पूँजीवादी व्यवस्था जल्दी-जल्दी होने वाले चुनावों को तरजीह देती है, लेकिन गरिमामय भविष्य के निर्माण में सामाजिक शक्तियों को लंबे समय, संघर्ष और संगठन की ज़रूरत पड़ती है।
विकलांग लोग समाज में शरणार्थी नहीं, बल्कि इसका हिस्सा हैं। इनके साथ होने वाले अन्याय दिखाते हैं कि समाज इंसानी गरिमा से ज़्यादा मुनाफ़े को तरजीह देता है।
भविष्य का मतलब कैलेंडर में कोई आने वाली तारीख़ नहीं है। यह संघर्ष है, मानवता को पूँजीवाद की जकड़ से छुड़ाने का और उस राह चलने का जहाँ समस्याएँ सचमुच हल होंगी।