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ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में फिसड्डी क्यों है भारत?

भारत में व्याप्त आर्थिक संकट और लैंगिक भेदभाव से पैदा हुई परिस्थितियों ने ही ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में भारत को नीचे कर दिया है।

उमेश यादव

वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम ने जून 2025 में ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट जारी की है। पहली बार इसे वर्ष 2006 में जारी किया गया था। तब से हर साल इसको प्रकाशित किया जाता है। जहाँ वर्ष 2006 में 115 अर्थव्यवस्थाओं की रैंकिंग की गई थी, वहीं मौजूदा वर्ष 2025 में कुल 148 अर्थव्यवस्थाओं की रैंकिंग की गई है।

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स महिलाओं तथा पुरुषों के बीच के फ़ासलों को मापता है। इसके लिए चार श्रेणियों में लैंगिक असमानताओं को मापा जाता है जिसके आधार पर जेंडर गैप इंडेक्स तैयार करके देशों की रैंकिंग निर्धारित की जाती है। ये श्रेणियाँ हैं: आर्थिक प्रतिभाग एवं अवसर, शैक्षणिक स्तर, स्वास्थ्य, और राजनीतिक सशक्तीकरण। इन चार श्रेणियों के कुल चौदह सूचकांकों में से निम्नतम बारह सूचकांकों पर जानकारी देने वालों देशों को रैंकिंग में शामिल किया जाता है।

वैश्विक स्तर पर, उत्तरी अमेरिका तथा यूरोप में सबसे कम लैंगिक असमानता मौजूद है। वहीं पश्चिम एशिया, उत्तरी अफ़्रीका और दक्षिणी एशिया में यह फ़ासला सबसे ज़्यादा है। वैश्विक स्तर पर लैंगिक असमानता के बीच भारी अंतर का कारण आर्थिक प्रतिभाग एवं अवसर तथा राजनीतिक सशक्तीकरण में पश्चिम एशिया एवं उत्तरी अफ़्रीका और दक्षिणी एशिया की महिलाओं का वहाँ के पुरुषों की तुलना में अधिक पिछड़ा होना है। शैक्षणिक स्तर और स्वास्थ्य की श्रेणियों में अपेक्षाकृत कम अंतर मौजूद है।

2006 में भारत ने 115 देशों में 98वाँ स्थान हासिल किया था। इस साल भारत का स्थान 148 देशों की सूची में 131वाँ है। पाकिस्तान को छोड़कर भारत के ज़्यादातर पड़ोसी देशों की रैंकिंग साल-दर-साल भारत से बेहतर रही है। भारत की रैकिंग नीची रहने की वजह अन्य श्रेणियों की तुलना में आर्थिक प्रतिभाग एवं अवसर तथा स्वास्थ्य की रैंकिंग का ज़्यादा कम होना है। इस साल की रैंकिंग में भारत को आर्थिक प्रतिभाग एवं अवसर में 144वाँ तथा स्वास्थ्य में 143वाँ स्थान प्राप्त हुआ है।

दरार, कैरेन हेडॉक

आर्थिक प्रतिभाग एवं अवसर में लैंगिक असमानता की गणना करने के लिए श्रम बल भागीदारी दर, पारिश्रामिक तथा जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ कर्मियों, तकनीकी कर्मियों आदि के लैंगिक अनुपात का प्रयोग किया जाता है। भारत में आर्थिक प्रतिभाग एवं अवसर के मामले में महिलाओं तथा पुरुषों के बीच व्याप्त असमानता की जड़ें बेहद पुरानी हैं। 2023-24 में 78 प्रतिशत पुरुषों की तुलना में सिर्फ़ 41 प्रतिशत महिलाएँ ही श्रम बल का हिस्सा थीं। शहरी महिलाओं के मामले में यह आँकड़ा मात्र 27 प्रतिशत था। प्रतिवर्ष होने वाले पीएलएफ़एस के आँकड़े बताते हैं कि पुरुष कर्मियों की तुलना में महिला कर्मियों की पगार में कमी का ट्रेंड भी लगातार बना हुआ है।

शिक्षा के क्षेत्र में महिला तथा पुरुष के बीच फ़ासला कम हुआ है। उच्च शिक्षा पर हुए सर्वेक्षण की सबसे हालिया रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं का नामांकन पुरुषों के नामांकन को भी पार कर गया है। लेकिन यह अचंभे की बात है कि शिक्षा के शीघ्र बाद के चरण, रोज़गार में, महिलाएँ गायब होना शुरू हो जाती हैं। इस विडंबना को समझने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था में रोज़गार के ताने-बाने को समझना आवश्यक है।

भारत सस्ते श्रम के अनंत स्रोत वाली एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है। देश की जीडीपी में सिर्फ़ 18 प्रतिशत का योगदान देने वाले कृषि सेक्टर में तक़रीबन 42 फ़ीसदी आबादी संलग्न है। भारत में तक़रीबन 90 प्रतिशत जोतों का क्षेत्रफल दो हेक्टेयर से कम है। ज़्यादातर परिवार अपने परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने हेतु खेती करते हैं। व्यावसायिक खेती करने वाले परिवारों की संख्या बेहद कम है। ऐसे में कृषि सेक्टर में कार्यरत अधिकतर लोग मजबूरीवश, बेहतर रोज़गार के अभाव में काम कर रहे हैं। ग्रामीण भारत की महिलाएँ मुख्यत: परिवार के कृषि से जुड़े हुए कार्यों में अवैतनिक सहायक के रूप में काम कर रही हैं। अगर इनको छोड़ दें, तो फिर महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बहुत ही कम हो जाएगी।

गैर-कृषि सेक्टर में रोज़गार सृजन में लंबे समय से ठहराव आया हुआ है। जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। पढ़ाई करके काम की तलाश करने वाले लोगों की संख्या स्वाभाविक रूप से बढ़ रही है। मुट्ठी भर रोज़गार को पाने की रेस का ख़ामियाज़ा महिलाओं को ज़्यादा भुगतना पड़ रहा है। सरकार के आँकड़े बताते हैं कि महिलाओं को खेती-बाड़ी जैसे निम्न उत्पादकता सेक्टरों की ओर धकेला जा रहा है जबकि पुरुष गैर-कृषि सेक्टर में रोज़गार पाने की लालसा में दौड़ रहे हैं। आर्थिक त्रासदी लिंगभेद की जड़ों को मज़बूत कर रही है।

कामकाजी महिला, कैरेन हेडॉक

भारत स्वास्थ्य पर सबसे कम ख़र्च करने वाले देशों में से एक है, जहाँ दुनिया के स्तर पर जीडीपी का क़रीब दस प्रतिशत स्वास्थ्य पर ख़र्च होता है, वहीं भारत में मात्र तीन प्रतिशत। सरकारी अस्पतालों की ख़स्ताहाल अवस्था तथा इलाज की आस में खड़े लोगों की लंबी क़तारें भारत के लगभग हर सरकारी अस्पताल की कहानी हैं। इसका अपवाद सिर्फ़ केरल जैसे राज्य हैं जहाँ पर स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे मुद्दों पर वामपंथी प्रतिबद्धता तथा जन सरोकार की वजह से हालात बेहतर हैं। राजकीय शह पर तैयार हुआ निजी स्वास्थ्य सेक्टर बहुसंख्यक आबादी की पहुँच से बाहर है। स्वास्थ्य को अकूत मुनाफ़े का व्यवसाय बना दिये जाने से गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य अमीर वर्ग का विशेषाधिकार बन गया है। वित्तपोषण के अभाव में मरणासन्न सरकारी अस्पतालों को छोड़कर आम आदमी अच्छी गुणवत्ता के लिए निजी अस्पलातों का रुख़ तभी करता है जब उसके सामने कोई और रास्ता नहीं बचता है। दोहरी प्रणाली की इस स्वास्थ्य व्यवस्था में ग़रीबों में भी महिलाओं को भेदभाव का ज़्यादा सामना करना पड़ता है। स्वास्थ्य का व्यावसायीकरण वर्ग के साथ लैंगिक असमानता को भी गहरा करता है।

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में फिसड्डी रैंकिंग का कारण है भारत में व्याप्त आर्थिक संकट और लैंगिक भेदभाव से पैदा हुई परिस्थितियाँ। जहाँ कामगार वर्ग का पुरुष घर के बाहर सस्ते श्रम का स्रोत है, वहीं महिला घर के अंदर तथा बाहर दोनों की जगहों पर सस्ते श्रम का स्रोत है। आर्थिक भागीदारी में लंबे समय से विद्यमान लैंगिक असमानता एक वृहद आर्थिक संकट तथा सामाजिक स्तर पर लिंगभेद का द्योतक है। ये कारक सरकारी उदासीनता के साथ मिलकर स्वास्थ्य सेवा में लैंगिक असमानता को बढ़ावा दे रहे हैं। एक मजबूत सामाजिक तथा राजनीतिक मुहिमजिसकी परिणति नीतिगत बदलाव कर पाने की शक्ति में होके बिना इन मुद्दों को हल नहीं किया जा सकता। इसके बिना ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में भारत की रैंकिंग सुधरने वाली नहीं है।