक्रिय रूप से साम्राज्यवाद के तथाकथित प्रगतिशाली पहलुओं के पक्ष में मत रखते रहे। अपनी किताब Imperialism: Pioneer of Capitalism (1980) में वॉरन ने लिखा कि वैश्विक दक्षिण के पिछड़े देशों के आधुनिकीकरण में साम्राज्यवाद एक परिवर्तनकारी ऊर्जा की भूमिका निभा सकता है क्योंकि उनके मुताबिक़ यह औद्योगीकरण और लोकतंत्र दोनों की नींव रखता है।36 वॉरन ने जो साम्राज्यवाद को कथित वामपंथी जामा पहनाने की कोशिश की उसकी वैश्विक दक्षिण के मार्क्सवादी-लेनिनवादियों ने बहुत आलोचना की क्योंकि वे जानते थे कि कैपिटल इन मोशन (पूँजी की अंतर्राष्ट्रीय आवाजाही) के रूप में साम्राज्यवाद न सिर्फ़ [वैश्विक] दक्षिण की उत्पादन शक्तियों के विकास में विफल रहा है: साथ ही साथ इसने इनकी अर्थव्यवस्थाओं को बेहद अल्पविकसित रखा, इनके संसाधनों को लूटा और बर्बर युद्धों, शोषण और उत्पादन की स्थानीय व्यवस्थाओं को बर्बाद करके इन देशों को दूसरों पर निर्भर बना दिया।37 वॉरन का सिद्धांत नवक्लासिकीय आधुनिकता सिद्धांत के ही एक रूप के अलावा और कुछ नहीं था जो मार्क्सवादी शब्दों में लिखा गया था।

तीसरा, 70 और 80 के दशकों में राजनीतिक मार्क्सवादी कहे जाने वाले कुछ मार्क्सवादियों ने निर्भरता सिद्धांतकारों पर ‘नव-स्मिथवादी मार्क्सवादी’ होने का आरोप लगाया कि इन्होंने विकसित देशों के छोटे समूह और हाशिए के देशों के व्यापारिक संबंधों पर अत्यधिक ध्यान दिया जबकि हाशिए के देशों के आंतरिक सामाजिक और राजनीतिक संबंधों को नज़रंदाज़ कर दिया।38 इसके बावजूद नव-स्मिथवादियों और राजनीतिक मार्क्सवादियों के बीच समझौते की कुछ कसर रहती है, क्योंकि कुछ सिद्धांतकर्ताओं ने साम्राज्यवादी रिश्तों जैसे बाहरी कारणों को वर्गीय संबंधों जैसे आंतरिक सामाजिक-राजनीतिक पारस्परिक व्यवहारों को आपस में जोड़ने के प्रयास किए।

श्रीलंकाई मार्क्सवादी अर्थशास्त्री एस. बी. डी. डी. सिल्वा ने अपनी बेहतरीन किताब The Political Economy of Underdevelopment (1982) में कहा कि साम्राज्यवाद ने व्यापारिक पूँजी को विकसित और मज़बूत किया जबकि औद्योगिक पूँजी को कमज़ोर।39 डी सिल्वा का मानना था कि इस बात पर बहस करने की बजाय कि हाशिए के देश पूँजीवादी हो चुके हैं या नहीं (निर्भरता सिद्धांतकारों का मानना था कि ऐसा हो चुका जबकि रॉबर्ट ब्रेनर जैसे राजनीतिक मार्क्सवादी ऐसा नहीं मानते थे) से बेहतर होगा यह अध्ययन करना कि साम्राज्यवाद ने कैसे आंतरिक वर्गीय संरचना के ज़रिए उन तत्वों को बढ़ावा दिया जो औद्योगीकरण के ख़िलाफ़ थे। डी सिल्वा के अनुसार अल्पविकास एक ऐसे वर्गीय और आर्थिक ढाँचे की अनुपस्थिति से जुड़ा हुआ था जो न सिर्फ़ धन के स्तर पर पूँजी संचय करता है बल्कि उत्पादक स्थाई संपत्ति के स्तर पर भी।

इसी तरह पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया के समाजवादी धड़ों के विचारकों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में नवउपनिवेशवादी निर्भरता और वैश्विक दक्षिण की अंदरूनी वर्गीय संरचना की भूमिका का अपना अलग विश्लेषण विकसित किया। उदाहरण के लिए सोवियत राजनीतिक अर्थशास्त्री सेर्गे ट्यूलपनोव का मत था कि राज्य को उन घरेलू शक्तियों को अलग-थलग करना होगा जो औद्योगीकरण में रुकावट पैदा कर रही हैं (ज़मींदार और व्यापारिक पूँजी) तथा एक मज़बूत सार्वजनिक क्षेत्र खड़ा करना होगा, साथ ही निजी क्षेत्र में राष्ट्रीय बुर्जुआ की प्रगतिशील भावी संभावनाओं को प्रेरित करना चाहिए।40 इस ‘ग़ैर-पूँजीवादी विकास’ की रणनीति के तहत यह ज़रूरी है कि राष्ट्रीय-लोकतांत्रिक दलों को नेतृत्व का भार उठाना होगा और बुर्जुआ के हाथों में राजनीतिक सत्ता नहीं देनी होगी।

विकास का एक मार्क्सवादी सिद्धांत

पिछले पचास सालों में, वॉशिंगटन कॅन्सेंसस जब अपने चरम पर था, अधिकतर ग़रीब देश ऋण और ख़र्चों में कटौती के कुचक्र, ग़रीबी की ऊँची दर और गहरी निराशा में डूब गए। लेकिन चीन 1949 की क्रांति के बाद से ‘अल्पविकास के विकास’ के दौर से बाहर निकल पाया है और ग़रीबी की ऊँची दर को कम करके एक ऐसे समाज की ओर बढ़ पाया है जिसने अति-ग़रीबी को ख़त्म कर दिया है और एक बड़ी आर्थिक ताक़त के रूप में उभरा है।41 चीन और बाक़ी देशों में अंतर यह है कि यहाँ राजनीतिक सत्ता का संतुलन पूँजीपति वर्ग (ख़ासतौर से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों) के हाथों में नहीं है और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलाई जा रही चीनी सरकार ने योजना की एक प्रक्रिया विकसित की है जो द्वंद्वात्मक संतुलन बनाते हुए संसाधनों का वितरण विकास और सामाजिक बेहतरी दोनों के लिए करती है। किसी भी ठोस और व्यावहारिक विकास के मार्क्सवादी सिद्धांत को चीन की सफलताओं को समझना होगा। इस संदर्भ में दो बिंदुओं को उजागर करना ज़रूरी है।

पहला, हालाँकि चीन में पूँजीवादी वर्ग है लेकिन राजनीतिक सत्ता पर इसका प्रभुत्व स्थापित नहीं होने दिया गया है। वैश्विक उत्तर के समाजों में जो पारस्परिक संबंध मौजूद हैं – जहाँ राज्य और अन्य संस्थान निजी पूँजी के इशारों पर चलते हैं – वे चीन में नहीं हैं, यहाँ ये संस्थान राजनीतिक सत्ता द्वारा संचालित हैं जो समाजवाद के प्रति प्रतिबद्ध है। इसके साथ ही चीन में एक बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र है जिसमें भूमि, वित्त, व्यापार और बड़े उद्योग शामिल हैं। यह क्षेत्र अपने आप में इतना शक्तिशाली है कि चीन में आर्थिक निर्णयों पर मूल्य के पूँजीवादी नियम को हावी नहीं होने देता। इसलिए चीन के प्रयोग आधुनिकता के सिद्धांत के साँचे में नहीं ढलते।

दूसरा, चूँकि राजनीतिक सत्ता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों में है इसलिए यहाँ राजनीतिक निर्णय दूसरे देशों या इकाइयों के हितों के आधार पर नहीं होते (जैसा कि वॉशिंगटन कॅन्सेंसस में दिखा)। जैसा कि अमीन ने कहा कि चीन ख़ुद को ‘अलग’ कर पाने में सफल रहा जिससे यह राष्ट्रीय विकास की रणनीति अपनी विकासात्मक नीति के आधार पर व्याख्यायित कर पाया।42 यह हासिल किया गया देश की ज़मीन और वित्त पर सार्वजनिक क्षेत्र के नियंत्रण द्वारा जिससे राज्य व्यापार, निवेश और वैश्विक मूल्य की श्रृंखला के ज़रिए विश्व की अर्थव्यवस्था से जुड़ा रहा, इससे श्रम का समाजीकरण हुए (जो मार्क्स की समाजवाद की राजनीतिक दृष्टि का एक अहम हिस्सा है)। इससे चीन निर्भरता सिद्धांत की नकारात्मकता से निकल पाया और दुनिया का एक बड़ा व्यापारिक देश बन पाया।

आधुनिकता और निर्भरता दोनों ही सिद्धांत चीन के उत्थान को पूरी तरह नहीं समझा पाते। चीन में एक विकासात्मक देश के कुछ पहलू दिखाई देते हैं जैसे सक्रिय औद्योगिक नीतियाँ, लेकिन इनके आधार पर इसके तीव्र विकास की सैद्धांतिक व्याख्या हमें नहीं मिल पाती। चीन का सुधार और खुलापन (1978) एक पुनरावृत्तीय और प्रायोगिक प्रक्रिया थी, जो हमेशा स्थानीय परिस्थितियों के महत्व पर जोर देती थी। हालाँकि यह अब तक एक विकसित अर्थव्यवस्था और समाज के रूप में स्थापित नहीं हुआ है लेकिन जैसा कि एनफ़ू छंग और छान त्ज़ाय का मत है चीन ने ‘समृद्धि की तरफ़ लगातार बढ़ते रहने की स्थिति’ को हासिल कर लिया है, यह हाशिए के देशों से निकलकर वैश्विक व्यवस्था के ‘अर्द्ध-केंद्रीय’ स्थान तक आ चुका है।43

इस स्थिति में भी चीन अति-ग़रीबी को ख़त्म करने में सफल हो पाया है और विज्ञान तथा तकनीक के क्षेत्र में बहुत अहम प्रगति कर पाया है। इसके पीछे क्या ख़ास वजह हैं? हमारे विकास के नए सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण घटक और शुरुआती बिंदु यह होना चाहिए कि चीन के आर्थिक मॉडल में निवेश और जीडीपी का अनुपात निरंतर ऊँचा रहा है जिससे इन्फ़्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक क्षमता के रूप में बहुत अधिक स्थाई पूँजी का निर्माण हुआ।

ग्लोबल साउथ इन्साइट्स (जीएसआई) के नए शोध से पता चलता है कि जीडीपी वृद्धि की उच्च मात्रा और स्थाई पूंजी निर्माण की उच्च हिस्सेदारी के बीच एक अति-उच्च सहसंबंध है, जिसे हम संक्षेप में शुद्ध स्थाई निवेश (एनएफआई) कहते हैं। शुद्ध स्थाई निवेश का मतलब है नया स्थाई पूँजी निवेश (मसलन किसी अवधि के दौरान मशीनों, इन्फ़्रास्ट्रक्चर इत्यादि के निर्माण पर हुए कुल खर्च में से इस दौरान ख़राब अथवा बेकार हुए मौजूदा पूँजी स्टॉक को घटाकर सकल स्थाई निर्माण की गणना की जाती है)। संक्षेप में, जीडीपी में शुद्ध स्थाई निवेश की हिस्सेदारी जितनी ज़्यादा रहेगी विकास की दर भी उतनी ऊँची रहेगी। यह उच्च सहसंबंध उन 50 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर लागू होती है जो दुनिया की जीडीपी का 88% बनाते हैं। यह वैश्विक दक्षिण की 50 से ज़्यादा छोटी अर्थव्यवस्थाओं पर भी लागू होता है।44 मतलब यह कि सिर्फ़ वित्तीय निवेश का आना ही काफ़ी नहीं है बल्कि जीडीपी के विकास के लिए ठोस परिसंपत्तियों में निवेश भी ज़रूरी है।

जीडीपी आर्थिक विकास मापने का एक अपूर्ण परिमाण है क्योंकि यह पर्यावरण के नुक़सान और सामाजिक विकास के तत्वों जैसे ‘बाह्य कारकों’ को नहीं गिनता। इसका मतलब यह नहीं कि जीडीपी ग़ैर-ज़रूरी है। ग्लोबल साउथ इन्साइट्स के शोध ने प्रति व्यक्ति जीडीपी और जीवन प्रत्याशा के बीच एक अहम और मज़बूत सहसंबंध पाया है। यह सहसंबंध 90 के दशक से लगातार बढ़ा है। इसके साथ ही प्रति व्यक्ति जीडीपी में बढ़ोत्तरी और कम आय वाले वर्गों के लोगों की जीवन प्रत्याशा में अनुपातिक वृद्धि में भी सहसंबंध है। दूसरे शब्दों में, जीडीपी के विकास से वैश्विक दक्षिण के लोगों के जीवन में बहुत वास्तविक भौतिक बदलाव आ सकते हैं। दूसरी ओर, जीडीपी विकास में ठहराव, जैसा कि तीसरी दुनिया के देशों में ऋण संकट और नवउदारवाद की शुरुआत की वजह से हुआ, दशकों तक ऐसा समय ला सकता है जब मानव विकास के संदर्भ में बहुत कम या नगण्य प्रगति होती है। ज़ाहिर है सामाजिक सुरक्षा की भी एक अहम भूमिका है: इस संदर्भ में कई बेहतरीन उदाहरण हमारे सामने हैं जैसे समाजवादी क्यूबा जिसने अमेरिका द्वारा छ: दशक के प्रतिबंध की वजह से तीव्र गति से आर्थिक प्रगति न होने के बावजूद ऊँची जीवन प्रत्याशा दर हासिल की।

जबकि हमें पता है कि NFI और जीडीपी विकास में सकारात्मक संबंध है और प्रति व्यक्ति जीडीपी विकास और जीवन प्रत्याशा दर में भी सकारात्मक संबंध है, तो वैश्विक दक्षिण की प्रगतिशील सरकारों के लिए बुनियादी काम यह है कि वे जीडीपी में NFI की हिस्सेदारी को बढ़ाएँ। लेकिन इसमें तीन चुनौतियाँ खड़ी होती हैं:

  1. NFI का जीडीपी में हिस्सा इस हद तक नहीं बढ़ाया जा सकता कि कुछ समय के लिए यह माँग को असह्य स्तर तक गिरा दे। इसके लिए ऐसे मददगार घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की ज़रूरत है जो NFI के लिए रियायती और दीर्घावधि वित्तीय मदद दे सकें।
  2. ऐसे तंत्रों की ज़रूरत है जो वैश्विक दक्षिण से संपदा की लूट को रोक सकें और उन्हें NFI के विकास में लगा सकें। इसके लिए कर की चोरी, ट्रान्स्फ़र प्राइसिंग और व्यापार में ग़लत बिल बनाने जैसे कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सामंजस्य की ज़रूरत है। इसके साथ ही वस्तुओं के दाम स्थिर करने के लिए बहुस्तरीय तंत्रों की भी ज़रूरत है।
  3. NFI उत्पादक और पर्यावरण के नज़रिए से उचित होना चाहिए (यानी अच्छे स्तर का)। यह स्पष्ट है कि रियल इस्टेट जैसे सट्टे के क्षेत्रों में NFI के वे परिणाम नहीं होते जो इन्फ़्रास्ट्रक्चर, खेती और आधुनिक उद्योगों जैसे उत्पादक क्षेत्रों में NFI के होते हैं। उत्पादक क्षेत्र स्किल, तकनीक के संचय के लिए और भौतिक पदार्थों के उत्पादन के लिए ज़्यादा बेहतर है। इसके साथ ही आवास और आवास से जुड़े इन्फ़्रास्ट्रक्चर में NFI का जीडीपी विकास दर और जीवन प्रत्याशा दर दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस सबके लिए ज़रूरी है देश के लिए विशिष्ट औद्योगिक और कल्याणकरी नीतियाँ जो तभी तैयार की जा सकती हैं जब हर विशेष मामले में वर्ग संघर्ष की ताक़तों में संतुलन हासिल किया जा सकेगा।

निष्कर्ष

1949 की क्रांति के बाद से चीन के तीव्र आर्थिक विकास और बढ़ते हुए जीवन स्तर को विकास के पारंपरिक सिद्धांतों द्वारा नहीं समझा जा सकता। लेकिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा NFI की ऊँची दर को प्राथमिकता देने से ज़रिए इसे समझा जा सकता है। उदाहरण के तौर, चीन का तेज़ रफ़्तार रेल तंत्र, जो दुनिया में सबसे बड़ा है – के निर्माण के लिए बहुत अधिक निवेश और लोगों को लामबंद करने की ज़रूरत थी। यह कोई नया विचार नहीं था। हालाँकि इस में मतभेद थे कि अर्द्ध-सामंती और साम्राज्यवादी दायरे के भीतर निवेश कैसे इकट्ठा किया जाए, मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचार की परंपरा ने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया है कि बड़े स्तर के उद्योग समाजवाद के लिए भौतिक आधार बनाते हैं। 1920 में व्लादिमीर लेनिन ने जोर देते हुए कहा था कि कम्युनिस्ट विकास का मतलब है ‘सोवियत सत्ता और पूरे देश में बिजली पहुँचना’।45 आधी सदी के बाद अफ़्रीकी क्रांतिकारी अमिलकर कब्राल ने हमें सिखाया कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता का लक्ष्य है ‘राष्ट्रीय उत्पादक शक्तियों के विकास की प्रक्रिया को निर्बाध बनाना’।46 इसलिए वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत को गढ़ना अपने आप में साम्राज्यवाद और नवउदारवाद से आज़ादी पाने के संघर्षों की ओर लौटना भी है। इसके साथ हम पिछड़े देशों की विराट आकांक्षाओं की राह का नक़्शा तैयार करेंगे।


नोट

1 World Health Organisation, ‘Millennium Development Goals (MDGs)’, 19 February 2018, https://www.who.int/news-room/fact-sheets/detail/millennium-development-goals-(mdgs).

2 UN Secretary-General, Progress Towards the Sustainable Development Goals: Towards a Rescue Plan for People and Planet: Report by the Secretary-General, United Nations Digital Library, July 2023, https://digitallibrary.un.org/record/4014344?ln=en&v=pdf, 1–2.

3 United Nations Department of Economic and Social Affairs, ‘UN Chief Urges “Surge in Investment” to Overcome $4 Trillion Financing Gap’, accessed 9 December 2024, https://www.un.org/en/desa/un-chief-urges-%E2%80%98surge-investment%E2%80%99-overcome-4-trillion-financing-gap.

4 Organisation of Economic Co-operation and Development, ‘The 0.7% ODA/GNI Target – A History’, accessed 9 December 2024, https://web-archive.oecd.org/temp/2024-06-17/63452-the07odagnitarget-ahistory.htm; United Nations Economic Commission for Europe, ‘Indicator 17.2.1 (a) Net Official Development Assistance (ODA) as a Percentage of OECD-DAC Donors GNI (Grant Equivalent Methodology), %’, accessed 9 December 2023, https://w3.unece.org/SDG/en/Indicator?id=72; Henry-Laur Allik, ‘Record Number of NATO Allies to Hit 2% Defense Spending Goal’, Deutsche Welle, 19 June 2024, https://www.dw.com/en/record-number-of-nato-allies-to-hit-2-defense-spending-goal/a-69401037. Our forthcoming publication, The Most Dangerous Organisation on Earth: the North Atlantic Treaty Organisation (NATO), Dossier no. 89, June 2025, will trace the implications to the world of this increase in military spending in the NATO countries.

5 United Nations Conference on Trade and Development, Division on Globalisation and Development Strategies, ‘Target 17.4: Long-Term Debt Sustainability’, accessed 9 December 2024, https://stats.unctad.org/Dgff2016/partnership/goal17/target_17_4.html.

6 Tao Zhang, ‘Managing Debt Vulnerabilities in Low-Income and Developing Countries’, IMF Blog, 22 March 2018, https://www.imf.org/en/Blogs/Articles/2018/03/22/managing-debt-vulnerabilities-in-low-income-and-developing-countries; International Monetary Fund, ‘Public Debt Vulnerabilities in Low-Income Countries: The Evolving Landscape’, December 2015, https://www.imf.org/external/np/pp/eng/2015/110215.pdf.

7 United Nations Inter-Agency Task Force on Financing for Development, Financing for Sustainable Development Report 2024: Financing for Development at a Crossroads (New York: United Nations, 2024), https://desapublications.un.org/publications/financing-sustainable-development-report-2024, xiv.

8 For more on the formulation of new development theories see Tricontinental: Institute for Social Research, The World Needs a New Socialist Development Theory, dossier no. 66, 4 July 2023, https://dev.thetricontinental.org/dossier-66-development-theory/.

9 W. W. Rostow, The Stages of Economic Growth: A Non-Communist Manifesto (Cambridge: Cambridge University Press, 1960).

10 W. Arthur Lewis, The Theory of Economic Growth (Homewood, Illinois: Richard D. Irwin, 1955).

11 W. W. Rostow and Richard W. Hatch, An American Policy in Asia (Cambridge: MIT Press, 1955), vii.

12 Samuel P. Huntington, Political Order in Changing Societies (New Haven: Yale University Press, 1968). This book was far from the idealistic portrayal of civilian control over the military in Huntington’s The Soldier and the State: The Theory and Politics of Civil-Military Relations (Boston: Belknap of Harvard University Press, 1957).

13 Cheryl Payer, The Debt Trap: The International Monetary Fund and the Third World (New York: Monthly Review Press, 1974); Leo Panitch and Sam Gindin, ‘Finance and American Empire’, Socialist Register 41, 2005.

14 John Williamson, ed., Latin American Adjustment: How Much Has Happened? (Washington, DC: Institute for International Economics, 1990).

15 It is important to note that it was these same thinkers who engineered the neoliberal coup against the Third World, starting with Chile in the early 1970s as their laboratory. For more, see Tricontinental: Institute for Social Research, The Coup Against the Third World: Chile, 1973, dossier no. 68, 5 September 2023, https://dev.thetricontinental.org/dossier-68-the-coup-against-the-third-world-chile-1973/.

16 For more on SAPs and the role of debt in Africa, see Tricontinental: Institute for Social Research, Life or Debt: The Stranglehold of Neocolonialism and Africa’s Search for Alternatives, dossier no. 63, 11 April 2023, https://dev.thetricontinental.org/dossier-63-african-debt-crisis.

17 World Bank, World Bank Development Report 1989: Financial Systems and Development (Washington, DC: World Bank, 1989); Era Dabla-Norris, ‘Financial Sector Deepening and Transformation’, in Frontier and Developing Asia (Washington, DC: International Monetary Fund, 2015), https://www.elibrary.imf.org/display/book/9781475595512/ch006.xml.

18 Samir Amin, The Implosion of Capitalism (New York: Monthly Review Press, 2014) and Tricontinental: Institute for Social Research, Globalisation and Its Alternative: An Interview with Samir Amin, notebook no. 1, 29 October 2019, https://dev.thetricontinental.org/globalisation-and-its-alternative/.

19 Tricontinental: Institute for Social Research, The World in Economic Depression: A Marxist Analysis of Crisis, notebook no. 4, 10 October 2023, https://dev.thetricontinental.org/dossier-notebook-4-economic-crisis/.

20 United Nations Conference on Trade and Development, World Investment Report 2024: Investment Facilitation and Digital Government (New York: United Nations, 20 June 2024), https://unctad.org/publication/world-investment-report-2024.

21 United Nations Conference on Trade and Development, Foreign Direct Investment and Development (New York: United Nations, 1999), https://unctad.org/system/files/official-document/psiteiitd10v1.en.pdf.

22 United Nations Conference on Trade and Development, Global Economic Fracturing and Shifting Investment Patterns (Washington, DC: United Nations, 23 April 2024), https://unctad.org/publication/global-economic-fracturing-and-shifting-investment-patterns.

23 Tricontinental: Institute for Social Research, Life or Debt.

24 Raghuram Rajan, Fault Lines: How Hidden Fractures Still Threaten the World Economy (New Jersey: Princeton University Press, 2010), 93. For more on IMF policies and the Global South, see Tricontinental: Institute for Social Research, Life or Debt.

25 Raúl Prebisch, The Economic Development of Latin America and Its Principal Problems (New York: United Nations Economic Commission for Latin America, 1950). For more on Latin American structuralism, see Alfred Saad Filho, ‘The Rise and Decline of Latin American Structuralism and Dependency Theory’, in The Origins of Development Economics: How Schools of Economic Thought Have Addressed Development, edited by K. S. Jomo and E. S. Reinert (London: Zed Books, 2005).

26 Andre Gunder Frank, ‘The Development of Underdevelopment’, Monthly Review 18, no. 4, 1966.

27 Walter Rodney, How Europe Underdeveloped Africa (London: Verso, 1972).

28 Andre Gunder Frank, Crises in the Third World (New York: Holmes & Meier, 1967), 25.

29 Samir Amin, ‘A Note on the Concept of Delinking’, Review 10, no. 3 (Winter 1987): 435–444.

30 Benjamin Selwyn, ‘Why Global Value Chains Should Be Called Global Poverty Chains’, Developing Economics (blog), 13 January 2023, https://developingeconomics.org/2023/01/13/why-global-value-chains-should-be-called-global-poverty-chains/.

31 There are several exceptions to what we have said here, such as the work of Samir Amin on ‘delinking’ and the work of dependency theorists who operated in the early years of the Economic Commission of Asia (such as Ashok Mitra), the Economic Commission of Latin America (such as Osvaldo Sunkel, Theotônio dos Santos, and Vânia Bambirra), and the Economic Commission of Africa (such as Mekki Abbas and Robert K. A. Gardiner). See Tricontinental: Institute for Social Research, Dependency and Super-exploitation: The Relationship between Foreign Capital and Social Struggles in Latin America, dossier no. 67, 8 August 2023, https://dev.thetricontinental.org/dossier-67-marxist-dependency-theory/.

32 Chalmers Johnson, MITI and the Japanese Miracle: The Growth of Industrial Policy, 1925–1975 (Stanford: Stanford University Press, 1982) and Alice H. Amsden, Asia’s Next Giant: South Korea and Late Industrialisation (Oxford: Oxford University Press, 1989).

33 The East Asian Miracle: Economic Growth and Public Policy was published by the World Bank in 1993. It was authored by Nancy Birdsall, José Edgardo L. Campos, Chang-Shik Kim, W. Max Corden, Lawrence MacDonald, Howard Pack, John Page, Richard Sabor, and Joseph E. Stiglitz.

34 Ha-Joon Chang, The Political Economy of Industrial Policy (New York: St. Martin’s Press, 1994) and Mariana Mazzucato, The Entrepreneurial State: Debunking Public vs. Private Sector Myths (London: Anthem Press, 2013).

35 The key text here is Nancy Birdsall and Frederick Jaspersen, eds., Pathways to Growth: Comparing East Asia and Latin America (Washington, DC: Inter-American Development Bank, 1997).

36 Bill Warren, Imperialism: Pioneer of Capitalism (London: Verso, 1980).

37 Aijaz Ahmad, ‘Imperialism and Progress’, in Lineages of the Present: Political Essays (New Delhi: Tulika, 1996).

38 Robert Brenner, ‘The Origins of Capitalist Development: A Critique of Neo-Smithian Marxism’, New Left Review, no. I/104 (July/August 1977): 25–92. Brenner’s essay occasioned a large debate, which began with Ben Fine’s ‘On the Origins of Capitalist Development’, New Left Review, no. I/109 (May/June 1978): 88–95 and Paul Sweezy’s short note ‘Comment on Brenner’, New Left Review, no. I/108 (March/April 1978): 94–95.

39 S. B. D. de Silva, The Political Economy of Underdevelopment (London: Routledge, 1982).

40 Sergei Tyulpanov, Politische Ökonomie und ihre Anwendung in den Entwicklungsländern [Political Economy and Its Application in the Developing States] (Frankfurt/Main: Verlag Marxistische Blätter, 1972).

41 Tricontinental: Institute for Social Research, Serve the People: The Eradication of Extreme Poverty in China, Studies in Socialist Construction no. 1, 23 July 2021, https://dev.thetricontinental.org/studies-1-socialist-construction/.

42 Samir Amin, ‘China 2013’, Monthly Review 63, no. 10 (March 2013), https://monthlyreview.org/2013/03/01/china-2013/.

43 Enfu Cheng and Chan Zhai, ‘China as a “Quasi-Centre”’ in the World Economic System: Developing a New “Centre-Quasi-Centre-Semi-Periphery-Periphery” Theory’, World Review of Political Economy 12, no. 1 (Spring 2021): 22.

44 John Ross, Roy Singham, and Gisela Cernadas, “从210个经济体大数据中,我们发现了误解促消费对经济的危害” [From the Big Data of 210 Economies, We Found the Misunderstanding of Promoting Consumption to the Economy], Guancha, 21 October 2024, https://www.guancha.cn/LuoSiYi/2024_10_21_752447.shtml.

45 Vladimir Lenin, Lenin’s Collected Works, vol. 31 (Moscow: Progress Publishers, 1965), 408–426.

46 Amílcar Cabral, ‘The Weapon of Theory’, United Nations Economic Commission for Africa, African Institute for Economic Development and Planning, working paper, April 1978, https://repository.uneca.org/handle/10855/42836.

ज़मीन और सपनों के लिए तेलुगूभाषी जनता का संघर्ष

 

1934 में तेलुगू कवि श्रीरंगम श्रीनिवास राव (1910-1983), जिन्हें लोग प्यार से श्री श्री कहते थे, ने महा प्रस्थानम (महा प्रस्थान) शीर्षक से एक कविता लिखी। तब तक तेलुगू भाषा में इस कविता जैसा कुछ नहीं लिखा गया था। आज दक्षिण-मध्य भारत और दूसरे इलाक़ों में जाकर बसे यहाँ के लोगों को मिलाकर यह दस करोड़ लोगों की भाषा है। श्री श्री की कविता को एक युद्ध गीत की तरह गाया जाता था, हालांकि यह किसी सेना के लिए नहीं लिखी गई थी, बल्कि क्रांतिकारियों के लिए थी, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद को उखाड़ फेंक एक समाजवादी भारत का निर्माण करना चाहते थे। इसके शब्द बहुत सरल हैं, इतने आसान कि घिसे-पिटे मालूम होते हैं, लेकिन ये बोल सच कहते हैं:

लहरें उफन रही हैं।
घंटियाँ बज रही हैं।
एक दूसरी दुनिया पुकार रही है।
दूसरी, दूसरी, दूसरी दुनिया
उफनती, बजती, पुकारती
बढ़े चलो।
ओ, चलो, बढ़ो.
आगे, आगे, हमेशा बढ़े चलो।1
మరో ప్రపంచం,
మరో ప్రపంచం,
మరో ప్రపంచం పిలిచింది!
పదండి ముందుకు,
పదండి త్రోసుకు!
పోదాం, పోదాం పైపైకి!
కదం త్రొక్కుతూ,
పదం పాడుతూ,
హ్రుదంతరాళం గర్జిస్తూ-
పదండి పోదాం,
వినబడలేదా
మరో ప్రపంచపు జలపాతం?

यह गीत लोगों को उनकी क़ाबिलियत पर भरोसा दिलाने और साथ ही एक अजेय दिखने वाले दुश्मन से लड़ने के लिए ज़रूरी प्रेरणा देने के लिए लिखा गया था। श्री श्री मानो कहना चाहते हैं कि ख़ुद पर भरोसा हो तो कुछ भी मुमकिन है। लेकिन अगर अंत में हार हासिल हो तो बलिदान का क्या अर्थ रह जाता है? भविष्य जनता को पुकारते हुए कह रहा था कि तुम्हारा बलिदान बेकार नहीं जाएगा। अंतत: जीत हासिल होने की निश्चितता, जिसके लिए बलिदान और संघर्ष अनिवार्य है, ही सबसे बड़ी प्रेरणा थी। बस आगे बढ़ो।

  1. क्रांतिकारी कलाकार और गायिका विमलक्का। साभार: कुरेला श्रीनिवास
  2. महांकाली पार्वती (बाएं), मोटुरु उदयम (बीच में), और चिंतला कोटेश्वरम्मा (दाएं), द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने बुर्राकथा समूह के साथ युद्ध-विरोधी गीत प्रस्तुत कर रही हैं। साभार: प्रजा नाट्य मंडली फोटोग्राफी अभिलेखागार, फोटोग्राफर अज्ञात
  3. कम्युनिस्ट क्रांतिकारी नेता मल्लू स्वराज्यम (बाएं), 1940 के दशक के अंत में सशस्त्र संघर्ष की अन्य महिला सेनानियों के साथ। साभार: सुनील जाना

डोसियर, ‘ज़मीन और सपनों के लिए तेलुगू जनता का संघर्ष’, इस विचार पर आधारित है कि कला और संस्कृति दोनों वर्ग संघर्ष की उपज हैं और बदले में वे वर्ग संघर्ष पैदा भी करते हैं। इस डोसियर में हम उस व्यापक सांस्कृतिक सृजन का एक ब्योरा प्रस्तुत कर रहे हैं, जो भारत के इस हिस्से में चले महान संघर्षों से सामने आए और लोगों को लंबे प्रतिरोध में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया। यह क्रांतिकारी तेलुगू साहित्य का विस्तृत अध्ययन नहीं है और न ही यह भारत के तेलुगूभाषी क्षेत्र के कम्युनिस्ट आंदोलन का पूरा इतिहास है। हम यह दस्तावेज़ आपके साथ इस उम्मीद से साझा कर रहे हैं कि कला और राजनीति के बीच के संबंध का अध्ययन और साथ ही तेलुगू जनता के वर्ग संघर्ष के सांस्कृतिक संसार के अध्ययन में आम जिज्ञासा बढ़े।

हमने गीतों को चुना क्योंकि एक ऐसे समाज, जिसे पूरी तरह साक्षर होने से रोका गया हो, में सिनेमा के आने से पहले कहानी कहना और गीत गाना ही लोकतांत्रिक संस्कृति के प्रमुख रूप थे। तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष की कम्युनिस्ट नेता मल्लू स्वराज्यम (1931-2022) का कहना था कि औरतें और दलित गांव में धान से भूसा अलग करते समय रात के आसमान को शोषितों के गीतों से भर दिया करते थे। वे गीत ईश्वर और उनके जीवन के बारे में हुआ करते थे। स्वराज्यम कहती थीं, वे गीत इतने ख़ूबसूरत थे कि ‘चाँदनी तले सोते हुए लोग भी उनका लुत्फ़ उठाते थे’।2

ये गीत तेलुगू समाज में प्रचलित लोककला परंपरा से निकले थे, जैसे क़िस्सागोई के वे रूप जो गायन एवं नाट्य शैली का इस्तेमाल कर कथा कहते हैं। उदाहरण के लिए हरिकथा (भगवान विष्णु की कथा),पाकिर पाटलु (सूफ़ी गीतों का संकलन), भागवतम् (महाभारत की कहानियाँ) और साथ ही मज़दूर-किसानों के जीवन पर आधारित बुर्राकथा और गोलासुद्दुलु जैसे गैर-धार्मिक क़िस्से, जिन्हें एक गायक दो ढोल की थाप के साथ गाता था। इन्हीं संगीतमय कला रूपों के ज़रिए मज़दूरों व किसानों ने दबंग जातियों के विचारों को चुनौती दी। और सामाजिक बदलाव के इस कलात्मक अभियान में वामपंथ शुरू से ही शामिल हो गया था। मल्लू स्वराज्यम ने बताया कि वे विद्रोह शुरू करने के लिए कम-से-कम तीस गाँवों में गईं थीं जहां ‘मैंने एक गीत के ज़रिए लोगों में क्रांति की लौ जलाई थी। मुझे इससे ज़्यादा और क्या चाहिए था?’3


  1. गुम्माडी विट्ठल राव, दर्शकों के सामने नाट्य करते हुए। इन्हें लोकप्रिय रूप से गदर के नाम से जाना जाता है, और ये तेलुगु के सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी गीतकारों में से एक हैं। वे पहले अपने एक गीत की एक पंक्ति नाट्य शैली में गाते हैं और फिर उसका राजनीतिक व ऐतिहासिक महत्व समझाने के लिए रुकते हैं। साभार: के एन हरि
  2. श्री श्री के नाम से लोकप्रिय, तेलुगु कवि श्रीरंगम श्रीनिवास राव अपने संकलन महा प्रस्थानम (नीचे दाईं ओर पीले कवर में) से एक कविता पढ़ते हुए, और (दाईं तरफ़ पीछे) लाल झंडे तले दूसरे संघर्ष के लिए आगे बढ़ते लोग। साभार: कुरेला श्रीनिवास, 2009
  3. नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत करते हुए प्रजा नाट्य मंडली। साभार: प्रजा नाट्य मंडली फ़ोटोग्राफ़ी अभिलेखागार

हमें गोरे स्वामियों का यह राज नहीं चाहिए

औपनिवेशिक राज ने भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकतर क्षेत्र में सामाजिक विकास को दबाकर रखा। इस सिलसिले में कुछ मूलभूत आँकड़े चौंकाने वाले हैं: 1881 से 1921 के बीच लोगों का अनुमानित जीवन काल 25 साल था और शिशु मृत्यु दर प्रति 1,000 जन्म पर 200 से अधिक थी।4 ज़मीन से जुड़े समाज सुधार आंदोलनों का भारत के उन बड़े हिस्सों में असर नहीं पड़ा था, जहां लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा को लेकर, बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह को लेकर रूढ़िवादी, जातीय प्रतिबंधों ने सामाजिक जीवन की संभावनाओं को दबा रखा था।

लेकिन आंध्र-तेलंगाना क्षेत्र सहित भारत के दक्षिणी भाग में ऐसा नहीं था, यहाँ उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक सामाजिक परिवर्तन ने जड़ें जमा ली थीं।5 कंडुकुरी वीरेसलिङ्गं (1848-1919), गुरुजाडा अप्पाराव (1862-1915) और गरिमेला सत्यनारायण (1893-1952) जैसे लेखकों ने लड़कियों की शिक्षा, विधवाओं के पुनर्विवाह के अधिकार के लिए अभियान चलाए तथा नौच या देवदासी प्रथा के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठाई। इस प्रथा के तहत निचली जातियों के परिवारों से युवा लड़कियों को ईश्वर को सौंप दिया जाता था (यानी उन्हें मंदिरों में रहने के लिए भेज दिया जाता था और वे मंदिरों की संपत्ति हो जाती थीं) और उच्च जातियों के पुरुष उनका यौन शोषण करते थे।6 साक्षरता दर कम होने की वजह से इस क्षेत्र के समाज सुधारक लोगों तक अपना संदेश गीतों और नाटकों के ज़रिए लेकर जाते थे।7 उदाहरण के लिए गुरुजाडा अप्पाराव ने जनपद लोक परंपरा में गीत लिखे, जिन्हें याद रखना और गाना आसान था क्योंकि वे जनभाषा में लिखे गए थे। गरिमेला सत्यनारायण का गीतलु (स्वराज के गीत) इतना प्रभावशाली था कि ब्रिटिश शासन ने 1912 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया था और कवि को कुल साढ़े तीन साल के लिए राजद्रोह के कानून में कैद रखा था।8 सत्यनारायण का बहुत लोकप्रसिद्ध गीत ‘मकोड्डी तेल्ला डोरा तनामु’ (हमें गोरे स्वामियों का राज नहीं चाहिए) पर भी सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था, इस गीत की शुरूआत इन पंक्तियों से होती है::

हे ईश्वर, हमें गोरे स्वामियों का राज नहीं चाहिए!
हमारा जीवन दाँव पर है।
हमारा आत्मसम्मान छिन गया है।


हमें चावल का एक थाल नहीं मिलता।
नमक छूना हो चुका है अपराध।
वो हमारे मुँह में भर देगा मिट्टी और जाएगा [हमें दफ़नाने]।
हमें अन्न के लिए लड़ना होगा कुत्तों से [कचरे के ढेर में]।
लेकिन हमें गोरे स्वामियों का राज नहीं चाहिए, हे ईश्वर!9
మా కొద్దీ
తెల్లదొరతనము – దేవా
మా ప్రాణాలపై
పొంచి
మానాలు హరియించె



పట్టెడన్నమె
లోపమండి
ఉప్పు ! ముట్టుకుంటే
దోషమండి!
నోట – మట్టికొట్టి
పోతాడండి!
అయ్యొ! కుక్కలతో
పోరాడి – కూడు తింటామండీ
మా కొద్దీ
తెల్లదొరతనము – దేవా

इस उपमहाद्वीप में सीधे-सीधे राज करने की बजाय ब्रिटिश शासन ने ऐसे राजा और सामंत खड़े किए जो उनके नाम पर राज करें, औपनिवेशिक राज्य को राजस्व दें और इन सामंती शासकों के प्रशासनिक तंत्र के ज़रिए व्यवस्था बरक़रार रखी जाती थी। हैदराबाद का निज़ाम (पुश्तैनी शासक), जो दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक था, उसका दबदबा तीन भाषाई क्षेत्रों में था: तेलंगाना (तेलुगू भाषी), मराठवाड़ा (मराठी भाषी) और हैदराबाद-कर्णाटक (कन्नड़ भाषी)। निज़ाम ने अपने राज्यों की प्रजा की संस्कृतियों की उपेक्षा की, उसे औपचारिक कार्यों में उर्दू का इस्तेमाल करने पर मजबूर किया हालांकि उर्दू आबादी के सिर्फ़ 12 प्रतिशत लोगों की ज़बान थी।10 अत्याचार और शोषण के तमाम साधनों में से भाषा भी एक साधन थी। ब्रिटिश साम्राज्य के नाम पर निज़ाम ने एक सामंती व्यवस्था के तहत शासन किया जिसकी जड़ें इस क्षेत्र के एक अजीबोगरीब जातिगत विभाजन में थी। भूस्वामियों, जो केवल दबंग जातियों के होते थे, ने बहुत सी शोषित जातियों को दबाकर और विभिन्न प्रकार से उनका शोषण कर (इसमें जबरन श्रम लेना भी शामिल है) संपदा जुटाई और सत्ता बरक़रार रखी।

शोषण के विरुद्ध एकजुट होकर जनता ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया । इस क्षेत्र के लोगों ने कई तरीक़ों से ख़ुद को संगठित किया, लेकिन इनमें से बहुतों का विवरण इतिहास की किताबों में नहीं है। 1921 में मदापति हनुमंत राव (1885-1970) और बहादुर वेंकट राम रेड्डी (1869-1953), जो कि मध्यवर्गीय परिवारों में जन्मे थे और निज़ाम के प्रशासन में काम करते थे, ने आंध्र जन संगम (एजेएस) का गठन किया। वे अपनी भाषा के प्रति भेदभाव से परेशान हो चुके थे इसलिए उन्होंने पुस्तकालय, वाचनालय यानी रीडिंग रूम, और तेलुगू के स्कूल खोले (इनमें 1928 में हैदराबाद का पहला लड़कियों का स्कूल भी शामिल है)। तेलंगाना के सांस्कृतिक इतिहास का अध्ययन कर चुके प्रोफेसर अड़पा सत्यनारायण लिखते हैं कि एजेएस के ज़रिए पुस्तकालय आंदोलन बीसवीं शताब्दी के उतरार्द्ध के ‘सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों में से एक अहम आंदोलन बन कर उभरा और उसने जन जागृति में योगदान दिया’।11

1928 में मदापति हनुमंत राव के नेतृत्व में आंध्र जन संगम का नाम बदलकर आंध्र महासभा (एएमएस) हो गया। बद्दम येल्ला रेड्डी (1906-1979), रवि नारायण रेड्डी (1908-1991) और देवुलापल्ली वेंकटेश्वर राव (1912-1984) जैसे एएमएस के कई युवा नेता कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल हो गए और इस ‘उदारवादी सांस्कृतिक संगठन’ को, इतिहासकार सुनील पुरुषोतम के शब्दों में, ‘एक जुझारू जन संगठन’ बनाने पर ज़ोर दिया।12 एक जन संगठन के रूप में एएमएस प्रचलित लोक कलाओं के माध्यम से जनता के बीच अपना संदेश लेकर गया, जैसे कि गीत और नाटक, जो पर्दाफ़ाश करते थे ब्रिटिश उपनिवेशवाद के ढाँचे, निज़ाम के राज और ग्रामीण दुनिया पर भूस्वामियों के शिकंजे का। एएमएस के नेताओं ने किसानों के आंदोलन को यूरोप में नाज़ीवाद के ख़तरे और भारत में इसके असर की आशंका के मद्देनज़र पैदा हुई नाजीवाद विरोधी विश्वदृष्टि से भी जोड़ा। 1933 में क्रांतिकारी कवि श्री श्री ने जयभेरी (विजय नाद) लिखी जिसमें उनके दौर के कलाकारों के भीतर रिस रहे गुस्से के भाव को दिखाया:

मैंने भी
दी है समिधा
विश्व की अग्नि में।
मैंने भी
रोया है एक अश्रु
विश्व की वर्षा में।
मेरा भी
नाद शामिल है
विश्व की चिंघाड़ में।
.
నేను సైతం ప్రపంచాగ్నికి
సమిధ నొక్కటి
ఆహుతిచ్చాను!
నేను సైతం
విశ్వవ్రుష్టికి
అశ్రు వొక్కటి ధారపోశాను!
నేను సైతం
భువన ఘోషకు
వెర్రిగొంతుక విచ్చి మ్రోశాను!

उपनिवेशवाद, राजशाही और ज़मींदारी के विरुद्ध लड़ाई खेतों और सड़कों पर लड़ी जानी थी, लेकिन इन संघर्षों के लिए ज़रूरी था लोगों में आत्मविश्वास और यक़ीन पैदा होना कि वे न सिर्फ़ सत्ता के ढाँचे से लड़ सकते हैं बल्कि जीत भी सकते हैं। यह आत्मविश्वास और यक़ीन संघर्ष से तो पैदा होता ही है लेकिन साथ-साथ कल्पना से भी पनपता है। इसीलिए बहुत से अन्य उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों की तरह एएमएस ने ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचने और दुनिया को लेकर उनकी समझ तैयार करने में गीतों और नाटकों की भूमिका पर ज़ोर दिया। इस काम से एएमएस पॉप्यूलर कल्चर यानी लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बना और उनके गीत इस क्षेत्र के संघर्षों से लगातार गहराई से जुड़े रहे हैं, जैसे कि पाडावेक्कू आंध्र महासभा पड़ाव (आंध्र महासभा की नाव पर सवार हो), जिसके लेखक का नाम कोई नहीं जानता:

ओ बंधु, हो जाओ सवार नाव पर, मेरे बंधु
ओ बंधु, हो जाओ सवार नाव पर, मेरे बंधु
आंध्र महासभा [एएमएस] की नाव, बंधु
रवि नारायणरेड्डी के हाथ है पतवार
बद्दम बालरेड्डी ने संभाली है पाल
नाव बढ़ रही है अपने लक्ष्य की ओर
ओ बंधु, हो जाओ सवार नाव पर, मेरे बंधु
सामंतों और लुटेरों की इस पर नहीं है जगह

जनता के शोषकों
सत्य भुलाया नहीं जाएगा
लक्ष्य है एक ऐसी जगह
जहाँ राज करेगा सर्वहारा
आँधियों से निकलकर,
और नौकाओं की पालों के परे
ओ बंधु, हो जाओ सवार नाव पर, मेरे बंधु।13

ఎక్కు బాబా – పడవెక్కు బాబా
ఎక్కు బాబా – పడవెక్కు బాబా
ఆంధ్ర సభయను
పడవెక్కు బాబా
చుక్కా నీ బట్టే
రావి నారాయణరెడ్డి
ఎతైనలే తెరచాప
బద్దం ఎల్లారెడ్డి
గడలు బట్టిరి
కార్యకర్తలు ప్రాణాలొడ్డి
కదులు తుందీ పడవ
గమ్య స్థానము జేరు
ఎక్కు బాబా – పడవెక్కు బాబా
దొరలు దోపిడీ దార్లకు
దొరకదింత చోటైనా!
ప్రజా పీడితులకిచట
నిజము నిల్వ నీడవరు!
కష్ట జీవుల రాజ్యం
గమ్యముగా చేసుకొని
సుడిగుండముల రాటి
సూటిగా దాటిగ పోను
ఎక్కు బాబా – పడవెక్కు బాబా

Tricon

  1. गीत सुनें। सुड्डाला हनुमंथु द्वारा लिखा गया और 23 जुलाई 2024 को अब्बागनी बिक्षम द्वारा गाया गया गीत ‘कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ो, ओ बंधुआ खेतिहर मजदूर’।
  2. सुड्डाला हनुमंथु का यह चित्र उनके द्वारा निभाए गए विभिन्न किरदारों को दर्शाता है, बाएं से बीच तक, तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष के एक क्रांतिकारी सेनानी के रूप में राइफल पकड़े हुए और उसकी दाईं ओर तानपुरा लिए, जिसे वे अक्सर अपने गीतों में इस्तेमाल करते थे। सबसे दाईं ओर का चित्र एक गाँव के लड़के को दर्शाता है जो हनुमंथु के गीत ‘पलेतुरी पिल्ला गड़ा पसूलगासे मोनागाड़’ (जानवरों को हाँकने में दक्ष गाँव का लड़का [बँधुआ बाल मज़दूर]) का नायक है, जिसे जमींदार ने उसकी माँ से दूर कर बंधुआ मज़दूर बना दिया और जो मजबूरी वश मवेशी चराने का काम करता है। साभार: कुरेला श्रीनिवास, 2016
  3. प्रजा नाट्य मंडली द्वारा लिखे गए एक नुक्कड़ नाटक में घमंडी मध्यवर्गीय संवेदनाओं का मजाक उड़ाती एक अभिनेत्री। तारीख़ अज्ञात, साभार: प्रजा नाट्य मंडली फोटोग्राफी अभिलेखागार।
  4. विप्लव रचैतला संघम (विरासम) और जन नाट्य मंडली के सदस्य वरवर राव, के बालगोपाल, गुम्माडी विट्ठल राव (बाएं से दाएं), और वंगापंडु (सबसे दाएं) 1990. साभार: एन. वेणुगोपाल का निजी संग्रह
  5. प्रजा नाट्य मंडली के नाटकों और गीतों के कैसेट, वीएचएस, और सीडी कवर। साभार: प्रजा नाट्य मंडली, 2024

तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन

1930 के दशक में एएमएस में युवा क्रांतिकारियों के शामिल होने से न सिर्फ़ संगठन में बदलाव आए बल्कि तेलंगाना की राजनीतिक दुनिया भी काफ़ी बदल गई। इन युवा कम्युनिस्टों ने एएमएस को अपने सदस्यता के नियम बदलने पर मजबूर किया जिससे ग़रीब और निरक्षर जनता भी बड़ी संख्या में संगठन से जुड़ सके। इन नए तबक़ों से आए सदस्यों ने माँग उठानी शुरू की कि संगठन अपने सांस्कृतिक कार्यों के साथ और पहलुओं में भी हस्तक्षेप करे। इसके चलते 1941 के पारित प्रस्तावों में माँग की गई कि वेट्टी (जाति आधारित बँधुआ मज़दूरी) और जाग़ीरदारी व्यवस्था को ख़त्म किया जाए और बटाईदारों के अधिकारों को लागू किया जाए। आमतौर पर संगम कहा जाने वाला एएमएस अपने रास्ते की रुकावटों को क्रांतिकारी ढंग से तोड़ते हुए पूरे ग्रामीण तेलंगाना तक पहुँच चुका था।14 एएमएस ने उन लेखकों और कलाकारों को भी आकर्षित किया जिन्होंने समाज को लोकतांत्रिक बनाने और औपनिवेशवादी निज़ाम के संस्थागत ढाँचे को ख़त्म करने के संघर्ष में अपनी कला से योगदान दिया।

क्रांतिकारी सोच केवल एएमएस के सदस्यों और उसकी कलात्मक क्रियाओं में ही नहीं पनप रही थी बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के कलाकारों और लेखकों में फैल रही थी। 1936 में वामपंथ से प्रभावित लेखकों और कलाकारों ने प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) की स्थापना की जिसका नेतृत्व प्रेमचंद (1880-1936), रवीन्द्रनाथ टैगोर (1861-1941), मुल्क राज आनंद (1905-2004), ख्वाजा अहमद अब्बास (1914-1987) और सरोजिनी नायडू (1879-1949) जैसे दिग्गज कर रहे थे। 1943 तक रंगकर्मियों ने भारतीय जन नाट्य संघ या इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) का गठन कर लिया था।

आंध्र क्षेत्र भी प्रलेस और इप्टा के विकास से अछूता नहीं रहा। 1943 में प्रलेस का अधिवेशन पहली बार आंध्र में हुआ और इसी साल मुंबई में इप्टा बना। इप्टा के उद्घाटन समारोह में उर्दू शायर मखदूम मोहिउद्दीन (1908-1969) और तेलुगू नाटकों के निर्देशक गरिकापति राजाराव (1915-1963) मौजूद थे, जिन्होंने दो महीने के अंदर ही, 1 जून 1943 को आंध्र के विजयवाड़ा क्षेत्र में इप्टा की पहली मीटिंग रखवाई। तीन साल बाद, मई 1946 में प्रलेस ने अपना पहला ग्रीष्मकालीन साहित्यिक स्कूल लगाया जिससे निकली प्रजा नाट्य मंडली (पीएनएम)।15

आंध्र क्षेत्र में निज़ाम की ताक़तों और तेलंगाना के किसानों के संघर्ष की पृष्ठभूमि में प्रलेस और इप्टा विकसित हुए। ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन ने निज़ाम से कहा कि उसे युद्ध कर के रूप में अनाज मुहैया करवाए। निज़ाम ने ग़रीब किसानों की फसलें ज़ब्त करना शुरू कर दिया। कम्युनिस्ट कवि बंदी यदागिरी ने इस महान किसान संघर्ष पर निज़ाम सरकरोड़ा (ओ शासक, निज़ाम) लिखी:

ओ शासक, निज़ाम!
तुम तो नाज़ियों से भी क्रूर निकले
तुमने सताया हमें बहुत

ओ शासक, निज़ाम!
तुमने छीन ली सारी फसल
न छोड़ा एक भी दाना अन्न का

ओ शासक, निज़ाम!
न खेती को ज़मीन
न सिर पे छत
हम भागे अनजान जगह छिपने के लिए

तुमने सोचा था
देखे तुम्हारी पुलिस औ’ सेना
हम डाल देंगे हथियार

ओ शासक, निज़ाम!
न पुलिस न सेना
न डंडों की मार
न बम न हथियार
तुम ले आओ जितना भी अंबार
हम डालेंगे न हथियार
शासक निज़ाम

तुमने खड़ी की एक भ्रष्ट पुलिस
जो बचाए तुम्हें बनकर दीवार
ओ शासक, निज़ाम!
नलगोंडा है बीचोंबीच
किनारे की ओर है सूर्यपेटा
हैदराबाद है उससे परे
और फिर गोलकुंडा
गोलकुंडा किले के नीचे दफ़नाएंगे तुम्हें हम
शासक निज़ाम।16

నైజాము సర్కరోడా!
నైజాము సర్కరోడా
నాజీల మించినోడా
యమబాధ పెడ్తివి కొడుకో

నైజాము సర్కరోడా!
పండిన పంటనంత
తిండికైన ఉంచకుండ
తీసుక వెళ్ళినావు

నైజాము సర్కరోడా!
దున్నాను భూమిలేక
వుండాను ఇల్లులేక
పరదేశము వెల్తీమి కొడుకో

నైజాము సర్కరోడా!
పోలీసు మిల్ట్రి జూసి
మేము లొంగి వస్తామని
ఒక ఆశపడ్తివి కొడకో!

నైజాము సర్కరోడా!!
పోలీసు మిల్ట్రి గాని
లాఠీల దెబ్బలుగాని

మిషీను గన్నూలుగాని
తుపాకి బాంబులు గాని
నీ వెన్ని తెచ్చినగాని
మేం లొంగీరాం కొడకో!
నెజాము సర్కరోడా!!!

కంచారు గాడ్దులాను
లంచగొండి పోలీసోల్ల
నీవు పెంచినావు కొడకో
నైజాము సర్కరోడా!
చుట్టుముట్టు సూర్యపేట
నట్టనడుమ నల్లగొండ
ఆవాలా హైద్రాబాదా
తర్వాత గోలకొండ
గోలకొండాఖిల్లా కిందా నీ
గోరి కడ్తం కొడకో
నై జాము సర్కరోడా..!

पालकुर्ती गाँव में कम्युनिस्टों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए इस क्षेत्र पर शासन करने वाले निज़ाम के अधिकारी (जिसे देशमुख भी कहा जाता था) विष्णुर रामचंद्रा रेड्डी ने एएमएस सदस्य चित्यला ऐलम्मा की ज़मीन हड़प ली। अब तक किसानों को इस तरह की हरक़तों का तजुर्बा हो चुका था। एएमएस के स्थानीय नेताओं की अगुआई में अट्ठाईस किसान ऐलम्मा की फसल बचाने के लिए इकट्ठा हुए और देशमुख के दो सौ गुंडों को भगा डाला। इसके जवाब में देशमुख ने एएमएस के नेताओं को पकड़ने के लिए अपने लोग भेजे, नेताओं को गिरफ़्तार कर उन्हें यातनाएँ दी गईं। महीनों के संघर्ष के बाद 4 जुलाई 1946 को एक हज़ार किसानों ने देशमुख के ख़िलाफ़ जुलूस निकाला। उसके गुंडों ने जुलूस पर गोलियाँ चलाईं जिसमें डोड्डी कोमारैया की मौत हो गई। वह एक ग़रीब किसान, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य और एएमएस संगठन के स्थानीय नेता थे। जुलूस इकट्ठा होकर देशमुख के घर तक गया और घर को आग लगा दी। अगले हफ़्ते में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने किसानों को संगठित किया और उन्होंने देशमुख से दो सौ एकड़ ज़मीन छीनकर भूमिहीन किसानों में बाँट दी। तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन का आग़ाज़ हो चुका था।17

सीपीआई के नेतृत्व में किसानों का आंदोलन पूरे ग्रामीण इलाक़े में फैल गया। न तो हैदराबाद राज्य का सैन्य बल और न ही रज़ाकार (हैदराबाद का एक स्वयंसेवी अर्द्धसैन्य बल) इस ज्वार को रोक पाए। एक के बाद एक गाँव ख़ुद को निज़ाम के राज से आज़ाद घोषित करते गए और वहां ग्राम राज्यमों (ग्रामीण कम्यून) की स्थापना हुई जिन्होंने सामाजिक ऊँच-नीच पर प्रहार किया और ज़मीन का पुनर्वितरण किया। सभी जातियों के पुरुष और महिलाओं ने सशस्त्र टुकड़ियों में हिस्सेदारी की और एक बहुत बड़े जनशासित मुक्त क्षेत्र के निर्माण के लिए लड़ाई लड़ी, इस क्षेत्र में लगभग पाँच हज़ार गाँव शामिल थे।18

प्रजा नाट्य मंडली ने आंदोलनरत किसानों को शिक्षित और प्रेरित करने के लिए तत्काल गीत और नाटक लिखे; आंध्र क्षेत्र से कार्यकर्ता रेल से तेलंगाना गए और लोगों को प्रेरित किया तथा इससे और भी कलाकार मंडली में शामिल हुए।19 इस दौर में जो सबसे यादगार नाटक लिखा गया वो था माँ भूमि, इसे कम्युनिस्ट कलाकार सनकारा सत्यनारायण और वासीरेड्डी भास्कर राव (ये दोनों आंध्र क्षेत्र के कृष्णा जिले से थे) ने 1947 में लिखा था।20 यह नाटक नलगोंडा जिले के दो सौ चालीस गाँवों में पुलिस के दमन पर लिखा गया था। यह ज़िला तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन का केंद्र था और यहाँ निज़ाम के राज्य ने 15,350 लोगों को गिरफ़्तार किया था, उन्हें यातना दी थी (इसमें 74 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएँ भी शामिल हैं) और क़ैद में 52 लोगों की हत्या की थी। यह नाटक शुरू होता है एक मुसलमान किसान बंदगी की कहानी से जिसकी ज़मीन हथियाने के लिए देशमुख ने उसे मार डाला और इसके बाद कहानी बढ़ती है कि कैसे एएमएस के ज़रिए जनता उठ खड़ी हुई।21 देशमुख ने धार्मिक और जातीय भेदभाव के आधार पर एएमएस को तोड़ने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुआ। नाटक का अंत कब्रिस्तान में होता है जहाँ लोग बंदगी को श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा होते हैं और कसम खाते हैं कि एएमएस के नेतृत्व में लड़ाई जारी रखेंगे, ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करेंगे और खेती करेंगे और निज़ाम के राज से जिसने भी हाथ मिलाया था गाँव में उसका बहिष्कार करेंगे। 1948 के अंत तक 125 मंडलियाँ माँ भूमि का मंचन कर चुकी थीं और कम-से-कम दो करोड़ लोग यह नाटक देख चुके थे।22

इन नाटकों के मंचन ने लोगों को प्रेरित और शिक्षित किया तथा साथ ही इस पूरे क्षेत्र में रंगमंच और कला की संस्कृति में भी बदलाव लाया। तेलंगाना आंदोलन में शामिल रही कम्युनिस्ट लेखिका कोंडापल्ली कोटेश्वरअम्मा (1918-2018) याद करती हैं ‘उस दौर में औरतों को नाटकों में अभिनय करने की आज़ादी नहीं थी। इसलिए महिला कॉमरेड ने बंगाल का उदाहरण दिया जहाँ रवीन्द्रनाथ टैगोर की बेटी एक नाटक में काम कर रही थीं। वरिष्ठ नेताओं ने हमारी माँग मान ली और हम नाटकों में अभिनय कर पाए’। शंकर वासी रेड्डी के नाटक मुंडाडुगु (एक कदम आगे की ओर) पहला नाटक था जिसमें महिलाओं ने पुरुषों के साथ काम किया।23

एक कम्युनिस्ट और आंध्र महिला सभा की नेता मोटुरु उदयम (1924-2002) सशस्त्र आंदोलन के समय तो भूमिगत यानी अन्डरग्राउन्ड थीं लेकिन उन्होंने विजयवाड़ा में हुई इप्टा की पहली मीटिंग में शिरकत की। इस क्षेत्र में साइकिल चलाने वाली पहली महिला उद्यम ने बुर्राकथा स्क्वाड नाम के एक सांस्कृतिक समूह का नेतृत्व किया जो नाटकों इत्यादि का मंचन करते थे, इनमें एक नाटक सोवियत युद्ध की नायिका तान्या पर भी था।24 अपने कई जेलवासों में से एक में 1947 में उदयम ने जेलों की अमानवीय स्थिति को लेकर विरोध प्रकट करने के लिए चेवुलपिल्ली मैजिस्ट्रैट (खरगोश जैसे कानों वाला मैजिस्ट्रैट) लिखा। बाद में वह याद करती हैं कि कैसे जेल में वह नाटक देखने के बाद कुछ क़ैदी कम्युनिस्ट हो गए थे।25

सशस्त्र आंदोलन के दौरान कवि सुड्डाला हनुमंथु (1908-1982) ने एक गीत लिखा ‘पलेतुरी पिल्ला गड़ा पसूलगासे मोनागाड़’ (जानवरों को हाँकने में दक्ष गाँव का लड़का [बँधुआ बाल मज़दूर]) इसका इस्तेमाल ‘माँ भूमि’ नाटक में और फिर बाद में 1979 में इस पर बनी फिल्म में हुआ।26 हनुमंथु नलगोंडा से थे (तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन का केंद्र), कम्युनिस्ट बनने से पहले उन्होंने थोड़े समय के लिए निज़ाम की सरकार के लिए काम किया था। निज़ाम के राज्य के तौर-तरीक़ों से क्षुब्ध होकर वह कम्युनिस्ट बन गए। उन्होंने कुछ वाकये बताए जिनका उन पर प्रभाव पड़ा जैसे कि एक सरकारी अधिकारी का एक बूढ़े आदमी को सिर्फ इसलिए मारना कि उसने अधिकारी का सामान उठाने से मना कर दिया था। निज़ाम की सरकार रोज़ाना जनता की बेइज़्ज़ती और शोषण करती थी और इसके विरुद्ध जनता के प्रतिरोध को देखकर हनुमंथु प्रेरित हुए। उन्होंने एक गीत लिखा ‘वे वे देब्बाकु देब्बा’ (हर धक्के का जवाब दो धक्के से), इसका शीर्षक एक बूढ़ी महिला की उस समय कही बात से लिया गया जब एएमएस की एक मीटिंग पर रज़ाकारों ने हमला किया:

हो! हो! हर धक्के का जवाब दो
हर धक्के का जवाब दो
निज़ाम की सेना के राक्षस
आयें हैं हमसे लड़ने
वार करो कुल्हाड़ी से
चाकू से कर दो उनके टुकड़े
जब वो चीखें चिल्लाएँ
कौवों और चीलों को उन्हें खाने दो!
हो! हो! हर धक्के का जवाब दो
सिपाही और रज़ाकार क्यों आए हैं इधर?
क्यों होती है लूट?
क्यों चलती हैं गोलियाँ?
क्यों मरते हैं लोग?
क्या समझता है निज़ाम खुद को?…
जब तक दुश्मन का नहीं हो खात्मा
वचन दो तुम हथियार नहीं छोड़ोगे!
दुश्मन से लड़ने में लगा दो पूरी जान
तुम्हारे अस्त्र उतने ही हैं बलवान
जितने इंद्र के
हो! हो! हर धक्के का जवाब दो
जागो और उठो, ओ किसान, ओ मेहनतकश
राव, रेड्डी, कुर्मा, गोल्ला
बढ़ई, कुम्हार, धोबी, नाई
हरिजन, आदिवासी
कसो अपनी कमर
उठाओ हसिया, भाला, कुल्हाड़ी
दांती, तलवार, बंदूक
कूद पड़ो युद्ध में
करो जयनाद…
एक गिरा एक झटके से
तीन गिरे एक फटके से
हो! हो! हर धक्के का जवाब दो।27
వెయ్‌ వెయ్‌ – వేయర దెబ్బ
దెబ్బకు దెబ్బ – వెయ్‌ వెయ్‌
దయ్యపు గుండా
గోయలు తుర్కలు
కయ్యమునకు మనపైబడి వచ్చిరి
ఇయ్యరమొయ్యర వేయర బడితను
కుయ్యో మొర్రన కోయర చురికతొ
చ్రియ్యలు, వ్రయ్యలు , వ్రయ్యలుగా ఎగ
రేయర కాకులుమేయగ గ్రద్దలు
వెయ్‌ వెయ్‌ – వేయర దెబ్బ
దెబ్బకు దెబ్బ – వెయ్‌ వెయ్‌
ఎక్కడి సైనికు లెక్కడి
రజా కార్లెందుకు ఇక్కడ?
ఎందుకు దోపిళ్ళెందుకు
కాల్పులు ఎందుకు
హత్యలు యెవడా? నైజామ్‌.

రాక్షస పాలన
విధ్వంసము గావించే వరకు
ఎత్తిన
ఆయుధ మెపుడు దించమని
శపథము చేసి,
శత్రమూకలను, చెండాడర, నీ
కందినదే వజ్రాయధమగునిల
వెయ్‌ వెయ్‌ – వేయర దెబ్బ
లేరాలేరా! రారా! వేగమే రైతా! కూలీ!
రావూరెడ్డి
కూర్మాగొల్ల కుమ్మర కమ్మర
చాకల, మంగల, హరిజన, గిరిజన,
నడవర ముందుకు, నడుం బిగించి,
కొడవలి కఠారి గొడ్డలి చిల్ల బాకూ
వడిళల బర్మి తుపాకిచేకొనిరణములొ
దూకర జై యని…
నరకర ఎగబడి పొడవర తెగబడి
ఏటుకు ఇద్దరు,
పోటుకు ముగ్గురు.
వెయ్‌ వెయ్‌ – వేయర దెబ్బ

तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन 1946 से 1951 तक चला और किसानों ने इस दौरान ज़मींदारों को अपदस्थ करने और एक समाजवादी उत्पादन प्रणाली तैयार करने में काफ़ी सफलता हासिल कर ली थी। इस समय में 10 लाख एकड़ भूमि किसानों में बाँटी गई, इसके बाद जन समितियाँ इनको सुविधाएँ देतीं और सब चीज़ की देखरेख करतीं। वेट्टी (जाति आधारित बँधुआ मज़दूरी) को ख़त्म कर दिया गया और देवदासी प्रथा को भी। जनता ने संकीर्ण पहचान से जुड़े संबंधों को त्याग कर मज़बूत सामाजिक रिश्तों का निर्माण किया। सशस्त्र आंदोलन के लोकप्रिय गीतों से यह बात स्पष्ट होती है, उदाहरण के लिए ‘जाति से तुम्हें रोटी नहीं मिलती, मेरे भाई; हमें मिलकर लड़ना ही होगा’। यह सब बिना जन कलाकारों, गायकों और गाथागायकों के संभव नहीं था, जिनके गीतों और नाटकों ने लाखों ग़रीबों और शोषितों को एक ऐसी दुनिया की कल्पना करने के लिए प्रेरित किया जहाँ वे बेड़ियों में क़ैद नहीं थे और साथ ही इस दुनिया को हासिल करने के लिए उनमें आत्मविश्वास भी पैदा किया।28

1948 में निज़ाम हैदराबाद को नव-निर्मित भारत से आज़ाद रखने के लिए आतुर था जिससे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और भारत सरकार नाराज़ हो गए थे। इसलिए भारत सरकार ने हैदराबाद पर कब्ज़ा कर उसे भारतीय संघ में शामिल करने के लिए सेना भेजी। निज़ाम का राज खत्म होने के बाद भारतीय सेना ने अपनी बंदूकों की नली एएमएस के नेताओं और क्रांतिकारी किसानों की ओर मोड़ दी। कम्युनिस्ट नेता पी सुंदरैया (1913-1985) जिन्होंने तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई थी, के अनुसार:

4,000 कम्युनिस्टों और किसान क्रांतिकारियों को मार गिराया गया; 10,000 से ज़्यादा कम्युनिस्ट कार्यकर्ता और आम लड़ाकुओं को तीन-चार साल के लिए डिटेन्शन या हिरासत शिविरों तथा जेलों में ठूँस दिया गया; लगभग 50,000 लोगों को समय-समय पर पुलिस और सेना कैम्पों में घसीटकर ले जाया गया, वहाँ उन्हें हफ्तों तक पीटा गया, यातनाएँ दी गईं; हज़ारों गाँवों के लाखों लोगों को पुलिस और सेना के तलाशी अभियान का सामना करना पड़ा और बर्बरतापूर्ण लाठी चार्ज झेलना पड़ा; पुलिस और सेना की कार्रवाइयों के कारण लोगों को लाखों की संपत्ति गँवानी पड़ी जो या तो लूट ली गई या बर्बाद कर दी गई; [और] हज़ारों महिलाओं को यौन उत्पीड़न झेलना पड़ा और अन्य तरह की बेइज़्ज़ती भी सहनी पड़ी।29

1950 में श्री श्री का कविता संग्रह ‘महा प्रस्थानम’ प्रकाशित हुआ, जिससे इस कम्युनिस्ट कवि की कविताएँ जनता का गीत बन गईं। 1951 में सीपीआई ने औपचारिक तौर से तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन का अंत कर दिया, हालांकि इसके बाद भी कुछ इलाक़ो में लड़ाई जारी रही। 1956 में नई भारत सरकार ने बचे हुए सशस्त्र आंदोलन को भी कुचल दिया और आंध्र प्रदेश राज्य की स्थापना की। लेकिन इसके बावजूद इसकी विरासत बची रही। नेहरू को भी इस दौर में हुए भूमि पुनर्वितरण के कुछ पहलुओं को स्वीकार करना पड़ा, और जनता कभी उन गीतों को भूली नहीं।

Listen to a song by Suddala Hanumanthu about the importance of getting organised and fighting for a peasant-workers’ rule, like in the Soviet Union and China, performed by Abbagani Biksham on 23 July 2024

  1. प्रजा नाट्य मंडली के नुक्कड़ नाटक ‘वीर तेलंगाना’ में एक कलाकार लाल झंडा लहराते हुए। लाल झंडा कम्युनिस्ट आंदोलन के नेतृत्व में सामंती व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का प्रतीक है। साभार: प्रजा नाट्य मंडली, 2000 का दशक, फोटोग्राफर अज्ञात
  2. गीत सुनें। सोवियत संघ और चीन की तर्ज़ पर, मेहनतकशों का राज स्थापित करने में संघर्ष और संगठन के महत्त्व के बारे में सुड्डाला हनुमंथु द्वारा लिखा गया गीत, जिसे 23 जुलाई 2024 को अब्बागनी बिक्षम ने गाया था।
  3. मख़दूम मोहिउद्दीन, एक क्रांतिकारी उर्दू कवि जिन्होंने निज़ाम के राज के समय हैदराबाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। साभार: कुरेला श्रीनिवास, 2016

लाल सितारा अब भी जगमगा रहा है

1950 में संविधान लागू होने के बाद 1952 के लोकसभा चुनावों में 16 कम्युनिस्ट जीतकर संसद पहुँचे। इनमें से सात सीटें तेलंगाना के उन हिस्सों में से थीं जहाँ सशस्त्र आंदोलन हुआ था। एक आठवीं सीट हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय (1898-1990) ने जीती थी जो निर्दलीय लड़े थे और सीपीआई ने उन्हें समर्थन दिया था, वे सरोजिनी नायडू (कांग्रेस की भूतपूर्व अध्यक्ष और कवि) और विरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय (कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के एक नेता) के छोटे भाई थे। सशस्त्र आंदोलन के दौरान चट्टोपाध्याय ने ‘टेल्स ऑफ तेलंगाना’ (तेलंगाना की कहानियाँ) नाम से एक कविता लिखी जो इस क्षेत्र और देश भर में काफ़ी पढ़ी गई:

अब मुझे लिखने दो
एक कथा तेलंगाना की, एक दुखद कथा

[तेलंगाना] दूसरा नाम है इतिहास का

ये गूँजता है बार बार
भविष्य के अंधेरे गलियारों में
जिनसे गुज़रता है ऐतिहासिक तर्क और बढ़ता है
अपनी भव्य सिद्धि की ओर।30

तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन की गूँज सही में समय से परे लगातार सुनाई देती रही है।

तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन दरअसल किसानों के अपनी मुक्ति के लिए लड़े गए संघर्ष के लंबे इतिहास का एक अध्याय है, जो 1946 में इस आंदोलन के शुरू होने से बहुत पहले से चला आ रहा है। इसमें किसानों के वे विरोध प्रदर्शन भी शामिल हैं जिनके चलते नेल्लोर में सितंबर 1931 में पहला आंध्र प्रदेश ज़मींदारी विरोधी सम्मेलन हुआ था और साथ ही 1937 में इच्छापूरम (श्रीकाकुलम जिला) से मद्रास तक किसानों का ऐतिहासिक जुलूस भी। किसानों के विरोध प्रदर्शनों की इसी कड़ी के चलते अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) की एक क्षेत्रीय इकाई का गठन हुआ और इसके बाद इस क्षेत्र को दो बार एआईकेएस के सम्मेलन की मेज़बानी भी मिली, एक बार पलासा (1940) और फिर विजयवाड़ा (1944)। विजयवाड़ा के सम्मेलन के लिए एआईकेएस ने 1,00,000 किसानों को लामबंद किया और इसके समापन के बाद एक बड़ा अभियान चला जिसमें 2,000 गाँव की जनता तक किसान संघर्ष का संदेश पहुँचाया गया। इसके अगले साल 50,000 किसानों ने आंध्र क्षेत्र की किसान सभा के सम्मेलन के लिए अपने-अपने गाँव से तेनाली (गुन्टूर जिला) तक रैली निकाली।31 किसानों का संघर्ष तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन में तब्दील हुआ और इसके बाद 1960 के दशक में विद्रोह की नई शृंखला के रूप में जारी रहा।

जब 1953 में आंध्र प्रदेश का गठन हुआ तो भारत सरकार ने इस क्षेत्र में वाणिज्यिक खेती का विकास शुरू किया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से मौजूद समस्याएँ और बढ़ गईं, जैसे जाति आधारित असमानता और कुछ दबंग जातियों द्वारा राज्य भर में कुछ सुविधाएँ हासिल कर लेना, इन दोनों की ही वजह से शोषित जातियों, ख़ासकर भूमिहीन मज़दूरों के खिलाफ हिंसा और उनकी क्षति और बढ़ गई। इससे इस क्षेत्र के किसानों में प्रतिरोध की भावना पैदा हुई जिससे सरकार एक भूमि सुधार जाँच कमेटी बैठाने को मजबूर हुई और 1955 के आंध्र प्रदेश (तेलंगाना क्षेत्र) इनाम उन्मूलन अधिनियम जैसे सुधार पारित हुए।32 यह संघर्ष इस क्षेत्र में किसान आंदोलन का सीधा परिणाम था।

भारत की आज़ादी के बाद हुए कुछ मामूली से सुधारों से खेत मज़दूरों और किसानों के सामने जो संकट था वह ख़त्म नहीं हुआ। तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन के जो संकल्प थे, वो आज भी ज़िंदा हैं और अलग-अलग रूपों में बार-बार उभरेंगे, जिसमें किसानों का सशस्त्र आंदोलन भी शामिल है और इन आंदोलनों के साथ जन्म लेने वाली कविता भी।

सशस्त्र आंदोलन ख़त्म होने के एक दशक बाद, 31 अक्टूबर 1967 को लेविडी गाँव के रहने वाले दो कम्युनिस्ट किसान, कोरन्ना और मन्गन्ना, गिरिजन समागम सम्मेलन (गिरिजन यानी भारत के पूर्वी घाट पर रहने वाले आदिवासी) में जा रहे थे। वो सम्मेलन में पहुँचे इससे पहले ही उन्हें गाँव के ज़मींदारों ने घेर लिया और मार डाला। जब उनकी हत्या की खबर सम्मेलन तक पहुँची तो गिरिजनों ने जवाब में ज़मींदारों पर हमला कर दिया और पूरे इलाक़े में संघर्ष फैल गया। पूरे एक साल तक गिरिजनों और दूसरे आदिवासी किसानों ने आंध्र प्रदेश के इस हिस्से में ज़मींदारों और पुलिस थानों पर हमले जारी रखे। यह शासन के ख़िलाफ़ किसानों के तीखे संघर्ष के एक नए दौर की शुरूआत थी। विद्रोह आस-पास के जिलों में फैला, जिसमें श्रीकाकुलम भी शामिल है जो इसका केंद्र बना। इस आंदोलन के तीन नेता उभरे: सुब्बा राव पाणिग्रही (1933-1969), जो एक मंदिर के पुजारी रह चुके थे, वेमपतापु सत्यनारायण या ‘सत्यम’ (1934-1970), जो एक स्कूल शिक्षक थे, और अदीभाटला कैलासम (1970 में सत्यम के साथ इनकी मृत्यु हुई), वे भी स्कूल शिक्षक थीं। इन्होंने आदिवासियों सहित बड़ी संख्या में किसानों को लामबंद किया कि वे माओवादी रुझान वाली भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की सशस्त्र टुकड़ियों में शामिल हों। भारत सरकार इस माओवादी विद्रोह को कुचलने के लिए आतुर थी इसलिए इस इलाके में 12,000 सैनिक भेजे गए। इन तीनों नेताओं को मार डाला गया और यह आंदोलन अंतत: बिखर गया।

साठ के दशक के अंतिम सालों में इस क्रांतिकारी उबाल के बीच फिल्मकार बी. नरसिंह राव (जन्म 1946) ने ग्रामीण हैदराबाद में आर्ट लवर्स एसोसिएशन की स्थापना की, जहाँ हर हफ़्ते मीटिंग में यह चर्चा होती थी कि किसान संघर्ष की ज़रूरतें पूरी करने के लिए क्रांतिकारी कला की रचना करने की आवश्यकता है। इन्हीं मीटिंगों के दौरान, सदस्यों – जिनमें से अब कई माओवादी आंदोलन में शामिल हैं – ने जन नाट्य मंडली (जेएनएम) की स्थापना की। लोकप्रिय कला की कम्युनिस्ट परंपरा से प्रेरणा लेकर जेएनएम ने लोक गीतों और क्रांतिकारी गीतों को इकट्ठा किया, उन्हें सहेजा और दूसरों से साझा किया, हैदराबाद के आसपास के गाँव में घूमकर कविताएँ इकट्ठा कीं और उनके साथ अपनी कविताएँ साझा कीं।

4 जुलाई 1970 को क्रांतिकारी कलाकारों और लेखकों ने माओवादी रुझान वाले विप्लव रचैतल संगम (इसे विरासम भी कहा जाता था) की स्थापना की, इसके संस्थापक अध्यक्ष थे श्री श्री। ये लेखक और कलाकार जोसेफ स्टालिन और माओत्से तुंग की मार्क्सवादी सांस्कृतिक अवधारणाओं से प्रेरित थे, जिन्होंने कहा था कि कला विषयवस्तु में अनिवार्य रूप से ‘सर्वहारा से जुड़ी, रूप में राष्ट्रीय’ और ‘जनता से निकलकर जनता तक जानी चाहिए’।33 विरासम ने एक मासिक पत्रिका अरुणतारा निकाली, जिसमें कविताओं के साथ राजनीतिक विश्लेषण भी छपते थे। इसमें छपी सामग्री में से सबसे ज़रूरी रही के.जी. सत्यमूर्ति (1931-2012, जिन्हें उनके गुप्तवास के नाम शिवसागर से भी जाना जाता है) की लिखी एक कविता और गीत ‘नारूडो भसकरुडो’ (ओ मनुष्य! ओ भास्कर!, 1970)। यह इतनी महत्त्वपूर्ण इसलिए थी कि यह जनता के लिए बोलचाल की भाषा में लिखी तेलुगू साहित्य में अपनी किस्म की पहली कविता थी।34 यह गीत एक भास्कर नाम के शहीद को श्रद्धांजलि देता है:

तुम सुंदर वृक्ष के बीचे बैठे
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुम्हारी आँखें हैं लाल
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुम कूद पड़े संघर्ष में
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

एक बैरंका वृक्ष के नीचे
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने उठाए हथियार
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
हथियार उठाकर
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने तोड़ दिए संबंध अपने परिवार और समुदाय से
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

एक गोड़दंगी वृक्ष के नीचे
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज़ की
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
धारदार कुल्हाड़ी से
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने वार किया भालू पर
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

एक महुआ वृक्ष के नीचे
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुम लड़े तीर कमान से
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तीर कमान से
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने हासिल की विजय
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

तुम्हारी वीरता देखी
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
उन्होंने [राज्य] ज़हरीली आँखों से

ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
उन्होंने [राज्य] काट दिया तुम्हारा सिर
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
सिंगनेरी सीमा के पास
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

जो राह दिखाई तुमने
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
है हमारा पथ महान
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुम्हारी दिखाई राह पर
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
हम लेंगे शस्त्र थाम
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

एक बैरंका वृक्ष के नीचे
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने उठाए हथियार
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
हथियार उठाकर
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने तोड़ दिए संबंध अपने परिवार और समुदाय से
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!35

నర్రెంగ సెట్టుకింద నరుడో! భాస్కరుడా!
కన్నెర సేస్తివయ్యా నరుడో! భాస్కరుడా!
కన్నార సేసి నీవు నరుడో! భాస్కరుడా!
కదనాన దూకితివా నరుడో! భాస్కరుడా!

బర్రెంక సెట్టుకింద నరుడో! భాస్కరుడా!
బందూకు పడ్తివయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!
బందూకు సేతబట్టి నరుడో! భాస్కరుడా!
బంధాలు తెంచ్తివయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!

గొట్టంకి సెట్టుకింద నరుడో! భాస్కరుడా!
గొడ్డళ్ళు నూర్తివయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!
గొడ్డళ్ళు నూరి నీవు నరుడో! భాస్కరుడా!
గుడ్డెలుగు కొడ్తివయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!

విప్పపూ సెట్టుకింద
నరుడో! భాస్కరుడా!
విల్లు సారించితివా
నరుడో! భాస్కరుడా!

విల్లంబు సారించి
నరుడో! భాస్కరుడా!
విజయ మే అన్నావో నరుడో! భాస్కరుడా!

నీదు శౌర్యం సూసి నరుడో! భాస్కరుడా!
కళ్ళల్లో జిల్లేళ్ళు నరుడో! భాస్కరుడా!


నీ శిరసు తీస్తిరయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!
శింగేరి గట్టుకింద నరుడో! భాస్కరుడా!


నీవు సూపినబాట నరుడో! భాస్కరుడా!
మాదొడ్డ బాటయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!
నీ బాటనే మేము నరుడో! భాస్కరుడా!
బందూకు పడ్తాము నరుడో! భాస్కరుడా!

బర్రెంక సెట్టుకింద నరుడో! భాస్కరుడా!
బందూకు పట్టాము నరుడో! భాస్కరుడా!
బందూకు సేతబట్టి నరుడో! భాస్కరుడా!
బంధాలు తెంచాము నరుడో! భాస్కరుడా!

इन क्रांतिकारी परंपराओं से प्रेरित होकर युवा लोकगीत गायक गुम्मादी विट्ठल राव (1949-2023) – जिन्हें गदर भी कहा गया – विरासम की एक मीटिंग में गए और नरसिंह राव से मिले, जिन्होंने बाद में माँ भूमि (1979) और दासी (1988) जैसी क्रांतिकारी फिल्में बनाईं। नरसिंह ने गदर से कहा ‘एक क्रांतिकारी गीत में जनता की आजीविका के संघर्ष दिखने चाहिए और इस स्थिति से उबरने के उनके दैनिक संघर्ष भी’।.36

ऐसी ही क्रांतिकारी गीत रचने की अपनी तलाश में गदर और उनके ग्रुप को यह लोकप्रिय लोक गीत ‘अपुरा बंडोडो’ (रुको, ओ रिक्शेवाले) मिला:

रिक्शा रोको, रिक्शेवाले।
मैं तुम्हारे पास आती हूँ
तुम और मैं भागते हैं
मैं तुम्हारे गाल पर काट लूँगी!

रुको, रिक्शेवाले!
मैं तुम्हारे रिक्शे के पीछे चलूँगी।
रुको ज़रा पहनने दो मुझे साड़ी
पहनने दो ज़रा ब्लाउज़।
रुको, रिक्शेवाले!
मैं तुम्हारे रिक्शे के पीछे चलूँगी।37

అపుర బండోడో బండెంట నేనొస్తా
నిలుపుర బండోడో బండిమీద నేనొస్తా
నువ్వు నేను పారిపోదాం
నీ బుగ్గ కొరుకుత

అపుర బండోడో బండెంట నేనొస్తా
చీరగట్టిందాకా
రైకా దొడిగిందాకా
అపుర బండోడో
బందెంటనేనొస్తా..

गौर करने पर यह काफी रूमानी लगा और एक रिक्शेवाले की परेशानियों से भरी ज़िंदगी इसमें नहीं दिखाई दी। इस गीत की धुन पर गदर ने इसका एक रूपांतर लिखा जो लोगों की ज़िंदगी से ज़्यादा जुड़ा हुआ था:

गोलनाका पर मैं तुम्हें गोल मिठाई खिलाऊँगी।
सत्य थिएटर में दिखाऊँगी तुम्हें फिल्में।
लाल बाज़ार में दूँगी तुम्हें
खाने को लड्डू।
कारखाने में दिलाऊँगी तुम्हें ताड़ी।
अल्फा होटल में दिलाऊँगी तुम्हें आलू बिरयानी
रुको, रिक्शेवाले
मैं तुम्हारे रिक्शे के पीछे चलूँगी।38
గోల్నాక కాడ నీకు- గోల్‌ మిఠాయ్‌ దినిపిస్తా
సత్యా టాకీస్‌లోన నీక్‌ సిన్మా జూపిస్తా
లాల్‌బజార్‌ కాడా లడ్డు మిఠాయ్‌ దినిపిస్తా
కార్ఖాన కాడా – నిక్‌ కల్లు బోపిస్తా
ఆల్ఫా హోటల్లో ఆలు బిర్యాని దినిపిస్తా
ఆపుర రిక్షోడో రిక్షెంట నేనొస్తా
నిలుపుర రిక్షోడో    రీక్ష మీద నేనొస్తా

लेकिन यह भी नाकाफ़ी लगा। रिक्शेवाले के लिए इतना सब लेने के लिए महिला के पास पैसा कहाँ से आएगा? इसलिए गदर सही संदर्भ की तलाश में लगे रहे:

अगर नहीं चले तुम्हारे हाथ-पाँव, तो खाली रहेंगे हमारे पेट!
हम कर लें जितनी भी मेहनत, खाली रहेंगे हमारे पेट।
इस कांग्रेस राज में, खाली रहेंगे हमारे पेट।
तुम चलाओ अपना रिक्शा और मैं दूँगी तुम्हारा साथ।39
రెక్కలాడితే గాని
డొక్క నిండని మనకు
కాయ కష్టం జేశ్నా – కడుపే నిండని
మనకు
ఈ కాంగ్రెస్ పాలనలో
మన కడుపు నిండదిరా
నిలుపుర రిక్షోడో – రిక్ష మీద నేనొస్తా

यह गीत अपने नवीनतम और अंतिम स्वरूप में बेहद लोकप्रिय हुआ और इसके रचयिता गदर भी। पिछले साल यानी 2023 में 74 बरस की उम्र में गदर की मौत हो गई। वे जन नाट्य मंडली के सबसे प्रसिद्ध कलाकार थे और उन्होंने अपने जीवन काल में 5,000 से ज़्यादा गीत लिखे व गाए थे, जिनमें से कई लोककथाओं में शामिल हो चुके हैं, और लाखों लोग बिना इनके स्रोत को जाने इन्हें बहुत पसंद करते हैं।40

गदर तेलंगाना के मेडक जिले के तुपरण गाँव की एक शोषित जाति से थे और उन्हें पैसों की कमी के चलते इंजीनियरिंग कॉलेज छोड़ना पड़ा। 1972 में वे पीपल्स वॉर ग्रुप में शामिल हुए। आपातकाल (1975-1977) के दौरान जब भारत सरकार ने संविधान की धज्जियां उड़ानी शुरू की तो उन्हें गिरफ़्तार कर पैंतालीस दिन जेल में रखा गया। 1986 में वे अन्डरग्राउन्ड हो गए और आठ महीने दण्डकारण्य जंगल में काम किया। 1992 में उन्होंने ग़रीब परिवारों के बच्चों और पुलिस एनकाउन्टरों में जिनके माँ-बाप मारे गए, उन बच्चों के लिए बोधि स्कूल शुरू किया। 1995 में मुख्यधारा की एक फिल्म के लिए गीत लिखने के लिए पीपल्स वॉर ग्रुप से उन्हें निलंबित कर दिया गया। 6 अप्रैल 1997 को एक अज्ञात व्यक्ति ने उनकी हत्या की कोशिश की। उन्हें छह गोलियाँ मारी गई थीं। वे बच तो गए लेकिन ताउम्र उनकी रीढ़ की हड्डी में एक गोली फँसी रही। लेकिन इस सबके बावजूद उनके गीत नहीं रुके।41

  1. 1940 के दशक के अंत में चले तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष का एक दल (दलम) मार्च करते हुए। साभार: सुनील जाना
  2. १६) के जी सत्यमूर्ति, जिन्हें शिवसागर के नाम से जाना जाता है, पीपुल्स वॉर ग्रुप के संस्थापक थे जिन्होंने तेलुगु कविता ‘नारूडो भसकरुडो’ लिखी थी। साभार: कुरेला श्रीनिवास, 2016
  3. 1940 के दशक के अंत में चले सशस्त्र संघर्ष में शामिल एक दल के सदस्य खाना खाने के लिए रुके। साभार: सुनील जाना
  4. एक जुलूस के दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ आदिवासी कलाकार। साभार: प्रजा नाट्य मंडली फ़ोटोग्राफ़ी अभिलेखागार, तारीख़ अज्ञात

कला को जनता से निकल, जनता तक जाना चाहिए

तेलुगूभाषी लोगों के संघर्षों और जीवन में गीत बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। गीतों में ही इतिहास को बचाए रखा जाता है; गीतों में ही ऐतिहासिक व्याख्याओं को चुनौती देकर वर्ग संघर्ष दिखाया जाता है; और गीतों के ज़रिए ही सामाजिक एकजुटता और आत्मविश्वास के नए संघर्ष जन्म लेते हैं।

दुनियाभर में कई ऐसी कलाकृतियाँ हैं जो ज़मींदारों की निर्दयी सत्ता को चुनौती देती हैं। ज़मींदार न सिर्फ़ किसानों द्वारा पैदा की गई अतिरिक्त फसल पर अपना अधिकार चाहते हैं बल्कि वो अपने प्रति ऐसी श्रद्धा भी चाहते हैं जिसका इंसानियत से कोई मेल नहीं। 1927 में युवा माओत्से तुंग (1893-1976) किसानों की स्थिति का जायज़ा लेने हुनान गए और पूछा:

हज़ारों कानून और राजनीतिक विज्ञान के स्कूल खोले गए हैं, लेकिन क्या ये स्कूल जनता, पुरुषों और महिलाओं तक, ग्रामीण इलाकों के दूरदराज़ के कोनों तक, उतनी राजनीतिक शिक्षा पहुँचा पाए हैं जितनी किसान संगठनों ने इतने कम समय में पहुँचाई है?42

किसान संगठनों ने ही किसानों को नए नारों से अवगत करवाया और उनमें आत्मविश्वास जगाया। किसान संगठनों और उनसे जुड़ी सांस्कृतिक इकाइयों ने ही अपने नाटकों, गीतों और नारों से हज़ार साल की ज़मींदार वर्ग की सत्ता को तोड़ने में मदद दी।

किसानों के ज़हन में यह विचार बहुत गहराई से बैठा हुआ है कि राजाओं और ज़मींदारों के वर्ग को आर्थिक और राजनीतिक ताक़त भगवान ने दी है। इस विचार को ख़त्म करने के लिए साहस, संगठन और आत्मविश्वास की ज़रूरत होती है, और ये मिलते हैं संयुक्त राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्ष से। अगर भूमि पुनर्वितरण के बावजूद किसान ज़मींदारों को दैविक ही मानते रहेंगे तो दबंग जातियाँ हर बार सत्ता में वापसी करती रहेंगी। राजनीतिक संघर्ष सत्तारूढ़ वर्ग की ताक़त को तोड़ता है लेकिन इस जीत को बरक़रार सांस्कृतिक संघर्ष रखता है, और यही सांस्कृतिक संघर्ष ज़मींदारों और किसानों, दोनों को अंतत: इंसान बनने की आज़ादी देता है।


Listen to the song Palleturi pillagada pasulagaase monagaada (Village Boy [bonded child worker] Who Can Herd the Animal Expertly), written by Suddala Hanumanthu and performed by Abbagani Biksham on 23 July 2024

  1. गीत सुनें। सुड्डाला हनुमंथु का गीत ‘पलेतुरी पिल्ला गड़ा पसूलगासे मोनागाड़’ (जानवरों को हाँकने में दक्ष गाँव का लड़का [बँधुआ बाल मज़दूर]) सुनें, जिसे 23 जुलाई 2024 को अब्बागनी बिक्षम ने गाया था।
  2. 1940 के दशक के अंत में छद्मवेश में सशस्त्र संघर्ष की एक टुकड़ी के सदस्य। साभार: सुनील जाना
  3. 1940 के दशक के अंत में, कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य मुक्त हुए गांवों में भूमिहीनों के बीच ज़मीन बाँटने के लिए रस्सी से ज़मीन को मापते और चिह्नित करते हुए। साभार: सुनील जाना
  4. 1940 के दशक के अंत में कम्युनिस्ट पार्टी का एक सदस्य गाँववासियों को शरीर की संरचना के बारे में बताते हुए। इस तरह कम्युनिस्ट पार्टी ने मुक्त हुए गांवों की जनता तक साक्षरता और विज्ञान पहुंचाने का काम भी किया। साभार: सुनील जाना
  5. कम्युनिस्ट कवि और क्रांतिकारी, बंदी यादगिरी जिन्होंने ‘ओ शासक, निज़ाम’ कविता लिखी थी। साभार: कुरेला श्रीनिवास, 2016

संदर्भ सूची

1 V. Ramakrishna, ‘Left Cultural Movement in Andhra Pradesh: 1930s to 1950s’, Social Scientist 40, no. 1–2 (January–February 2012), 21–30.

2 मल्लू स्वराज्यम, ‘न माते तुपाकी तुतलु’ [गोलियों जैसे मेरे शब्द]। (हैदराबाद, हैदराबाद बुक ट्रस्ट, 2019), 23, हमारा अनुवाद।

3 स्वराज्यम, ‘न माते’, हमारा अनुवाद।

4 K. Navaneetham and C. S. Krishnakumar, ‘Mortality Trends and Patterns in India: Historical and Contemporary Perspectives’, in Shaping India: Economic Change in Historical Perspective, eds. D. Narayana and Raman Mahadevan (New Delhi: Routledge, 2020), 266–294.

5 आंध्र और तेलंगाना दोनों तेलुगूभाषी क्षेत्र हैं। आज़ादी से पहले आंध्र ब्रिटिश राज के अंतर्गत आता था जबकि तेलंगाना हैदराबाद के निज़ाम के अधीन था। आज़ादी के बाद और संगठित संघर्ष के बाद इन दो क्षेत्रों को मिलाकर आंध्र प्रदेश (1956) राज्य बनाया गया। 2014 में राज्य को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया गया – आंध्र प्रदेश और तेलंगाना।

6 Tameshnie Deane, ‘The Devadasi System: An Exploitation of Women and Children in the Name of God and Culture’, Journal of International Women’s Studies 24, no. 1 (2022): 8.

7 A. K. Prabhakar, M A Telugu Janapada Vibhagam (Hyderabad: Dr B. R. Ambedkar Open University, 2009).

8 एस वी सत्यनारायण, ‘तेलगुलो उद्यम गीतलु’ (तेलुगू में आंदोलन के गीत)। हैदराबाद: ए पी प्रग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन, 2005, 54–56, हमारा अनुवाद।

9 सत्यनारायण, ‘तेलगुलो उद्यम गीतलु’।

10 P. Sundarayya, Telangana People’s Struggle and Its Lessons (Calcutta: Communist Party of India (Marxist), 1972), 3.

11 Adapa Satyanarayana and Dyavanapalli Satyanarayana, Telangana History, Culture, and Movements (From Pre-History to Formation of the State) (Hyderabad: Telangana Publications, 2022); Adapa Satyanarayana, ‘The Pioneer of People’s Literature in Telangana’, The Hans, 1 November 2016, https://www.thehansindia.com/hans/opinion/news-analysis/how-hurricanes-will-change-as-earth-warms-890664?infinitescroll=1.

12 Sunil Purushotham, From Raj to Republic: Sovereignty, Violence, and Democracy in India (Redwood City: Stanford University Press, 2021), 190. इसके साथ ही देखें Rama Sundari Mantena, ‘The Andhra Movement, Hyderabad State, and the Historical Origins of the Telangana demand: Public Life and Political Aspirations in India, 1900–1956’, India Review 13, no. 4 (2014): 337­­–357.

13 ‘पड़ाव पत’, जयधीर तिरुमाला राय द्वारा संपादित पुस्तक ‘तेलंगाना पोराता पटलु’ में से। हैदराबाद: सहिति सर्कल, 1990, पेज नं 37, हमारा अनुवाद।

14 Purushotham, Raj to Republic, 191.

15 Ramarao Peddi, ‘Theatre of the Marginalised. Politics of Representation’ (Ph.D. Thesis, University of Hyderabad, 2003), 200.

16 यादगिरी, ‘नैज़ामु सरकरोड़ा’, पुस्तक ‘तेलंगाना पोराता पटलु’ में से, पेज नं 96। हमारा अनुवाद।

17 Sundarayya, Telangana People’s Struggle and Its Lessons, 26. See also, G. Kamalakar, ‘Tribal and Peasant Armed Struggle in Telangana’, Interaction 36, no. 1 (2018): 51–60; Dhanaraju Vulli, ‘Making Peoples History in Telangana Movement: Remembering Voyya Raja Ram Dhanaraju’, International Research Journal of Social Sciences 3, no. 6 (June 2014): 37–43.

18 Sundarayya, Telangana People’s Struggle and Its Lessons; Mohan Ram, ‘The Telangana Peasant Armed Struggle, 1946–1951’, Economic and Political Weekly 8, no. 23 (June 1973); Mohan Ram, ‘The Communist Movement in Andhra Pradesh’, Radical Politics in South Asia, eds. Paul Brass and Marcus Franda (Cambridge: MIT Press, 1973); Ravi Narayana Reddy, Heroic Telangana: Reminiscences & Experiences, no.17, October 1973 (New Delhi: Communist Party Publications).

19 V. Ramakrishna, ‘Left Cultural Movement in Andhra Pradesh’.

20 Srinath Sriperumbudur, ‘The Freedom Struggle and the Telugu Song, Theatre, and Cinema in South India’, Journal of Indian History and Culture, no. 28 (December 2021): 448–465.

21 शेख बंदगी के संघर्ष के बारे में और जानने के लिए देखें, Devulapalli Venkateswara Rao, Telangana Peoples’ Armed Struggle (Devulapalli Venkateshwara Rao Research Centre, 2002), 31–39.

22 Ramarao Peddi, ‘Theatre of the Marginalised’, 252–288.

23 Stree Shakti Sanghatana, We Were Making History: Life Stories of Women in the Telangana People’s Struggle (London: Zed Books, 1989), 123.

24 तान्या नाज़ियों से लड़ने वाली एक युवा सोवियत कम्युनिस्ट ज़ोया कोस्मोडेम्यास्काया का छद्मनाम था, इन्हें युद्ध के शुरुआती दौर में ही पकड़ कर फाँसी दे दी गई थी। इनकी कहानी पूरे यूएसएसआर और दुनियाभर के कम्युनिस्टों में फैल गई। 1944 में इनके जीवन पर लेव आर्नश्तम ने बेहतरीन फिल्म ज़ोया बनाई। Ramarao Peddi, ‘Theatre of the Marginalised’, 201.

25 Sanghatana, We Were Making History, 194–195.

26 Vulli Dhanaraju, ‘Voice of the Subaltern Poet: Contribution of Suddala Hanumanthu in Telangana Peoples’ Movement’, Research Journal of Language, Literature, and Humanities 2, no. 7 (2015); और देखें: के आनंदाचारी द्वारा संपादित पुस्तक ‘प्रजाकवि सुड्डाला हनुमंथु समग्र साहित्यम-जीवितम’ [जनकवि सुड्डाला हनुमंथु का संपूर्ण साहित्य एवं जीवनी] (हैदराबाद: नव तेलंगाना पब्लिशिंग हाउस, 2024)।

27 जयधीर तिरुमाला राय, ‘तेलंगाना पोराता पटलु’, पेज नं 146, हमारा अनुवाद।

28 पसनूरी रविंदर, ‘तेलंगाना उद्यम पाट-प्रदेशिका’ [तेलंगाना आंदोलन के गीत: क्षेत्रीय अवलोकन] (हैदराबाद: तेना, 2016); एस वी सत्यनारायण, ‘तेलगुलो उद्यम गीतलु’ [तेलुगू में आंदोलन के गीत], (हैदराबाद: पोत्ती श्रीरामुलू तेलुगु यूनिवर्सिटी, 2019)।

29 Sundarayya, Telangana People’s Struggle and Its Lessons, vii.

30 Reproduced in Sundarayya, Telangana People’s Struggle and Its Lessons, 383–414.

31 Telakapalli Ravi, ‘Peasant Struggles in Andhra Pradesh and Telangana: Reports from the Field’, Review of Agrarian Studies 5, no. 2 (2015): 114; तेलकपल्ली रवि, जी रघुपाल, साय्याद निसार, एवं महेंद्र एम रेडी, ‘वीर तेलंगाना माड़ी’ [हमारा वीर तेलंगाना] (हैदराबाद: भारत की कोम्मनस्त पार्टी (मार्क्सवादी), 2006); जी रघुपाल एवं बी वेंकटेश्वरलु, ‘सी सी ओ नलगोंडा वीरूलु’ [तैयार रहो, नलगोंडा के नायक](हैदराबाद: प्रजाशक्ति, 2011); यू रामकृष्ण, ‘कृष्णा ज़िला कम्युनिस्ट उद्यम गाथालु: त्यागदनुला वीरचरित्रालु’ [कृष्णा ज़िला के कम्युनिस्ट आंदोलन और वीरतापूर्ण बलिदान की कहानियाँ] (विजयवाड़ा: भारत की कॉम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), 2012); के आनन्दाचारी, पी वी कृष्णा राव, एवं नन्ना नगेस्वर राव, ‘खम्माम ज़िला कम्युनिस्ट योधुलू’ [खम्माम ज़िला के कम्युनिस्ट योद्धा] (खम्माम: बोडेपड़ि विज्ञान केंद्र, 2012); एम वी एस कोटेस्वर राव, सी एच हरी बाबू, एवं सुधा किरण, ‘गुंटूर डिस्ट्रिक्ट कम्युनिस्ट वीरूलू’ [गुंटूर ज़िला के कम्युनिस्ट शहीद] (हैदराबाद: प्रजाशक्ति बुक हाउस, 2013); जी रघुपाल, एवं एस यादगिरी, ‘वारंगल वीर गाथालु’ [वारंगल की वीर गठाएँ] (वारंगल: भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), 2006); वाई सिद्दय्या, ‘प्रकासम ज़िला अमर वीरुलु’ [प्रकासम ज़िला के अमर सैनिक] (हैदराबाद: प्रजाशक्ति बुक हाउस, 2012).

32 K. Srinivasulu, ‘Caste, Class, and Social Articulation in Andhra Pradesh: Mapping Differential Regional Trajectories’, Working Paper no. 179, Overseas Development Institute, Osmania University, 2002, 8.

33 Joseph Stalin, J. V. Stalin Works, vol. 7 (Moscow: Foreign Languages Publishing House, 1954); N. Venugopal Rao, Understanding Maoists: Notes of a Participant Observer from Andhra Pradesh (Kolkata: Setu Prakashani, 2013), 99; Tricontinental: Institute for Social Research, Go to Yan’an: Culture and National Liberation, dossier no. 52, 16 May 2022, https://dev.thetricontinental.org/dossier-yanan-forum/.

34 Venugopal, Understanding Maoists.

35 K. G. Satyamurthy, ‘Narudo Bhaskarudo’, in Shivasagar Poetry, ed. Gurram Sitharamulu (Hyderabad: Anvikshi Publishers, 2019), 36–38.

36 बी नर्सिंग राव, ‘अग्नि सरस्सुना विरिसिना वज्रम’ [अग्नि ताल में खिला हीरा] (हैदराबाद: विस्वनाथ साहित्य पीठम, 2023), 5, हमारा अनुवाद।

37 Gaddar, My Life Is a Song: Gaddar’s Anthems for the Revolution, trans.Vasanth Kannabiran (New Delhi: Speaking Tiger Books, 2021), E-book.

38 Gaddar, My Life Is a Song, 44–64.

39 Gaddar, My Life Is a Song.

40 For more on Gaddar and for a selection of his songs in English translation, see My Life Is a Song.

41 Gaddar, My Life Is a Song; Keshav Kumar, ‘Singing for Revolution: Revisiting the Life and Lyrics of Gaddar’, Maidaanam, 3 October 2023, https://maidaanam.com/singing-for-revolution-revisiting-the-life-and-lyrics-of-gaddar/.

42 Mao Zedong, ‘Report on an Investigation of the Peasant Movement in Hunan’, in Selected Works of Mao Tse-tung, vol. 1 (Peking: Foreign Languages Press, 1965), 47.

एक नए शीत युद्ध से उत्तर-पूर्व एशिया में हड़कंप

यह डोसियर सियोल स्थित इंटरनैशनल स्ट्रैटिजी सेंटर (आईएससी) के साथ मिलकर तैयार किया गया है और इसे डे-हान सॉन्ग ने लिखा है। आईएससी की सामग्री तैयार करने वाली टीम (एलिस किम, जिओवानी वासतीदा, ग्रेग चंग, मरियम इब्राहीम, मैथ्यू फिलिप्स और ज़ोइ युंगमि ब्लैंक) का ख़ास तौर से शुक्रिया और साथ ही ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान का उनके सहयोग, सुझाव और संपादन के लिए शुक्रिया, जिससे यह डोसियर संभव हो सका।

जापानी दंपति मारुकी इरी (1901-1995) और मारुकी तोषी (1912-2000) ने बत्तीस साल में ‘द हिरोशिमा पैनल्स’ (चित्रों की एक शृंखला) तैयार किया। इनके ज़रिए वे अगस्त 1945 में संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बमों से हुई तबाही को दिखाना चाहते थे। इस बत्तीस साल के अरसे में उन्होंने हिरोशिमा और नागासाकी के नरसंहार को दर्शाते हुए लगभग 900 मानव आकृतियां बनाईं (इस हमले में कितने लोग मारे गए, इसका सटीक आँकड़ा नहीं है, लेकिन अनुमान है कि 220,000 लोगों की मौत हुई थी)।1 सुमी-ई नाम की पारंपरिक जापानी वाश तकनीक से बनी यह शृंखला जंग के ख़िलाफ़ और शांति के पक्ष में एक ज़ोरदार आवाज़ है और यही आवाज़ यह डोसियर इस क्षेत्र और बाक़ी दुनिया के लिए बुलंद कर रहा है।

इरी और तोषी मारुकी, I प्रेत, 1950 , हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

18 अगस्त 2023 को संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया के राष्ट्र प्रमुख कैम्प डेविड में एक ऐतिहासिक सम्मेलन के लिए इकट्ठा हुए। मेरीलैंड के फ्रेडरिक काउंटी में राष्ट्रपति के एकांतवास पर तीनों नेताओं ने उत्तर-पूर्व एशिया में मुख्यत: चीन के उभार को रोकने के लिए ‘त्रिपक्षीय सुरक्षा सहयोग’ के लिए एक नए समझौते की घोषणा की।2 इससे पहले ऐसी संधि करने की वाशिंगटन की कोशिशों पर जापान और दक्षिण कोरिया के आपसी संबंधों की कटुता की छाया पड़ती रही थी, जिसकी जड़ें जापानी उपनिवेशवाद के इतिहास में हैं। लेकिन इस बार यह सैन्य गुट बन पाया क्योंकि औपनिवेशिक और युद्ध अपराधों के लिए जापान को जो क्षतिपूर्ति चुकानी थी, वो दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति यूं सुक येओल ने माफ़ कर दी।

यूएस के नेतृत्व में चीन के ख़िलाफ़ चल रहे नए शीत युद्ध की वजह से उत्तर-पूर्व एशिया में अस्थिरता पैदा हो रही है। आपसी टकराहट की वजह से अशांति के ख़तरे से ग्रस्त इस इलाक़े में एक विस्तृत सैन्यकरण अभियान चल रहा है, जो जापान और दक्षिण कोरिया से लेकर ताइवान जलडमरूमध्य और फ़िलिपींस से लेकर ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत महासागर के द्वीपों तक फैला हुआ है। वाशिंगटन की शह पर जापान के प्रधानमंत्री फूमियो किशिदा ने अपने देश को फिर से हथियारबंद करने की प्रक्रिया तेज़ कर दी है। उनका लक्ष्य है 2027 तक सैन्य ख़र्च को दोगुना करना और दुश्मन पर निशाना साधने के लिए लंबी दूरी की मिसाइलें हासिल करना।3 इस बीच जैसे-जैसे यूएस इस क्षेत्र में अपनी शक्ति बढ़ाने की कोशिश कर रहा है कोरिया की शांति प्रक्रिया कमज़ोर हो गई है। हालांकि सैन्यकरण के लिए प्रायः उत्तरी कोरिया को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है लेकिन यह हमेशा से अपना दबदबा बनाए रखने की रणनीतियों के लिए एक बहाना रहा है – पहले यह सोवियत संघ के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाता था और अब चीन के विरुद्ध।

सच कहा जाए तो उत्तर-पूर्व एशिया में ‘पुराना’ शीत युद्ध कभी ख़त्म ही नहीं हुआ, आज भी इसकी आग कोरियाई प्रायद्वीप और ताइवान जलडमरूमध्य में सुलग रही है। सोवियत संघ के विघटन और वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन को सम्मिलित किए जाने के बावजूद, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद द्विपक्षीय सैन्य समझौतों का जो यूएस नेटवर्क या जाल तैयार किया गया था, उसने आज भी इस क्षेत्र को विभाजित कर रखा है। पर आपसी टकराहट के बीच ऐसे बहुत से सकारात्मक आंदोलन हैं, जो ओकिनावा द्वीप से लेकर चहल-पहल भरे सियोल महानगर तक उत्तरपूर्व एशिया में शांति, पर्यावरण को बचाने और लोगों की बेहतरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शांतिमय और सहयोगपूर्ण भविष्य के लिए ज़रूरी है कि यूएस के नेतृत्व में चल रहे इस नए शीत युद्ध को रोका जाए और पिछले 70 सालों से इस क्षेत्र में न्याय और सुलह के रास्ते का रोड़ा बने द्विपक्षीय समझौतों को ख़त्म किया जाए।


इरी और तोषी मारुकी, II अग्नि, 1950 , हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

भाग I: नया शीत युद्ध

 यूएस की एशिया केंद्रित नीति

2008 के अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संकट के बाद से वैश्विक व्यवस्था में बदलाव आया है। यह अब संयुक्त राज्य अमेरिका की अगुआई वाले सात देशों के समूह (जी7) पर केंद्रित न रहकर कुछ कम एकध्रुवीय हो गई है, हालांकि अब तक इस नई व्यवस्था को ठीक से परिभाषित नहीं किया जा सका है। विश्व में जारी आर्थिक संकट (या तीसरी महामंदी) से निपट पाने में अमेरिका और उसके साथियों की अक्षमता, चीन के आर्थिक उत्थान और विश्व राजनीतिक परिदृश्य में ग्लोबल दक्षिण के मुल्कों के, ख़ासकर ब्रिक्स के ज़रिए आगमन से पश्चिमी ताक़तों के नेतृत्व और उनकी नीतियों की वैधता ख़तरे में पड़ गई है।4

इस संदर्भ में यूएस की तमाम सरकारों की विदेश नीति लगातार पूर्व की ओर केंद्रित होती जा रही है ताकि चीन के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके। वाशिंगटन विश्व में चले आ रहे अपने वर्चस्व के लिए चीन को सबसे बड़ा ख़तरा समझता है। ओबामा प्रशासन ने इस नीति को ‘पिवट टू एशिया’ (एशिया केंद्रित नीति) का नाम दिया। यह एक रणनीतिक परिवर्तन था जिसके आर्थिक और सैन्य, दोनों पहलू थे। एक तरफ ट्रांस-पेसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) का ओबामा के शब्दों में उद्देश्य था ‘इस सदी में दुनिया की अर्थव्यवस्था के नियम संयुक्त राज्य अमेरिका लिखे न कि चीन जैसे देश’।5 दूसरी तरफ़ यह तय हुआ कि यूएस पेसिफिक कमांड (जिसका नाम 2018 में इंडो-पेसिफिक कमांड कर दिया गया) के विस्तार के साथ साल 2020 तक यूएस के 60% युद्धपोत एशिया- प्रशांत क्षेत्र में तैनात हों।6 यहाँ याद रखना चाहिए कि चीनी सरकार ने साफ़ कर दिया था कि वह विश्व पर अपना वर्चस्व नहीं जमाना चाहती। उसके बाद भी यूएस ने इस शत्रुतापूर्ण विदेश नीति की शुरुआत की। उदाहरण के लिए, 2012 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) ने अपनी 18वें राष्ट्रीय कांग्रेस में एक ऐसी विदेश नीति पेश की जिसका मकसद ‘एक नए तरीके के शक्ति संबंध’ बनाना था, जिसमें चीन का ‘शांतिपूर्ण उत्थान’ सीधे-सीधे संयुक्त राज्य अमेरिका के विरोध में नहीं होगा।7

ट्रम्प और बाइडन दोनों ने अपने-अपने तरीक़ों से ओबामा की एशिया केंद्रित नीति को ही जारी रखा, लेकिन इसमें एक बड़ा अंतर भी था। जब तक ट्रम्प ने राष्ट्रपति पद संभाला तब तक साफ़ हो चुका था कि यूएस कांग्रेस टीपीपी का समर्थन नहीं करने वाली। यह जल्दी ही बिखर गया (जबकि एशियाई देश – जिनमें चीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है – 2020 में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) पर हस्ताक्षर कर एकजुट हो गए)। चीन के ख़िलाफ़ ट्रम्प के व्यापार युद्ध ने इस क्षेत्र में ओबामा के बहुपक्षीय आर्थिक हस्तक्षेप की जगह ले ली, क्योंकि वाशिंगटन अब बीजिंग के प्रति ज़्यादा आक्रामक रुख अपना रहा था।8 ट्रम्प सरकार ने अपनी नैशनल सिक्युरिटी स्ट्रैटिजी,2017 (राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति, 2017) में ‘फ्री एण्ड ओपन इंडो-पेसिफिक’ (मुक्त और खुला हिंद-प्रशांत) को रेखांकित करते हुए चीन को एक मुख्य ख़तरे के रूप में पेश किया; उस पर आरोप लगाया कि वह ‘अमेरिका की ताक़त, प्रभाव और हितों को चुनौती देना’ चाहता है और अंतत: ‘अमेरिकी मूल्यों और हितों के विपरीत एक दुनिया गढ़ना’ चाहता है।9

बाइडन सरकार ने ट्रम्प की आर्थिक संरक्षणवाद (जिसे कई बार ‘डिकप्लिंग’ यानी अलग होने की नीति भी कहा जाता है) और सैन्यवाद की नीति को और सख़्त बनाया। बाइडन सरकार ने कई तरह के निर्यात नियंत्रणों के ज़रिए कोशिश की चीन के लिए सबसे बेहतरीन सेमीकंडक्टर (जिन्हें चौथी औद्योगिक क्रांति के लिए सबसे अहम माना जाता है) हासिल करना मुश्किल हो जाए और इससे जुड़ी अन्य तकनीकें भी; साथ ही सेमीकंडक्टर उद्योग में अग्रणी देशों जैसे दक्षिण कोरिया, जापान, ताइवान और नीदरलैंड पर भी दबाव डाला कि वे चीन पर इसी तरह के प्रतिबंध लगाएँ।10 इसी बीच चिप्स एण्ड साइंस ऐक्ट (2022) के ज़रिए बाइडन ने सेमीकंडक्टर निर्माण की यूएस में ‘पुनर्स्थापना’ को बढ़ावा देने की कोशिश की।11 पेंटागन के एक भूतपूर्व अधिकारी जॉन बेटमैन ने जो बाइडन की नीतियों के बारे में कहा, ‘रणनीतिक लक्ष्य और राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ इससे पहले कभी इतनी स्पष्ट नहीं थीं। चीन का तकनीकी विकास किसी भी क़ीमत पर धीमा कर दिया जाएगा।… [यूएस] खुले तौर पर चीन को अपना एक विकसित आर्थिक समकक्ष बनने से रोकेगा।’12

इससे भी ज़्यादा ख़तरनाक यह है कि बाइडन ने अपनी पिछली सरकारों के इंडो-पेसिफिक सैन्यकरण की रणनीति को और भी तेज़ कर दिया। बाइडन प्रशासन ने ट्रम्प शासन के दौर में दोबारा शुरू हुए ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और यूएस के एक रणनीतिक ग्रुप ‘ चतुर्भुज सुरक्षा संवाद’ (क्वाड) को और भी मज़बूत किया, इसके साथ ही नए गुट भी बनाए गए जैसे ऑस्ट्रेलिया-यूनाइटेड किंगडम-संयुक्त राज्य अमेरिका (AUKUS) परमाणु-संचालित पनडुब्बी समझौता और जापान-दक्षिण कोरिया-संयुक्त राज्य अमेरिका (JAKUS) सुरक्षा पार्टनरशिप। इन सब क़दमों से एशिया में तनाव और हथियारों के लिए होड़ बढ़ रही है, ख़ासतौर से उत्तर-पूर्व एशिया में जहाँ यूएस सेना की विदेशी क्षेत्रों में मौजूदगी दुनिया में किसी दूसरे क्षेत्र से सबसे ज़्यादा है।13

इरी और तोषी मारुकी, III जल, 1950 , हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

एक एशियाई नाटो के निर्माण की कोशिश?

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के नेतृत्व वाली ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ को उसकी भारी-भरकम सैन्य उपस्थिति के माध्यम से बनाए रखा जाता है, जो हवाई और गुआम से लेकर चीन के तट तक फैली हुई है। उत्तर-पूर्व एशिया में यह सेना मुख्यत: जापान और दक्षिण कोरिया में मौजूद है। इन दोनों को मिलाकर 80,000 से ज़्यादा सैनिक और 193 अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, जो यूएस के विदेशी ज़मीन पर सैन्य अड्डों का लगभग एक चौथाई हैं।14 इतने बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती से अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया की त्रिपक्षीय सैन्य साझेदारी काफ़ी हद तक उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के स्तर पर पहुंच गई है। 2023 कैम्प डेविड सम्मेलन के अंत में अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया ने एक साझा वक्तव्य जारी किया, जो उनकी ‘त्रिपक्षीय सुरक्षा सहयोग’ का ख़ाका सामने रखता है। इसमें उन्होंने ‘एक-दूसरे से मशविरा करने’ और ‘क्षेत्रीय चुनौतियों, उकसावे और ख़तरों का जवाब देने में समन्वय’ का वादा किया, उन्होंने चीन और उत्तर कोरिया का नाम अपनी ‘साझा चिंताओं’ के तौर पर सामने रखा। सबसे बड़ी बात यह कि यूएस ने स्पष्ट शब्दों में दोहराया कि वह जापान और दक्षिण कोरिया को किसी भी तरह के सैन्य हमले से बचाने के लिए दृढ़संकल्प है और इसके लिए अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल करेगा।15 इन्हें समग्रता में देखने से पता चलता है कि ये वादे नाटो सैन्य संधि के ‘संयुक्त सुरक्षा’ के सिद्धांत के कितने ज़्यादा करीब हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका इस तरह की तुलना को छुपाने की फ़िराक़ में रहता है। इसके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सलीवन ने कहा कि JAKUS समझौता ‘पेसिफिक के लिए एक नाटो नहीं’ है और इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यह यूएस की विदेश नीति के लिए कोई ‘नया कदम’ भी नहीं। लेकिन इसके साथ ही सलीवन ने इस समझौते को एक ‘महत्त्वपूर्ण सफलता’ मानते हुए ख़ुशी भी ज़ाहिर की।16 JAKUS समझौते के तहत जो ‘मशविरा’ और ‘संयुक्त जवाबी कारवाई’ के वादे हैं, वे भले ही नाटो के ‘संयुक्त सुरक्षा’ के सिद्धांत से कुछ कम हों, लेकिन यूएस अधिकारियों ने फिर भी इस समझौते को ‘सुरक्षा और व्यापक सहयोग को बुनियादी तौर से अगले स्तर तक पहुँचाने’ वाला समझौता कहकर ख़ूब सराहा है।17 तीनों देशों ने कुछ साझे मूल्यों की रक्षा करने का वचन दिया, चीन को एक ख़तरा माना और मिसाइल सुरक्षा और सालाना त्रिपक्षीय अभ्यासों के लिए भी हामी भरी, इससे ज़ाहिर है कि JAKUS सुरक्षा समझौते में अहम सैन्य संधि वाले पहलू हैं जो दक्षिण कोरिया और जापान को यूएस-चीन के बीच के किसी तनाव में घसीट सकते हैं, खासतौर से ताइवान के इर्द-गिर्द।

सैन्य दृष्टि से देखें तो JAKUS समझौता चीन के तट के पास ‘प्रथम द्वीप शृंखला’- जो जापान से शुरू होकर ताइवान और फ़िलिपींस से होते हुए मलेशिया तक फैली है- तक यूएस की पहुँच बना देगा। शीत युद्ध के दौरान यूएस अधिकारियों ने इस द्वीपों की ‘शृंखला’ की अवधारणा तैयार की थी, यह उनके लिए नियंत्रण रेखा थी, जिसका इस्तेमाल उन्होंने सोवियत संघ और चीन पर अंकुश लगाने की अपनी रणनीति के तहत किया। पहले सैन्य अभ्यास कभी-कभार ज़रूरत के आधार पर होते थे, लेकिन अब ये वार्षिक, बहु-क्षेत्रीय त्रिपक्षीय अभ्यासों की तरह नियमित रूप ले चुके हैं, जिनसे इन तीनों देशों की सेनाओं में आपसी तालमेल बेहतर हुआ है।18 व्यापक स्तर पर देखा जाए तो संयुक्त राज्य अमेरिका इस त्रिपक्षीय समझौते का इस्तेमाल इस क्षेत्र में अपनी ताक़त को बचाए रखने और मज़बूत करने के लिए करना चाहता है। इसके लिए वह एकीकृत वायु और मिसाइल सुरक्षा (आईएएमडी) रणनीति के ज़रिए चीन के ए2/एडी (एंटी एक्सेस/एरिया डिनायल) मिसाइल सिस्टम को निशाना बनाना चाहता है, जो यूएस नौसेना के जहाज़ों को इस क्षेत्र तक पहुंचने और किसी तरह की घेरेबंदी का प्रयास करने से रोकता है।19 चीन की ए2/एडी रणनीति के तहत लंबी दूरी की मिसाइलें तैनात की गई हैं, जो यूएस विमान वाहक पोतों को चीनी तटों के आसपास किसी तरह की कार्रवाई नहीं करने देतीं। इसके जवाब में IAMD ने कोरिया में टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (THAAD) मिसाइलों से लेकर जापानी एजिस युद्धपोतों तक सैन्य प्रणाली को ‘आक्रामक-रक्षात्मक एकीकरण’ के तहत एक संयुक्त नेटवर्क में जोड़ने की योजना बनाई है ताकि किसी भी तरह के हमले से बचाव हो सके।20 इसके साथ ही तीनों देशों के रडारों को भी हवाई में यूएस के प्लैटफॉर्म में ही एकीकृत कर दिया जाएगा।21

दक्षिण कोरिया और जापान पर अधिक सुरक्षा सहयोग स्थापित करने के लिए जो अमेरिकी दबाव रहा है, वह मुख्यतः इस एकीकृत नेटवर्क के निर्माण के लिए ही है, जिसमें 2016 में हस्ताक्षरित सैन्य सूचना समझौते की सामान्य सुरक्षा (GSOMIA) के माध्यम से सैन्य खुफ़िया जानकारी साझा करना शामिल है। GSOMIA को वैसे तो उत्तर कोरिया की मिसाइली कार्रवाई से निपटने के लिए एक ज़रिया बताया जाता है लेकिन इसके तहत व्यापक जानकारियां साझा करने का मतलब है कि समझौते के सभी पक्षों के लिए चीन और रूस से जुड़ी जानकारियाँ भी साझा करना अनिवार्य है। यूएस के साथ दक्षिण कोरिया और जापान के पहले से मौजूद द्विपक्षीय समझौतों की बुनियाद पर GSOMIA ने रियल-टाइम मिसाइल की चेतावनी का डाटा सहित त्रिपक्षीय खुफ़िया जानकारी साझा करने के रास्ते खोल दिए हैं।23

इरी और तोषी मारुकी, IV इंद्रधनुष, 1951, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

उत्तर कोरिया का हौवा

दूसरा ताइवान की ‘रक्षा’ की ज़रूरत। लेकिन यह याद रखा जाना चाहिए कि यूएस के लिए उत्तर कोरिया के साथ शांति क़ायम करना कभी भी सोवियत संघ और चीन के प्रभाव को रोकने की रणनीतियाँ बनाने से ज़्यादा ज़रूरी नहीं रहा। 1953 में कोरिया युद्ध विराम समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद से यूएस ने कभी भी उत्तर कोरिया के साथ अमन क़ायम करने की कोई निरंतर प्रक्रिया चलाने की कोशिश नहीं की है। इतने दशकों में अगर कभी बातचीत की शुरुआत भी हुई तो उसे नाकाम किया गया, रोक दिया गया या सत्ता परिवर्तन की वजह से नज़रंदाज़ किया जाता रहा है। उदाहरण के लिए क्लिंटन के कार्यकाल में यूएस और उत्तर कोरिया ने ‘अग्रीड फ्रेमवर्क’ (1994) पर हस्ताक्षर किए, जिससे शांति क़ायम होने और परमाणु हथियारों से मुक्ति का रास्ता लगभग खुल रहा था, लेकिन रिप्ब्लिकन पार्टी के दबदबे वाली यूएस कांग्रेस ने इसे रोक दिया और फिर बुश द्वितीय के शासन काल में नवरूढ़िवादी जॉन बोल्टन और रॉबर्ट जोसेफ ने इसे ख़त्म कर दिया।24 यही सिलसिला 2019 में दोहराया गया, जब यूएस और उत्तर कोरिया की बातचीत बंद हो गई क्योंकि ट्रम्प प्रशासन ने वियतनाम के हनोई में एक सम्मेलन के दौरान संभावित समझौते की शर्तें अचानक बदल दीं (एक बार फिर बोल्टन ने इसमें अहम भूमिका निभाई)।25

कोरियाई प्रायद्वीप में एक नियंत्रित तनाव और टकराव बनाए रखना यूएस के लिए इस क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई बरक़रार रखने का एक अच्छा बहाना है। मसलन 2017 में यूएस के THAAD मिसाइल रोधी सिस्टम दक्षिण कोरिया में यह कहकर लगाया गया कि यह उत्तर कोरिया के हमले से रक्षा करेगा, लेकिन इसे जहाँ लगाया गया था वहाँ से यह सियोल महानगरीय क्षेत्र समेत देश की आधी आबादी की रक्षा नहीं कर सकता था।26 लेकिन THAAD इस जगह से चीन के मिसाइल सिस्टम को काफी अंदर तक भेद सकता है।27 नए शीत युद्ध के ज़रिए यूएस ने कोरियाई प्रायद्वीप में शांति प्रक्रिया को लटका रखा है और भू-राजनीतिक बँटवारों को और बढ़ा रहा है, इस बँटवारे में दक्षिण के देश अमेरिका की तरफ़ और उत्तर के मुल्क रूस और चीन की तरफ़ जा रहे हैं।

इरी और तोषी मारुकी, V लड़के और लड़कियाँ, 1951 , हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

तनाव का केंद्र ताइवान

इसी तरह ताइवान जलडमरूमध्य में भी शांति स्थापित करना यूएस के लिए कभी मुख्य उद्देश्य नहीं रहा है। वैसे तो बीजिंग, ताइपे और वाशिंगटन, तीनों ही ने औपचारिक तौर पर इस द्वीप और मुख्य भूमि को ‘एक चीन’ का हिस्सा स्वीकार किया है, लेकिन यूएस की दखलंदाजी की वजह से 1949 में चीन के गृहयुद्ध खत्म होने के बाद से ही ये दोनों बँटे हुए हैं। ताइवान से जुड़ा हालिया तनाव 2016 में हुआ, जब यूएस-समर्थक और अलगाववादी डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) के साई इंग-वन चुनाव जीते। डीपीपी का मानना है कि ताइवान एक ‘संप्रभु राज्य’ है और ‘चीनी जनवादी गणराज्य का हिस्सा नहीं है’।28 यह स्थिति ट्रम्प और बाइडन दोनों के ही शासन में बिगड़ी है, जब इस दौरान यूएस अधिकारियों और दोनों ही मुख्य राजनीतिक दलों से जुड़े नीति निर्माताओं के इस द्वीप पर अभूतपूर्व और विवादित दौरे हुए। 2020 में ट्रम्प के स्वास्थ्य मंत्री एलेक्स अज़ार 1979 के बाद ताइवान के आधिकारिक दौरे पर जाने वाले अमेरिकी मंत्रिमंडल के सबसे बड़े अधिकारी बने। इसके दो साल बाद बाइडन के कार्यकाल में अमेरिकी सभा की स्पीकर नैन्सी पेलोसी इस द्वीप के दौरे पर गईं और 1997 के बाद ऐसा करने वाली पहली पदेन स्पीकर बनीं। इनके दौरों ने चीन को व्यापक स्तर के सैन्य अभ्यासों के ज़रिए जवाब देने के लिए उकसाया, जो उसके 2005 के अलगाव-विरोधी क़ानून के मुताबिक था कि ‘चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने के लिए ग़ैर-शांतिपूर्ण तरीके और अन्य आवश्यक तरीके अपनाये जा सकते है’ यदि ‘पुन: एकीकरण की शांतिपूर्ण संभावनाएँ… पूर्ण रूप से चुक गई हों’।29 2022 में सीपीसी की 20वीं राष्ट्रीय कांग्रेस में चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग ने पुरज़ोर तरीक़े से अपना मत फिर से सामने रखा:

ताइवान चीन का ताइवान है। ताइवान का प्रश्न सुलझाना चीन का मुद्दा है और इसे चीन ही सुलझाएगा। हम शांतिपूर्ण तरीके से पुन: एकीकरण की पूरी ईमानदारी से कोशिश करेंगे, लेकिन हम ताकत का इस्तेमाल न करने का वादा कभी नहीं करेंगे और हम हर आवश्यक विकल्प चुनने का अधिकार रखते हैं। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ इस मामले में हस्तक्षेप कर रही बाहरी ताक़तों और ‘स्वतंत्र ताइवान’ चाहने वाले कुछ अलगाववादियों और उनकी फिरकापरस्त गतिविधियों के लिए है: यह बात ताइवान के हमारे हमवतनों के लिए बिल्कुल भी लागू नहीं होती।30

ताइवान पर वाशिंगटन का बढ़ता फोकस इस बात का संकेत है कि ताइवान में बैठी यूएस समर्थित सेना की ताक़त चीनी सामने कमज़ोर पड़ रही है। जैसा कि 2002 में यूएस कांग्रेस की अनुसंधान सेवा की एक रिपोर्ट में माना गया था, ‘दशकों तक ताइवान की सेना चीन की सेना से ज़्यादा विकसित थी… जैसे-जैसे चीन की वायु, जल, मिसाइल और उभयचर सेनाएँ और सक्षम हुईं, ताइवान जलडमरूमध्य में शक्ति का संतुलन बहुत हद तक पीआरसी (पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) के पक्ष में झुक गया है’।31 एक अधिक सक्षम चीन का सामना होने पर यूनाइटिड स्टेट्स ने ताइवान पर ‘ पॉर्क्यूपाइन रणनीति’ ( इसे साही रणनीति कहते हैं। साही एक जानवर है, जिसके पूरे बदन पर कांटे होते हैं। कोई जानवर उस पर हमला करता है तो वे कांटे खड़े हो जाते हैं, जिससे हमलावर जानवर घायल होकर भाग खड़ा होता है। ऐसे ही कोई कमज़ोर देश इस तरह अपनी तैयारी करता है कि वह बड़े हमलावर देश को भारी नुक़सान पहुंचाकर अपने क़दम पीछे खींचने पर मजबूर कर सके। इसके तहत ताइवान ने अपने समुद्री तटों में ‘साही के कांटों’ की तरह घातक हथियार जमा रखे हैं। शहरों में छापामार युद्ध की योजना बनाई है। ताइपे में कुछ भवनों का निर्माण ऐसा किया गया है कि इसे कभी भी हालात के अनुसार बैरक में बदला जा सकता है।) अपनाने का दबाव डाला जिसके तहत इस द्वीप को धड़ल्ले से हथियार बेचे गए ताकि अगर बीजिंग जबरन पुन: एकीकरण की कोशिश करे तो चीन की मुख्य धरती को काफी हद तक नुकसान पहुँचाना ताइवान के लिए मुमकिन हो।32 यह रणनीति अंतत: इस बात पर निर्भर करती है कि ताइवान, चीन की धरती पर भारी जनहानि और बर्बादी तथा उससे भी बड़े स्तर पर ताइवान के विध्वंस को स्वीकार करने के लिए तैयार है कि नहीं।

इरी और तोषी मारुकी, VI परमाणु रण, 1952 , हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

सैन्य तनाव बढ़ने का ख़तरा

अगर यह माना जाए कि मिसाइल रक्षा तकनीक यूएस और उसके साथियों की हिफ़ाज़त करेगी, जिससे नए शीतयुद्ध में सैन्य तनाव कम होगा, तो इसका दूसरा पहलू यह भी है कि यह सुरक्षा कवच अपने आप में अभेद्य नहीं है। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मिसाइलों का पता लगाने के लिए रडार और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए इंटरसेप्टर बनाने में कितने संसाधन ख़र्च किए जाते हैं, मिसाइलों की अपेक्षाकृत सस्ती लागत और आसान उत्पादन हमलावर देश को इस सुरक्षा तंत्र को छिन्न-भिन्न करने के लिए और अधिक मिसाइलें बनाने को प्रेरित करता है।33 ऐसा इसलिए है क्योंकि सुरक्षा तंत्र को आक्रामक मिसाइलों की तुलना में अधिक सटीकता की आवश्यकता होती है, क्योंकि उन्हें आकाश में एक गतिशील वस्तु पर निशाना लगाकर उसे नष्ट करना होता है। इसका मतलब हुआ कि आत्मरक्षा के लिए एक गोली को गोली से तबाह करना होता है। सही मायनों में ग्राउन्ड-बेस्ड मिडकोर्स डिफेन्स (GMD) सिस्टम, जो मिसाइल हमलों से यूएस की रक्षा करता है, बेहद नियंत्रित अभ्यासों के दौरान सिर्फ़ 55% ही कारगर रहा है। 90 % तक कारगर होने के लिए GMD सिस्टम को आते हुए हर वॉरहेड (मिसाइल) के लिए तीन इंटरसेप्टर (हमलावर मिसाइल को नष्ट करने के लिए जवाबी मिसाइल) दागने पड़ेंगे। पूरे यूएस मिसाइल आत्मरक्षा नेटवर्क में अब तक के अभ्यासों में सफलता लगभग 80% तक ही सीमित रही है।34 मिसाइल आत्मरक्षा तकनीक संयुक्त राज्य अमेरिका को भी पूरी तरह से बचाने के लिए नाकाफ़ी हैं, ताइवान, दक्षिण कोरिया और जापान की क्या ही बात की जाए। परिस्थिति का बिगड़ना सिर्फ़ एक चीज़ से ‘रुका हुआ’ है, वह है तुरंत व्यापक स्तर पर जवाबी कार्रवाई का डर जिसकी वजह से टकराव नियंत्रण से बाहर हो जाएगा और परिणाम होगा दोनों पक्षों की भारी क्षति।

इरी और तोषी मारुकी, VII बैम्बू ग्रोव, 1954, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

भाग II: ‘पुराना’ शीत युद्ध कभी ख़त्म हुआ ही नहीं

उत्तर-पूर्व एशिया में मौजूदा तनाव इस क्षेत्र में ‘पुराने’ शीत युद्ध के दौरान पड़ी दरार के अंदर ही सुलगता चला आ रहा है। इस दरार के एक तरफ़ थे यूएस, दक्षिण कोरिया, जापान और ताइवान तो दूसरी तरफ़ थे सोवियत संघ, चीन और उत्तर कोरिया। इस नए शीत युद्ध को समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि इस इतिहास ने किस तरह जापान, कोरियाई प्रायद्वीप और ताइवान को गढ़ा है।

इरी और तोषी मारुकी, VIII राहत कार्य, 1954, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

जापान की फिर से हथियारबंदी

1947 में द्वितीय विश्व युद्ध में हार के बाद जापान ने एक नया ‘शांति संविधान’ लागू किया जिसमें इसने संकल्प लिया कि ‘हमेशा के लिए युद्ध… और अंतर्राष्ट्रीय मतभेदों को खत्म करने के लिए धमकी या ताकत के इस्तेमाल को त्याग देगा’।35 लेकिन जल्द ही चीनी क्रांति हुई और कम्यूनिज़्म के विस्तार के डर से संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान को इस क्षेत्र में एक कम्युनिस्ट-विरोधी दीवार बनाने का काम किया। जैसा कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय के इतिहासकार याद करते हैं, ‘एक बार फिर से हथियारबंद और युद्धप्रिय जापान का विचार अब यूएस अधिकारियों को नहीं डराता था; बल्कि असली ख़तरा कम्यूनिज़्म के विस्तार का लगने लगा था, ख़ासतौर से एशिया में’।36 मित्र देशों और जापान के बीच 1951 में सैन फ्रांसिस्को शांति संधि की शुरुआत करते हुए, अमेरिका ने इस क्षेत्र में द्विपक्षीय गठबंधनों का एक नेटवर्क बनाया, जिसे सैन फ्रांसिस्को प्रणाली के रूप में जाना जाता है, जिसने पूर्वोत्तर एशिया को ताइवान जलडमरूमध्य और कोरियाई प्रायद्वीप के साथ विभाजित किया।37 सात दशकों से भी ज़्यादा से सैन फ्रांसिस्को प्रणाली ने इस क्षेत्र में एक अंदरूनी बँटवारे को बनाए रखा है, साथ ही ताइवान जलडमरूमध्य और कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव की चिंगारी को भी।

संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए मुख्य मुद्दा युद्धोत्तर एशिया में शांति स्थापित करना नहीं था, बल्कि कम्यूनिज़्म के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई के लिए सैन्य शक्ति को बढ़ाना था। सैन फ्रांसिस्को संधि में यूएस की तरफ से मुख्य मध्यस्थ जॉन फॉस्टर डल्स ने वाशिंगटन का मत इस तरह पेश किया: ‘क्या हमें जापान में अपने जितने चाहे सैनिक, जहाँ चाहे और जब तक चाहे रखने का अधिकार है? यही मुख्य प्रश्न है’।38 यह लक्ष्य पाने के लिए यूएस ने युद्ध के बाद न्याय की प्रक्रियाओं को बाधित किया, उपनिवेशवादी और युद्ध अपराधों के लिए जापान की जिम्मेदारियों को नज़रंदाज किया (जिसमें नरसंहार, जैविक युद्ध, यौन ग़ुलामी, मनुष्यों पर परीक्षण और बंधुआ मज़दूरी शामिल थे)।39 जापान के युद्ध अपराधों का जिन्होंने सबसे ज़्यादा दंश झेला, उन्हें किसी भी तरह की क्षतिपूर्ति देने से जापान को इस संधि ने आज़ाद कर दिया। लेकिन सैन फ्रांसिस्को संधि पर हस्ताक्षर करने वाले 51 भागीदारों में जो देश नहीं शामिल थे वे थे चीन, ताइवान और उत्तर तथा दक्षिण कोरिया – इन सब ने जापान का क़ब्ज़ा झेला था। इसके साथ ही जापानी साम्राज्य (1868-1945) के कई युद्ध अपराधियों और उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों को द्वितीय विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद यूएस द्वारा माफ़ी दे दी गई और उन्हें उनके पदों पर बहाल भी कर दिया गया। यूएस का ध्यान सिर्फ और सिर्फ शीत युद्ध में ख़ुद को मज़बूत करने पर था।

इनमें से ही था उत्तरपूर्व चीन में जापान के कठपुतली राज्य मान्चुको का गवर्नर नोबुसुके किशी, जो ‘शोवा युग के राक्षस’ के तौर पर कुख्यात था।40 युद्ध के बाद किशी को प्रथम श्रेणी के युद्ध अपराधी के रूप में गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन उसे रिहा कर दिया गया, और यूएस के समर्थन से वह 1957 से 1960 तक जापान का राष्ट्रपति रहा।41 किशी की दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी लिबरल डेमोक्रैटिक पार्टी को शीतयुद्ध के दौरान सीआईए से लाखों डॉलर की सहायता मिली और जापान में 1955 से (1993-1994 और 2009-2012 को छोड़कर) लगातार इसी का शासन रहा है।42 इतिहासकार एंड्रू लेवीडिस के शब्दों में, ‘किशी और वर्तमान के बीच एक सीधी रेखा है जो जापान के [मौजूदा] रूढ़िवादी अभिजात वर्ग और साम्राज्यवादी युग को जोड़ती है’।43

दक्षिणपंथ को सत्ता में रखकर, संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान को अपने साम्राज्यवादी अतीत पर विचार करने से रोका और जापान के फिर से सैन्यीकरण को बढ़ावा देने और एशिया में अमेरिकी रणनीतिक स्थिति को मज़बूत करने के लिए उसके इतिहास पर पर्दा डाल दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के ख़त्म होने के बाद से यूएस ने जापान में सैन्य मौजूदगी बनाए रखी है जिसमें ओकिनावा पर कब्ज़ा भी शामिल है जो 1945 से 1972 तक चला (1972 में ओकिनावा को जापान को लौटा दिया गया लेकिन इस द्वीप पर यूएस सेना बनी रही)। इस दौर में यूएस के कहने पर जापान लगातार फिर से हथियारबंद हुआ है और उसने अपनी सेना का विस्तार किया है। इस संबंध में कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य हैं:

  • 1954 में एक नई सेना तैयार की गई जपानीज़ सेल्फ-डिफेन्स फोर्सेस (JSDF) जबकि युद्ध से परेशान देश की जनता इसके प्रतिरोध में खड़ी हुई।
  • 1960 में JSDF ने प्रतिबद्धता ज़ाहिर की कि वह जापानी क्षेत्रों में मौजूद यूएस की सेना पर हमलों का जवाब देगा।
  • 1992 में जापानी सेना ने अंतर्राष्ट्रीय शांति मिशनों में हिस्सा लेना शुरू किया।
  • 1997 में यूएस और जापान ने नए नियम अपनाये जिनसे JSDF को ‘आस-पास के क्षेत्रों’ में कार्रवाई करने की छूट मिल गई।
  • 2000 के दशक में जापान ने यूएस के समर्थन से अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में विदेशी क्षेत्र में सैन्य कार्रवाइयों में हिस्सेदारी की।44

आज दुनिया के किसी भी दूसरे देश से ज़्यादा यूएस के सैनिक अड्डे (120) और सैनिक (लगभग 54,000) जापान में हैं।45

यूएस के एशिया की ओर रुझान के साथ ही जापान की नए सिरे से हथियारबंदी बहुत तेज़ी से बढ़ी है। 2014 में तत्कालीन प्रधानमंत्री आबे शिन्ज़ो (नोबुसुके किशी के पोते) ने जापान के युद्धोत्तर संविधान की पुनर्व्याख्या करने के लिए ‘सक्रिय शांतिवाद’ का विचार सामने रखा।46 इस पुनर्व्याख्या ने जापान को ‘सामूहिक आत्म-रक्षा’ की स्थिति में शक्ति का प्रयोग करने की इजाज़त दे दी, इस ‘सामूहिक आत्म-रक्षा’ की स्थिति में ‘किसी ऐसी विदेशी राष्ट्र पर सशस्त्र हमला जिसके जापान से करीबी रिश्ते हों और ऐसे हमले की वजह से जापान के अस्तित्व को ख़तरा हो’।47 दिसम्बर 2022 में प्रधानमंत्री फूमियो किशिदा के शासन में जापान ने एक नई नैशनल सिक्युरिटी स्ट्रैटिजी (राष्ट्रीय सुरक्षा नीति) जारी की जिसमें चीन को ‘जापान में शांति और सुरक्षा बरक़रार रखने तथा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में शांति और स्थिरता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा’ बताया गया।48 इसके साथ ही किशिदा ने सैन्य ख़र्च पर 1976 से लागू उच्च सीमा को भी ख़त्म कर दिया जिसके तहत यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1% से ज़्यादा नहीं हो सकता था और घोषणा की कि जापान 2027 तक इसे बढ़ाकर जीडीपी का 2% कर देगा – यह नाटो सदस्यों के ख़र्च के लक्ष्य के बराबर है और इससे जापान दुनिया में सैन्य ख़र्च के मामले में तीसरे नंबर का देश बन जाएगा।49 2022 में ही जापान का प्रति व्यक्ति सैन्य ख़र्च चीन से लगभग दोगुना था, जापान का सैन्य खर्च बढ़ाने से यह फ़र्क भी बढ़ता ही जाएगा।50

इरी और तोषी मारुकी, IX Yaizu, 1955, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

कोरिया का बँटवारा

जापान के औपनिवेशिक शासन (1910-1945) से कोरिया के आज़ादी हासिल करने के तुरंत बाद 15 अगस्त 1945 को यूएस ने 38 डिग्री उत्तरी अक्षांश के आधार पर प्रायद्वीप का बँटवारा कर दिया, जिससे दक्षिण में कोरिया गणराज्य (ROK) बना और उत्तर में कोरिया लोकतांत्रिक जनवादी गणराज्य (DPRK) बना। इस बँटवारे का, जो आज भी बरक़रार है, कोई भी ऐतिहासिक आधार नहीं, सिवाय यूएस हस्तक्षेप के: दो यूएस कर्नलों ने एक नैशनल जिओग्रैफिक के मानचित्र पर मनमर्ज़ी से लकीर खींच दी और एक झटके में एक जनता को दो हिस्सों में बाँट दिया।51 इसके पाँच साल बाद कोरिया युद्ध छिड़ गया। यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी मिलिटरी गवर्नमेंट (USAMGIK) यूँ तो उदार लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने का दावा करता है लेकिन दक्षिण में इसने, इतिहासकार ब्रूस कमिंगस के शब्दों में, ‘कोरिया को कोरिया की जनता के हवाले’ करने से मना कर दिया।52 कोरिया प्रायद्वीप में ज़मीनी स्तर पर लोकतांत्रिक जनता की विधानसभाओं को मान्यता देने की बजाय USAMGIK ने उन्हें कम्युनिस्ट होने का आरोप लगाकर उनका दमन किया, उन्हें तरह-तरह से परेशान किया। दक्षिण की आबादी – जिसके बारे में कमिंगस कहते हैं ‘इसमें बड़ा हिस्सा गरीब किसानों का था और आबादी के बहुत छोटे हिस्से के पास ही ज़्यादातर संपत्ति केंद्रित थी’ – के भीतर बाज़ार व्यवस्था के प्रति रुझान पैदा करने के लिए यूएस ने छोटे से अभिजात वर्ग को सहारा देकर ऊँचा उठाया, यह वही वर्ग था जिसने जापानी कब्ज़े के दौरान भी उनसे हाथ मिलाया था।53

यह थी कोरियाई प्रायद्वीप के विभाजन और कोरिया युद्ध की पृष्ठभूमि। इस युद्ध के छद्म चरित्र के बावजूद इसकी विभीषिका, मौतों और बर्बादी ने दक्षिण में एक कम्युनिस्ट विरोधी विचारधारा को पनपने की ज़मीन दी जिससे तानाशाहों को सहारा मिला और दशकों तक राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत असहमति की आवाज़ को लगातार कुचला गया।54 उत्तर कोरिया के साथ मेल-मिलाप के सिलसिले ने रेड-बेटिंग (किसी विचार को कम्युनिस्ट मानकर उस पर हमला करना) के ज़रिए पैदा ध्रुवीकरण को कम ज़रूर किया है, लेकिन कम्युनिस्ट-विरोधी सोच की वजह से दक्षिण कोरिया में अब भी सही और खुली बहस नहीं हो पा रही। इसके साथ ही औपनिवेशिक काल के दौरान दक्षिण में साथ मिलकर चलने की परंपरा के बारे में चर्चा नहीं होती और यही आज उसका चरित्र बन गया है। कोरिया की आज़ादी की 70वीं वर्षगांठ के मौके पर समाचार समूह Newstapa ने एक डाक्यूमेंट्री Collaboration and Forgetting (2015) [समझौते करना और भूल जाना] में ख़ुलासा किया कि दक्षिण में कोरिया के कई स्वतंत्रता सेनानियों के वंशज ग़रीबी में जी रहे हैं क्योंकि उनके परिवारों को कम्युनिस्ट मानकर उनका बहिष्कार किया गया, जबकि जापानी शासन से समझौते करने वालों के वंशज अपनी बड़ी ज़मीनों के सहारे बड़े आराम की ज़िंदगी काट रहे हैं।55

JAKUS त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौता इसी इतिहास का नया अध्याय है। पहले कोरिया के एक जापानी उपनिवेश होने की सच्चाई ने कभी भी जापान और दक्षिण कोरिया में इस तरह की कोई साझेदारी नहीं होने दी। इस रुकावट को पार करने के लिए दक्षिण कोरिया के रूढ़िवादी यूं सुक-येओल ने जापान को उसके अपराधों की ज़िम्मेदारी से आज़ाद कर दिया। उदाहरण के लिए यूं ने 2018 में आए दक्षिण कोरिया के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को नज़रअंदाज़ किया, जिसमें जापानी कंपनी मित्सुबिशी को कोरियाई लोगों से जबरन काम कराने के लिए ज़िम्मेदार माना गया था।56 इसके अतिरिक्त यूएस और चीन के प्रति पूर्ववर्ती प्रशासन (मून जे-इन) की संतुलित नीति के उलट यूं प्रशासन ने खुले तौर पर यूएस परस्त नीति अपनाई है।57 यूं की पीपल्स पावर पार्टी दक्षिण कोरिया के रूढ़िवादी आंदोलन की सबसे बड़ा राजनीतिक पुनरावृत्ति है, इस आंदोलन की जड़ें जापानी उपनिवेशवाद से समझौते और यूएस कब्ज़े में दिखती हैं।58

इरी और तोषी मारुकी, X अर्ज़ी, 1955, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

ताइवान, एक ‘न डूब सकने वाला विमान वाहक पोत’

चीन का गृह युद्ध कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (CPC) और राष्ट्रवादी कुओमिनतांग (KMT) के बीच 1927 से लेकर 1945 तक रुक-रुक कर चला। किसी भी हाल में कम्युनिस्टों की विजय को रोकने के मकसद से यूएस ने KMT की हर संभव मदद की, जैसे इसे 1945 और 1949 के बीच 200 करोड़ डॉलर की मदद दी।59 फिर भी जीत CPC की हुई और चीन की मुख्य भूमि पर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) की नींव पड़ी जबकि KMT भागकर ताइवान चली गई, जहाँ उसने एक निर्वासित सरकार बनाई यानी रिपब्लिक ऑफ चाइना (POC)। मुख्यभूमि से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित ताइवान को वाशिंगटन ने बीजिंग पर दबाव बनाने और उसे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में अलग-थलग करने के लिए इस्तेमाल किया (मसलन, 1949-1971 के बीच यूएस और KMT, PRC को संयुक्त राष्ट्र से बाहर रखने में कामयाब रहे क्योंकि उनका मत था कि ताइवान स्थित ROC प्रशासन ही पूरे चीन की एकमात्र जायज़ सरकार थी)। यूएस अधिकारी तो खुलेआम इस द्वीप को एक ‘न डूब सकने वाला विमान वाहक पोत’ कहते थे।60

शीत युद्ध के दौरान यूएस के समर्थन वाली ROC ने ताइवान में एक दमनकारी तानाशाही स्थापित की, जिसमें 1949-1987 का 38 साल का लंबा सैन्य शासन भी शामिल है जिसे ‘व्हाइट टेरर’ [सफेद आतंक] कहा गया। इन सालों में जबर्दस्त राजनीतिक दमन किया गया। 140,000-200,000 लोग जेल और और उत्पीड़न के शिकार हुए और 3,000-4,000 लोगों को मृत्युदंड दिया गया।61 हालांकि वाशिंगटन ने 1970 के दशक में चीन से अपने संबंधों को सामान्य करने के दौरान आधिकारिक तौर से ताइवान से अपने संबंध ख़त्म कर दिए लेकिन इसने द्वीप से ‘अनौपचारिक’ रिश्ते बनाए रखे जिसमें बहुत गहरे सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक संबंध शामिल हैं। अब अपने नए शीत युद्ध के तहत यूएस ताइवान के शस्त्रीकरण के अपने कार्यक्रम को ज़ोर-शोर से चला रहा है जिसमें इसका साथ अलगाववादी ताक़तें दे रही हैं।62 चीन ने साफ़ कर दिया है कि उसके लिए ताइवान एक ‘लक्ष्मण रेखा है जिसे लाँघा नहीं जाना चाहिए’, ऐसे में यूएस के लगातार हस्तक्षेप से इस क्षेत्र में बड़ा तनाव शुरू होने का ख़तरा मंडरा रहा है।63

इरी और तोषी मारुकी, XI माँ और बच्चा, 1959, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

भाग III: उत्तर-पूर्व एशिया में शांति की राह

उत्तर-पूर्व एशिया में टकराव शुरू होने से रोकने के लिए ज़रूरी है कि यूएस के नेतृत्व में सैन्य समझौतों की योजना और इस क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाले सैन्यीकरण की प्रवृत्ति समाप्त हो। लेकिन सतत शांति स्थापित करने के लिए सामाजिक आंदोलनों और सरकारों को इससे भी आगे जाना होगा और उपनिवेशवाद, शीत युद्ध और लगातार चल रहे विदेशी हस्तक्षेप ने यहाँ जो ऐतिहासिक बँटवारे तैयार कर दिए हैं, उन्हें ख़त्म करना होगा। दोनों कोरियाई देशों को शांति और सुलह का अपना रास्ता चुनने की आज़ादी दी जानी चाहिए। चीन की मुख्यभूमि और ताइवान को विदेशी दख़ल के बिना अपने आज़ाद भविष्य को चुनने की आज़ादी दी जानी चाहिए। जापान को अपने साम्राज्यवादी इतिहास की ज़िम्मेदारी लेनी होगी और उसके साथ जीना सीखना होगा। और इस सबसे बढ़कर यूएस को यहाँ से बाहर होना होगा।

28-29 अक्टूबर 2023 को इंटरनैशनल स्ट्रैटिजी सेंटर (ISC) [अंतर्राष्ट्रीय रणनीति केंद्र] ने एक अंतर्राष्ट्रीय फ़ोरम आयोजित किया जिसका नाम था ‘शांति की स्थापना : उत्तर-पूर्व एशिया में युद्ध का प्रतिकार’ इसमें यूएस सैन्यवाद के ख़िलाफ़ पहली पंक्ति में लड़ाई लड़ रहे कई संगठनों और व्यक्तियों ने हिस्सा लिया।64 इस फ़ोरम और दूसरी जगहों से प्राप्त इस क्षेत्र में ज़मीनी आंदोलनों के अनुभव ने शांति की राह की रुकावटों और संभावनाओं दोनों को रेखांकित करने में मदद की।

इरी और तोषी मारुकी, XII तैरते चिराग़, 1968, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

ओकिनावा में सैन्यीकरण विरोधी संघर्ष

ओकिनावा द्वीप जापान की कुल ज़मीन के महज़ 1% हिस्से में है, लेकिन यूएस सेना ने अपने कुल अड्डों का 74% यहीं बना रखा है।65 2019 में एक ग़ैर-बाध्यकारी जनमत संग्रह में ओकिनावा की 72% जनता ने फूटेनमा मरीन कॉर्प्स एयर स्टेशन के बदले हेनोको-औरा खाड़ी में यूएस के एक नए सैन्य अड्डे के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट किया।66 यह विरोध यूएस क़ब्ज़े के एक बेहद हिंसक इतिहास – जिसमें 1995 में यूएस सैनिकों द्वारा एक बारह साल की लड़की का सामूहिक बलात्कार भी शामिल है – और इस द्वीप से जापान की धोखाधड़ी के इतिहास की वजह से है। उदाहरण के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब यूएस सेना इस ओर बढ़ रही थी तो सबसे भीषण लड़ाइयों में जापान ने मुख्य भूमि को बचाने के लिए ओकिनावा के नागरिकों को ढाल की तरह इस्तेमाल किया।67 ओकिनावा को तब अमेरिकी सैन्य शासन के लिए बलिदान कर दिया गया था ताकि जापान सैन फ्रांसिस्को शांति संधि के हिस्से के रूप में अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता को पुनः प्राप्त कर सके।

शांति की तलाश के साथ-साथ ओकिनावा के सामाजिक आंदोलनकारी पर्यावरण, जन स्वास्थ्य और जेन्डर-आधारित हिंसा से जुड़े कारणों की वजह से यूएस सेना के अड्डों की मौजूदगी के ख़िलाफ़ भी लड़ाई लड़ रहे हैं। मसलन, ओकिनावा एनवायरनमेंट जस्टिस प्रोजेक्ट [ओकिनावा पर्यावरण न्याय कार्यक्रम] फूटेनमा अड्डे को हेनोको-औरा खाड़ी ले जाने का विरोध कर रहा है क्योंकि यूएस सैनिक अड्डों से जहरीला प्रदूषण फैलता हैं।68 जबकि कादेना एयर बेस के ख़िलाफ़ संघर्ष यूएस सैनिकों द्वारा यौन हिंसा के साथ-साथ शहरी इलाक़ों के ऊपर से उड़ने वाले विमानों से जुड़े हादसों के मामलों को लेकर किया जा रहा है। अमूमन जो आंदोलन किन्हीं अन्य कारणों से शुरू होते हैं वो शांति और न्याय के संघर्षों में तब्दील हो जाते हैं।

जापान में सैन्य ख़र्च बढ़ाने के लिए सरकार को या तो करों में बढ़ोत्तरी करनी होगी या सामाजिक कल्याण की योजनाओं के ख़र्च में कटौती, दोनों ही सूरतों में उसके लिए जनता का समर्थन कम हो जाएगा। इस समर्थन को बढ़ाने के लिए जापान की सरकार ने JSDF सेना को ओकिनावा के दक्षिणी द्वीपों के कुछ हिस्सों में तैनात करने की कोशिश की है। इन द्वीपों की जनता के युद्ध और क़ब्ज़े को लेकर वे अनुभव नहीं, जो दूसरों के हैं और यह काफ़ी हद तक चीन, ताइवान और उत्तर कोरिया को ख़तरनाक साबित करने वाले दुष्प्रचार पर भरोसा करके चलती है। ओकिनावा एनवायरनमेंट जस्टिस प्रोजेक्ट के निर्देशक हिदेकी योशीकावा के मुताबिक ज़मीनी संगठन कोशिश कर रहे हैं कि ‘एक व्यापक और समन्वित शांति आंदोलन तैयार करें’, कार्यक्रम और रैलियाँ आयोजित करें जिनसे जापान की मुख्यभूमि और विदेशों के शांति संगठन एक साथ आ सकें। योशीकावा का कहना है कि बढ़ते हुए JAKUS त्रिपक्षीय समझौते ने तीनों देशों में ‘शांति आंदोलनों के बीच एक जवाबी समझौते की नींव रख दी है’।69

इरी और तोषी मारुकी, XIII अमेरिकी युद्ध बंधकों की मौत, 1971, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

कोरियाई प्रायद्वीप में एक शांति समझौता

जून 2020 से जुलाई 2023 तक यानी कोरिया युद्ध छिड़ने और युद्धविराम समझौते की क्रमश: 70वीं वर्षगांठों के मौक़े पर दक्षिण कोरिया और दुनिया के बाक़ी हिस्सों के आंदोलनों और लोगों ने कोरिया युद्ध को हमेशा के लिए ख़त्म करने के लिए एक शांति संधि की माँग के समर्थन में हज़ारों हस्ताक्षर इकट्ठा किए। शांति और पुनर्एकीकरण का यह संघर्ष सिविल सोसाइटी के प्रयासों से शुरू हुआ और 13-15 जून 2000 को प्योंगयांग में आयोजित पहले अंतर-कोरिया सम्मेलन में इसका व्यापक और संगठित रूप सामने आया, जहाँ दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति किम डे-जुंग और उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग-इल द्वारा संयुक्त घोषणा जारी हुई। यह मुलाक़ात उत्तर कोरिया में गुप्त रूप से हुई (ताकि यूएस अड़ंगा न लगाए), जिसमें घोषणा हुई कि शांति और पुनर्एकीकरण का रास्ता ‘देश के सर्वेसर्वा कोरिया के लोगों के संयुक्त प्रयासों’ से हासिल किया जाएगा। 70 लेकिन यूएस की मंशा कुछ और ही थी। 11 सितंबर के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमलों के बाद यूएस राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने उत्तर कोरिया को ईरान और इराक़ के साथ ‘बुराई की धुरी’ का हिस्सा बताया, जिससे दक्षिण कोरिया के लिए उम्मीद के स्रोत की तरह आई प्रारम्भिक शांति प्रक्रिया का रास्ता रुक गया। इस प्रक्रिया का समर्थन बुश के पूर्ववर्ती बिल क्लिंटन ने भी किया था। यह एक और मौक़ा था जब कोरियाई प्रायद्वीप में शांति यूएस के भूराजनीतिक हितों की गिरफ़्त में आ गई।

कोरियाई युद्ध को ख़त्म करने के इन सिविल और राजनयिक कोशिशों के अलावा दक्षिण कोरिया के लोगों ने प्रायद्वीप में यूएस की सेना की मौजूदगी के ख़िलाफ़ हमेशा संघर्ष जारी रखा है। 2007 से गैंगजेओंग के गाँववासियों ने एक नौसेना अड्डे के निर्माण का विरोध किया है, जिससे जेजू आइलैंड पर यूएस के युद्धपोत खड़े हो सकेंगे। ओकिनावा के हेनोको-औरा खाड़ी के संघर्ष की ही तरह यह आंदोलन भी पहले पर्यावरण को ख़तरे के अंदेशे से शुरू हुआ लेकिन जल्दी ही सैन्यीकरण के ख़िलाफ़ एक बड़ी लड़ाई में बदल गया। जेजू में सैन्य अड्डा विरोधी आंदोलन वक़्त के साथ छोटा हो गया है लेकिन इसके बावजूद यह जारी है और साबित कर रहा है कि सैन्यीकरण कैसे प्रभावित समुदायों को शांति की लौ में बदल देता है।

इरी और तोषी मारुकी, XIV कौवे, 1972, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

ताइवान जलडमरूमध्य में शांति

दक्षिण कोरिया और जापान के मुकाबले ताइवान में शांति आंदोलन कम विकसित है। नैशनल यांग-मिंग चाओ-थोंग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और ISC के अंतर्राष्ट्रीय फ़ोरम में भाग लेने वाले, तायवे फ़ू के मुताबिक ताइवान की आबादी लगभग द्वीप की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के मुताबिक ही बँटी हुई है, 50% चाहते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ जुड़े रहना चाहिए (इनमें भी 10% स्वतंत्रता के पक्ष में हैं जबकि 40% यूएस परस्त स्थिति के) और बाकी के 50% चाहते हैं चीन की तरह ज़्यादा संतुलन फिर से बैठाया जाए (इनमें 10% फिर से चीन में विलय चाहते हैं और बाकी 40% एक तटस्थ स्थिति)। फू पॉर्क्युपाइन रणनीति की आलोचना करते हुए कहते हैं कि यह रणनीति ताइवान के सैन्यकरण और ज्यादा सामाजिक व्यय की ज़रूरत के बीच विरोधाभास को सामने लाती है। यह रणनीति अमेरिका की सलाह पर ताइपेई ने यह मानकर अपनाई कि उसके ऊपर हमले का अंदेशा है, जिसमें ताइवान जलडमरूमध्य के असंख्य नागरिक मारे जा सकते हैं।

हालांकि जनवरी 2024 के आम चुनावों में सत्तारूढ़, अलगाववादी रुझान वाली डेमोक्रैटिक प्रग्रेसिव पार्टी (DPP) की जीत हुई लेकिन हाल के चुनावी आँकड़ों से पता चलता है कि ताइवान की जनता के विचार शायद बदल रहे हैं। 2016 और 2020 के चुनावों में जहाँ DPP को बहुमत मिला था, 2024 के चुनावों में DPP का वोट प्रतिशत गिरकर 40% रह गया, 2020 से सत्रह अंक नीचे। जबकि बीजिंग के साथ अच्छे संबंध रखने वाली विपक्षी पार्टियाँ – KMT और ताइवान पीपल्स पार्टी – ने मिलकर 2024 में 60% वोट हासिल किए। इसके साथ ही चुनावों से पहले अमेरिकन पोर्ट्रेट सर्वे में पता चला कि ताइवान की 34% आबादी मानती है कि यूएस भरोसेमंद देश है, यह आँकड़ा 2021 के आँकड़े से ग्यारह अंक नीचे आ गया, कुछ समीक्षकों ने इशारा किया कि यूक्रेन में चल रहे युद्ध की वजह से यूएस की साख को धक्का लगा है।71

इरी और तोषी मारुकी, XV नागासाकी, 1972, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

शांति आंदोलन के लिए एक प्रस्ताव

संयुक्त राज्य अमेरिका चीन के विरुद्ध एक नया शीत युद्ध चला रहा है ताकि उसका वैश्विक वर्चस्व बना रहे और साथ ही उसकी बनाई हुई ‘नियम बद्ध व्यवस्था’ भी। इन ‘नियमों’ को अमूमन संयुक्त राष्ट्र के चार्टरों के समान बताया जाता है लेकिन ये दोनों एक समान नहीं हैं।72 यूएन के चार्टर 193 सदस्य देशों की सर्वसम्मति को दर्शाते हैं जबकि ‘नियम बद्ध व्यवस्था’ के ‘नियम’ अंतर्राष्ट्रीय कानूनों से नहीं निकले; बल्कि इन्हें यूएस ने अपने हितों की रक्षा के लिए थोपा है। इसी बिन्दु पर ‘काउन्सल ऑन फ़ॉरन रिलेशन्स’ की 2022 की एक रिपोर्ट में कहा गया कि ‘मानव अधिकारों और पर्यावरण संधियों की पुष्टि के मामले में यूएस सबसे खराब रिकार्ड वाले देशों में से है’।73

‘नियम बद्ध व्यवस्था’ की अमानवीयता इज़राइल द्वारा गज़ा में फिलिस्तीनियों के क़त्लेआम में पूरी तरह खुलकर सामने आ गई है, क्योंकि इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका पूरी तरह इज़राइल को समर्थन दे रहा है। इस सबसे से कहीं ज़्यादा, यह व्यवस्था मानव अधिकारों, न्याय या आज़ादी को बचाने की कोशिश नहीं कर रही बल्कि यह रक्षा कर रही है उस दुनिया की जिसमें यूएस का वर्चस्व है और जो 900 यूएस सैन्य अड्डों – जिनमें से सैंकड़ों चीन को घेरे हुए हैं – के वैश्विक जाल को कमर पर बाँधे खड़ी है।74

उत्तर-पूर्व एशिया में जो भारी बदलाव हो रहे हैं, वो इस क्षेत्र को युद्ध की ओर धकेल रहे हैं। ऐसे समय में इस क्षेत्र के शांति आंदोलनों को कुछ विशेष माँगों और आदर्शों के आधार पर एकजुट हो जाना चाहिए, जिनमें महत्त्वपूर्ण हैं:

  1. JAKUS सुरक्षा समझौते की समाप्ति- बहुआयामी सैन्य समझौते, जिनका स्वरूप ही दूसरे देशों को अकेला कर देना या निशाना बनाना है, क्षेत्रों को विपरीत गुटों या कैम्पों में बाँटते हैं, तनाव बढ़ाते और सैन्य ख़र्च को बढ़ावा देते हैं। यूएस, जापान और दक्षिक कोरिया के बीच का त्रिपक्षीय समझौता भी इससे अलग नहीं है।
  2. यूएस के युद्ध अभ्यासों का ख़ात्मा- वैसे तो इन सैन्य अभ्यासों को ‘सामान्य’ कह दिया जाता है लेकिन ये शत्रुतापूर्ण और भड़काऊ होते हैं। उदाहरण के लिए, यूएस और दक्षिण कोरिया के बीच संयुक्त युद्ध अभ्यासों में उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ परमाणु हमले का, इसके राजनीतिक नेतृत्व के ‘सर कलम’ करने और पूरी तरह से घुसपैठ करने का अभ्यास हुआ। जबकि यूएस और ऑस्ट्रेलिया तथा फ़िलिपींस के युद्ध अभ्यासों में चीन की मुख्य भूमि पर लंबी दूरी की मिसाइल दागने का अभ्यास किया गया। ये बाज जैसी कार्रवाइयाँ राजनयिक बातचीत के रास्ते बंद कर देती हैं और दूसरे देशों के पास अपनी सेनाओं को जवाबी कार्रवाई के लिए संगठित करने के अलावा और कोई चारा नहीं छोड़तीं।
  3. यूएस के हस्तक्षेप का ख़ात्मा- सत्तर साल से ज़्यादा से यूएस ने उत्तर-पूर्व एशिया, ख़ासतौर से कोरियाई प्रायद्वीप और ताइवान की खाड़ी में तनाव को हवा देने का काम कर रहा है। पूरे एशिया-प्रशांत में, यहाँ के लोगों को अपना भविष्य और शांति पथ चुनने का अधिकार होना चाहिए, इसमें किसी भी तरह के विदेशी हस्तक्षेप और सैन्यीकरण की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
  4. एक दूसरे के संघर्षों का सहयोग- उत्तर-पूर्व एशिया में शांति के लिए संघर्ष पूरे क्षेत्र का होना चाहिए। हालांकि स्थानीय संघर्षों की तत्काल माँगों में खो जाना आसान है लेकिन इस क्षेत्र के मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं। इन्हें सुलझाने के लिए दूरदर्शी होना और तमाम संघर्षों को मज़बूत करने की प्रतिबद्धता होना ज़रूरी है। इसके लिए संगठनों को सक्रिय रूप से पूरे क्षेत्र में चल रहे अभियानों और संघर्षों का हिस्सा बनना पड़ेगा न कि सिर्फ़ अपने देश के, जैसे कि हर साल मई में ओकिनावा में एक शांति मार्च निकलता है, 15 जून 2000 को अंतर-कोरियाई सम्मेलन और दूसरे प्रयासों को याद करने के लिए।
  5. अगली पंक्ति के संघर्षों का सहयोग- युद्ध और सैन्यीकरण भले ही अमूर्त और रोज़मर्रा के जीवन से दूर की चीज़ लगते हों, लेकिन जो लोग संघर्ष की ज़मीन पर रह रहे हैं, उन अग्रिम पंक्ति के पास रह रहे लोगों के लिए ये बहुत ठोस और तत्कालीन सच्चाई हैं, जैसे कि कादेना एयर बेस और हेनोको खाड़ी (ओकिनावा में) और सोसेओन्ग-री में THAAD का लगाया जाना और जेजू में नेवल बेस बनाया जाना (दक्षिण कोरिया में)। इन जगहों पर संघर्षों की शुरुआत तो कमोबेश लोगों के जीवन पर पड़ रहे तात्कालिक, स्थानीय प्रभावों की वजह से हुई लेकिन प्रतिरोध ने इसमें शामिल लोगों और व्यापक जनता में बदलाव लाने का काम किया।

हम जोख़िम भरे दौर में रह रहे हैं। यह जरूरी है कि हम साझा ज़मीन और समझ तलाशें ताकि हम सामरिक और रणनीतिक उद्देश्यों पर मिलकर काम कर सकें। ऐसा कर पाने की हमारी क्षमता ही यह तय करेगी कि हम युद्ध रोक पाते हैं या नहीं और इस क्षेत्र में तथा सारी दुनिया में शांति बहाल कर पाते हैं या नहीं। ऐसा करके ही हम लोगों और दुनिया में सुधार पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।


Notes

1 Alex Wellerstein, ‘Counting the dead at Hiroshima and Nagasaki’, Bulletin of the Atomic Scientists, 4 August 2020, https://thebulletin.org/2020/08/counting-the-dead-at-hiroshima-and-nagasaki/.

2 ‘The Spirit of Camp David: Joint Statement of Japan, the Republic of Korea, and the United States’, The White House, 18 August 2023, https://www.whitehouse.gov/briefing-room/statements-releases/2023/08/18/the-spirit-of-camp-david-joint-statement-of-japan-the-republic-of-korea-and-the-united-states/.

3 Mike Yeo, ‘New Japanese Strategy to up Defence Spending, Counterstrike Purchases’, Defence News, 20 December 2022, https://www.defensenews.com/global/asia-pacific/2022/12/20/new-japanese-strategy-to-up-defense-spending-counterstrike-purchases/.

4 For more on the Third Great Depression, see Tricontinental: Institute for Social Research, The World in Economic Depression: A Marxist Analysis of Crisis, notebook no. 4, 10 October 2023, https://dev.thetricontinental.org/dossier-notebook-4-economic-crisis/; for more on the Global North economies and contemporary imperialism, see Tricontinental: Institute for Social Research, Hyper-Imperialism: A Dangerous Decadent New Stage, Studies on Contemporary Dilemmas no. 4, 23 January 2024, https://dev.thetricontinental.org/studies-on-contemporary-dilemmas-4-hyper-imperialism/.

5 ‘President Obama: “Writing the Rules for 21st Century Trade”’, The White House, 18 February 2015, https://obamawhitehouse.archives.gov/blog/2015/02/18/president-obama-writing-rules-21st-century-trade.

6 ‘Leon Panetta: US to Deploy 60% of Navy Fleet to Pacific’, BBC News, 2 June 2012, https://www.bbc.com/news/world-us-canada-18305750.

7 Ren Xiao, ‘Modeling a “New Type of Great Power Relations”: A Chinese Viewpoint’, The Asan Forum, 4 October 2013, https://theasanforum.org/modeling-a-new-type-of-great-power-relations-a-chinese-viewpoint/.

8 For more on trade wars, see Tricontinental: Institute for Social Research, The Imperialism of Finance Capital and ‘Trade Wars’, dossier no. 7, 5 August 2018 https://dev.thetricontinental.org/the-imperialism-of-finance-capital-and-trade-wars/.

9 Donald J. Trump, National Security Strategy of the United States of America (Washington, DC: The White House, 2017), https://trumpwhitehouse.archives.gov/wp-content/uploads/2017/12/NSS-Final-12-18-2017-0905.pdf.

10 Sujai Shivakumar, Charles Wessner, and Thomas Howell, ‘Balancing the Ledger: Export Controls on US Chip Technology to China’, Center for Strategic and International Studies, 21 February 2024, https://www.csis.org/analysis/balancing-ledger-export-controls-us-chip-technology-china.

11 Mary Lovely, ‘US CHIPS Act Threatens to Hollow out Asian Semiconductor Industry’, East Asia Forum Quarterly 15, no. 4 (November 2023), https://eastasiaforum.org/2023/11/26/us-chips-act-threatens-to-hollow-out-asian-semiconductor-industry/.

12 Jon Bateman, ‘Biden Is All-In on Taking Out China, Whatever the Consequences’, Foreign Policy, 12 October 2022, https://foreignpolicy.com/2022/10/12/biden-china-semiconductor-chips-exports-decouple/.

13 Mohammed Hussein and Mohammed Haddad, ‘US Military Presence around the World’, Al Jazeera, 10 September 2021, https://www.aljazeera.com/news/2021/9/10/infographic-us-military-presence-around-the-world-interactive.

14 Hussein and Haddad, ‘US Military Presence around the World’.

15 ‘The Spirit of Camp David’.

16 ‘Press Gaggle by National Security Advisor Jake Sullivan’, The White House, 18 August 2023, https://www.whitehouse.gov/briefing-room/statements-releases/2023/08/18/press-gaggle-by-national-security-advisor-jake-sullivan-thurmont-md/.

17 Justin Katz, ‘US-Japan-ROK to Make “Pledge” to Consult Each Other in Security Crises’, Breaking Defence, 18 August 2023, https://breakingdefense.sites.breakingmedia.com/2023/08/us-japan-rok-to-make-pledge-to-consult-each-other-in-security-crises/.

18 ‘US, Japan, Republic of Korea Conduct Trilateral Aerial Exercise’, United States Indo-Pacific Command, 22 October 2023, https://www.pacom.mil/Media/News/Spotlight/Article/3564925/us-japan-republic-of-korea-conduct-trilateral-aerial-exercise/.

19 Lynn Savage, ‘US INDOPACOM’s Integrated Air and Missile Defence Vision 2028: Integrated Deterrence toward a Free and Open Indo-Pacific’, Journal of Indo-Pacific Affairs, January 2022, https://media.defense.gov/2022/Jan/27/2002929057/-1/-1/1/JIPA%20-%20SAVAGE.PDF.

20 ‘INDOPACOM IAMD Vision 2028’, United States Indo-Pacific Command, 3 November 2021, https://community.apan.org/wg/pic/philippines-pic-portal/m/documents/396455.

21 Gabriel Dominguez, ‘Japan, US, South Korea to Share Missile-Warning Data’, The Japan Times, 13 November 2023, https://www.japantimes.co.jp/news/2023/11/13/japan/politics/japan-us-south-korea-trilateral-analysis/.

22 ‘GSOMIA vs TISA: What is the Big Deal?’, Pacific Forum, 11 February 2020, https://pacforum.org/publications/yl-blog-19-gsomia-vs-tisa-what-is-the-big-deal/.

23 Dominguez, ‘Japan, US, South Korea to Share Missile-Warning Data’.

24 Siegfried Hecker, Hinge Points: An Inside Look at North Korea’s Nuclear Program, (Stanford: Stanford University Press, 2023), 77, 86.

25 Yeon-cheol Seong, ‘Bolton Sabotaged the Korean Peninsula Peace Process at Every Opportunity’, The Hankyoreh, 24 June 2020, https://english.hani.co.kr/arti/PRINT/950798.html.

26 Chery Kang, ‘“THAAD” Anti-Missile System Can’t Protect South Korea from Missile Attacks by Itself’, CNBC, 11 September 2017, https://www.cnbc.com/2017/09/11/south-korea-missile-defense-thaad-system-cant-do-the-job-alone.html.

27 Adam Taylor, ‘Why China Is So Mad about THAAD, a Missile Defence System Aimed at Deterring North Korea’, The Washington Post, 7 March 2017, https://www.washingtonpost.com/news/worldviews/wp/2017/03/07/why-china-is-so-mad-about-thaad-a-missile-defense-system-aimed-at-deterring-north-korea/.

28 Democratic Progressive Party of Taiwan, ‘Party Platform’, accessed 9 April 2024, https://www.dpp.org.tw/en/upload/download/Party_Platform.pdf.

29 ‘Anti-Secession Law (Full Text)’, Embassy of the People’s Republic of China in the United States, 15 March 2005, http://us.china-embassy.gov.cn/eng/zt/twwt/200503/t20050315_4912997.htm.

30 Xi Jinping, ‘Hold High the Great Banner of Socialism with Chinese Characteristics and Strive in Unity to Build a Modern Socialist Country in All Respects: Report to the 20th National Congress of the Communist Party of China’, 16 October 2022, https://www.fmprc.gov.cn/eng/zxxx_662805/202210/t20221025_10791908.html.

31 Susan V. Lawrence and Caitlin Campbell, ‘Taiwan: Political and Security Issues’ (Washington, DC: Congressional Research Service, 4 April 2022), https://crsreports.congress.gov/product/pdf/IF/IF10275/57.

32 Siddarth Kaushal, ‘US Weapons Sales to Taiwan: Upholding the Porcupine Strategy’, Royal United Services Institute, 8 December 2020, https://rusi.org/explore-our-research/publications/commentary/us-weapons-sales-taiwan-upholding-porcupine-strategy.

33 ‘GMD: Frequently Asked Questions’, Center for Arms Control and Non-Proliferation, accessed 6 March 2024, https://armscontrolcenter.org/issues/missile-defense/gmd-frequently-asked-questions/.

34 ‘GMD: Frequently Asked Questions’.

35 ‘The Constitution of Japan’, Prime Minister’s Office of Japan, 1947, https://japan.kantei.go.jp/constitution_and_government_of_japan/constitution_e.html.

36 ‘Occupation and Reconstruction of Japan, 1945-52’, United States Department of State, Office of the Historian, accessed 10 April 2024, https://history.state.gov/milestones/1945-1952/japan-reconstruction.

37 San Francisco Peace Treaty Project, accessed 10 April 2024, http://www.sfpeacetreaty.org/.

38 Foreign Relations of the United States, 1951: Asia and the Pacific, Volume VI, Part 1 (Washington, DC: US Government Printing Office, 1977), 812, https://books.google.ca/books?id=gm5NEc9kWSEC;pg=PA812#v=onepage;f=false.

39 For further reading on the role of the United States in rehabilitating war criminals in Japan, see Jeanne Guillemin, Hidden Atrocities: Japanese Germ Warfare and American Obstruction of Justice at the Tokyo Trial (Ithaca: Cornell University Press, 2017).

40 The Shōwa era refers to the reign of Emperor Shōwa (1926–1989), the beginning of which marked the rise of militarism in Japan.

41 Andrew Levidis, ‘The End of the Kishi Era’, East Asia Forum Quarterly 14, no. 3 (July–September 2022), https://eastasiaforum.org/2022/09/13/the-end-of-the-kishi-era/.

42 Tim Weiner, ‘CIA Spent Millions to Support Japanese Right in 50’s and 60’s’, The New York Times, 9 October 1994, https://www.nytimes.com/1994/10/09/world/cia-spent-millions-to-support-japanese-right-in-50-s-and-60-s.html.

43 Levidis, ‘The End of the Kishi Era’.

44 Lindsay Maizland and Nathanael Cheng, ‘The US-Japan Security Alliance’, Council on Foreign Relations, 4 November 2021, https://www.cfr.org/backgrounder/us-japan-security-alliance.

45 Hussein and Haddad, ‘US Military Presence around the World’.

46 The 2014 reinterpretation of the post-war constitution circumvented the established process of constitutional amendment and was instead made by way of a cabinet decision. Abe’s cabinet was dominated by members of the Nippon Kaigi, a far-right Japanese non-governmental organisation of which Abe himself is also a member. See Akira Kawasaki and Céline Nahory, ‘Japan’s Decision on Collective Self-Defence in Context’, The Diplomat, 3 October 2014, https://thediplomat.com/2014/10/japans-decision-on-collective-self-defense-in-context/.

47 ‘Cabinet Decision on Development of Seamless Security Legislation to Ensure Japan’s Survival and Protect Its People’, Ministry of Foreign Affairs of Japan, 1 July 2014, https://www.mofa.go.jp/fp/nsp/page23e_000273.html.

48 National Security Strategy of Japan (Tokyo: The Government of Japan, 2022), https://www.cas.go.jp/jp/siryou/221216anzenhoshou/national_security_strategy_2022_pamphlet-e.pdf.

49 Yeo, ‘New Japanese Strategy’.

50 Stockholm International Peace Research Institute, ‘SIPRI Military Expenditure Database’, accessed 10 April 2024, https://milex.sipri.org/sipri.

51 Michael Fry, ‘National Geographic, Korea, and the 38th Parallel’, National Geographic, 8 May 2013, https://www.nationalgeographic.com/science/article/130805-korean-war-dmz-armistice-38-parallel-geography.

52 Bruce Cumings, Korea’s Place in the Sun: A Modern History (New York: WW Norton & Company, 2005), 200.

53 Cumings, Korea’s Place in the Sun, 193.

54 Kim-Hwang Kyung-san, ‘Peace, A New Beginning – National Security Law, Our Task Ahead’, The International Strategy Center, 7 June 2018, https://www.goisc.org/englishblog/2018/6/7/peace-a-new-beginning-national-security-law-our-task-ahead.

55 Of the 430 square kilometres of South Korean land that was owned by collaborationists during the Japanese occupation – equivalent to roughly two-thirds the size of Seoul – only 3% has returned to state ownership since liberation. See Kim Ri-taek, ‘The Ever Persistent Cancer of Japanese Collaborators in Modern S Korean History’, The Hankyoreh, 26 February 2019, https://english.hani.co.kr/arti/english_edition/english_editorials/883678.

56 Lee Je-Hun, ‘Yoon Suk-Yeol’s Plan for Forced Labor Compensation Is a Complete Victory for Japan’, The Hankyoreh, 6 March 2023, https://english.hani.co.kr/arti/english_edition/e_national/1082375.

57 The Moon administration committed to the ‘three no’s’: no additional THAAD deployment, no participation in the US missile defence network, and no establishment of a trilateral military alliance with the US and Japan. The Yoon Administration, on the other hand, embraced the US’s ‘free and open Indo-Pacific’. Furthermore, Yoon was the first president to participate in a NATO summit. See Park Byong-su, ‘South Korea’s “Three No’s’”. Announcement Key to Restoring Relations with China’, The Hankyoreh, 2 November 2017, https://english.hani.co.kr/arti/english_edition/e_international/817213.

58 The roots of the People’s Power Party and broader conservative movement in South Korea can be traced back to the Park Chung-hee military dictatorship (1961–1979) and are steeped in an anti-communist ideology. Prior to Korea’s liberation from Japan, Park served in the Imperial Japanese Army, helping to hunt independence fighters. Later, Japan would provide both the inspiration and the funds for Park’s modernisation projects. Park’s daughter, Park Geun-hye, served as South Korea’s president from 2013 to 2017, when she was impeached and convicted on corruption charges. In the aftermath of this scandal, the People’s Power Party was formed through the merger of multiple conservative parties, including the successor to Park Geun-Hye’s Saenuri Party.

59 United States Department of State, The China White Paper, August 1949, ed. Lyman P. Van Slyke (Stanford: Stanford University Press, 1967).

60 ‘National Affairs: An Unsinkable Aircraft Carrier’, Time, 4 September 1950, https://content.time.com/time/subscriber/article/0,33009,856644,00.html.

61 ‘Teaching Human Rights through Documentaries’, Ministry of Culture (Taiwan), 20 April 2014, https://web.archive.org/web/20230330181047/https://www.moc.gov.tw/en/information_196_75811.html.

62 Rupert Wingfield-Hayes, ‘The US Is Quietly Arming Taiwan to the Teeth’, BBC News, 5 November 2023, https://www.bbc.com/news/world-asia-67282107.

63 No Cold War, ‘Taiwan Is a Red Line Issue’, briefing no. 6, 9 February 2023, https://dev.thetricontinental.org/newsletterissue/taiwan/.

64 ‘Building Peace: Preventing War in Northeast Asia’, International Strategy Center, 28–29 October 2023, available at https://www.youtube.com/watch?v=ep4sMtZz5cE.

65 Maia Hibbett, ‘In Their Fight to Stop a New US Military Base, Okinawans Confront Two Colonizers’, The Nation, 16 May 2019, https://www.thenation.com/article/archive/okinawa-japan-us-military/.

66 Hibbett, ‘In Their Fight’.

67 Dae-Han Song, ‘Okinawa: A Bastion for Peace?’, CounterPunch, 6 October 2023, https://www.counterpunch.org/2023/10/06/okinawa-a-bastion-for-peace/.

68 ‘About the Project’, Okinawa Environmental Justice Project, accessed 11 April 2024, https://okinawaejp.blogspot.com/p/about-project.html.

69 Song, ‘Okinawa’.

70 ‘South-North Joint Declaration’, United Nations Peacemaker, 15 June 2000, https://peacemaker.un.org/koreadprk-southnorthdeclaration.

71 Chi Hui Lin, ‘Taiwan Poll Shows Dip in US Trust amid Growing Concern over China’, The Guardian, 23 November 2023, https://www.theguardian.com/world/2023/nov/23/taiwan-poll-shows-dip-in-us-trust-amid-growing-concern-over-china.

72 For more on the ‘rules-based order’ and the UN system, see Tricontinental: Institute for Social Research, Sovereignty, Dignity, and Regionalism in the New International Order, dossier no. 62, 14 March 2023, https://dev.thetricontinental.org/dossier-regionalism-new-international-order/.

73 Anya Wahal, ‘On International Treaties, the United States Refuses to Play Ball’, Council on Foreign Relations, 7 January 2022, https://www.cfr.org/blog/international-treaties-united-states-refuses-play-ball.

74 Tricontinental: Institute for Social Research, The Churning of the Global Order, dossier no. 72, 23 January 2024, https://dev.thetricontinental.org/dossier-72-the-churning-of-the-global-order/; Hussein and Haddad, ‘US Military Presence around the World’.