विकलांग लोग समाज में शरणार्थी नहीं, बल्कि इसका हिस्सा हैं। इनके साथ होने वाले अन्याय दिखाते हैं कि समाज इंसानी गरिमा से ज़्यादा मुनाफ़े को तरजीह देता है।
मानसिक स्वास्थ्य संकट का प्रतिकार हमारे समाज के पुनर्निर्माण में निहित है। पूंजीवाद की गला-काट प्रतिस्पर्धा की संस्कृति की बजाय हमें एकजुटता और देखभाल पर आधारित संस्कृति को स्थापित करना होगा।